किशोरावस्था

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किशोरावस्था मनुष्य के जीवन का बसंतकाल माना गया है। यह काल बारह से उन्नीस वर्ष तक रहता है, परंतु किसी किसी व्यक्ति में यह बाईस वर्ष तक हो सकता है। यह काल भी सभी प्रकार की मानसिक शक्तियों के विकास का समय है। भावों के विकास के साथ साथ बालक की कल्पना का विकास होता है। उसमें सभी प्रकार के सौंदर्य की रुचि उत्पन्न होती है और बालक इसी समय नए-नए और ऊँचे आदर्शों को अपनाता है। बालक भविष्य में जो कुछ होता है, उसकी पूरी रूपरेखा उसकी किशोरावस्था में बन जाती है। जिस बालक ने धन कमाने का स्वप्न देखा, वह अपने जीवन में धन कमाने में लगता है। इसी प्रकार जिस बालक के मन में कविता और कला के प्रति लगन हो जाती है, वह इन्हीं में महानता प्राप्त करने की चेष्टा करता और इनमें सफलता प्राप्त करना ही वह जीवन की सफलता मानता है। जो बालक किशोरावस्था में समाज सुधारक और नेतागिरी के स्वप्न देखते हैं, वे आगे चलकर इन बातों में आगे बढ़ते है।

पश्चिम में किशोर अवस्था का विशेष अध्ययन कई मनोवैज्ञानिकों ने किया है। किशोर अवस्था काम भावना के विकास की अवस्था है। कामवासना के कारण ही बालक अपने में नवशक्ति का अनुभव करता है। वह सौंदर्य का उपासक तथा महानता का पुजारी बनता है। उसी से उसे बहादुरी के काम करने की प्रेरणा मिलती है।

किशोर अवस्था शारीरिक परिपक्वता की अवस्था है। इस अवस्था में बच्चे की हड्डियों में दृढ़ता आती है; भूख काफी लगती है। कामुकता की अनुभूति बालक को 13 वर्ष से ही होने लगती है। इसका कारण उसके शरीर में स्थित ग्रंथियों का स्राव होता है। अतएव बहुत से किशोर बालक अनेक प्रकार की कामुक क्रियाएँ अनायास ही करने लगते हैं। जब पहले पहल बड़े लोगों को इसकी जानकारी होती है तो वे चौंक से जाते हैं। आधुनिक मनोविश्लेषण विज्ञान ने बालक की किशोर अवस्था की कामचेष्टा को स्वाभाविक बताकर, अभिभावकों के अकारण भय का निराकरण किया है। ये चेष्टाएँ बालक के शारीरिक विकास के सहज परिणाम हैं। किशोरावस्था की स्वार्थपरता कभी-कभी प्रौढ़ अवस्था तक बनी रह जाती है। किशोरावस्था का विकास होते समय किशोर को अपने ही समान लिंग के बालक से विशेष प्रेम होता है। यह जब अधिक प्रबल होता है, तो समलिंगी कामक्रियाएँ भी होने लगती हैं। बालक की समलिंगी कामक्रियाएँ सामाजिक भावना के प्रतिकूल होती हैं, इसलिए वह आत्मग्लानि का अनुभव करता है। अत: वह समाज के सामने निर्भीक होकर नहीं आता। समलिंगी प्रेम के दमन के कारण मानसिक ग्रंथि मनुष्य में पैरानोइया नामक पागलपन उत्पन्न करती है। इस पागलपन में मनुष्य एक ओर अपने आपको अत्यंत महान व्यक्ति मानने लगता है और दूसरी ओर अपने ही साथियों को शत्रु रूप में देखने लगता है। ऐसी ग्रंथियाँ हिटलर और उसके साथियों में थीं, जिसके कारण वे दूसरे राष्ट्रों की उन्नति नहीं देख सकते थे। इसी के परिणामस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ा।

किशोर बालक उपर्युक्त मन:स्थितियों को पार करके, विषमलिंगी प्रेम अपने में विकसित करता है और फिर प्रौढ़ अवस्था आने पर एक विषमलिंगी व्यक्ति को अपना प्रेमकेंद्र बना लेता है, जिसके साथ वह अपना जीवन व्यतीत करता है।

