कम्बोडियाई नरसंहार

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कम्बोडियाई नरसंहार
सम्बंधित: शीत युद्ध
कंबोडिया में ख्मेर रूज का शासन

तुओल स्लेंग नरसंहार इतिहासालय, नोम पैन्ह में कम्बोडियाई नरसंहार मे मारे गए पीड़ितों की खोपड़ियाँ
स्थान लोकतांत्रिक कम्पुचिया
तिथि १७ अप्रैल १९७५ - ७ जनवरी १९७९ (३ वर्ष, ८ माह और २० दिन)
लक्ष्य पूर्व कम्बोडियाई सैनिक
राजनेता
उद्योगपति
पत्रकार
विद्यार्थी
चिकित्सक
वकील
बौद्ध
ईसाई
मुसलमान
चाम लोग
चीनी
थाई
वियतनामी
हमले का प्रकार नरसंहार
वर्गसंहार
राजनैतिकसंहार
जातीय संहार
नयायेतर हत्या
तड़पाना
भुखमरी
बेगार
मानव परीक्षण
अवगाह करना
वामपंथी आतंक
मृत्यु १५ से २० लाख
अपराधी ख्मेर रूज
उद्देश्य ख्मेर राष्ट्रवाद
चरम राष्ट्रवाद
कृषि समाजवाद
राष्ट्रीय नास्तिकता
बुद्धिजीवद्रोह
नस्लभेद
दक्षिणपंथ
वर्ष शून्य

 

कम्बोडियाई नरसंहार (ख्मेर: របបប្រល័យពូជសាសន៍នៅកម្ពុជា) कंबोडियाई लोगों पर हुआ उत्पीड़न और नरसंहार था। इसए कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के महासचिव पोल पॉट के नेतृत्व में ख्मेर रूज द्वारा किया गया, जिन्होंने कंबोडिया को पूरी तरह से आत्मनिर्भर कृषि समाजवादी समाज की ओर धकेला। इसके कारण १९७५ से १९७९ तक १५ से २० लाख लोगों की मृत्यु हुई, जो कंबोडिया की १९७५ की आबादी का लगभग एक चौथाई था (७८ लाख के आसपास)।[1][2][3]

पोल पॉट और ख्मेर रूज का लंबे समय से चीनी साम्यवादी पार्टी और उसके अध्यक्ष माओ से-तुंग ने समर्थन किया;[a] अनुमान लगाया गया है कि ख्मेर रूज को प्राप्त होने वाली विदेशी आर्थिक सहायता का कम से कम ९०% चीन से आती थी, और अकेले १९७५ में ब्याज मुक्त आर्थिक और सैन्य सहायता में कम से कम एक अरब अमेरिकी डॉलर चीन से आया था।[10][11] अप्रैल १९७५ में सत्ता पर कब्जा करने के बाद ख्मेर रूज देश को एक कृषि समाजवादी गणराज्य में बदलना चाहता था, जो अति- माओवाद की नीतियों पर स्थापित और सांस्कृतिक क्रांति से प्रभावित था। पोल पॉट और अन्य ख्मेर रूज अधिकारियों ने जून १९७५ में बीजिंग में माओ के साथ मुलाकात की, अनुमोदन और सलाह प्राप्त की। इसके साथ उच्च पदस्थ सीसीपी अधिकारियों ने बाद में मदद पेशकश के लिए कंबोडिया का दौरा किया, जिसमें सीसीपी पोलितबुरो स्थायी समिति के सदस्य झांग चुंचाओ जैसे दिग्गज सदस्य शामिल थे। अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ख्मेर रूज ने शहरों को खाली कर दिया और कंबोडियाई लोगों को ग्रामीण इलाकों में श्रम शिविरों में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया, जहाँ सामूहिक निष्पादन, जबरन श्रम, शारीरिक शोषण, कुपोषण और बीमारी बड़े पैमाने पर थी।[12][13] १९७६ में ख्मेर रूज ने देश का नाम बदलकर लोकतांत्रिक कम्पूचिया रख दिया।

जब वियतनामी सेना ने १९७८ में आक्रमण किया और ख्मेर रूज शासन को गिरा दिया, तब नरसंहार समाप्त हो सका। जनवरी १९७९ तक ख्मेर रूज की नीतियों के कारण १५ से २० लाख लोग मारे गए थे, जिनमें २,००,०००-३,००,००० चीनी कंबोडियाई, ९०,००० मुसलमान और २०,००० वियतनामी कंबोडियन शामिल थे।[14][15] २०,००० लोग सुरक्षा जेल-२१ से गुज़रे, जो ख्मेर रूज द्वारा संचालित १९६ जेलों में से एक था,[3][16] और केवल सात वयस्क जीवित बच सके।[17] कैदियों को मृत्यु मैदानों में ले जाया जाता था, जहाँ उन्हें मार डाला गया (उन्हें अक्सर गैंती से मार जाता था ताकि गोलियाँ बचाई जा सकें)[18] और सामूहिक कब्रों में दफनाया जाता। बच्चों का अपहरण और उन्हें अनुशासित किया जाना साधारण बात थी, और बहुतों को अत्याचार करने के लिए राजी किया गया या मजबूर किया गया।[19] २००९ तक कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र ने २३,७४५ सामूहिक कब्रों का मानचित्रण किया है जिसमें लगभग १३ लाख संदिग्ध निष्पादन के शिकार हैं। माना जाता है कि प्रत्यक्ष निष्पादन में नरसंहार के मरने वालों की संख्या का ६०% तक का योगदान है,[20] अन्य पीड़ितों के साथ भुखमरी, थकावट, या बीमारी के कारण मौत हो जाती है।

नरसंहार ने शरणार्थियों का दूसरा बहिर्वाह शुरू कर दिया, जिनमें से कई पड़ोसी थाईलैंड और कुछ हद तक वियतनाम भाग गए[21] कंबोडिया पर वियतनामी आक्रमण ने जनवरी १९७९ में ख्मेर रूज को हराकर नरसंहार को समाप्त कर दिया।[22] २ जनवरी २००१ को कंबोडियाई सरकार ने ख्मेर रूज के नेतृत्व के सदस्यों पर मुकदमा चलाने के लिए ख्मेर रूज ट्रिब्यूनल की स्थापना की, जो कम्बोडियन नरसंहार के लिए जिम्मेदार था। मुकदमा १७ फरवरी २००९ को शुरू हुआ।[23] ७ अगस्त २०१४ को नूओन चिया और खिउ सम्फन को नरसंहार के दौरान मानव-विरोधी अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा मिली। [24]

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि[संपादित करें]

 

ख्मेर रूज का उदय[संपादित करें]

 

कम्बोडियाई गृहयुद्ध[संपादित करें]

  १९६८ में ख्मेर रूज ने आधिकारिक तौर पर कंबोडिया में एक राष्ट्रव्यापी विद्रोह शुरू किया। भले ही उत्तरी वियतनाम की सरकार को ख्मेर रूज के फैसले के बारे में सूचित नहीं किया गया था, उसके बलों ने विद्रोह शुरू होने के बाद ख्मेर रूज को आश्रय और हथियार प्रदान किए। ख्मेर रूज के विद्रोह के उत्तर वियतनाम द्वारा समर्थन ने कंबोडियाई सेना के लिए इसके प्रभाव का मुकाबला करना असंभव बना दिया। अगले दो वर्षों तक विद्रोह बढ़ता गया क्योंकि नरोत्तम सीहनु ने इसे रोकने के लिए नहीं के बराबर काम किया। जैसे-जैसे विद्रोह की ताकत बढ़ती गई, पार्टी ने खुले तौर पर खुद को कम्पूचिया की कम्युनिस्ट पार्टी घोषित कर दिया।[25]

सीहनु को १९६० में राज्य के प्रमुख के रूप में हटा दिया गया। प्रधानमंत्री लोन नोल ने कम्बोडियाई राष्ट्रीय समिति की मदद से उन्हें उनके पद से हटाया, जिससे संयुक्त राज्य अमेरिका का समर्थन करने वाले ख्मेर गणराज्य की स्थापना हुई। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की सलाह पर सीहनु, जो बीजिंग में निर्वासित थे, ने ख्मेर रूज के साथ गठबंधन किया, और ख्मेर रूज-प्रभुत्व वाली निर्वासित का नाममात्र प्रमुख बन गए। हालांकि लोन नोल की सेना की कमजोरी और वायु शक्ति के अलावा किसी भी रूप में नए संघर्ष के लिए अमेरिकी सैन्य बल को प्रतिबद्ध करने के लिए पूरी तरह से अवगत होने के बावजूद, निक्सन प्रशासन ने नए ख्मेर गणराज्य के लिए अपने समर्थन की घोषणा की। [26]

२९ मार्च १९७० को उत्तरी वियतनाम ने कंबोडियाई सेना के खिलाफ एक आक्रमण जारी किया। सोवियत संघ के अभिलेखागार से जो दस्तावेज सामने आए थे, उनसे पता चला कि आक्रमण ख्मेर रूज के स्पष्ट अनुरोध पर शुरू किया गया था, जब नुओन ची के साथ बातचीत हुई थी।[27] एक उत्तरी वियतनामी सेना ने जल्दी से पूर्वी कंबोडिया के बड़े हिस्से पर कब्जा पाकर नोमपेन्ह के २४ किलोमीटर अंदर तक घुस गया, जिसके बाद उसे पीछे धकेल दिया गया। सीहनु को हटाने के तीन महीने बाद जून तक उन्होंने देश के पूरे पूर्वोत्तर तिहाई से सरकारी बलों को हटा दिया। उन ताकतों को हराने के बाद उत्तरी वियतनाम ने नए जीते क्षेत्रों को स्थानीय विद्रोहियों में बदल दिया। ख्मेर रूज ने देश के दक्षिण और दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों में "मुक्त" क्षेत्रों की भी स्थापना की, जहाँ वे उत्तरी वियतनामी से स्वतंत्र रूप से संचालित होते थे।[28]

सीहनु ने ख्मेर रूज के लिए मैदान में जाकर उनके समर्थन का प्रदर्शन करने के बाद उनकी सेना ६,००० से बढ़कर ५०,००० तक हो गई। ख्मेर रूज के नए रंगरूटों में से कई गैर-राजनीतिक किसान थे, जिन्होंने साम्यवाद के बजाय राजा के समर्थन में लड़ाई लड़ी, जिसकी उन्हें बहुत कम समझ थी।[29]

