मण्डन मिश्र

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के संस्थापक डॉ मंडन मिश्र के बारे में अन्यत्र देखें।


मंडन मिश्र, पूर्व मीमांसा दर्शन के बड़े प्रसिद्ध आचार्य थे। कुमारिल भट्ट के बाद इन्हीं को प्रमाण माना जाता है। अद्वैत वेदांत दर्शन में भी इनके मत का आदर है। ये भर्तृहरि के बाद कुमारिल के अंतिम समय में तथा आदि शंकराचार्य के समकालीन थे।

मीमांसा और वेदांत दोनों दर्शनों पर इन्होंने मौलिक ग्रंथ लिखे। मीमांसानुक्रमाणिका, भावनाविवेक और विधिविवेक - ये तीन ग्रंथ मीमांसा पर; शब्द दर्शन पर स्फोटसिद्धि, प्रमाणाशास्त्र पर विवेक तथा अद्वैत वेदांत पर ब्रह्मसिद्धि - ये इनके ग्रंथ हैं। शालिकनाथ तथा जयंत भट्ट ने वेदांत का खंडन करते समय मंडन का ही उल्लेख किया। शांकर भाष्य के सुप्रसिद्ध व्याख्याता, भामती के निर्माता वाचस्पति मिश्र ने मंडन की ब्रह्मसिद्धि को ध्यान में रखकर अपनी कृति लिखी।

मंडन और सुरेश्वर[संपादित करें]

एक परंपरा के अनुसार मंडन कुमारिल भट्ट के शिष्य थे। यही बाद में शंकराचार्य द्वारा शास्त्रार्थ में पराजित होकर संन्यासी हो गए और उनका नाम सुरेश्वराचार्य पड़ा। मंडन और सुरेश्वर एक ही हैं या अलग-अलग - इसको लेकर बड़ा विवाद हुआ है। अधिकांश प्रमाण दोनों की भिन्नता के पक्ष में ही मिलते हैं। मंडन ने शब्दाद्वैत का समर्थन किया है, पर सुरेश्वर इसके बारे में मौन हैं। मंडन ने अद्वैतप्रस्थान में अन्यथाख्यातिवाद का बहुत हद तक समर्थन किया, पर सुरेश्वर इसका खंडन करते हैं। मंडनके अनुसार जीव अविद्या का आश्रय है, सुरेश्वर ब्रह्म को ही अविद्या का आश्रय और विष मानते हैं। इसी मतभेद के आधार पर अद्वैत वेदांत के दो प्रस्थान चल पड़े। भामती प्रस्थान मंडन का अनुयायी बना, विवरण प्रस्थान सुरेश्वर के सिद्धांतों पर चला। सुरेश्वर शुद्धज्ञान को मोक्ष का मार्ग मानते हैं पर मंडन के अनुसार वेदांत के श्रवणमात्र से मोक्ष नहीं मिलता, जब तक अग्निहोत्र आदि कर्म ज्ञान के सहकारी न हो यही नहीं, किसी प्राचीन प्रामाणिक ग्रंथ में मंडन और सुरेश्वर को एक नहीं माना गया है। मंडन मिश्र कुमारिल भट्ट के शिष्य थे, इस बात का कोई अकाट्य प्रमाण नहीँ मिलता। यह बात केवल 'शंकर-दिग्विजय' के आधार पर कही जाती है, जो कि एक नितान्त अप्रामाणिक कथा-पुस्तक है। मंडन और सुरेश्वर की भिन्नता के ही जब अधिकांश प्रमाण मिलते हैं तो यह कहा जाना किसी भी तरह से उचित नहीँ है कि मंडन ही शास्त्रार्थ में पराजित होकर सुरेश्वर बने थे। दरअसल इन दोनों महापुरुषों (मंडन और शंकर) के बीच शास्त्रार्थ होने की बात ही पूरी तरह काल्पनिक और रणनीतिक है,जो मध्यकाल में शंकर के मठ द्वारा प्रचारित किया गया।शब्दाद्वैत,अन्यथाख्यातिवाद,अविद्या,जीव,ब्रह्म आदि के बारे में सुरेश्वर के जो भी विचार हैं, वे शत-प्रतिशत शंकराचार्य के अनुगामी हैं।गुरु के चरणों की प्रीति ही उनका परम लक्ष्य है। वे असहिष्णुता की हद तक मंडन का विरोध करते हैं और उन्हें अलग प्रस्थान का अद्वैतवेदान्ती बताते हैं।फिर,वही सुरेश्वर स्वयं मंडन कैसे हो सकते हैं?'विवरण-प्रस्थान' के प्रवर्तक सुरेश्वर नहीं, 'विवरण-कार' हैं,जबकि 'भामती-प्रस्थान'पूरी तरह मंडन का अनुगमन करता है। जब किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में मंडन और सुरेश्वर को एक नही माना गया है, तब हमारे विद्वान-गण क्यों शास्त्रार्थ के मिथक का बोझ सर पर उठाए युग-युग से परेशान हो रहे हैं।अब भी तो सच को स्वीकार किया जाए.