आदि शंकराचार्य
विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
| आदि शंकराचार्य | |
|---|---|
| तिथि | 509 से 477 ई॰पू॰ [१] |
| जन्मस्थान | कलड़ी, केरल, भारत |
| दर्शन | अद्वैत वेदांत |
| गुरू | गोविंद भगवत्पाद |
| प्रभाव | हिंदू धर्म, हिंदू दर्शन |
| प्रणेता | दशनामी संप्रदाय, षणमत |
आदि शंकराचार्य - जिन्हें शंकर भगवद्पादाचार्य के नाम से भी जाना जाता है, वेदांत के अद्वैत मत के प्रणेता थे। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है।
अनुक्रम |
[संपादित करें] जीवन
[संपादित करें] जन्म और बचपन
[संपादित करें] सन्यास
[संपादित करें] मण्डन मिश्र से भेंट
[संपादित करें] दिग्विजय
[संपादित करें] सर्वज्ञानपीठ आरोहण
[संपादित करें] तिथियाँ
[संपादित करें] मठ
[संपादित करें] दर्शन और विचार
[संपादित करें] संक्षेप में अद्वैत मत
शंकराचार्य एक महान समन्वयवादी थे।उन्हें हिन्दु धर्म को पुनः स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है।एक तरफ उन्होने अद्वैत चिन्तन को पुनर्जीवित हिन्दु धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ किया तो दुसरी तरफ उन्होने जनसामान्य में प्रचलित मुर्तिपुजा का औचित्य सिद्ध करने कई भी कोशिश की। हिन्दु धर्म को दृढ़ आधार प्रदान करने के लिये उन्होने विरोधी पन्थ के मत को भी आंशिक तौर पर अंगीकार किया।शंकर के मायावाद पर महायान बौद्ध चिन्तन का प्रभाव माना जाता है। इसी आधार पर उन्हे प्रछन्न बुद्ध कहा गया है।शंकर के अद्वैत का दर्शन का सार-
-
- ब्रह्म और जीव मुलतः और तत्वतः एक है।हमे जो भी अंतर नजर आता है उसका कारण अज्ञान है।
- जीव की मुक्ति के लिये ज्ञान आवश्यक है।
- जीव की मुक्ति ब्रह्म मे लीन हो जाने मे है।
[संपादित करें] ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रभाव
[संपादित करें] रचनाएँ
[संपादित करें] देखें
[संपादित करें] ध्यान दें
[संपादित करें] जहाँ से जानकारी ली गयी
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
ये लेख अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है, यानि कि एक आधार है। आप इसे बढ़ाकर विकिपीडिया की मदद कर सकते है। ![]()

