वैदिक धर्म

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हिन्दू मापन प्रणाली

वैदिक धर्म वैदिक सभ्यता का मूल धर्म था, जो भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य एशिया में हज़ारों वर्षों से चलता आ रहा है। आधुनिक सनातन धर्म अथवा हिन्दू धर्म इसी धार्मिक व्यवस्था पर आधारित हैं। वैदिक संस्कृत में लिखे चार वेद इसकी धार्मिक किताबें हैं। हिन्दू मान्यता के अनुसार ऋग्वेद और अन्य वेदों के मन्त्र ईश्वर द्वारा ऋषियों को प्रकट किये गए थे। इसलिए वेदों को 'श्रुति' (यानि, 'जो सुना गया है') कहा जाता है, जबकि रामायण जैसे बाद के हिन्दू धर्म ग्रंथों को 'स्मृति' (यानि, 'जो मानव स्मृति पर आधारित है') कहा जाता है। वेदों को 'अपौरुषय' (यानि 'पुरुष द्वारा कृत नहीं') भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है कि उनकी कृति दिव्य है।

वैदिक धर्म की जड़ें आदिम हिन्द-ईरानी धर्म और उस से भी प्राचीन आदिम हिन्द-यूरोपीय धर्म तक पहुँचती हैं, जिनके कारण बहुत से वैदिक देवी-देवता यूरोप, मध्य एशिया और ईरान के प्राचीन धर्मों में भी किसी-न-किसी रूप में मान्य थे, जैसे की मित्र, वरुण, बृहस्पति (द्यौस-पितृ), वायु-वात, सरस्वती, वग़ैराह। इसी तरह बहुत से हिन्दू धार्मिक शब्दों के सजातीय शब्द पारसी धर्म और प्राचीन यूरोपीय धर्मों में पाए जाते हैं, जैसे कि सोम (फ़ारसी: होम), यज्ञ (फ़ारसी: यस्न), इत्यादि।[1]

आत्मा की एकता[संपादित करें]

वैदिक धर्म में आत्मा की एकता पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। जो आदमी इस तत्व को समझ लेगा, वह किससे प्रेम नहीं करेगा? जो आदमी यह समझ जाएगा कि 'घट-घट में तोरा साँई रमत है!' वह किस पर नाराज होगा? किसे मारेगा? किसे पीटेगा? किसे सताएगा? किसे गाली देगा? किसके साथ बुरा व्यवहार करेगा?

यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥

जो आदमी सब प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, उसके लिए किसका मोह, किसका शोक? वैदिक धर्म का मूल तत्व यही है। इस सारे जगत में ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है। उसी को पाने के लिए, उसी को समझने के लिए हमें मनुष्य का यह जीवन मिला है। उसे पाने का जो रास्ता है, उसका नाम है धर्म।

धर्म के चार लक्षण मनु महाराज ने धर्म के चार लक्षण बताए हैं:

वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विघं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्‌॥

धर्म की कसौटी चार हैं :

  • वेद,
  • स्मृति,
  • सदाचार
  • आत्मा को रुचने वाला आचरण
  • सत्याचरण


वेद[संपादित करें]

वेद चार हैं। हर वेद के चार विभाग हैं : संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् हिन्दू धर्म का मूल आधार है वेद। वेद का अर्थ है ज्ञान। संस्कृत की 'विद्' धातु से 'वेद' शब्द बना है। 'विद्' यानी जानना।

वेद को 'श्रुति' भी कहा जाता है। 'श्रु' धातु से 'श्रुति' शब्द बना है। 'श्रु' यानी सुनना। कहते हैं कि ऋषियों को अंतरात्मा में परमात्मा के पास से ज्ञान सुनाई पड़ा।

वेद चार हैं : ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

  • ऋग्वेद : यह सबसे पुराना वेद है। इसमें 10 मंडल हैं और 10552 मंत्र। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना और स्तुतियाँ हैं।
  • यजुर्वेद : इसमें 1975 मंत्र और 40 अध्याय हैं। इस वेद में अधिकतर यज्ञ के मंत्र हैं।
  • सामवेद : इसमें 1875 मंत्र हैं। ऋग्वेद की ही अधिकतर ऋचाएँ हैं। इस संहिता के सभी मंत्र संगीतमय हैं, गेय हैं।
  • अथर्ववेद : इसमें 5987 मंत्र और 20 कांड हैं। इसमें भी ऋग्वेद की बहुत-सी ऋचाएँ हैं।

