गणितसारसंग्रह

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गणितसारसंग्रहः भारतीय गणितज्ञ महावीराचार्य द्वारा संस्कृत भाषा में रचित एक गणित ग्रन्थ है।

संरचना[संपादित करें]

  1. संज्ञाधिकारः (Terminology)
  2. परिकर्मव्यवहारः (Arithmetical operations)
  3. कालासवर्णव्यवहारः (Fractions)
  4. प्रकीर्णकव्यवहारः (Miscellaneous problems)
  5. त्रैराशिकव्यवहारः (Rule of three)
  6. मिश्रकव्यवहारः (Mixed problems)
  7. क्षेत्रगणितव्यवहारः (Measurement of Areas)
  8. खातव्यवहारः (calculations regarding excavations)
  9. छायाव्यवहारः (Calculations relating to shadows)

गणितशास्त्रप्रशंसा[संपादित करें]

गणितसारसंग्रहः के 'संज्ञाधिकारः' में मंगलाचरण के पश्चात महावीराचार्य ने बड़े ही मार्मिक ढंग से गणित की प्रशंशा की है।

लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः।
व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥
कामतन्त्रेऽर्थशास्त्रे च गान्धर्वे नाटकेऽपि वा।
सूपशास्त्रे तथा वैद्ये वास्तुविद्यादिवस्तुसु॥
छन्दोऽलङ्कारकाव्येषु तर्कव्याकरणादिषु।
कलागुणेषु सर्वेषु प्रस्तुतं गणितं परम्॥
सूर्यादिग्रहचारेषु ग्रहणे ग्रहसंयुतौ।
त्रिप्रश्ने चन्द्रवृत्तौ च सर्वत्राङ्गीकृतं हि तत्॥
द्वीपसागरशैलानां संख्याव्यासपरिक्षिपः।
भवनव्यन्तरज्योतिर्लोककल्पाधिवासिनाम्॥
नारकाणां च सर्वेषां श्रेणीबन्धेन्द्रकोत्कराः।
प्रकीर्णकप्रमाणाद्या बुध्यन्ते गणितेन् ते॥
प्राणिनां तत्र संस्थानमायुरष्टगुणादयः।
यात्राद्यास्संहिताद्याश्च सर्वे ते गणिताश्रयाः॥
बहुभिर्प्रलापैः किं त्रैलोक्ये सचराचरे।
यत्किञ्चिद्वस्तु तत् सर्वं गणितेन् बिना न् हि॥
लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः।
व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥

अर्थ: लौकिक, वैदिक तथा सामयिक में जो व्यापार है वहाँ सर्वत्र संख्या का ही उपयोग होता है। कामशास्त्र, अर्थशास्त्र, गन्धर्वशास्त्र, गायन, नाट्यशास्त्र, पाकशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, अलंकार, काव्य, तर्क, व्याकरण आदि में तथा कलाओं में समस्त गुणों में गणित अत्यन्त उपयोगी है। सूर्य आदि ग्रहों की गति ज्ञात करने में, देश और काल को ज्ञात करने में सर्वत्र गणित अंगीकृत है। द्वीपों, समूहों और पर्वतों की संख्या, व्यास और परिधि, लोक, अन्तर्लोक, स्वर्ग और नरक के निवासी, सब श्रेणीबद्ध भवनों, सभा एवं मन्दिरों के निर्माण गणित की सहायता से ही जाने जाते हैं। अधिक कहने से क्या प्रयोजन? तीनों लोकों में जो भी वस्तुएँ हैं उनका अस्तित्व गणित के बिना नहीं हो सकता।

गणक के गुण[संपादित करें]

गणितसारसंग्रह के संज्ञाधिकार के अन्त में महावीराचार्य ने गणकों (गणितज्ञों) के ८ गुण गिनाए हैं-

अथ गणकगुणनिरूपणम्

लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः।
व्यक्तिकराङ्कविशिष्टैर् गणकोऽष्टाभिर् गुणैर् ज्ञेयः॥
(लघुकरण, उह, अपोह, अनालस्य, ग्रहण, धारण, उपाय, व्यक्तिकरांकविशिष्ट - इन आठ गुणों से गणक को जाना जाता है।)
“A mathematician is to be known by eight qualities: conciseness, inference,
confutation, vigour in work and progress, comprehension, concentration of mind and
by the ability of finding solutions and uncovering quantities by investigation.”

कला-सवर्ण-व्यवहार ( Rules for decomposing fractions)[संपादित करें]

गणितसारसंग्रह में भिन्नों को इकाई भिन्नों के योग के रूप में व्यक्त करने की विधियाँ दी हुईं हैं। [1] ये विधियाँ वैदिक काल में प्रयुक्त इकाई भिन्नों तथा शुल्बसूत्र का अनुसरण करतीं हैं जिसमें √2 का मान दिया गया है।[1]

In the Gaṇita-sāra-saṅgraha (GSS), the second section of the chapter on arithmetic is named kalā-savarṇa-vyavahāra (lit. "the operation of the reduction of fractions"). In this, the bhāgajāti section (verses 55–98) gives rules for the following:[1]

  • To express 1 as the sum of n unit fractions (गतिणसारसंग्रह कलासवर्ण 75, examples in 76):[1]
रूपांशकराशीनां रूपाद्यास्त्रिगुणिता हराः क्रमशः।

द्विद्वित्र्यंशाभ्यस्ताव आदिमचरमौ फले रूपे ॥

When the result is one, the denominators of the quantities having one as numerators are [the numbers] beginning with one and multiplied by three, in order. The first and the last are multiplied by two and two-thirds [respectively].
  • To express 1 as the sum of an odd number of unit fractions (GSS kalāsavarṇa 77):[1]
  • To express a unit fraction as the sum of n other fractions with given numerators (GSS kalāsavarṇa 78, examples in 79):
  • To express any fraction as a sum of unit fractions (GSS kalāsavarṇa 80, examples in 81):[1]
Choose an integer i such that is an integer r, then write
and repeat the process for the second term, recursively. (Note that if i is always chosen to be the smallest such integer, this is identical to the greedy algorithm for Egyptian fractions.)
  • To express a unit fraction as the sum of two other unit fractions (GSS kalāsavarṇa 85, example in 86):[1]
where is to be chosen such that is an integer (for which must be a multiple of ).
  • To express a fraction as the sum of two other fractions with given numerators and (GSS kalāsavarṇa 87, example in 88):[1]
where is to be chosen such that divides

कुछ और नियम १४वीं शताब्दी में नारायण पण्डित द्वारा गणित कौमुदी में दिये गये हैं। [1]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Kusuba 2004, पृष्ठ 497–516

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]