भज गोविन्दम्

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भज गोविन्दम् ८वीं शताब्दी[1] की एक लोकप्रिय हिन्दू भक्ति रचना है, जो संस्कृत में लिखी गयी है, तथा इसे लिखने का श्रेय आदि शंकराचार्य को है। यह रचना यह रेखांकित करती है कि प्रभु (यहाँ गोविन्द) के प्रति भक्ति सामान्य अध्यात्म का एक अति महत्त्वपूर्ण भाग है, जिसका कि भक्ति योग व भक्ति आंदोलन द्वारा समर्थन किया गया है।[2]

सार्थकता[संपादित करें]

यह कालजयी रचना इस बात की स्मारिका है कि आदि शंकर जिन्हें ज्ञानमार्ग का महान पुरोधा माना जाता है वे भी भक्ति को समान लक्ष्य तक पहुँचाने वाली बताकर प्रशंसा करने में नहीं हिचकिचाये।[3] तथा जैसा कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अपने भाष्य में लिखा है, जब बुद्धिमत्ता परिपक्व होती है तो हृदय में जमकर जड़ें जमा लेती है, वह प्रज्ञा (विज़्डम) बन जाती है। जब वह प्रज्ञा जीवन के साथ संयुक्त होती है तथा क्रिया का रूप ले लेती है तब भक्ति बन जाती है। ज्ञान जो परिपक्व होता है भक्ति कहलाता है। यदि यह भक्ति में नहीं बदलता तो निरुपयोगी है।[4]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Review Yogalife, sivananda.org, 2003.
  2. Bhaja Govindam, by Sankarācārya, Chinmayananda, Translated by Brahmacharini Sharada. Published by Chinmaya Publications Trust, 1967. Page5-7.
  3. Bhaja Govindam Ancient Wisdom, Yogalife, Fall 2003 Issue.Sivananda.
  4. Commentary on Bhaja Govindam by C. Rajagopalachari.

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बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]