मुण्डकोपनिषद्
मुंडकोपनिषद् दो-दो खंडों के तीन मुंडकों में, अथर्ववेद के मंत्रभाग के अंतर्गत आता है। यह अद्वैत वेदांत तथा संन्यास निष्ठा का प्रतिपादक है।
परिचय [संपादित करें]
मुण्डकोपनिषद् के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, अथर्वा, अंगी, सत्यवह और अंगिरा की ब्रह्मविद्या की आचार्य परंपरा थी। शौनक की इस जिज्ञासा के समाधान में कि "किस तत्व के जान लेने से सब कुछ अवगत हो जाता है अंगिरा श्रृषि ने उसे ब्रह्मविद्या का उपदेश किया जिसमें उन्होंने विद्या के परा और अपरा भेद करके वेद वेदांग को अपरा तथा उस ज्ञान को पराविद्या नाम दिया जिससे अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है (1. 1. 4.5)।
विहित यज्ञ यागादि के फलस्वरूप स्वर्गादि दिव्य किंतु अनित्य लोक सधते हैं परंतु कर्मफल का भोग समाप्त होते ही मनुष्य अथवा हीनतर योनि में जीव जरामरण के चक्कर में पड़ता है (1. 1.7 - 10)। कर्मफल की नश्वरता देखते हुए संसार से विरक्त हो ब्रह्मनिष्ठ गुरु से दीक्षा लेकर संन्यासनिष्ठा द्वारा ब्रह्मोपलब्धि ही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है (1. 2 - 11.12)।
ब्रह्म "भूतयोनि" है अर्थात् उसी से प्राणिमात्र उत्पन्न होते और उसी में लीन होते हैं। यह क्रिया किसी ब्रह्मबाह्य तत्व से नहीं होती, बल्कि जैसे ऊर्णनाभि (मकड़ी) अपने में से ही जाले को निकालती और निगलती है, जैसे पृथिवी में से औषधियाँ और शरीर से केश और लोम निकलते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म से विश्वसृष्टि होती है। अपने अनिर्वचनीय ज्ञानरूपी तप से वह किंचित् स्थूल हो जाता है जिससे अन्न, प्राण, मन, सत्य, लोक, कर्म, कर्मफल, हिरण्यगर्भ, नामरूप, इंद्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और पृथिवी इत्यादि उत्पन्न होते हैं (1. 1. 6 - 9, 2. 1. 3)। प्रदीप्त अग्नि से उसी के स्वरूप की अनगिनत चिनगारियों की तरह सृष्टि के अशेष भाव ब्रह्म ही से निकलते हैं। यथार्थत: संसार पुरुष (ब्रह्म) का व्यक्त रूप है (2. 1. 1, 2. 1. 10)।
ब्रह्म का सच्चा स्वरूप अव्यक्त और अचिंत्य है। आँख, कान इत्यादि ज्ञानेंद्रियों और हाथ पाँव इत्यादि कमेंद्रियों, तथा मन और प्राण इत्यादि से रहित वह अज, अनादि, नित्य, विभु, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, दिव्य और वर्णनातीत है (1. 1. 6, 2. 1.2)। तथापि सत् और असत्, दूर से दूर, समीप से समीप, ह्रदय में अवस्थित महान् और सूक्ष्म, गतिशील और सप्राणोन्मेष इत्यादि उसके सगुण निर्गुण स्वरूप का वर्णन भी बहुधा हुआ है (2. 2.1, 3. 1.7)।
ब्रह्म को कोरे ज्ञान अथवा पांडित्य से, तीव्र इंद्रियों, मेधा, अथवा कर्म से नहीं पा सकते, कामनाओं का त्याग, निष्ठारूपी बल, सत्य, ब्रह्मचर्य, मन और इंद्रियों की एकाग्रता रूपी तप, अनासक्ति और सम्यक् ज्ञान इत्यादि उपायों से मनोविकारों के नष्ट हो जाने पर बुद्धि शुद्ध हो जाती है जिससे ध्यानावस्था में परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है (3.2 - 2.3.4, 3.1, 5.8)। इसके निमित्त उपनिषदों के महान् अस्त्र प्रणवरूपी धनुष पर उपासना से प्रखर किए आत्मारूपी बाण से तन्मय होकर ब्रह्मरूपी लक्ष्य की बेचने की साधना का निर्देश है (2. 2. 3.4)। इससे जीवात्मा और परमात्मा के अभेद का अनुभवात्मक ज्ञान हो जाता है; ह्रदय की गाँठ खुल जाती, सब संशय मिट जाते और पुण्य और पाप के बंधन से मुक्ति मिल जाती है (2.2.8) एवं मरण काल में आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं। इस "एकीभाव" का स्वरूप बहती हुई नदियों का समुद्र में मिलने पर नामरूप मिटकर एकरसता प्राप्त होने के समान है (3.2.7.8)।
द्वैतवादी "एक ही वृक्ष पर सटे बैठे दो पक्षी मित्रों में एक पीपल के मीठे-मीठे गोदे खाता और दूसरा ताकता मात्र है" (3. 1. 1)। मंत्र में कर्म-फल-भोक्ता आत्मा तथा ब्रह्म का भासमान भेद लेकर दोनों के स्वरूपत: भिन्न मानते हैं, परंतु अनुवर्ती तथा दूसरे मंत्रों एवं उपसंहारात्मक "ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति" (3. 1. 2. 3, 3.2.7-9) वाक्य से ब्रह्मात्मैक्य इस उपनिषद् का सिद्धांत निष्पन्न होता है।
बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]
Sacred Texts - Online
www.ancienttexts.org Also at ancienttexts.org
- Mundaka Upanishad - A simple translation
- Sri Aurobindo, The Upanishads [1]. Sri Aurobindo Ashram, Pondicherry. 1972.