१९७५ तक जब लोन नोल की सरकार के अमेरिकी समर्थन की समाप्ति के कारण गोला-बारूद से खत्म होने लगे, यह स्पष्ट था कि उनकी सरकार के गिरने की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। १७ अप्रैल १९७५ को ख्मेर रूज ने नोमपेन्ह पर कब्जा कर लिया और गृहयुद्ध को समाप्त कर दिया। गृहयुद्ध से होने वाली मौतों के अनुमान अलग-अलग हैं। सीहनु ने ६ लाख गृहयुद्ध में हुई मौतों का आंकड़ा इस्तेमाल किया,[30] जबकि एलिजाबेथ बेकर ने दस लाख से अधिक गृहयुद्धों की मौत की सूचना दी, जिसमें सैन्य और नागरिक शामिल थे;[31] अन्य शोधकर्ता ऐसे उच्च अनुमानों की पुष्टि करने में असमर्थ थे।[32] मारेक स्लिविंस्की ने नोट किया कि मृतकों के कई अनुमान सवालों के घेरे में हैं और प्रचार के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं, यह सुझाव देते हुए कि सही संख्या २,४०,००० और ३,१०,००० के बीच है।[33] जूडिथ बैनिस्टर और ई. पेगे जॉनसन ने २,७५,००० युद्ध मृत्यु को "उच्चतम मृत्यु दर जिसे हम उचित ठहरा सकते हैं" के रूप में वर्णित किया।[34] पैट्रिक ह्यूवेलिन कहते हैं कि "जनसांख्यिकीय डेटा के बाद के पुनर्मूल्यांकन में [गृह युद्ध] के लिए मृत्यु टोल तीन लाख या उससे कम के क्रम में स्थित है"।[1]

संयुक्त राज्य अमेरिका बमबारी[संपादित करें]

१९७० से १९७३ तक ख्मेर रूज के खिलाफ संयुक्त राज्य अमेरिका के एक बड़े पैमाने पर बमबारी अभियान ने ग्रामीण कंबोडिया को तबाह कर दिया।[35][36] कंबोडिया का एक पूर्व अमेरिकी बमबारी अभियान वास्तव में १८ मार्च १९६९ को ऑपरेशन ब्रेकफास्ट के साथ शुरू हुआ था, लेकिन कंबोडिया में अमेरिकी बमबारी उससे कई साल पहले शुरू हुई थी।[32]

अमेरिकी बमबारी के कारण कंबोडियाई नागरिक और ख्मेर रूज की मौत की संख्या विवादित है और व्यापक कंबोडियाई गृहयुद्ध से अलग होना मुश्किल है।[33] अनुमान ३०,००० से ५,००,००० तक है।[37][38][39][40] स्लिविंस्की का अनुमान है कि कुल गृहयुद्ध में होने वाली मौतों का लगभग १७% अमेरिकी बमबारी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, यह देखते हुए कि यह मौत के प्रमुख कारणों से बहुत पीछे है, क्योंकि अमेरिकी बमबारी कम आबादी वाले सीमा क्षेत्रों में केंद्रित थी।[33] बेन कीरनन ने ५०,००० से १५०,००० मौतों का श्रेय अमेरिकी बमबारी को दिया है।[41]

इतिहासकारों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा कंबोडिया पर की गई भारी बमबारी और ख्मेर रूज के बढ़ते समर्थन और भर्ती एक रुचि का विषय रहा है। माइकल इग्नाटिएफ़, एडम जोन्स[42] और ग्रेग ग्रैंडिन[43] सहित कुछ विद्वानों ने १९६५ से १९७३ तक संयुक्त राज्य अमेरिका के हस्तक्षेप और बमबारी अभियान को महत्वपूर्ण कारकों के रूप में उद्धृत किया है जिनके कारण कंबोडियन किसानों के बीच ख्मेर रूज के लिए समर्थन बढ़ा।[44] बेन कीएरनन के अनुसार, "ख्मेर रूज अमेरिका की आर्थिक सहायता और कंबोडिया की सैन्य अस्थिरता के बिना सत्ता हासिल नहीं कर सकता था। इसने बमबारी की तबाही और नागरिकों के नरसंहार को भर्ती प्रचार के रूप में और अपनी क्रूर, कट्टरपंथी नीतियों और उदारवादी साम्यवादियों और सीहनुवादियों के शुद्धिकरण के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया।"[45]

पोल पॉट के जीवनी लेखक डेविड पी. चांडलर ने लिखा है कि बमबारी से "अमेरिका को वह मिल गया जो वह चाहता था - इसने नोमपेन्ह के वामपंथी घेरे को तोड़ दिया", लेकिन ग्रामीण समाज के पतन को भी तेज कर दिया और सामाजिक ध्रुवीकरण में बढ़त हुई।[46][47] क्रेग एचेसन मानते हैं कि अमेरिकी हस्तक्षेप ने ख्मेर रूज के लिए भर्ती में बढ़ावा लाया, लेकिन विवाद है कि यह ख्मेर रूज की जीत का एक प्राथमिक कारण था।[48] विलियम शॉक्रॉस के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका की बमबारी और जमीनी घुसपैठ ने कंबोडिया को उस अराजकता में डुबो दिया, जिससे बचने के लिए सीहनु ने वर्षों तक काम किया था।[49]

ख्मेर रूज के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन[संपादित करें]

चीन[संपादित करें]

 

माओ युग[संपादित करें]

 

१९७८ में पोल पॉट

१९५० के दशक के बाद से, पोल पॉट ने लगातार चीनी जनवादी गणराज्य का दौरा किया, जहाँ उन्होंने चीनी साम्यवादी दल के कर्मियों से राजनीतिक और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया - विशेष रूप से सर्वहारा की तानाशाही के सिद्धांत पर।[50][51] नवंबर १९६५ से फरवरी १९६६ तक चेन बोडा और झांग चुंचाओ जैसे उच्च पदस्थ सीसीपी अधिकारियों ने उन्हें चीन की साम्यवादी क्रांति, वर्ग संघर्ष, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल आदि जैसे विषयों पर प्रशिक्षित किया।[51] पोल पॉट ने डेंग शियाओ पिंग और पेंग जेन सहित अन्य अधिकारियों से भी मुलाकात की।[50] वे कांग शेंग के उस व्याख्यान से विशेष रूप से प्रभावित हुए, जिसमें उन्होंने कहा था कि राजनीतिक शुद्धिकरण कैसे किया जाए। [51]

१९७० में लोन नोल ने सीहनु को उखाड़ फेंका, और बाद वाला बीजिंग भाग गया, जहाँ पोल पॉट भी जा रहे थे। सीसीपी की सलाह पर ख्मेर रूज ने अपनी स्थिति बदल दी, और सीहनु का समर्थन करने के लिए, उसने कम्पूचिया के राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा की स्थापना की। अकेले १९७० में ही चीनियों ने कथित तौर पर संयुक्त मोर्चे को ४०० टन सैन्य सहायता दी।[52] अप्रैल १९७४ में सीहनु और ख्मेर रूज के नेता ईएंग सारी और खिउ सम्फन ने बीजिंग में माओ से मुलाकात की; माओ ने उन नीतियों का समर्थन किया जो ख्मेर रूज ने प्रस्तावित की थी, लेकिन वह नहीं चाहते थे कि ख्मेर रूज गृहयुद्ध जीतने और एक नया कंबोडिया स्थापित करने के बाद सीहनु को हाशिए पर ले जाए।[50][53]

जून १९७५ में पोल पॉट और अन्य ख्मेर रूज के अधिकारियों ने बीजिंग में माओ से-तुंग के साथ मुलाकात की, जहाँ माओ ने पोल पॉट को "सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के तहत निरंतर क्रांति के सिद्धांत" पर व्याख्यान दिया, जिसमें दो लेखों की सिफारिश की गई। जो याओ वेनयुआन द्वारा लिखे गए थे और ३० से अधिक पुस्तकें पोल पॉट भेज रहे थे, जिन्हें कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, व्लादिमीर लेनिन और जोसेफ स्टालिन ने उपहार के रूप में लिखा था।[50][51] इस मुलाकात के दौरान माओ ने पोल पॉट से कहा:[54]

हम आपसे सहमत हैं! आपका अधिकांश अनुभव हमसे बेहतर है। चीन आपकी आलोचना करने के काबिल नहीं है। अपने पचास वर्ष के राजनीतिक दौरे में दस गलतियाँ की - कुछ राष्ट्रीय, कुछ स्थानीय...इस कारण मैं मानता हूँ कि चीन के पास आपकी आलोचना करने की नहीं, बल्कि आपकी प्रशंसा करने की योग्यता है। आप मूल रूप से सही हैं...लोकतांत्रिक क्रांति से समाजवादी रास्ता अपनाने के रास्ते दो संभावनाएँ मौजूद हैं: पहला समाजवाद, दूसरा पूंजीवाद। अब हमारी स्थिति ऐसी है। आज से पचास साल या सौ साल बाद दोनों विचारों के बीच संघर्ष मौजूद रहेगा। आज से दस हजार साल बाद भी दोनों विचारों के बीच का संघर्ष बना रहेगा। जब साम्यवाद का एहसास होगा, तब भी दोनों विचारों के बीच संघर्ष रहेगा। नहीं तो आप मार्क्सवादी नहीं हैं।...जैसा लेनिन ने कहा था, हमारा राष्ट्र अब पूनिवादी राष्ट्र है जिसमें पूंजीपती नहीं हैं। यह राष्ट्र पूंजीवादी अधिकारों की रक्षा करता है, और आय समान नहीं है। समानता के नारे के तहत असमानता की व्यवस्था पेश की गई है। दो पंक्तियों के बीच संघर्ष होगा, उन्नत और पिछड़े के बीच संघर्ष, तब भी जब साम्यवाद का एहसास हो जाएगा। आज हम इसे पूरी तरह से समझा नहीं सकते हैं।

पोल पॉट ने उत्तर दिया: "अध्यक्ष माओ द्वारा उठाए गई संघर्ष की पंक्तियाँ एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा है। हम भविष्य में आपके शब्दों का पालन करेंगे। अपने बचपन के दिनों से मैं अध्यक्ष माओ के विभिन्न कार्यों के बारे में पढ़ता और सीखता था, विशेष रूप से लोगों के युद्ध पर लिखे है उनके सिद्धांत। आपके कार्यों ने हमारे पूरे दल को मार्गदर्शन दिया है।"[50] वहीं दूसरी ओर अगस्त १९७५ में एक अन्य बैठक के दौरान चीनी प्रधान मंत्री झोउ एनलाई ने चीन के अपने ग्रेट लीप फॉरवर्ड में गलतियों का हवाला देते हुए सीहनु के साथ-साथ ख्मेर रूज के नेताओं को खिउ सम्फान और आईंग सारी सहित साम्यवाद के प्रति कट्टरपंथी आंदोलन के खतरे की चेतावनी दी।[55][56][57] झोउ ने उनसे उन गलतियों को नहीं दोहराने का आग्रह किया जिन्होंने तबाही मचाई थी।[55][57] सीहनु ने बाद में याद किया कि खिउ सम्फन और आईंग थिरिथ ने केवल "एक अविश्वसनीय और बेहतर मुस्कान" के साथ जवाब दिया था।[57]

नरसंहार के दौरान चीन ख्मेर रूज का मुख्य अंतरराष्ट्रीय संरक्षक था, जो "१५,००० से अधिक सैन्य सलाहकारों" और इसकी अधिकांश बाहरी सहायता की आपूर्ति करता था। [58][59] यह अनुमान लगाया गया है कि ख्मेर रूज को विदेशी सहायता का कम से कम ९०% चीन से आया था, केवल १९७५ में ब्याज मुक्त अर्थशास्त्र और सैन्य सहायता में $१ अरब को देखते हुए, "अब तक चीन द्वारा किसी एक देश को दी गई सबसे बड़ी सहायता" थी।[10][11] १९७६ में आंतरिक संकटों की एक श्रृंखला ने बीजिंग को ख्मेर रूज की नीतियों पर पर्याप्त प्रभाव डालने से रोक दिया।[56]

