न्यायसूत्र

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न्यायसूत्र भारतीय दर्शन का प्राचीन ग्रन्थ है। इसके रचयिता अक्षपाद गौतम हैं। यह न्यायदर्शन का सबसे प्राचीन रचना है। इसकी रचना का समय दूसरी शताब्दी ईसापूर्व है।

इसका प्रथम सूत्र है -

प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः

(प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है।)

संरचना[संपादित करें]

न्याय दर्शन के कुल पांच अध्याय हैं; प्रत्येक अध्याय में दो आह्रिक हैं। इनमें विद्यमान प्रकरण एवं सूत्रों का विवरण यों हैं:

अध्याय -- प्रकरण -- सूत्र

1 -- 11 -- 61
2 -- 13 -- 137
3 -- 16 -- 145
4 -- 20 -- 118
5 -- 24 -- 67

इस प्रकार न्याय दर्शन के 528 सूत्रों में सोलह पदार्थों का विशद वर्णन किया गया है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]