चारों वेदों में कुल मिलाकर 20389 मंत्र हैं।

वैदिक ऋषि

प्राचीनकाल में भारत देश में जो लोग ज्ञानी थे, आचार-विचार वाले थे, जिनका हृदय उदार था, जिनके विचार ऊँचे थे, उन्हें लोग 'ऋषि' कहा करते थे। 'सादा जीवन, उच्च विचार' उनका आदर्श था।

वे धर्म के गूढ़ विषयों पर चिंतन करते थे, सादा और पवित्र जीवन बिताते थे और समाज को सही रास्ता दिखाया करते थे। वैदिक साहित्य इन ऋषियों की ही पवित्र धरोहर है। 5000 साल पहले भी उससे लोगों को प्रेरणा मिलती थी और आज भी मिलती है।

वैदिक देवता

वेदों में हमें बहुत से देवताओं की स्तुति और प्रार्थना के मंत्र मिलते हैं। इनमें मुख्य-मुख्य देवता ये हैं :

वेदों के देवतागण
अग्नि, वायु, इंद्र, वरुण, मित्र, अश्विनीकुमार, ऋतु, मरुत्‌ त्वष्टा, सोम, ऋभुः, द्यौः, पृथ्वी, विष्णु, पूषा, सविता, उषा, आदित्य, यम, रुद्र, सूर्य, बृहस्पति, वाक्‌, काल, अन्न, वनस्पति, पर्वत, पर्जन्य, धेनु, पितृ, मृत्यु, आत्मा, औषधि, अरण्य, श्रद्धा, शचि, अदिति, हिरण्यगर्भ, विश्वकर्मा, प्रजापति, पुरुष, आपः, श्री सीता, सरस्वती

कभी तो हम शरीर को मनुष्य कहते हैं, कभी उसकी आत्मा को। उसी तरह वैदिक ऋषि भी दो रूपों में देवताओं की प्रार्थना करते थे। कभी जड़ पदार्थ के रूप में, कभी उस जड़ के भीतर रहने वाले चेतन परंपरा के रूप में। जैसे- 'सूर्य' शब्द से कभी उनका आशय होता था उस तेज चमकते हुए गोले से, जिसे हम 'सूर्य' कहकर पुकारते हैं।

कभी 'सूर्य' से उनका आशय होता था, सूर्य के रूप में प्रकाशमान परमात्मा से। ऋषियों का ऐसा विश्वास था कि एक ही महान सत्ता नाना देवताओं के रूप में बिखरी है। उसी की वे स्तुति करते थे, उसी की प्रार्थना। उसी की वे उपासना करते थे। उसी को प्रसन्न करने के लिए वे यज्ञ करते थे।

मंत्रों का सौंदर्य[संपादित करें]

वेद के मंत्रों में सुंदरता भरी पड़ी है। वैदिक पंडित जब स्वर के साथ वेद मंत्रों का पाठ करते हैं, तो चित्त प्रसन्न हो उठता है। जो भी सस्वर वेदपाठ सुनता है, मुग्ध हो उठता है।

इतना ही नहीं, ऋचाओं में जो अर्थ भरा है, वह तो उससे भी सुंदर है। उनमें जो भाव भरे हैं, वे मनुष्य को ऊपर उठाने वाले हैं। समाज को ऊपर उठाने वाले हैं। उनसे आत्मा का भी कल्याण होता है, समाज का भी।

कर्म, ज्ञान और उपासना[संपादित करें]

वेदों के मुख्य रूप से तीन भाग हैं : 1) कर्मकाण्ड, 2) ज्ञानकाण्ड और 3) उपासनाकाण्ड

कर्मकाण्ड में यज्ञ कर्म दिया गया है, जिससे यज्ञ करने और कराने वाले को लोक-परलोक में सुख मिले।