कामवासना के विकास के साथ साथ मनुष्य के भावों का विकास भी होता है। किशोर बालक के भावोद्वेग बहुत तीव्र होते हैं। वह अपने प्रेम अथवा श्रद्धा की वस्तु के लिए सभी कुछ त्याग करने को तैयार हो जाता है। इस काल में किशोर बालकों को कला और कविता में लगाना लाभप्रद होता है। ये काम बालक को समाजोपयोगी बनाते हैं।

किशोर बालक सदा असाधारण काम करना चाहता है। वह दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है। जब तक वह इस कार्य में सफल होता है, अपने जीवन को सार्थक मानता है और जब इसमें वह असफल हो जाता है तो वह अपने जीवन को नीरस एवं अर्थहीन मानने लगता है। किशोर बालक के डींग मारने की प्रवृत्ति भी अत्यधिक होती है। वह सदा नए नए प्रयोग करना चाहता है। इसके लिए दूर दूर तक घूमने में उसकी बड़ी रुचि रहती है।

किशोर बालक का बौद्धिक विकास पर्याप्त होता है। उसकी चिंतन शक्ति अच्छी होती है। इसके कारण उसे पर्याप्त बौद्धिक कार्य देना आवश्यक होता है। किशोर बालक में अभिनय करने, भाषणा देने तथा लेख लिखने की सहज रुचि होती है। अतएव कुशल शिक्षक इन साधनों द्वारा किशोर का बौद्धिक विकास करते हैं।

किशोर बालक की सामाजिक भावना प्रबल होती है। वह समाज में सम्मानित रहकर ही जीना चाहता है। वह अपने अभिभावकों से भी सम्मान की आशा करता है। उसके साथ 10, 12 वर्ष के बालकों जैसा व्यवहार करने से, उसमें द्वेष की मानसिक ग्रंथियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिससे उसकी शक्ति दुर्बल हो जाती है और अनेक प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

बालक का जीवन दो नियमों के अनुसार विकसित होता है, एक सहज परिपक्वता का नियम और दूसरा सीखने का नियम। बालक के समुचित विकास के लिए, हमें उसे जल्दी-जल्दी कुछ भी न सिखाना चाहिए। सीखने का कार्य अच्छा तभी होता है जब वह सहज रूप से होता है। बालक जब सहज रूप से अपनी सभी मानसिक अवस्थाएँ पार करता है तभी वह स्वस्थ और योग्य नागरिक बनता है। कोई भी व्यक्ति न तो एकाएक बुद्धिमान होता है और न परोपकारी बनता है। उसकी बुद्धि अनुभव की वृद्धि के साथ विकसित होती है और उसमें परोपकार, दयालुता तथा बहादुरी के गुण धीरे धीरे ही आते हैं। उसकी इच्छाओं का विकास क्रमिक होता है। पहले उसकी न्यून कोटि की इच्छाएँ जाग्रत होती हैं और जब इनकी समुचित रूप से तृप्ति होती है तभी उच्च कोटि की इच्छाओं का आविर्भाव होता है। यह मानसिक परिपक्वता के नियम के अनुसार है। ऐसे ही व्यक्ति के चरित्र में स्थायी सद्गुणों का विकास होता है और ऐसा ही व्यक्ति अपने कार्यों से समाज को स्थायी लाभ पहुँचाता है। किशोरावस्था में बदल किशोरवयीन बदल को शारीरिक बदल, मानसिक बदल, बौद्धिक बदल और सामाजिक बदल ऐसे वर्गीकरण कर सकते हैं। किशोरावस्था में(लड़के और लड़कियों) होने वाले बदल निम्नलिखित है।

सर्वसाधारण व्रूध्दी और विकास पूर्णत्व की ओर जानेवाली शारीरिक ग्रोथ और अलग- अलग अवयवों की परिपक्वता और प्रौढत्व की दिशा में होनेवाला विकास इस प्रकार से इस आयु में शारीरिक बदल होते हैं। ऊँचाई और वजन: इस आयु में ऊँचाई और वजन में एकदम बढौतरी होती है। बांधे में लड़की और लड़कों में अनुरूप बदल होता है। ऊँचाई और चौडाई दोनो में लड़कों का बाँधा भक्कम दिखाई देता है। और लड़कियों का बांधा नाजुक दिखाई देता है। मांसपेशियों का विकास होता है परंतु उसमें भी लडकों में फुर्ती और ताकत के लिए उपयुक्त मांसपेशियाँ तो लड़कियों में न थकते दीर्घ समय तक काम करनेवाली मांसपेशियों का प्रमाण बढता है। चरबी के प्रमाण में यह व्रूध्दी होती है। पर शरीर में चरबी का वितरण लडकों में और लडकियों में अलग-अलग विशेषतापूर्ण तरीके से होता है। इस कारण लड़कों का शरीर भरदार दिखाई देता है और लड़कियों के शरीर गोलाईदार होता है।