संक्रमण अवधि[संपादित करें]

सितंबर १९७६ में माओ की मृत्यु के बाद चीन लगभग दो साल के संक्रमण से गुजरा, जिसके बाद डेंग शियाओपिंग दिसंबर १९७८ में उसके नए सर्वोपरि नेता बन गए। संक्रमण काल के दौरान पोल पॉट ने जुलाई १९७७ में चीन की आधिकारिक यात्रा की और उनका स्वागत अध्यक्ष हुआ गुओफेंग और अन्य उच्च सीसीपी अधिकारियों ने किया, पीपुल्स डेली ने उन्हें "कंबोडिया से कॉमरेड" (柬埔寨战友) कहा।[60] पॉट ने माओ के युग के उत्पाद, दझाई के कृषि उत्पादन मॉडल का भी दौरा किया। चीन के उप प्रधान मंत्री और दझाई के नेता चेन योंगगुई ने साम्यवाद के प्रति अपने आंदोलन की उपलब्धि की सराहना करते हुए दिसंबर १९७७ में कंबोडिया का दौरा किया। [61]

१९७८ में ख्मेर रूज नेता और लोकतांत्रिक कम्पूचिया के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री सोन सेन ने चीन का दौरा किया और सैन्य सहायता के लिए इसकी स्वीकृति प्राप्त की।[62] उसी वर्ष वांग डोंगक्सिंग और देंग यिंगचाओ जैसे उच्च पदस्थ सीसीपी अधिकारियों ने समर्थन देने के लिए कंबोडिया का दौरा किया।[62][63]

देंग युग[संपादित करें]

  देंग के चीन के सर्वोपरि नेता बनने के तुरंत बाद वियतनाम ने कंबोडिया पर आक्रमण करके जनवरी १९७९ में ख्मेर रूज को हराकर नरसंहार को समाप्त कर दिया,[22] जिसके तहत कम्पूचिया जनवादी गणराज्य की स्थापना हुई। दक्षिण पूर्व एशिया में सोवियत संघ और वियतनाम के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए चीन ने आधिकारिक तौर पर वियतनामी आक्रमण की निंदा की और ख्मेर रूज को अपना भौतिक समर्थन देना जारी रखा। १९७९ की शुरुआत में वियतनाम के आक्रमण के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने के लिए चीन ने वियतनाम पर आक्रमण कर दिया[64]

देंग सिंगापुर के प्रधान मंत्री ली कुआन यू द्वारा युद्ध के पैमाने और अवधि को सीमित करने के लिए बातचीत से आश्वस्त थे। एक महीने तक युद्ध चलने के बाद सिंगापुर ने कंबोडियाई मुद्दे पर वियतनाम और चीन के बीच मध्यस्थता रखने का प्रयास किया।[65]

अन्य समर्थन[संपादित करें]

१९७८ और १९७९ के वियतनामी आक्रमण पर चीनी और पश्चिम के विरोध के परिणामस्वरूप ख्मेर रूज ने १९८२ तक कंबोडिया की संयुक्त राष्ट्र की कुर्सी पर कब्जा करना जारी रखा, जिसके बाद सीट ख्मेर रूज-के गठबंधन ने ले लिया, जिसे कम्पूचियाई प्रजातन्त्र की गठबंधन सरकार के नाम से जाना जाता था।[3][66][67] वियतनाम के विरोध से प्रेरित होकर चीन ने १९७९ से १९८६ तक अपनी ज़मीन पर ख्मेर रूज सैनिकों को प्रशिक्षित किया, "१९९० तक ख्मेर रूज सैनिकों के साथ सैन्य सलाहकार तैनात किए,"[66] और " १९८० के दशक के दौरान सैन्य सहायता में कम से कम $१ अरब की आपूर्ति की।[68]

१९९१ के पेरिस शांति समझौते के बाद थाईलैंड ने ख्मेर रूज को "व्यापार करने और अपनी गतिविधियों को बनाए रखने के लिए थाई सीमा के पार जाने की अनुमति दी... हालांकि अंतरराष्ट्रीय आलोचना, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से... के कारण इसे किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य समर्थन को अस्वीकार करने का कारण बना दिया।"[69] ऐसे भी आरोप हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ख्मेर रूज का समर्थन किया क्योंकि वह दक्षिण पूर्व एशिया में वियतनाम के प्रभाव को कमजोर करना चाहता था।[3][70][71][72] चीन, अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों के समर्थन के कारण, गँठबंधन ने १९९३ तक शीत युद्ध समाप्त होने के बाद भी कंबोडिया की संयुक्त राष्ट्र सीट पर कब्जा करके रखा।[32]

विचारधारा[संपादित करें]

विचारधारा ने नरसंहार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पोल पॉट मार्क्सवाद-लेनिनवाद से प्रभावित थे और वे कंबोडिया को पूरी तरह से आत्मनिर्भर कृषि समाजवादी समाज में बदलना चाहते थे जो विदेशी प्रभावों से मुक्त हो। स्टालिन के काम को उनके विचार पर "महत्वपूर्ण रचनात्मक प्रभाव" बुलाया गया है। माओ के काम भी प्रभावशाली थे, खासकर उनकी पुस्तक नए लोकतंत्र पर से। इतिहासकार डेविड चांडलर के अनुसार झीन-झाक रूसो उनके पसंदीदा लेखकों में से थे। १९६० के दशक के बीच पोल पॉट ने कंबोडियाई स्थिति के अनुरूप मार्क्सवाद-लेनिनवाद के बारे में अपने विचारों में सुधार किया, जैसे कि कंबोडिया को शक्तिशाली ख्मेर साम्राज्य के कथित पौराणिक अतीत में वापस लाना, विदेशी सहायता और पश्चिमी संस्कृति जैसे भ्रष्ट प्रभावों को मिटाना, और कंबोडिया के कृषि समाज को बहाल करना।[73]

पोल पॉट का मानना था कि कंबोडिया के ग्रामीण उत्तर-पूर्व में उनके अनुभव से कंबोडिया को एक कृषि यूटोपिया में बदलने की जरूरत है - जहाँ उन्होंने ख्मेर रूज ने सत्ता हासिल करने के दौरान क्षेत्र की अलग-अलग जनजातियों की कृषि आत्मनिर्भरता के लिए एक आत्मीयता विकसित की।[74] इन लक्ष्यों (छोटे, ग्रामीण समुदायों की टिप्पणियों पर गठित) को एक बड़े समाज में लागू करने के प्रयास आगामी नरसंहार के प्रमुख कारण थे।[75][76] एक ख्मेर रूज नेता ने कहा कि हत्याएं "जनसंख्या की शुद्धि" के लिए की गई थी।[77] ख्मेर रूज ने वस्तुतः कंबोडिया की पूरी जनता को खुद को लामबंद टोलियों में विभाजित करने के लिए मजबूर कर दिया।[78] माइकल हंट ने लिखा है कि यह "बीसवीं सदी की क्रांतियों में बेजोड़ सामाजिक लामबंदी में एक प्रयोग था।"[78] ख्मेर रूज ने आबादी को काबू में रखने के लिए बेगार शासन, भुखमरी, जबरन पुनर्वास, भूमि एकत्रीकरण और राज्य आतंक का इस्तेमाल किया।[78] ख्मेर रूज की आर्थिक योजना को उपयुक्त रूप से "महा लाउट प्लोह" नाम दिया गया था, जो चीन के ग्रेट लीप फॉरवर्ड का सीधा संकेत था, जिसके कारण महान चीनी अकाल में लाखों लोगों की मौत हुई थी।[79][80]

[81] बारे में केनेथ एम० क्विन द्वारा लिखित एक डॉक्टरेट शोध प्रबंध में "कट्टरपंथी पोल पॉट शासन की उत्पत्ति" के बारे में लिखा था, जिसे "पोल पॉट और ख्मेर रूज की नरसंहारी नीतियों पर रिपोर्ट करने वाले पहले व्यक्ति" के रूप में स्वीकार किया जाता है।"[82][83] जब वे दक्षिण पूर्व एशिया में अमेरिकी विदेश विभाग के लिए एक विदेश सेवा अधिकारी के रूप में दाखिल थे, क्विन १९७३-१९७४ के बीच नौ महीने के लिए दक्षिण वियतनामी सीमा पर तैनात थे।[84] वहाँ रहते हुए क्विन ने "अनगिनत कंबोडियाई शरणार्थियों का साक्षात्कार लिया जो ख्मेर रूज के क्रूर चंगुल से बच गए थे।"[84] संकलित साक्षात्कारों और उनके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से देखे गए अत्याचारों के आधार पर क्विन ने इसके बारे में एक ४०-पृष्ठ की रिपोर्ट लिखी, जिसे पूरे अमेरिकी सरकार के हर कर्मचारी को भेजा गया।[82] रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है कि ख्मेर रूज में "नाजी जर्मनी और सोवियत संघ के अधिनायकवाद से बहुत सामान्य था।"[85] क्विन ने ख्मेर रूज के बारे में लिखा है कि "एक चीज़ है जो १९७० के दशक के दौरान कंबोडिया में फैले आतंक और हिंसा की व्याख्या के रूप में उभरता है, कि अलग-थलग पड़े बुद्धिजीवियों का एक छोटा समूह जो पूरी तरह से भ्रष्ट समाज की अपनी धारणा से क्रोधित है और कम से कम समय में एक शुद्ध समाजवादी व्यवस्था बनाने की माओवादी योजना से ओतप्रोत, अत्यंत युवा, गरीब और ईर्ष्यालु लड़ाकुओं की भर्ती की, उन्हें स्टालिनवादी आकाओं से सीखे गए कठोर और क्रूर तरीकों में निर्देश दिया, और उनका उपयोग भौतिक रूप से सांस्कृतिक आधार को नष्ट करने के लिए और सभ्यता के शुद्धिकरण, फाँसी और हिंसा के माध्यम से एक नया समाज लागू करने के लिए प्रयोग किया गया।"[86]

बेन किएरनन ने कंबोडियाई नरसंहार की तुलना अर्मेनियाई जनसंहार से की है जो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उस्मानी साम्राज्य द्वारा किया गया था और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी द्वारा यहूदी नरसंहार किया गया था। भले ही प्रत्येक नरसंहार अद्वितीय था, उनमें कुछ सामान्य विशेषताएँ थी, और नस्लवाद तीनों शासनों की विचारधारा का एक प्रमुख हिस्सा था। तीनों शासनों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों पर निशाना साधा और उन्होंने अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए बल का उपयोग करने की भी कोशिश की, जिसे वे अपना ऐतिहासिक हृदय क्षेत्र मानते थे (क्रमशः ख्मेर साम्राज्य, तुर्केस्तान और लेबेन्सराऊम), और तीनों शासनों ने "अपने जातीय किसानों को सच्चे 'राष्ट्रीय' वर्ग के रूप में आदर्श बनाया, वह जातीय मिट्टी जिससे नया राज्य विकसित हुआ।"[87]

नरसंहार[संपादित करें]

वर्गसंहार[संपादित करें]

