पाशुपत दर्शन

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पाशुपत दर्शन का उल्लेख सर्वदर्शनसंग्रह में है । इसे 'नकुलीश पाशुपति दर्शन' भी कहते हैं।

इस दर्शन में जीव मात्र को 'पशु' की संज्ञा दी गई है । सब जीवों के अधीश्वर 'पशुपति शिव' हैं । भगवान् पशुपति ने बिना किसी कारण, साधन या सहायता के इस जगत् का निर्माण किया, इससे वे स्वतंत्र कर्ता हैं । हम लोगों से भी जो कार्य होते हैं उनके भी भूल कर्ता परमेश्वर ही हैं, इससे पशुपति सब कार्यों के करण स्वरुप हैं।

इस दर्शन में मुक्ति दो प्रकार की कही गई है : एक तो सब दुःखों की अत्यंत निवृत्ति, दूसरी पारमैश्वर्य प्राप्ति । अन्य दार्शनिकों ने दुःख की अत्यंत निवृत्ति को ही 'मोक्ष' कहा है किंतु पाशुपत दर्शन कहता है कि केवल दुःख की निवृत्ति ही मुक्ति नहीं हैं, जब तक साथ ही पारमैश्वर्यप्राप्ति भी न हो तब तक केवल दुःखनिवृत्ति से क्या ? पारमैश्वर्य मुक्ति दो प्रकार की शक्तियों की प्राप्ति है— दृक् शक्ति और क्रिया शक्ति । दृक् शक्ति द्वारा सब वस्तुओं और विषयों का ज्ञान हो जाता है, चाहे वे सूक्ष्म से सूक्ष्म, दूर से दूर, व्यवहित से व्यवहित हों । इस प्रकार सर्वज्ञता प्राप्त हो जाने पर क्रिया शक्ति सिद्ध होती है जिसके द्वारा चाहे जिस बात की इच्छा हो वह तुरंत हो जाती है । उसकी इच्छा की देर रहती है । इन दोनों शक्तियों का सिद्ध हो जाना ही पारमैश्वर्य मुक्ति है । पूर्णप्रज्ञ आदि दार्शनिकों तथा भक्तों का यह कहना कि भगवद्-दासत्व की प्राप्ति ही मुक्ति है, विडंबना मात्र है । दासत्व किसी प्रकार का हो, बंधन ही है, उसे मुक्त (छुटकारा) नहीं कह सकते ।

इस दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम ये तीन प्रमाण माने गए हैं । धर्मार्थसाधक व्यापार को 'विधि' कहते हैं । विधि दो प्रकार की होती है - 'व्रत' और 'द्वार' । भस्मस्नान, भस्मशयन, जप, प्रदक्षिणा, उपहार आदि को व्रत कहते हैं । शिव का नाम लेकर ठहाकर हँसना, गाल बजाना, गाना, नाचना, जप करना आदि 'उपहार' हैं । व्रत सबके सामने न करना चाहिए । 'द्वार' के अंतर्गत क्राथन, स्पंदन, मंदन, शृंगारण, अतित्करण और अवितदभाषण है । सुप्त न होकर भी सुप्त के से लक्षण प्रदर्शन को क्राथन; जैसे हवा के धक्के से शरीर झोंके खाता है उसी प्रकार झोंके खिलाने को स्पंदन; उन्नत्त के समान लड़खडा़ते हुए पैर रखने को मंदन, सुंदरी स्त्री देख वास्तव में कामार्त न होकर कामुकों की सी चेष्टा करने को शृंगारण; अनिवेकियों के समान लोकनिंदित कर्मों की चेष्टा को अवितत्करण तथा अर्थहीन और व्याहत शब्दों के उच्चारण को अवितदभाषण कहते हैं । चित्त द्वारा आत्मा और ईश्वर के संबंध का नाम 'योग' है ।