नारायण प्रसाद 'बेताब'

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नारायणप्रसाद 'बेताब' (१८७२ - १५ सितंबर, १९४५) प्रसिद्ध नाटककार थे।

परिचय[संपादित करें]

आदरणीय पं नारायण प्रसाद बेताब जी की लेखनी में मां सरस्वती साक्षात वास करती प्रतीत होती हैं, बुलंदशहर के एक कस्बे औरंगाबाद के समीप संवत् १९२९ में ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही उन्हें तुकबंदी का शौक था। औरंगाबाद के पंडित श्लेषचंद वैद्य से उन्होंने पिंगल शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया और ये 'भूलना' लिखकर दंगलों में सुनाने लगे।

वैद्य जी के अतिरिक्त बेताब ने जनाब हकीम मो. खाँ साहब तालिब को उस्ताद मानकर उनसे भी उर्दू की शिक्षा प्राप्त की। साथ ही उन्होंने निजामी तथा कैफ साहब से पद-विन्यास-पद्धति तथा उर्दू न्यायशास्त्र सीखा।

छंद:शास्त्र की पुस्तक 'पिंगलखार' तथा आलोचना की दिशा में उन्होंने 'पद्य परीक्षा' नामक पुस्तक की रचना की। नये कवियों के पथप्रदर्शन के लिए बेताब ने 'प्रासपुंज' नामक पुस्तक लिखी। 'मिश्र बंधु प्रलाप' नामक पुस्तक में हिंदी नवरत्न में मिश्रबंधुओं द्वारा ब्रह्म भट्ट जाति पर लगाए गए लांछनों का युक्तियुक्त खंडन किया। यह पुस्तक अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज की ओर से प्रकाशित हुई है।

१९०३ ई. में बेताब पारसी थियेट्रिकल कंपनी में कार्य करने के लिए बंबई चले गए। बंबई में एल्फ्रडे कंपनी ने इनके महाभारत, रामायण तथा जहरी साँप, गणेशजन्म, सीता वनवास नामक नाटकों को खेला। नाटकों के अतिरिक्त बेताब ने चलचित्रों में भी योग दिया है।

बेताब प्रिंटिंग प्रेस का अनावरण

१९१२ के आसपास पंडित जी ने बेताब प्रिंटिंग प्रेस खोली और विभिन्न पुस्तकों की रचना और प्रकाशन किया, यह प्रेस उनकी मृत्यु के पश्चात भानू प्रिंटिंग प्रेस के नाम से संचालित होती रही, जिसे उनके पुत्र भानू जी ने संचालित किया, भानू जी के मुम्बई प्रस्थान के बाद भानू जी के साले श्री राजकुमार जी और उनके भाई द्वारा इसे चलाया गया, २०१० के दशक में दुर्भाग्यवश यह प्रेस किसी अन्य को बेच दी गई,

पटकथा लेखन

१९३१ ई. में रणजीत फिल्म कंपनी के चित्र 'देवी देवयानी' के आपने संवाद तथा गीत लिखे। भारतीय फिल्म जगत् के सफल कलाकार पृथ्वीराज कपूर जोकि बेताब जी को अपना गुरु मानते थे, को पृथ्वी थियेटर्स के निर्माण में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। मार्च, १९४४ में आपने पृथ्वी थियेटर के लिए 'शकुंतला' नामक नाटक लिखा। नाटकों की भाषा के संबंध में बेताब हिंदुस्तानी के पक्षपाती थे। इनकी हिंदुस्तानी एकदम उर्दू की ओर झुकी हुई नहीं होती थी परंतु उसमें यथास्थान संस्कृत हिंदी के भी काफी शब्द रहते थे। बेताब की भाषा मुहावरेदार तथा टकसाली थी। उन्होंने २४ नाटकों, ३७ फिल्मी कथाओं तथा ३८ अन्य पुस्तकों की रचना की है। १५ सितंबर १९४५ ई. को उनकी मृत्यु हुई।

ब्रह्मभटट शोध संस्थान कुचेसर (फोर्ट) बुलन्दशहर उत्तर प्रदेश[संपादित करें]

ब्रह्मभटट शोध संस्थान बुलन्द शहर द्वारा सन 2018 ई से पंडित नारायण प्रसाद बेताब जी पर शौध किया जा रहा है, इस संदर्भ में पंडित जी द्वारा रचित अनेकानेक पुस्तकों का संरक्षण और खोज का कार्य किया जा रहा है, इच्छुक व्यक्ति जिनके पास पंडित नारायण प्रसाद बेताब जी का कोई साहित्य या संस्मरण हो तो वह ईमेल करें Code108india@hotmail.com