ख्मेर रूज शासन ने अक्सर उन लोगों को गिरफ्तार किया और मारा जिनके ऊपर पूर्व कंबोडियाई सरकार या विदेशी सरकारों के साथ संबंध था, साथ ही सभी पेशेवरों, बुद्धिजीवियों, बौद्ध भिक्षुओं और जातीय अल्पसंख्यकों को भी मारा गया। यहाँ तक कि उन लोगों का भी संहार किया गया जिन्हें बौद्धिक गुणों के रूप में माना जाता था, जैसे कि जो लोग चश्मा पहनते या कई भाषाएं बोल सकते थे, क्योंकि शासन को डर था कि वे ख्मेर रूज के खिलाफ विद्रोह कर देंगे।[88] इस कारण से पोल पॉट को विलियम ब्रैनिगिन जैसे पत्रकारों और इतिहासकारों द्वारा "एक नरसंहार तानाशाह" के रूप में वर्णित किया गया है।[89] अंग्रेज़ समाजशास्त्री मार्टिन शॉ ने कंबोडियाई नरसंहार को "शीत युद्ध के युग का सबसे शुद्ध नरसंहार" बताया। कंबोडियाई समाज को नस्लीय, सामाजिक और राजनीतिक आधार पर शुद्ध करने के प्रयास ने कंबोडिया के पिछले सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ व्यापारिक नेताओं, पत्रकारों, छात्रों, डॉक्टरों और वकीलों को भी मिटा दिया।[90]

जातीय वियतनामी, जातीय थाई, जातीय चीनी, जातीय चाम, कंबोडियाई ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाया गया। ख्मेर रूज ने अल्पसंख्यक समूहों का जबरन स्थानांतरण कर दिया और उनकी भाषाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। डिक्री द्वारा ख्मेर रूज ने २० से अधिक अल्पसंख्यक समूहों के अस्तित्व पर प्रतिबंध लगा दिया जो कंबोडिया की १५% आबादी का गठन करते थे।[91]

जातीय पीड़ित[संपादित करें]

तुओल स्लेंग नरसंहार संग्रहालय के कमरों में ख्मेर रूज द्वारा अपने पीड़ितों के लिए ली गई हजारों तस्वीरें हैं।

जबकि कंबोडियाई सामान्य रूप से ख्मेर रूज शासन के शिकार थे, ख्मेर रूज द्वारा किए गए उत्पीड़न, यातना और हत्याओं को संयुक्त राष्ट्र ने नरसंहार का कार्य माना क्योंकि पोल पॉट और उनके शासन द्वारा जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित रूप से लक्षित किया गया था।[92][93]

ख्मेर रूज के हाथों उत्पीड़न और हत्याओं को नरसंहार माना जाना चाहिए या नहीं, इस पर विद्वानों और इतिहासकारों की अलग-अलग राय हैं, क्योंकि १९७९ में ख्मेर रूज शासन के पतन के ठीक बाद आई छात्रवृत्ति ने दावा किया था कि पीड़ितों को उन परिस्थितियों के कारण मारा जा सकता था। उदाहरण के लिए माइकल विकरी ने कहा कि हत्याएं "बड़े पैमाने पर एक प्रतिशोधी, अनुशासनहीन किसान सेना की सहज ज्यादतियों का परिणाम थीं।"[94]

इस नजरिए का अलेक्जेंडर हिंटन ने समर्थन किया, जिन्होंने ख्मेर रूज के एक पूर्व काडर के बारे में बताया जिसने दावा किया कि हत्याएँ लोन नॉल सैनिकों के अन्याय का जवाब है। वे सैनिक पोल पॉट और ख्मेर रूज के आने से पहले पूर्व वियत मिन्ह एजेंटों को मारते थे।[95] विकरी ने एक बार ग़लती से, तर्क दिया कि ख्मेर रूज शासन के दौरान चाम पीड़ितों की संख्या लगभग २०,०००[96] थी जो पॉल पॉट और ख्मेर रूज के खिलाफ नरसंहार के अपराध से इनकार करेगा। ख्मेर रूज शासन द्वारा हत्याएं एक केंद्रीकृत और नौकरशाही प्रयास थीं, जैसा कि हाल ही में कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र (डीसी-कैम) द्वारा ख्मेर रूज आंतरिक सुरक्षा दस्तावेजों की खोज के माध्यम से प्रलेखित किया गया था, जिसने कंबोडिया में हत्याओं का निर्देश दिया था।[97] हालांकि "सामूहिक हत्याओं में अनुशासनहीनता और सहजता" के उदाहरण भी थे।[98] इसके शीर्ष पर, एचरसन ने यह भी बनाए रखा है कि राजनीतिक संबद्धता, जातीयता, धर्म और नागरिकता के आधार पर व्यवस्थित सामूहिक हत्याओं के परिणामस्वरूप कंबोडियाई आबादी का एक तिहाई नुकसान हुआ, ख्मेर रूज नरसंहार करने के लिए प्रभावी रूप से दोषी है .[99]

डेविड चांडलर ने तर्क दिया है कि भले ही जातीय अल्पसंख्यक ख्मेर रूज शासन के शिकार हुए, उन्हें विशेष रूप से उनकी जातीय पृष्ठभूमि के कारण लक्षित नहीं किया गया था, बल्कि इसलिए कि वे ज्यादातर शासन के दुश्मन थे।[100] चांडलर ने हिटलर के साथ संभावित समानताएं खींचने से बचने के लिए "अंधराष्ट्रीयता" और "नरसंहार" शब्दों के इस्तेमाल को भी खारिज कर दिया। इससे पता चलता है कि चांडलर ख्मेर रूज शासन पर नरसंहार के अपराध का आरोप लगाने के तर्क में विश्वास नहीं करते हैं। माइकल विकरी चांडलर की बातों से सहमति रखते हैं, और ख्मेर रूज शासन के अत्याचारों को नरसंहार के रूप में स्वीकार करने से इनकार करते हैं; वियतनाम विरोधी और धर्म विरोधी नीतियों के कारण विकीरी ने ख्मेर रूज को एक "अंधराष्ट्रवादी" शासन माना।[101] स्टीफन हेडर यह भी मानते हैं कि ख्मेर रूज नरसंहार के दोषी नहीं थे, यह बताते हुए कि शासन के अत्याचार नस्ल से प्रेरित नहीं थे।[102]

बेन कीरन ने तर्क दिया कि यह वास्तव में एक नरसंहार था और इन तीन विद्वानों से असहमति दिखाते हैं, जिसके लिए वे कंबोडिया में चाम लोगों के इतिहास का उदाहरण देते हैं, जैसा कि एक अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने नुओन ची और खिउ सम्फन को ९२ और ८७ क्रमशः मामलों में दोषी पाया।[103]

वियतनामी[संपादित करें]

ख्मेर रूज ने शुरू में कंबोडिया से जातीय वियतनामी के निष्कासन का आदेश दिया था, लेकिन फिर बड़ी संख्या में वियतनामी नागरिकों का बड़े पैमाने पर नरसंहार किया जिन्हें कंबोडिया से बाहर निकाला जा रहा था।[104] शासन ने शेष २०,००० वियतनामियों को भागने से रोक दिया और इस समूह के अधिकांश को भी मार डाला।[14] ख्मेर रूज ने नरसंहार के अपने लक्ष्यों का समर्थन करने के लिए मीडिया का भी इस्तेमाल किया। रेडियो नोम पेन्ह ने कंबोडियाई लोगों से ५ करोड़ वियतनामियों को खत्म करने का आह्वान किया।[105]

इसके अतिरिक्त ख्मेर रूज ने वियतनाम में कई सीमा पार छापे मारे जहाँ उन्होंने अनुमानित ३०,००० वियतनामी नागरिकों को मार डाला।[106][107] सबसे विशेष रूप से अप्रैल १९७८ में बा चाक नरसंहार के दौरान, ख्मेर रूज सेना ने सीमा पार की और गांव में प्रवेश किया, एक बार में ३,१५७ वियतनामी नागरिकों की हत्या कर दी। इसने वियतनामी सरकार से तत्काल प्रतिक्रिया को मजबूर कर दिया, जिससे कंबोडियन-वियतनामी युद्ध शुरू हो गया जिसमें ख्मेर रूज अंततः हार गया।[108][109]

चीनी[संपादित करें]

ख्मेर रूज शासन के दौरान चीनी कंबोडियाई राज्य को "दक्षिणपूर्व एशिया में किसी भी जातीय चीनी समुदाय के लिए अब तक की सबसे बुरी आपदा" कहा जाता है।[91] चीनी मूल के कंबोडियाई लोगों को ख्मेर रूज द्वारा नरसंहार का कारण बताया जाता था कि वे "कम्बोडियाई लोगों का शोषण करते थे"।[110] चीनी व्यापारियों और साहूकारों के रूप में पूंजीवाद से जुड़े हुए थे, जबकि ऐतिहासिक रूप से समूह ने अपने हल्के त्वचा के रंग और सांस्कृतिक मतभेदों के कारण नाराजगी को आकर्षित किया था।[111] १९७८ में सैकड़ों चाम, चीनी और ख्मेर परिवारों को गोलबंद किया गया और कहा गया कि उन्हें फिर से बसाया जाना था, लेकिन वास्तव में उन्हें मार दिया गया था।[110]

१९७५ में ख्मेर रूज शासन की शुरुआत में कंबोडिया में ४,२५,००० जातीय चीनी थे। १९७९ के अंत तक केवल २,००,००० लोग बचे हुए थे, और वे भी थाई शरणार्थी स्थलों या कंबोडिया में फसे हुए थे। १,७०,००० चीनी कंबोडिया से वियतनाम भाग गए जबकि अन्य को दूसरे देशों में भेज दिया गया।[112] चीनी मुख्य रूप से शहरी थे, जिससे उन्हें ख्मेर रूज के क्रांतिकारी ग्रामीणवाद और शहर के निवासियों को खेतों में निकालने का खतरा था।[91] पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार ने कंबोडिया में जातीय चीनी की हत्याओं का विरोध नहीं किया क्योंकि वे शायद स्थिति से अनजान थे।[113]

चाम मुसलमान[संपादित करें]

बेन किएरनन के अनुसार "सबसे भीषण विनाश अभियान कंबोडिया के मुस्लिम अल्पसंख्यक, चाम लोगों के खिलाफ निर्देशित किया गया था।"[114] इस्लाम को एक "विदेशी" और "बाहरी" संस्कृति के रूप में देखा गया जो नई साम्यवादी प्रणाली में शामिल नहीं थी। शुरुआत में ख्मेर रूज का उद्देश्य जनसंख्या के फैलाव के माध्यम से चाम लोगों को जबरन आत्मसात करना था। पोल पॉट ने फिर चाम लोगों को डराने-धमकाने का प्रयास किया, जिसमें गांव के बुजुर्गों की हत्या भी शामिल थी, लेकिन उन्होंने आखिर में चाम लोगों की पूर्ण पैमाने पर सामूहिक हत्या का आदेश दिया। अमेरिकी प्रोफेसर सैमुअल टॉटेन और ऑस्ट्रेलियाई प्रोफेसर पॉल आर. बार्ट्रॉप का अनुमान है कि इन प्रयासों से चाम की आबादी पूरी तरह से समाप्त हो जाती यदि यह १९७९ में ख्मेर रूज को उखाड़ फेंकने के लिए नहीं होती।[115]

