राधेश्याम कथावाचक

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

राधेश्याम कथावाचक (1890 - 1963)[1] पारसी रंगमंच शैली के हिन्दी नाटककारों में एक प्रमुख नाम है। उनका जन्म 25 नवम्बर 1890 को उत्तर-प्रदेश राज्य के बरेली शहर में हुआ था। अल्फ्रेड कम्पनी से जुड़कर उन्होंने वीर अभिमन्यु, भक्त प्रहलाद, श्रीकृष्णावतार आदि अनेक नाटक लिखे। परन्तु सामान्य जनता में उनकी ख्याति राम कथा की एक विशिष्ट शैली के कारण फैली। लोक नाट्य शैली को आधार बनाकर खड़ी बोली में उन्होंने रामायण की कथा को 25 खण्डों में पद्यबद्ध किया। इस ग्रन्थ को राधेश्याम रामायण के रूप में जाना जाता है। आगे चलकर उनकी यह रामायण उत्तरप्रदेश में होने वाली रामलीलाओं का आधार ग्रन्थ बनी। 26 अगस्त 1963 को 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।[2]

संक्षिप्त परिचय[संपादित करें]

राधेश्याम का जन्म 25 नवम्बर 1890 को संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध में बरेली शहर के बिहारीपुर मोहल्ले में पण्डित बांकेलाल के यहाँ हुआ था। महज 17-18 की आयु में ही उन्होंने सहज भाव से राधेश्याम रामायण की रचना कर ली थी। यह रामायण अपनी मधुर गायन शैली के कारण शहर कस्बे से लेकर गाँव-गाँव और घर-घर आम जनता में इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि उनके जीवनकाल में ही उसकी हिन्दी-उर्दू में कुल मिलाकर पौने दो करोड़ से ज्यादा प्रतियाँ छपकर बिक चुकी थीं। रामकथा वाचन की शैली पर मुग्ध होकर मोतीलाल नेहरू ने उन्हें इलाहाबाद अपने निवास पर बुलाकर चालीस दिनों तक कथा सुनी थी। 1922 के लाहौर विश्व धर्म सम्मेलन का शुभारम्भ उन्ही के लिखे व गाये मंगलाचरण से हुआ था। राधेश्याम कथावाचक नेमहारानी लक्ष्मीबाई और कृष्ण-सुदामा जैसी फिल्मों के लिये गीत भी लिखे। महामना मदनमोहन मालवीय उनके गुरु थे तो पृथ्वीराज कपूर अभिन्न मित्र, जबकि घनश्यामदास बिड़ला उनके परम भक्त थे। स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने भी उन्हें नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आमन्त्रित कर उनसे पंद्रह दिनों तक रामकथा का आनन्द लिया था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु धन जुटाने महामना जब बरेली पधारे तो राधेश्याम ने उनको अपनी साल भर की कमाई उन्हें दान दे दी थी। 26 अगस्त 1963 को अपनी मृत्यु से पूर्व वे अपनी आत्मकथा भी मेरा नाटककाल नाम से लिख गये थे।[2]

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स में हिन्दी की प्रोफेसर पामेला के अनुसार राधेश्याम कथावाचक ने हिन्दी भाषा को एक विशिष्ट शैली की रामायण लिखकर काफी समृद्ध किया। वे इतने सधे हुए नाटककार थे कि उनके नाटकों पर प्रतिबन्ध लगाने का कोई आधार ब्रिटिश राज में अंग्रेजों को भी नहीं मिला।[3]

कृतियाँ[संपादित करें]

राधेश्याम कथावाचक ने रामायण के अतिरिक्त अनेक नाटक भी लिखे। एक समय ऐसा भी था जब उनके नाटकों ने पेशावर, लाहौर और अमृतसर से लेकर दिल्ली, जोधपुर, बंबई, मद्रास और ढाका तक पूरे हिन्दुस्तान में धूम मचा रक्खी थी। भक्त प्रहलाद नाटक में पिता के आदेश का उल्लंघन करने के बहाने उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन का सफल सन्देश दिया तथा हिरण्यकश्यप के दमन व अत्याचार की तुलना ब्रिटिश शासकों से की।[3] उनकी प्रमुख नाट्य कृतियाँ निम्न हैं:[2]

  • वीर अभिमन्यु -1915,
  • श्रवणकुमार -1916,
  • परमभक्त प्रह्लाद -1917,
  • परिवर्तन -1917,
  • श्रीकृष्ण अवतार -1926,
  • रुक्मिणी मंगल -1927,
  • मशरिकी हूर -1927,
  • महर्षि वाल्मीकि -1939,
  • देवर्षि नारद -1961,
  • उद्धार और आज़ादी।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. वर्मा श्याम बहादुर, बृहत सूक्ति कोश भाग-2 प्रभात प्रकाशन 2009 ISBN 8173151695, पृष्ठ: 539, अभिगमन तिथि: 27 दिसम्बर 2013
  2. शीर्ष कथावाचक और रंगकर्मी पंडित राधेश्याम 24 नवम्बर 2012 दैनिक ट्रिब्यून, अभिगमन तिथि: 27 दिसम्बर 2013
  3. हिन्दी दिवस 14 सितम्बर को: राधेश्याम कथावाचक 13 दिसम्बर 2011, हिन्दुस्तान लाइव, अभिगमन तिथि: 27 दिसम्बर 2013

सहायक पुस्तकें[संपादित करें]

हिंदी साहित्य कोष भाग- 2

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]