त्वचा और बाल: त्वचा और बाल में बदल होता है। त्वचा की घर्मग्रंथीं और तैलग्रंथीं का प्रमाण बढ़ने से लड़के और लड़कियों के शरीर से वैशिष्ट्यपूर्ण गंध आती है और मुंहासे निकलने लगते हैं। लड़कों के बाल कडक होते है जबकि लड़कियों के बाल मुलायम होते हैं। पहले न दिखाई देने वाले शरीर के मुलायम बाल अनेक भागाेपर (जननेंद्रियो पर) बड़े, घुंघराले बाल दिखाई देते हैं। लड़कों और लड़कियों में बाल विशेषतापूर्ण बढ़ते हुए दिखते हैं। (द्वितीय लैंगिक बदल).

आवाज: पहले (कुमारवय में) लड़कों और लड़कियों का आवाज साधारणत: समान ही होता है परंतु किशोरावस्था में आवाज में बदल होता है। दोनो में भी खोपड़ी की हड्डियों की खाली जगह(Sinuses) और लडकों में स्वरयंत्र बढ़ते है इस कारण लड़कों का आवाज निचली पट्टी में बढा हुआ, कर्कश और लड़कियों का ऊपर की पट्टी का मीठा होता है।

अंतःस्रावी ग्रंथींका विकास मेंदू के अधश्चेत से (:en:Hypothalamus|Hypothalamus)आनेवाले संदेश के कारण पिट्युटरी ग्रंथी (Pituitary gland) उत्तेजित होती है उसमें से स्रवीत होनेवाले संप्रेरक के कारण और अंतःस्रावी ग्रंथी का (अवटु ग्रंथि, अधिवृक्क ग्रंथी, प्रजनन ग्रंथी, इ.) विकास होता है। उसमें से स्रवीत होनेवाले संप्रेरक के कारण संपूर्ण शरीर में अनेक बदल होते हैं।

ब्रेन का विकास ब्रेन का लगभग ९५% विकास कुमार अवस्था तक हो गया होता है। शेष विकास (अंत के ५ से १०%) और मुख्यतः विकास किशोरावस्था में पूर्ण होता है। किशोरावस्था का वैशिष्ट्यपूर्ण बौद्धिक विकास और मानसिक यह ब्रेन के मुख्यतः अधिमस्तिष्क इस भाग का विकास का परिणाम होता है। अधिमस्तिष्क के कुछ भाग की चेतापेशीं की संख्या बडे़ पैमाने पर बढ़ती है। इसके साथ ही चेतातंतुमय सफेद भाग में भी बढ़ता है इस कारण चेतापेशीं के परस्पर-संपर्क में संदेशवहन में बढ़ौतरी होती है।

दो चेतातंतू में संदेशवहन जोड़ना यह (Synapse) विशिष्ट रासायनिक संकेत के मार्फत होता है। जन्म से कुमार अवस्था तक आने वाले अनेक प्रकार के और असंख्य अनुभव, उनका विश्लेषण, उनका अर्थ लगाना, उसकी स्मृती रखना और उसे प्रतिक्रिया देना, इत्यादी काम के लिए मस्तिष्क में ऐसे असंख्य जोड़ तयार होते हैं। उन सभी का आगे उपयोग होता ही है ऐसा नही बल्कि वे अस्त-व्यस्त उलझे होने के कारण मस्तिष्क की कर्यक्षमता कम होती है। ऐसी अतिरिक्त और अनावश्यक जोड पहचान कर उसमें का संदेशवहन बंद करना और उपयुक्त तथा आवश्यक जोड़ अधिक सक्षम करने का काम किशोरवय में होता है। इसे चेतातंतू-जोड़ने की छटनी (Synaptic Pruning)ऐसा कहते हैं। इस कारण एक प्रकार से मस्तिष्क की सफाई होती है और भविष्य में आवश्यक और मार्गदर्शक संस्काराें का रक्षण होता है। जिसके कारण मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढती है।