१९५० के दशक की शुरुआत में साम्यवाद में शामिल होने के माध्यम से चाम प्रमुखता से बढ़ने लगा जब एक चाम बुजुर्ग, सोस मान इंडोचाइना कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और पार्टी की ताकतों में एक प्रमुख बनने के लिए ऊँचे पद पर उठे। वे १९७० में पूर्वी क्षेत्र में घर लौट आए और कम्पूचिया की कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी में शामिल हो गए, और अपने बेटे माट ली के साथ पूर्वी क्षेत्र इस्लामिक आंदोलन की स्थापना की। साथ में वे चाम लोगों को क्रांति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी का मुखपत्र बन गए। १९७०-१९७५ के बीच कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के नेतृत्व द्वारा एसओएस मैन के इस्लामिक आंदोलन को भी सहन किया गया। चाम लोगों को धीरे-धीरे दक्षिण-पश्चिम में १९७२ की शुरुआत में अपने विश्वास और विशिष्ट प्रथाओं को त्यागने के लिए प्रोत्साहित किया गया।[116]

१९७२-१९७३ में कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी ने दस चाम गांवों पर कब्जा कर लिया, जहाँ नए चाम नेताओं को स्थापित किया गया और ग्रामीणों को उनके गृहनगर से दूर खेतों में काम करने के लिए प्रेरित किया। किएरनन द्वारा साक्षात्कार में दिए गए एक गवाह ने दावा किया कि उस समय कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी उनके साथ अच्छा व्यवहार करते थे, और १९७४ में उन्हें अपने घरों में लौटने की अनुमति दे दी गई।[117] इसके अलावा चाम को "जमाकर्ता आधार वाले लोगों" के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिससे वे उत्पीड़न के प्रति और अधिक संवेदनशील हो गए। इसके बावजूद कई क्षेत्रों में चाम स्थानीय लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रहते हैं, ख्मेर भाषा बोलते हैं, और यहाँ तक कि बहुसंख्यक ख्मेरों के साथ-साथ अल्पसंख्यक चीनी और वियतनामी के साथ अंतर्विवाह भी करते हैं।[118] १९७२ में कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के उदय के साथ कंबोडियाई लोगों की विविध जातीय और सांस्कृतिक प्रथाएँ बिगड़ने लगीं, जब चाम लोगों को उनके विश्वास और संस्कृति का अभ्यास करने से मना कर दिया गया: चाम महिलाओं को ख्मेरों की तरह अपने बाल छोटे रखना आवश्यक था; चाम पुरुषों को सारोंग पहनना निषेध था; किसानों को काले कपड़े पहनने के लिए कहा जाता था; अनिवार्य दैनिक प्रार्थना जैसी धार्मिक गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया गया।[116] विकरी ने ध्यान दिया कि कुछ इलाकों में युद्ध की शुरुआत से पहले ख्मेर द्वारा कंबोडियाई चाम के साथ भेदभाव किया गया था, कभी-कभी इसलिए क्योंकि चाम लोगों को काले जादू के चिकित्सकों के रूप में माना जाता था।[119][120] अन्य इलाकों में ख्मेर भाषा बोलने वाले और ख्मेर वियतनामी और चीनी से शादी करने वाले मेजबान समुदायों के भीतर चाम लोगों को अच्छी तरह से आत्मसात कर लिया गया था।

१९७२ और १९७४ के बीच इस तरह के प्रतिबंधों के प्रवर्तन को और बढ़ाया गया क्योंकि ख्मेर रूज ने चाम लोगों को अपनी अनूठी भाषा, संस्कृति, मजहब और स्वतंत्र सांप्रदायिक व्यवस्था के कारण अपने साम्यवादी एजेंडे के लिए खतरा पाया। इतना ही नहीं, चाम का नाम बदलकर "इस्लामिक ख्मेर" कर दिया गया ताकि उन्हें उनकी पैतृक विरासत और धरोहर को अलग किया जा सके और उन्हें बड़े ख्मेर-प्रभुत्व वाले लोकतांत्रिक कम्पूचिया में आत्मसात किया जा सके। ख्मेर रूज का मानना था कि चाम लोग घनिष्ठ समुदायों की स्थापना कर देंगे जहाँ हर किसी पर आसानी से नजर रखी जा सकती है, और यह साम्यवादी प्रयासों को खतरे में डाल देगा। इस कारण से शासन ने निर्णय लिया कि चाम लोगों को उनके इलाकों से निकालकर कंबोडिया के अलग-अलग जिलों में भेज दिया जाएगा जहाँ वे किसान के रूप में काम करेंगे, जिससे सीधे नई लोकतांत्रिक कम्पूचिया की अर्थव्यवस्था में योगदान मिलेगा। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था कि चाम फिर से अपना समुदाय बनाने के लिए एकत्र नहीं होंगे, जिससे केंद्रीय आर्थिक सहकारी समितियों की स्थापना की शासन की योजना कमजोर हो सकती थी। धीरे-धीरे इन प्रतिबंधों की अवहेलना करने वालों को शासन द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। इसलिए अक्तूबर १९७३ में लोकतांत्रिक कम्पूचिया के पूर्वी क्षेत्र में चाम मुसलमानों ने ढोल पीटकर कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी प्रतिबंधों के प्रति अपनी नाराजगी का प्रदर्शन किया - स्थानीय मस्जिदों में पारंपरिक रूप से दैनिक प्रार्थना के समय के बारे में स्थानीय लोगों को सूचित किया जाता था। सांप्रदायिक अवज्ञा के इस कृत्य ने कई चाम मुस्लिम नेताओं और धार्मिक शिक्षकों की व्यापक गिरफ्तारी को प्रेरित किया।[121]

फरवरी १९७४ में क्षेत्र ३१, जो लोकतांत्रिक कम्पूचिया के पश्चिमी क्षेत्र में है, में रहने वाले चाम लोगों ने कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी नीति का विरोध किया, जिसके लिए मछुआरों को स्थानीय सहकारी के साथ अपनी दैनिक पकड़ दर्ज करने और कम कीमत पर सहकारी को बेचने की आवश्यकता थी। साथ ही स्थानीय लोगों से भी उन मछलियों को सहकारी समिति से ऊंचे दाम पर खरीदने को कहा गया। एक खाते के अनुसार इसने स्थानीय लोगों को अपने असंतोष को व्यक्त करने के लिए सहकारी का सामना करने के लिए प्रेरित किया, जिसके चलते १०० से अधिक लोगों की गोली मारकर हत्या की गई और कई घायल भी हो गए। दिसंबर १९७४ तक पूर्वी क्षेत्र के क्षेत्र २१ में चाम द्वारा विद्रोह समुदाय के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के खिलाफ छिड़ गया था। शासन द्वारा विद्रोह को जबरदस्ती दबा दिया गया था, जिसमें हताहतों की संख्या का कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं था।[121]

इन प्रतिबंधों, प्रतिरोधों और दबाव के जितने भी अभिलेख हैं, चाम समुदाय की ओर से भी अभिलेख हैं जो कहते हैं कि १९७० और १९७५ की शुरुआत के बीच उनके ऊपर शासन द्वारा कोई उत्पीड़न नहीं हुआ। जबकि उस अवधि के दौरान व्यापार और यात्रा जैसी कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध थे, उन्हें चल रहे गृहयुद्ध के उप-उत्पादों के रूप में समझा गया था। इसके अलावा कुछ चाम सैनिकों और कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के सदस्यों के रूप में भी क्रांति में शामिल हुए थे। कुछ स्थानीय समाचारों के अनुसार लोगों को ख्मेर रूज में तब से ही विश्वास था जब वे पहली बार ग्राम समुदायों में आकर स्थानीय लोगों को भोजन और प्रावधानों के साथ सहायता करते थे, और स्थानीय संस्कृति या धर्म पर कोई प्रतिबंध नहीं था; भले ही प्रतिबंध लगाए गए हो, लेकिन परिणाम कठोर नहीं थे।[122] कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी को क्रांति का नायक माना जाता था क्योंकि उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ किसानों और राष्ट्र के लिए संघर्ष किया था। चुकी चाम समुदायों को लोकतांत्रिक कम्पूचिया में पाया जाना था, इसलिए विभिन्न चाम समुदायों ने कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के १९७५ से पहले के प्रभावों को अलग-अलग तरीकों से अनुभव किया था; कुछ समुदायों ने दबाव और प्रतिबंधों को अनुभव किया जबकि कुछ ने नहीं किया। लेकिन जब पोल पॉट ने १९७५ के अंत तक सत्ता को समेकित किया था तब उत्पीड़न अधिक गंभीर हो गया और सभी चाम लोगों को अंधाधुंध रूप से प्रभावित किया। यह उन सरल कारकों में से एक हो सकता है जिसके कारण कंबोडियाई सरकार और कंबोडिया की अदालतों में असाधारण मंडल ने पोल पॉट के १९७५ में सत्ता में आने से पहले के ख्मेर रूजी अपराधों पर मुकदमा नहीं चलाया। जैसे १९७५ से पहले दबाव का अनुभव करने वालों की बातों को नरसंहार का हिस्सा नहीं माना जाता था क्योंकि यह जातीय या धार्मिक आधार पर नहीं किया जा रहा था।

१९७५ में ख्मेर गणराज्य बलों पर कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी की जीत पर ख्मेर रूज में शामिल दो चाम वंश के भाई सैनिकों के रूप में काम्पोंग चाम प्रांत के भीतर क्षेत्र २१ में घर लौट आए, जहाँ सबसे बड़ा चाम मुसलमान समुदाय पाया जा सकता था। भाइयों ने फ़िर अपने पिता को उन कारनामों के बारे में बताया जो उन्होंने क्रांति के दौरान अनुभव किया जिसमें ख्मेरों को मारना और सूअर का मांस खाना शामिल था। उन्हें उम्मीद थी कि ये सब सुनकर उनके पिता को साम्यवादी लक्ष्य में शामिल होने के लिए तैयार हो जाएंगे। पिता, जो चुप थे, स्पष्ट रूप से अपने पुत्रों की कहानियों से चिंतित नहीं थे। इसके बजाय उन्होंने एक विदारक औज़ार से अपने बेटों को मार डाला, और अपने साथी ग्रामीणों से कहा कि उन्होंने दुश्मन को मार डाला है। जब गाँववालों ने कहा कि उन्होंने वास्तव में अपने ही बेटों की हत्या की थी, तो उन्होंने अपने बेटों द्वारा सुनाई गई पहले की कहानियों का वर्णन किया कि ख्मेर रूज इस्लाम और चाम लोगों से नफरत करता है। इसके कारण सभी गाँववालों ने एक साथ निर्णय लिया कि सभी ख्मेर रूज सैनिकों को उसी रात मार दिया जाए। अगली सुबह दूसरे ख्मेर रूज सैनिक भारी हथियारों के साथ इस क्षेत्र में पहुँचे और गाँव को घेरकर सभी गाँववालों को मार डाला।[123]