ज्ञानकाण्ड में परमात्मा और आत्मा का तत्व और लोक-परलोक का रहस्य बताया गया है।

उपासनाकाण्ड में ईश्वर भजन की विधि बताई गई है। इससे मनुष्य को लोक-परलोक में सुख मिल सकता है और ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।

ब्राह्मण में कहा है

वेदों के दो मुख्य विभाग हैं : संहिता और ब्राह्मण। संहिता को वेद कहते हैं। उसमें मंत्र हैं। ब्राह्मण ग्रंथों के तीन भाग हैं :

1) ब्राह्मण, 2) आरण्य और 3) उपनिषद्

ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञों की चर्चा है। वेदों के मंत्रों की व्याख्या है। यज्ञों के विधान का विस्तार से वर्णन है।

मुख्य ब्राह्मण 3 हैं :

  • ऐतरेय,
  • तैत्तिरीय,
  • शतपथ
आरण्यक में कहा है

वेदों की रचना ऋषियों ने की है। वे रहते थे वनों में, जंगलों में। वन को संस्कृत में कहते हैं 'अरण्य'। अरण्यों में बने हुए ग्रंथों का नाम पड़ गया 'आरण्यक'।

मुख्य आरण्यक पाँच हैं :

  1. ऐतरेय,
  2. शांखायन,
  3. बृहदारण्यक,
  4. तैत्तिरीय और
  5. तवलकार।

उपनिषद[संपादित करें]

वेद के अंतिम भाग का नाम है उपनिषद्। उपनिषद् शब्द बना है सद् धातु से। सद् का अर्थ होता है नाश होना, मिलना और शिथिल करना। उपनिषद् का अर्थ है ब्रह्मविद्या। ब्रह्मविद्या से अविद्या का नाश होता है, आनंद मिलता है और जन्म-मरण का दुःख छूट जाता है।

मुख्य उपनिषद्

सभी वेदों की अपनी-अपनी उपनिषदें हैं। आजकल 108 उपनिषदें मिलती हैं। मुख्य उपनिषदें हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वर।

स्मृति[संपादित करें]

स्मृति में आते हैं:-

  1. छः वेदांग,
    1. शिक्षा,
    2. कल्प,
    3. व्याकरण,
    4. निरुक्त,
    5. छंद,
    6. ज्योतिष
  2. धर्मशास्त्र,
  3. इतिहास,
  4. पुराण और
  5. नीति के सभी ग्रंथ
मुख्य स्मृतियाँ हैं 
  1. मनु स्मृति (मानव धर्मशास्त्र),
  2. याज्ञवल्क्य स्मृति,
  3. अत्रि स्मृति,
  4. विष्णु स्मृति,
  5. आपस्तम्ब स्मृति,
  6. पाराशर स्मृति,
  7. व्यास स्मृति और
  8. वशिष्ठ स्मृति।

दीक्षा और तप[संपादित करें]

सत्य की साधना के लिए दीक्षा भी चाहिए और तपस्या भी।

यजुर्वेद में कहा है :-

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽप्नोति दक्षिणाम्‌। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥

व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा से दक्षिणा, दक्षिणा से श्रद्धा और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।


तप का अर्थ[संपादित करें]

इंद्रियों का संयम। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए तप करना ही पड़ता है। धर्म को पाने के लिए भी तप करना जरूरी है। ब्रह्मचर्य-जीवन में जिस तरह तपस्या करनी पड़ती है, उसी तरह आगे भी।


ब्रह्म और यज्ञ[संपादित करें]

ब्रह्म का अर्थ है प्रार्थना। वैदिक मंत्रों का विधिवत पाठ करना, मंत्रों का जप करना, परमात्मा की स्तुति और प्रार्थना करना धर्म का आवश्यक अंग माना गया है। उसी तरह यज्ञ करना भी। प्रार्थना और यज्ञ करने वाला सदाचारी होना चाहिए। नहीं तो उसकी पूजा-प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। सदाचारी लोग ही तरते हैं, दुराचारी नहीं।

ऋग्वेद में कहा है :-

ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]


बाहरी कड़ियां[संपादित करें]