इन सर्व कारणों से अधिमस्तिष्क और मस्तिष्क के अन्य भाग में होने वाला संदेशवहन और संपर्क में बड़े पैमाने पर बढ़ौतरी होती है और अधिक जलद होता है। इसके अलावा उसकी कार्यक्षमता बढ़ती है। इस कारण जानकारी (मुख्यतः धोके का) का योग्य विश्लेषण करना और अर्थ लगाना,उत्स्फूर्त भावनाओं पर नियंत्रण रखना, भविष्य कालीन जीवन का नियोजन करना और निर्णय लेना यह क्षमता बढ़ती है। इस सब कारणों से व्यवहार में मुख्यतः प्रतिबंधात्मक नियंत्रण आता है।

लैंगिक व्रूध्दी और विकास मुख्य लेख: पौगंडावस्था मस्तिष्क की अधश्चेतक से आनेवाले संदेशाें से उत्तेजित हुई पोष ग्रंथी की क्रियाशीलता और नियंत्रण में प्रजननग्रंथी की (लड़कों में वृषण व लड़कियों में बीजांडकोष) बढ़ौतरी होती है। इनका कार्य स्त्रीबीज और शुक्रजंतूं की निर्मिती करना और इसके साथ ही विशिष्ट संप्रेरक की निर्मिती शुरू होती है। इन संप्रेरकाें की क्रियाशीलता के कारण और नियंत्रण में लड़का और लड़कियों के लैंगिक अंगों की 'ग्रोथ' और विकास होता है। इन बदल के साथ द्वितीय लैंगिक अंगों की 'ग्रोथ' होती है और बाह्यतः द्वितीय लैंगिक चिन्ह दिखाई देने लगते हैं।

किशोरावस्था के इन लैंगिक विकास के कालखंड को यौवनावस्था या 'पुबर्टी' कहते हैं। परिणामी इस कालखंड के अंत में लड़के और लड़कियाँ किशोरावस्था से पूर्ण विकसित यौवनावस्था में रूपांतर होते है इस तरह दोनों में प्रजननक्षमता का निर्माण होता है।

मानसिक–भावनिक बदल इसवी सन १९०० साली के बाद किशोरावस्था के मनोवैज्ञानिक भाग का औपचारिक अध्ययन शुरू हुआ। पर १९८० साल तक इस उम्र के व्यवहार और आकृतीबंध समझने में और उसका वर्णन करने तक ही सीमित था पर उसके बाद विशेषत: मस्तिष्क की कार्यप्रणाली का अधिक ज्ञान होने लगा और फिर इस व्यवहार का स्पष्टीकरण देने का प्रयत्न शुरू हुआ अनेक मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन किया और इसके दौरान अब किशोरावस्था में होने वाले व्यवहार,बदल और उसके कारण समझाने लगे हैं।

इस आयु के लडकें व लड़कियाँ आसपास के जग को समझने का, परखने का और मर्यादा समझने का, जग में अपना स्थान ढूँढने का इसके साथ ही अपना स्थान निर्माण करने का प्रयत्न करती है और उनमें स्वत्व की भावना निर्माण होने लगती है। वे आत्मसम्मान के साथ जीने का प्रयत्न करते हैं। वे स्वयं को और दूसरे लोगों को पहचानने का प्रयत्न करने लगते हैं। उत्स्फूर्त व्यवहार पर नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयत्न, जिम्मेदारी जानने का और उसे निभाने का प्रयत्न, अमीर होने की इच्छा, भविष्य-नियोजन, निर्णयक्षमता में बढ़ौतरी यह इस कालखंड की विशेषता कहलाती है।

नया करने की जिद्द नवनिर्मिती की इच्छा के कारण इस आयु के लडकें उत्साही पर अस्वस्थ, अस्थिर और दिवास्वप्न देखनेवाली वृत्ती के लगते हैं। पर उनका वैचारिक एवं भावनिक स्थिरता की ओर सफर शुरू रहता है। उनको स्वयं के, स्वयं के बाह्य जननेंद्रियाें के और उनके कार्य के, भिन्नलिंगी व्यक्ति के, आसपास के जग का, नावीन्यपूर्ण कार्य का, अज्ञात और भविष्य के बारें में बहुत जिज्ञासा होती है। उन्हें नई बातें देखने की, नये अनुभव लेने की और शोध लेने की तीव्र इच्छा ( कामेच्छा – बाह्य जननेंद्रियाें का उपयोग करके देखने की इच्छा) रहती है।

(यौवनावस्था).