इसी तरह जून या जुलाई १९७५ में पूर्वी स्थान के क्षेत्र २१ में कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के अधिकारियों ने लोगों से कुरान की सभी प्रतियां जब्त करने की कोशिश की, साथ ही चाम महिलाओं को बाल छोटे करने का आदेश दिया। अधिकारियों को स्थानीय चाम समुदाय द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन के साथ मुलाकात करनी पड़ी, जिन्हें शासन के सैनिकों द्वारा गोली मार दी गई। चाम लोगों ने तलवार और धारियों से कुछ सैनिकों को मार डाला, जिससे उनकी सैन्य सुदृढीकरण के साथ मुलाकात हुई, जिसने ग्रामीणों और उनकी संपत्तियों को नष्ट कर दिया।[124] मलेशिया में चाम शरणार्थियों के एक अन्य समाचार में जून १९७५ में शासन द्वारा चाम मुसलमान समुदाय के भीतर तेरह प्रमुख व्यक्ति मारे गए। हत्याओं के पीछे का कारण माना जाता है कि उनमें से कुछ कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी की बैठक में भाग लेने के नाम पर प्रार्थना चलवा रहे थे, जबकि अन्य कथित तौर पर "विवाह समारोहों की अनुमति के लिए याचिका दायर कर रहे थे।"[125]

१९७६ के मध्य में विद्रोह के कारण हालात बद से बदतर होते गए। जातीय अल्पसंख्यक केवल ख्मेर राष्ट्रीयता और धर्म के प्रति वफादारी की प्रतिज्ञा करने के लिए बाध्य थे: ख्मेर के अलावा कोई अन्य पहचान नहीं थी। नतीजतन चाम भाषा का उच्चारण नहीं किया गया, और सांप्रदायिक भोजन अनिवार्य हो गया जहाँ हर कोई एक ही भोजन खाता था, जिसके कारण चाम मुसलमानों को सूअर पालने और अपने धार्मिक विश्वास के खिलाफ सूअर का मांस खाने के लिए मजबूर होना पड़ा।[126] स्थानीय लोगों द्वारा पेश किए गए इस तरह के विद्रोहों के कारण एक स्पष्टीकरण है कि कुछ चाम ख्मेर रूज में सैनिकों के रूप में शामिल थे, जो पोल पॉट के सत्ता में आने के बाद सत्ता की स्थिति का अनुमान लगा रहे थे। १९७५ में इन सैनिकों को ख्मेर रूज बल से बर्खास्त कर दिया गया, उनकी इस्लामी प्रथाओं से वंचित कर दिया गया और उनकी जातीय पहचान को लूट लिया गया।[127]

चाम लोगों की हत्याओं के दौरान प्रतिरूप सुसंगत थे: पहले मुफ्ती, इमाम और प्रभाव के अन्य विद्वान लोगों समेत चाम मुस्लिम नेताओं की हत्या के माध्यम से सांप्रदायिक ढांचे को खत्म किया गया। फ़िर चाम को ख्मेरों से अलग करने वाली प्रथाओं को प्रतिबंधित करके चाम की इस्लामी और जातीय पहचान को खत्म किया। इसके बाद अपने समुदायों से चाम का फैलाव या तो खेतों में जबरन मजदूरी करके या कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी के खिलाफ प्रतिरोध या विद्रोह का झूठा आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। ख्मेर रूज युग के दौरान बौद्ध धर्म और इस्लाम सहित सभी धर्मों को सताया गया था। चाम के सूत्रों के अनुसार ख्मेर रूज युग के दौरान १३२ मस्जिदों को नष्ट कर दिया गया, कई अन्य मस्जिदों को तहस-नहस किया गया, और मुसलमानों के नमाज़ पढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मुसलमानों को सूअर का मांस खाने के लिए मजबूर किया गया और मना करने पर उनकी हत्या कर दी जाती थी। चाम गाँवों के सभी लोगों को मार डाला जाता था। चाम लोगों को अपनी भाषा बोलने की अनुमति नहीं थी। चाम बच्चों को उनके माता-पिता से दूर ले जाया गया और ख्मेर के रूप में पाला गया।  १९७९ में ख्मेर रूज सरकार द्वारा दिए गए आदेशों में कहा गया है: "ख्मेर से संबंधित कम्पूचियाई मिट्टी पर चाम राष्ट्र अब मौजूद नहीं है। तदनुसार चाम राष्ट्रीयता, भाषा, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं को तुरंत समाप्त कर दिया जाना चाहिए। जो लोग इस आदेश का पालन करने में विफल रहते हैं, उन्हें अंगकार के विरोध के अपने कृत्यों के सभी परिणाम भुगतने होंगे।"[128]

ख्मेर रूज शासन के अंत के बाद सभी धर्मों को बहाल कर दिया गया। विकरी का मानना है कि १९८० के दशक के मध्य में कंबोडिया में लगभग १,८५,००० चाम रहते थे और मस्जिदों की संख्या लगभग उतनी ही थी जितनी १९७५ से पहले थी। १९८८ की शुरुआत में नोम पेन्ह क्षेत्र में ६ मस्जिद थे और प्रांतों में एक "अच्छी संख्या" थी, लेकिन मुसलमान गणमान्य व्यक्तियों की संख्या बहुत कम थी; कंबोडिया में पिछले ११३ सबसे प्रमुख चाम पादरियों में से केवल २० ख्मेर रूज काल से बचे थे।[129]

धार्मिक समूह[संपादित करें]

पोल पॉट एक उत्साही मार्क्सवादी नास्तिक थे,[130] इसलिए उनके नेतृत्व में ख्मेर रूज ने राज्य नास्तिकता की नीति लागू की। कैथरीन वेसिंगर के अनुसार "लोकतांत्रिक कम्पूचिया आधिकारिक तौर पर एक नास्तिक राज्य था, और ख्मेर रूज द्वारा धर्म का उत्पीड़न केवल अल्बानिया के साम्यवादी राज्यों और उत्तर कोरिया में धर्म के उत्पीड़न से गंभीरता से मेल खाता था। उत्तर कोरिया में धर्म की स्वतंत्रता देखें)।" [131] सभी धर्मों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और इस्लाम,[132] ईसाई धर्म,[133] और बौद्ध धर्म के अनुयायियों पर अत्याचार व्यापक थे। ऐसा अनुमान है कि ख्मेर रूज द्वारा ५०,०००बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दी गई थी।[134][135]

आंतरिक शुद्धिकरण[संपादित करें]

  पूर्वी सैन्य क्षेत्र में जिन इलाकों को वियतनामियों ने अशुद्ध कर दिया था, वहाँ पर १९७८ में पोल पॉट ने दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र के सैनिकों को भेज दिया और "छिपे हुए गद्दारों" को खत्म करने का आदेश दिया। कम्पूचिया सरकार के हमले का सामना करने में असमर्थ थी, इसलिए फिम ने आत्महत्या कर ली और उनके डिप्टी हेंग समरीन वियतनाम चले गए। पूर्वी क्षेत्र में नरसंहारों की श्रृंखला पोल पॉट शासन के नरसंहार के दौरान हुए सभी नरसंहारों में सबसे अधिक थी।[136] इसे "पार्टी, सेना और लोगों के बड़े पैमाने पर अंधाधुंध शुद्धिकरण" के रूप में वर्णित किया गया था। 

बच्चों का उपयोग[संपादित करें]

ख्मेर रूज ने नरसंहार और अत्याचार करने के लिए हजारों असुध बच्चों का इस्तेमाल किया, खासकर वो जो अभी अपनी शुरुआती किशोरावस्था में थे । निःसंकोच बच्चों को बिना किसी हिचकिचाहट के किसी भी आदेश का पालन करना सिखाया गया।[19]

संगठन ने कम से कम १९९८ तक बड़े पैमाने पर बच्चों का उपयोग करना जारी रखा, अक्सर उन्हें जबरन भर्ती किया जाता था। इस अवधि के दौरान बच्चों को मुख्य रूप से अवैतनिक सहायक भूमिकाओं में तैनात किया गया था, जैसे गोला-बारूद वाहक या सैनिक के रूप में। कई बच्चे खाना ना मिलने के कारण ख्मेर रूज को छोड़कर भाग गए, और उनका मानना था कि सरकारी बलों में शामिल होने से उन्हें जीवित रहने में मदद मिलेगी, हालांकि स्थानीय कमांडरों अक्सर उन्हें वेतन देने से इनकार कर देते थे।[137]

यातना और चिकित्सा प्रयोग[संपादित करें]

  ख्मेर रूज शासन कैदियों पर दर्दनाक चिकित्सा प्रयोगों का अभ्यास करने के लिए भी जाना जाता है। लोगों को शासन का विरोध करने के संदेह में या अन्य कैदियों द्वारा नाम देने के कारण कैद और प्रताड़ित किया जाता था। पूरे परिवार (महिलाओं और बच्चों सहित) को जेलों में बंद करके उन्हें प्रताड़ित किया जाता था क्योंकि ख्मेर रूज को डर था कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे, तो उनके इच्छित पीड़ितों के रिश्तेदार बदला लेने की कोशिश करेंगे। पोल पॉट ने कहा था, "यदि आप घास को मारना चाहते हैं, तो आपको जड़ों को भी मारना होगा"। अधिकांश कैदियों को यह भी नहीं पता था कि उन्हें क्यों कैद किया गया था और अगर जेलरों से पूछते, तो पहरेदार केवल यह कहकर जवाब देते कि अंगकार (कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी) कभी गलती नहीं करते हैं, तो उन्होंने कुछ अवैध किया ही होगा।[138]

एस-२१ के सूत्र और मुकदमे के दस्तावेजों दोनों में यातना के कई खाते हैं; जैसा कि उत्तरजीवी बौ मेंग ने अपनी पुस्तक (हुय वन्नक द्वारा लिखित) में बताया, यातनाएँ इतनी दर्दनाक और दुष्ट थीं कि कैदियों ने यहाँ तक कि चम्मच से भी आत्महत्या करने की कोशिश की, और उन्हें रोकने के लिए अक्सर उनकी उनके हाँथ उनकी पीठ के पीछे बंधे हुए रहते थे। जब यह माना जाता था कि वे कोई और उपयोगी जानकारी प्रदान नहीं कर सकते हैं, तो उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर मौत के खेत (जो सामूहिक कब्रें थीं) में भेज दिया जाता, जहाँ रात में कैदियों को कैंची या कील और हथौड़े जैसे धातु के औजारों से मार दिया जाता था (चुकी गोलियाँ बहुत महंगी थीं)। कई बार उनकी चीखें ना सुनाई दे इसलिए लाउडस्पीकरों पर लोकतांत्रिक कम्पूचिया का प्रचार संगीत बजाय जाता था और जनरेटर सेट से शोर की आवाज चलाई जाती थी।

एक चंकिरी का पेड़। तख्ते पर लिखा है "चंकिरी का पेड़ जिसपर जल्लाद बच्चों सर फोड़ते थे।"

