चरक संहिता

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चरक संहिता आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। यह संस्कृत भाषा में है। इसके उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु, ग्रंथकर्ता अग्निवेश और प्रतिसंस्कारक चरक हैं।

प्राचीन वाङ्मय के परिशीलन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ग्रंथ या तंत्र की रचना शाखा के नाम से होती थी। जैसे कठ शाखा में कठोपनिषद् बनी। शाखाएँ या चरण उन दिनों के विद्यापीठ थे, जहाँ अनेक विषयों का अध्ययन होता था। अत: संभव है, चरकसंहिता का प्रतिसंस्कार चरक शाखा में हुआ हो।

भारतीय चिकित्सा शास्त्र के तीन बड़े नाम हैं - चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट. चरक के नाम से जहां चरक संहिता है, वहीं सुश्रूत के नाम से सुश्रूत संहिता. चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा वाग्भट्ट का अष्टांग संग्रह आज भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) के मानक ग्रन्थ हैं. इन ग्रन्थों की प्रामाणिकता और प्रासंगिकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जहाँ ग्रीक और रोमन चिकित्सा पद्धतियों की तत्कालीन पुस्तकों के नाम स्वयं उस चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक नहीं बता सकते ये ग्रन्थ आज भी पाठ्यक्रम के अंग हैं.

[संपादित करें] रचनाकाल

चरकसंहिता में पालि साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक - विनयपिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा के लिये)। इससे चरकसंहिता का उपदेशकाल उपनिषदों के बाद और बुद्ध के पूर्व निश्चित होता है। इसका प्रतिसंस्कार कनिष्क के समय 78 ई. के लगभग हुआ।

त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है। किंतु कनिष्क बौद्ध था और उसका कवि अश्वघोष भी बौद्ध था, पर चरक संहिता में बुद्धमत का जोरदार खंडन मिलता है। अत: चरक और कनिष्क का संबंध संदिग्ध ही नहीं असंभव जान पड़ता है। पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में मत स्थिर करना कठिन है।

[संपादित करें] चरकसंहिता का संगठन

आचार्य चरक आयुर्वेद के विद्वान थे। उन्होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों और उसके ज्ञान को इकट्ठा करके उसका संकलन किया. चरक ने भ्रमण करके चिकित्सकों के साथ बैठकें की, विचार एकत्र किए और सिद्धांतों को प्रतिपादित किया और उसे पढ़ाई लिखाई के योग्य बनाया. चरक संहिता आठ भागों में विभाजित है और इसमें 120 अध्याय हैं। चरक संहिता में आयुर्वेद के सभी सिद्धांत हैं और जो इसमें नहीं है वह कहीं नहीं है। यह आयुर्वेद के सिद्धांत का पूर्ण ग्रंथ है ।

[संपादित करें] वाह्य सूत्र

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