यह अधिक साहसी, बेधडक, बेदरकार और निर्भय होते हैं। संकटों/प्रश्नों को भिडना यह उनकी व्रूत्ती में होता है।. पर इसके साथ ही धोखे का गणित समझकर, परखकर धोखे का सामना कैसे करना इस क्षमता का विकास करने का और बढ़ रहे शारीरिक और मानसिक तनाव सहन करने की सहनशक्ती बढ़ाने का उनका प्रयत्न रहता है।

उन्हे अक्सर शंका आती है, प्रश्न पड़ते है और उनके उत्तर ढूंढने का उनका प्रयत्न रहता है। न समझी बातों से वे अस्वस्थ होते है और न पाने जैसी बातों पर वादविवाद (लड़ाई-मारामाऱी) करते है। विसंगत और विसंवादी बातों से उनमें वैचारिक और भावनिक अस्थिरता आती है। पर इसमें से वे बाहर पडने का प्रयत्न करते हैं। सत्य परखकर देखने का उनका प्रयत्न रहता है।एखादी बात जैसी की वैसी किसी के कहने पर स्वीकारने के लिए तयार नहीं होते हैं। इसलिए उनके स्वभाव में आक्रमकता आती है वे दूसरों के अधिकार को चुनौती देते हैं और व्यवस्था के विरुद्ध व्यवहार करते हैं। इस आयु के लड़कों के पिता के साथ और लडकियों के माँ के साथ पटता नहीं है। उनके माता-पिता के साथ संबंधों में और व्यवहार में आए हुए ये बदल दिखाई देते है।

परंतु इस वृत्ती के कारण और बदलाव के कारण किशोरवयीन लडकें कहना न मानने वाले, अनादर करने वाले, बदतमीजी करनेवाले, नियंत्रण में न रहनेवाले, बेफिकीर लगते हैं।(विशेषतः लडकें) तो दूसरीओर वह संवेदनशील, स्वप्नो में रहनेवाली, अस्थिर, लालच में आकर अपना नुकसान करने वाले होते हैं।(विशेषतः लडकियाँ)

कुमारावस्था के अंत में और किशोरावस्था के शुरुआती समय में भिन्नलिंगी व्यक्तियों का आपस में तिरस्कार और गुस्सा आने लगता है फिर उनका रूपांतर ईर्ष्या और प्रतियोगिता में होता है। बाद में भिन्नलिंगी व्यक्तियों का आकर्षण लगने लगता(पौगंडावस्था)है। इस आयु में अन्य अनेक बातों का आकर्षण होने लगता है। आदर्शवाद, भिन्न-भिन्न आदर्शवादी विचार, भव्य बातों का आकर्षण होता है। आदर्श-व्यक्ती और उसके साथ बंधनो को न माननेवाले, अलग राह पर चलनेवाले(क्रांतिकारी और अपराधीवृत्ती का ऐसे दोनों) व्यक्तीं के बारें में उन्हें आकर्षण लगता है। इस सब बदलाव के कारण किशोरावस्था के अाखिर लडकों के मन की कल्पना, संकल्पना, विचार और भावना इसको स्पष्टता आकर वह दृढ होते जाते हैं। और उन लड़कें-लड़कियों के आगामी संपूर्ण भविष्य पर परिणाम करते हैं।

बौद्धिक बदल इस आयु की विशेषता मतलब मानसिकता, विचाराें की पद्धती और वर्तन पद्धती यह इस आयु के बौद्धिक परिवर्तन के परिणाम कह सकते हैं।