एस-२१ के अंदर शिशुओं और बच्चों को एक विशेष उपचार दिया गया था; उन्हें उनकी माताओं और रिश्तेदारों से दूर ले जाया गया, और हत्या के मैदानों में भेज दिया जाता था, जहाँ उन्हें चंकिरी के पेड़ पर सर फोड़कर मार डाला जाता था। माना जाता है कि ऐसा एस-२१ जैसे अन्य कारागार भी थे जहाँ बच्चों को इस प्रकार मारा जाता था, जो पूरे लोकतांत्रिक कम्पूचिया में फैले हुए थे। एस-२१ में कुछ पश्चिमी लोग भी थे जिन्हें शासन ने पकड़ लिया था। उनमें से एक ब्रिटिश शिक्षक जॉन डावसन ड्यूहर्स्ट थे, जिन्हें ख्मेर रूज ने उस समय पकड़ लिया था जब वह एक यॉट पर थे। एस-२१ के एक पहरेदार चेम सोयू ने कहा कि एक पश्चिमी देश के नागरिक को जिंदा जला दिया गया था, लेकिन कांग केक इव ने इससे इनकार किया। उन्होंने कहा कि पोल पॉट ने उन्हें लाशों को जलाने के लिए कहा और कोई भी उनके आदेश का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करेगा।[139] यातनाएँ न केवल कैदियों को अपने अपराध कबूल करने के लिए मजबूर करने के लिए थीं, बल्कि पहरेदारों के मनोरंजन के लिए भी थीं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने कैदियों के साथ अच्छा व्यवहार किया तो वे खुद कैदी बन जाएंगे।[140]

ख्मेर रूज के शासन के आने से पहले के सभी चिकित्सकों को या तो मार दिया गया था या ग्रामीण इलाकों में किसानों के रूप में काम करने के लिए भेजा गया था, और नोम पेन्ह में चिकित्सा संकाय के पुस्तकालय में आग लगा दी गई थी। उनके बदले शासन ने नए चिकित्सकों को नियुक्त किया जो बिना या बहुत कम प्रशिक्षण वाले किशोर थे। उन्हें पश्चिमी चिकित्सा का कोई ज्ञान नहीं था (जिसे पूंजीवादी आविष्कार माना जाता था) और उन्हें अपने खुद के चिकित्सा प्रयोगों का अभ्यास करके कम्बोडियाई चिकित्सा में नई तकनीकों का आविष्कार करना था। उनके पास पश्चिमी दवाएँ नहीं थीं (क्योंकि ख्मेर रूज के अनुसार कंबोडिया को आत्मनिर्भर होना था) और सभी चिकित्सा बिना बेहोशी की दवाई के की जाती थी।[141] एस-२१ के अंदर काम करने वाले एक चिकित्सक ने बताया कि एक १७ साल की लड़की का गला काट दिया गया और उदर में छेद करके उसे पीटा गया और रात भर पानी में रखा गया। इस प्रक्रिया को कई बार बिना एनेस्थेटिक्स के दोहराया गया।[142]

काम्पोंग चाम प्रांत के एक अस्पताल में बाल चिकित्सकों ने एक जीवित गैर-सहमति वाले व्यक्ति की आंतों को काट दिया और उपचार प्रक्रिया का अध्ययन करने के लिए उनके अंत को एक दूसरे से जोड़ दिया। इस "ऑपरेशन" के कारण तीन दिनों के बाद रोगी की मृत्यु हो गई।[141] उसी अस्पताल में ख्मेर रूज द्वारा प्रशिक्षित अन्य "चिकित्सकों" ने सिर्फ दिल को धड़कते हुए देखने के लिए एक जीवित व्यक्ति की छाती खोल दी। ऑपरेशन के परिणामस्वरूप रोगी की तत्काल मृत्यु हो गई।[141] अन्य साक्ष्य और ख्मेर रूज नीति सुझाव देते हैं कि ये अलग-थलग मामले नहीं थे।[143][144][145] उदाहरण के लिए उन्होंने एक जीवित व्यक्ति के शरीर में नारियल पानी इंजेक्ट करके प्रभावों का अध्ययन भी किया। नारियल के रस का इंजेक्शन अक्सर घातक होता है।[141]

मृत संख्या[संपादित करें]

बेन किएरनन का अनुमान है कि ख्मेर रूज नीति के परिणामस्वरूप १६.७१ से १८.७१ लाख कंबोडियाई लोगों की मृत्यु हो गई, जो कंबोडिया की १९७५ की आबादी का २१% से २४% के बीच था।[2] फ्रांसीसी जनसांख्यिकीय मारेक स्लिविंस्की के एक अध्ययन ने ख्मेर रूज के तहत १९७५ की कंबोडियाई आबादी ७८ लाख में से २० लाख से कुछ कम अप्राकृतिक मौतों की गणना की; कंबोडियाई महिलाओं की १५.७% की तुलना में ख्मेर रूज के तहत ३३.५% कंबोडियाई पुरुषों की मृत्यु हुई।[3] २००१ के एक अकादमिक स्रोत के अनुसार, ख्मेर रूज के तहत अधिक मौतों का सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत अनुमान १५ लाख से २० लाख तक है, हालांकि आंकड़े १० लाख से कम और ३० लाख से अधिक के रूप में उद्धृत किए गए हैं; ख्मेर रूज की फांसी के कारण होने वाली मौतों का पारंपरिक रूप से स्वीकृत अनुमान ५ से १० लाख तक है, "इस अवधि के दौरान अतिरिक्त मृत्यु दर का एक तिहाई से आधा।"[1] हालांकि, २०१३ के एक अकादमिक स्रोत (२००९ से अनुसंधान का हवाला देते हुए) इंगित करता है कि निष्पादन में कुल का ६०% हिस्सा हो सकता है, जिसमें २३,७४५ सामूहिक कब्रें हैं जिनमें लगभग १३ लाख निष्पादन के संदिग्ध शिकार हैं।[20] ख्मेर रूज के निष्पादन के पहले और अधिक व्यापक रूप से स्वीकृत अनुमानों की तुलना में काफी अधिक होने पर, कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र के क्रेग एचेसन ने दस लाख से अधिक निष्पादन के ऐसे अनुमानों का बचाव किया, जो "प्रशंसनीय, प्रकृति को देखते हुए" थे। सामूहिक कब्र और डीसी-कैम के तरीके, जो अधिक अनुमान के बजाय निकायों की कम गिनती का उत्पादन करने की अधिक संभावना रखते हैं।" [32] [30] जनसांख्यिकीय पैट्रिक ह्यूवेलिन ने अनुमान लगाया कि ११.७ लाख से ३४.२ लाख के बीच कंबोडियाई लोगों की मृत्यु १९७० और १९७९ के बीच अप्राकृतिक मौतों के साथ हुई, जिनमें से डेढ़ से तीन लाख के बीच गृहयुद्ध के दौरान हुई मौतें थीं। ह्यूवेलिन का केंद्रीय अनुमान २५.२ लाख अतिरिक्त मौतें हैं, जिनमें से १४ लाख हिंसा का प्रत्यक्ष परिणाम थे।[1][32] कंबोडियाई लोगों के घर-घर के सर्वेक्षण पर आधारित होने के बावजूद, ख्मेर रूज के उत्तराधिकारी शासन, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कम्पूचिया (पीआरके) द्वारा घोषित ३३ लाख मौतों का अनुमान आम तौर पर एक अतिशयोक्ति माना जाता है; [3] अन्य कार्यप्रणाली त्रुटियों के बीच, पीआरके अधिकारियों ने उन पीड़ितों की अनुमानित संख्या को जोड़ा जो आंशिक रूप से खोदी गई सामूहिक कब्रों में कच्चे सर्वेक्षण के परिणामों में पाए गए थे, जिसका अर्थ है कि कुछ पीड़ितों की दोहरी गणना की गई होगी।[32]

लोकतांत्रिक कम्पूचिया के बाद[संपादित करें]

स्मरणोत्सव[संपादित करें]

हालांकि पुराने शासन के सरकारी अधिकारियों की फांसी नोम पेन्ह के गिरने के बाद हुई थी, २० मई १९७५ को कंबोडिया में उस तारीख के रूप में मनाया जाता है जब निजी नागरिकों के खिलाफ ख्मेर रूज अभियान शुरू हुआ था [146] और अब २० मई को प्रतिवर्ष "राष्ट्रीय स्मरण दिवस" (ख्मेर: ទិវាជាតិនៃការចងចាំ) मनाया जाता है जो एक राष्ट्रीय छुट्टी द्वारा चिह्नित है।[147]

युद्ध अपराध मुकदमे[संपादित करें]

कोर्ट रूम के साथ ट्रिब्यूनल का मुख्य भवन

१५ जुलाई १९७९ को ख्मेर रूज को उखाड़ फेंकने के बाद कंबोडिया की नई सरकार ने "हुक्मनामा कानून न० १" लागू किया जिसने नरसंहार के अपराध के लिए पोल पॉट और ईएंगसरी के मुकदमे की अनुमति दी। उन्हें एक अमेरिकी बचाव पक्ष के वकील, होप स्टीवंस,[148] दिए गए और उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया और उन्हें नरसंहार का दोषी ठहराया गया।[149] जनवरी २००१ में कम्बोडियाई संसद भवन ने ख्मेर रूज शासन के अतिरिक्त सदस्यों पर मुकदमा चलाने के लिए एक न्यायाधिकरण बनाने के लिए कानून पारित किया।[150]

संयुक्त राज्य अमेरिका ने १९८९ तक ख्मेर रूज अत्याचारों को नरसंहार के रूप में वर्णित करने से परहेज किया और १९९७ के अंत तक पोल पॉट के लिए मुकदमा चलाने और पकड़ने को मंजूरी देने से इनकार कर दिया, क्योंकि अमेरिका ने १९८० के दशक में दक्षिण पूर्व एशिया में वियतनामी और सोवियत प्रभाव को रोकने के लिए ख्मेर रूज का समर्थन किया था। अमेरिका को इस बात का भी डर था कि अभी के समय एक मुकदमा चलाने से वियतनाम युद्ध के दौरान कंबोडिया पर अमेरिकी बमबारी की वैधता की जांच कर सकता है।[151]

१९९९ में निक डनलप और नेट थायर द्वारा कांग का साक्षात्कार लिया गया और टोल स्लेंग कारावास में किए गए अपराधों के लिए अपने अपराध को स्वीकार किया, जहाँ लगभग १७,००० राजनीतिक कैदियों को मार डाला गया था। उन्होंने अपने कार्यों के लिए दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वे मुकदमे में खड़े होने और अपने पूर्व साथियों के खिलाफ सबूत देने को तैयार हैं। फरवरी और मार्च २००९ में अपने मुकदमे के दौरान कांग ने स्वीकार किया कि वह तुओल स्लेंग में किए गए अपराधों के लिए जिम्मेदार था। २६ जुलाई २०१० को, उन्हें मानवता विरोधी अपराधों के आरोप में दोषी पाया गया और उन्हें ३५ साल जेल की सजा सुनाई गई।[152] ३ फरवरी २०१२ को उनकी पिछली सजा को आजीवन कारावास से बदल दिया गया था।[153] कांग की सितंबर २०२० में फेफड़ों की बीमारी से मृत्यु हो गई।[154]

नुओन चिया को १९ सितंबर २००७ को गिरफ्तार किया गया था।[155] अपने २०१३ के मुकदमे के अंत में उन्होंने यह कहते हुए सभी आरोपों का खंडन किया कि उन्होंने "ना तो लोगों के साथ दुर्व्यवहार या भोजन से वंचित करने के लिए और ना ही नरसंहार करने का आदेश नहीं दिया था"। उन्हें २०१४ में दोषी ठहराया गया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उन्होंने अफसोस व्यक्त किया और अपने अपराधों के लिए नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए कहा है, "मैं जनता, पीड़ितों, परिवारों और सभी कंबोडियाई लोगों से ईमानदारी के साथ माफी मांगना चाहता हूं।"[156]