वैचारिक बदल अधिमस्तिष्क के विकास के कारण लड़कें-लड़कियों में वैचारिक बदल होते हैं। उनकी बौद्धिक उडान बढ़ती है और वे विचार करने लगते है। उनके विचारों में तार्किकता आने लगती है। उन्हें नई कल्पना सुचने लगती है। मुख्यतः नातेसंबंध, समाजव्यवस्था, धर्म, नीती, योग्य-अयोग्य, न्याय-अन्याय, सच-झूठ राजनीति इ. संबंधी। सत्य के सापेक्षते संबंधी और कुल मिलाकर विचार प्रक्रिये संबंधीही नये,संकल्पनात्मक, अमूर्त और मूलभूत विचार वह करने लगते हैं। वर्तमान परीस्थिती, उसकी भूतकाल से जाँच परख और भविष्य-नियोजन के लिए भी वे विचार करते हैं। वे अनेकों बातों की जाँच पडतात करते रहते हैं और उसमें अर्थ ढूँढते हैं। सहज ही इस काल में उनमें वैचारिक अस्थिरता और चलबिचल, भावनिक तूफान और व्यवहार में उत्स्फूर्तता दिखती है। पर इसी से उनमें अस्थिरतेपर नियंत्रण, तार्किक विचारक्षमता, भावनिक संतुलन और निर्णयक्षमता आती है।अर्थात, इस उम्र में लड़कें-लड़कियाँ योग्य व्यक्ति के सहवास में रहे तो उन पर अच्छे संस्कार होते हैं और उन्हें योग्य मार्गदर्शन मिला तो अच्छा व्यक्तिमत्व बनना सरल और संभव होता है। अन्यथा उनमें विचारों का तूफान आता है, विचाराें की तार्किकता कम होती है, निर्णयक्षमता कम होती है और भावनिक दृष्टि से वे अस्थिर और निर्बल, कमजोर रह सकते हैं। इस उम्र में लड़कें-लड़कियाें में योग्य विचार करने की रीति में और विषय में फरक पडता है। लडकें विशेषतः शिक्षा, संरक्षण, सामाजिक-राजकीय-आर्थिक-जागतिक परीस्थिती, पितृत्वभावना इन विषयो पर व्यावहारिक और ज्यादा तार्किक स्वरूप में विचार करते हैं। लड़कियाँ आकर्षक दिखाई देना, साज-श्रंगार, संसार, बच्चें, पोषण, संस्कार, संस्कृती, स्थैर्य, मातृत्वभावना इत्यादीं संबंधी और ज्यादा भावनिक स्वरूप का विचार करती हैं और वे कल्पनांआें में ज्यादा मश्गुल रहती हैं।

आकलनात्मक बदल लड़कों में साधारणतः आकलन इस उम्र में बढ़ता है। इसके साथ ही उलझी हुई संकल्पनात्मक, सैद्धांतिक और अमूर्त विषयसंबंधी विचारों की अथवा कल्पनाओ़ के आकलन की उनकी क्षमता भी बढ़ती है।

सामाजिक बदल व्यक्तित्व विकास स्वसंकल्पना: इस उम्र में लड़कें-लड़कियाें में मुख्यतः स्वयं का स्थान निर्माण करने का प्रयत्न करते हैं। व्यक्तित्व विकास की शुरुआत स्व की पहचान का प्रयत्न करने से होती है। लडकें स्वयं का और स्वयं की प्रतिमा (स्व-संकल्पना – मुझे कैसे और कोेैन बनना है?)विचार करने लगते हैं और स्वयं से स्वयं की इस प्रतिमा तक को (प्रत्यक्ष से आदर्श तक) व्यक्तिमत्व विकास को सकारात्मक आकार देने का प्रयत्न करते हैं।

स्व की पहचान: प्रथम स्व की पहचान बाह्य बातों से(कपडे, बालों की फॅशन, पसंद-नापसद इ.) निर्माण करने का वे प्रयत्न करते हैं। अपने साथ के लड़कें-लड़कियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए, उन सभी में उठावदार दिखाई देने के लिए, अपन सबसे हठकर है यह दिखाने के लिए वे प्रयत्नशील रहते है। लडकें ताकत दिखाने का प्रयत्न करते हैं। लडकियाँ सुंदर और आकर्षक दिखाई देने का प्रयत्न करती हैं। बाद में व्यक्तिमत्त्व विकास से लड़कें स्वयं को सिद्ध करने का और दूसरों पर(विशेषतः भिन्नलिंगी व्यक्तिपर) प्रभाव डालने का प्रयत्न करते हैं।