एक भव्य नोम पेन्ह विला में स्थित होने के बाद, ईएंग सरी को १२ नवंबर २००७ को गिरफ्तार किया गया और उन्हे और उनकी पत्नी ईएंग ठिरिथ (जो शासन के लिए एक अनौपचारिक सलाहकार थीं) को मानवता विरोधी अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया।[157] १७ नवंबर २०११ को चिकित्सा विशेषज्ञों के मूल्यांकन के बाद थिरिथ को मानसिक स्थिति के कारण मुकदमे के लिए अयोग्य पाया गया।[158] सरी की २०१३ में हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई, जब उनका परीक्षण चल रहा था।[159]

एक अन्य वरिष्ठ ख्मेर रूज नेता खिउ सम्फन को १९ नवंबर २००७ को गिरफ्तार किया गया और उनपर मानवता विरोधी अपराधों का आरोप लगाया गया।[160] उन्हें २०१४ में दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। २३ जून २०१७ को एक सुनवाई में सम्फन ने अपने निर्दोष पीड़ितों की याद में झुकने की इच्छा व्यक्त की, जबकि यह भी दावा किया कि उन्होंने उन लोगों के लिए संघर्ष किया जिन्होंने अपने आदर्श के लिए एक उज्जवल भविष्य के लिए संघर्ष किया।[161]

नरसंहार की मनाही[संपादित करें]

  १५ अप्रैल १९९८ को पोल पॉट ने अपनी मृत्यु के कुछ महीने पहले[162] नेट थायर को अपना साक्षात्कार दिया था। साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा कि उनके पास एक स्पष्ट विवेक था और उन्होंने नरसंहार के लिए जिम्मेदार होने से इनकार किया। पोल पॉट ने जोर देकर कहा कि वे "लोगों को मारने के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष करने" के लिए आए थे। एलेक्स अल्वारेज़ के अनुसार पोल पॉट ने "खुद को एक गलत समझे गए और गलत तरीके से बदनाम किए गए व्यक्ति" के रूप में चित्रित किया।[163] २०१३ में कंबोडियाई प्रधान मंत्री हुन सेन ने सर्वसम्मति से कानून पारित किया जो ख्मेर रूज द्वारा किए गए कम्बोडियाई नरसंहार और अन्य युद्ध अपराधों से इनकार करने को अपराध मानता है; एक विधेयक जो यहूदी नरसंहार के समापन के बाद यूरोपीय देशों में पारित कानून के समान है।[164]

कंबोडियाई राष्ट्रीय बचाव दल के उपाध्यक्ष केम सोखा की टिप्पणियों के बावजूद कानून पारित किया गया। सोखा ने कहा कि तुओल स्लेंग नरसंहार संग्रहालय में प्रदर्शन नकली थे और १९७९ में वियतनामी द्वारा आक्रमण के बाद नकली कलाकृतियों को बनाया गया था। सोखा की पार्टी ने दावा किया है कि उनकी टिप्पणियों को संदर्भ से अलग लिया गया। [165]

चीन से समर्थन की मनाही[संपादित करें]

१९८८ में कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन सेन, जो कभी ख्मेर रूज के सदस्य थे, ने चीन को कंबोडिया में "सारी फसात की जड़" के रूप में वर्णित किया। लेकिन जुलाई १९९७ में जब उन्होंने एक खूंखार तख्तापलट के साथ अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों को बाहर करके पश्चिम में आक्रोशित कर दिया तब चीन ने तुरंत यथास्थिति को मान्यता दी और सैन्य सहायता की पेशकश की। नए हित जल्द ही संरेखण में आ गए। फिर २००० में सीसीपी महासचिव और चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन कंबोडिया में एक सरकारी यात्रा के लिए आए। यह १९६३ के बाद से पहली बार हो रहा था कि एक चीनी राष्ट्रपति कंबोडिया में आए हो।

दिसंबर २००० में जब जियांग कंबोडिया का दौरा कर रहे थे, चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी किया कि जब तक ख्मेर रूज ने कंबोडिया पर शासन किया तब तक बीजिंग ने कभी उनकी गलत नीतियों का समर्थन नहीं किया और माफी मांगने से इनकार कर दिया।[166][167][168] चीन के विदेश मंत्रालय में एशियाई विभाग के तत्कालीन उपनिदेशक यांग यांयी (杨燕怡) ने दावा किया: "यह एक आंतरिक मामला है जिसे स्वयं कंबोडियाई द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए। चीन ने कभी किसी दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया। उस निश्चित ऐतिहासिक अवधि के दौरान हमारी सहायता और समर्थन कंबोडिया की संप्रभुता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा के प्रयास का समर्थन करना था। हम कभी दूसरे देशों की गलत नीतियों का समर्थन नहीं करते हैं।"[166]

यात्रा के दौरान जियांग ने नरोत्तम सीहनु और कंबोडिया के प्रधान मंत्री हुन सेन से मुलाकात की, कंबोडिया को $१.२ करोड़ की सहायता पेश करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। भले ही कंबोडियाई सरकार ने जियांग की यात्रा के दौरान ख्मेर रूज के मुद्दे का उल्लेख कभी नहीं किया, प्रदर्शनकारियों ने चीन से माफी और यहाँ तक कि बहाली की मांग की, और ऐसा अनुरोध अभी भी जारी है।[166][169] २०१५ में कंबोडिया के दस्तावेज़ीकरण केंद्र के कार्यकारी निदेशक यूक चांग ने बताया कि "चीनी सलाहकार सभी कारावास प्रहरियों और शीर्ष नेता के साथ मिले हुए थे। चीन ने इसके लिए कभी भी स्वीकार नहीं किया और माफी नहीं मांगी।" २००९ में ख्मेर रूज के कुछ पूर्व नेताओं के अदालती मुकदमों के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता जियांग यू ने दावा किया: "लंबे समय से चीन के पिछले कंबोडियाई सरकारों के साथ सामान्य और मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं, जिसमें लोकतांत्रिक कम्पूचिया भी शामिल है। जैसा कि सभी जानते हैं, लोकतांत्रिक कम्पूचिया की सरकार के पास संयुक्त राष्ट्र में एक कानूनी सीट थी, और उसने ७० से अधिक देशों के साथ व्यापक विदेशी संबंध स्थापित किए थे।"[170]

बचाव दल की पहचान[संपादित करें]

द रेस्क्यूअर्स प्रदर्शन, जो २०११ से २०१५ तक चला, ने उन व्यक्तियों की पहचान की जिन्होंने दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। कम्बोडियाई बचावकर्ताओं को अन्य विश्व नरसंहारों से साहस के समान प्रोफाइल के साथ जोड़ा गया।[171]

ऑस्ट्रेलियाई सामाजिक सद्भाव समूह, करेज टू केयर द्वारा कंबोडियाई नरसंहार के बचावकर्ताओं को इसी प्रकार मान्यता दी गई, जिसने इस विषय पर एक शैक्षिक संसाधन प्रकाशित किया।[172]

साहित्य और मीडिया में[संपादित करें]

  • फ़्रांसवा पोनशोद द्वारा लिखी गई फ्रांसीसी पुस्तक कांबोझ आने ज़ेरो (Cambodge année zéro अर्थात "कंबोडिया वर्ष शून्य") १९७७ में जारी किया गया था और १९७८ में अंग्रेजी में अनुवाद किया गया था।[173] पोनचौड दुनिया के ध्यान में कंबोडियन नरसंहार लाने वाले पहले लेखकों में से एक थे।[174] पोनचौड ने कहा है कि नरसंहार "सबसे ऊपर था, कार्रवाई में अनुवाद एक आदमी की विशेष दृष्टि [ एसic ]: एक व्यक्ति जिसे एक भ्रष्ट शासन द्वारा खराब कर दिया गया है, उसे सुधार नहीं किया जा सकता है, उसे भाईचारे से शारीरिक रूप से समाप्त किया जाना चाहिए शुद्ध का।"[175] मर्डर ऑफ ए जेंटल लैंड: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए कम्युनिस्ट जेनोसाइड इन कंबोडिया जॉन बैरोन और एंथोनी पॉल द्वारा १९७७ में प्रकाशित किया गया था।[176] पुस्तक शरणार्थियों के खातों पर आधारित है, और रीडर्स डाइजेस्ट में प्रकाशित एक संक्षिप्त संस्करण व्यापक रूप से प्रकाशित हुआ था। पढ़ना।[177]
  • नरसंहार से बचे फिल्म निर्माता रिथी पान को "कई लोग कंबोडिया की सिनेमाई आवाज मानते हैं।" पान ने नरसंहार पर कई वृत्तचित्रों का निर्देशन किया है, जिसमें एस -२१: द ख्मेर रूज किलिंग मशीन शामिल है, जिसे आलोचकों द्वारा "हमें यह देखने की अनुमति देने के लिए नोट किया गया है कि अतीत को वर्तमान के रूप में प्रस्तुत करने के लिए स्मृति और समय कैसे गिर सकता है। इसलिए बुराई का सामान्य चेहरा प्रकट करो।"[178]
  • नरसंहार को १९८४ की अकादमी पुरस्कार विजेता फिल्म द किलिंग फील्ड्स [179] और पेट्रीसिया मैककॉर्मिक के २०१२ के उपन्यास नेवर फॉल डाउन में चित्रित किया गया है।[180]
  • नरसंहार का वर्णन लूंग उनग ने अपने संस्मरण फर्स्ट दे किल्ड माई फादर (२०००) में भी किया है।[181][180] पुस्तक को एंजेलीना जोली द्वारा निर्देशित २०१७ की जीवनी फिल्म में रूपांतरित किया गया था। १९७५ में सेट, फिल्म में ५ वर्षीय अनग को दर्शाया गया है, जिसे एक बाल सैनिक के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि उसके भाई-बहनों को ख्मेर रूज शासन द्वारा श्रम शिविरों में भेजा जाता है। [182]
  • फ़िल्म " ईयर ज़ीरो: द साइलेंट डेथ ऑफ़ कंबोडिया " १९७९ की एक ब्रिटिश टेलीविज़न डॉक्यूमेंट्री है जिसे ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार जॉन पिल्गर द्वारा लिखित और प्रस्तुत किया गया है। [183] [184] ३० अक्टूबर १९७९ को ब्रिटिश टेलीविजन पर पहला प्रसारण, फिल्म १९७० के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा कंबोडिया की व्यापक बमबारी को वियतनाम युद्ध के एक गुप्त अध्याय के रूप में याद करती है, बाद में क्रूरता और नरसंहार जो पोल पॉट और उसके ख्मेर रूज मिलिशिया ने लिया था। लोगों की गरीबी और पीड़ा, और पश्चिम द्वारा दी जाने वाली सीमित सहायता। कंबोडिया पर पिल्गर की पहली रिपोर्ट डेली मिरर के एक विशेष अंक में प्रकाशित हुई थी।[185][186][187]

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संदर्भ[संपादित करें]

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