किशोरावस्था में प्रणय(प्रेमभावनाविष्कार) और प्रेमसंबंध: किशोरावस्था में प्रेमभावनाविष्कार 12-13 वर्षे आयु से दिखने लगती है और कम-अधिक कालावधी में प्रेमसंबंध भी (व्यक्त या अव्यक्त) उसके बाद दिखाई देता है। बढ़ती उम्र के साथ प्रेमसंबंध की कालावधी में भी साधारणतः कम-ज्यादा समय लगता है। संपूर्ण किशोरवस्था की कालावधी में समझ बढ़ती है और लैंगिक और सामाजिक प्रगल्भता भी बढ़ती जाती है। उसके ये लक्षण हो सकते हैं। कारण दीर्घकाल टिकनेवाले संबंध,समझ और प्रगल्भता आवश्यक रहता है। स्वयं के बारे में सकारात्मक प्रतिमा, आत्मसम्मान और प्रौढ आयु में प्रेमसंबंध में गुणात्मक गहराई आने के लिए यह आवश्यक हो सकता है।

अधिकतर समाज में लड़कें-लड़कियों का उम्र में आना जीवशास्त्रीय टप्पे अनुसार(उदा.- पहला मासिक चक्र अथवा पहले वीर्यस्खलन) ठहराया जाता है इस जीवशास्त्रीय टप्पे के अतिरिक्त किशोर के लैंगिक-सामाजीकरण (उस समाज के लैंगिक व्यक्तित्व-पहचान), प्रेमभावनाविष्कार और प्रेमसंबंध खुले तौर पर दिखने का अनुपात उस-उस समाज के खुले और निर्बंधाे के अनुपात पर निर्भर रहता है। इतना ही नही तो किशोराें को लैंगिक शिक्षा भी देनी चाहिए कि नही, यदि देनी है तो कैसे-कितनी-कब देनी चाहिए यौवन में आने पर व्यक्ति ने लैंगिकदृष्टी से सक्रीय कब होना चाहिए, किसके साथ हो, यह भी उस उस समाज के विचारों के खुलेपन और निर्बंधाें के अनुपात पर निर्भर होता है।

किशोरवस्था के लड़कें-लड़कियाँ सहसा उनके परिसर के समाज में, जाती-धर्म के व्यक्तियों से संबंध जोडने की कोशिश करते हैं। इसको अपवाद कुछ व्यक्ती विशेषतः लडकियाँ भिन्नता की खोज में रहते हैं। अधिकतर उनकी आयु के जोडीदार के साथ जोडी जमाने का प्रयत्न करते हो तो भी लडकों को आयु में थोडा छोटा तो लडकियाें को उम्र में थोडा बड़ा जोडीदार चाहिए होता है।

किशोरावस्था में लैंगिकता: कुल मिलाकर मानवी लैंगिकता में किशोरावस्था में लैंगिक भावना, व्यवहार और विकास को’किशोरावस्था की लैंगिकता’ ऐसा कहते हैं। किशोरावस्था के कालखंड को जीवनावश्यक कह सकते है इतना यह महत्त्वपूर्ण पहलू है। वह व्यक्ति रहती है उस समाज की प्राकृत व्यवहार कल्पना, रूढी और रीतिरिवाज; सामाजिक बंधन और नीतिनियम; व्यक्ति का लैंगिक व्यक्तित्व और लैंगिक अभिमुखता इन सभी का सर्वसाधारणरूप से इस पहलू पर प्रभाव रहता है।

मनुष्य में लैंगिक इच्छा साधारणतः किशोरावस्था से शुरू होती है। लैंगिक हार्मोन(टेस्टोस्टेरॉन व ईस्ट्रोजेन्स) लैंगिक अवयव का विकास करते हैं। इसके अलावा वह विचारप्रक्रिया और भावना पर भी प्रभाव डालते हैं। लैंगिक विषय में रस, लैंगिक विचार और भावना, लैंगिक आकर्षण, हस्तमैथुन या समागम इस प्रकार से वह व्यक्त होता है परंतु प्रत्यक्ष समागमा में अनचाही गर्भधारणा और एड्स सह सर्व लैंगिक रोगों का धोखा रहता है।

यह धोखे बढ़ते हैं कारण किशोरावस्था में शारीरिक प्रगल्भता आती है तो भी ब्रेन, विशेषतः अधिमस्तिष्क और अधश्चेतक इन स्वयं पर नियंत्रण रखनेवाले और धोखे के विश्लेषण करनेवाले भागों का पूर्ण विकास नही हुआ होता है। वह लगभग 25 वर्ष आयु तक चालू रहता है। लैंगिक व्यक्तित्व और लैंगिक अभिमुखता: लैंगिक व्यक्तित्व: स्वयं के बारे में लैंगिक संकल्पना तैयार करने और उसके अनुसार लैंगिक व्यक्तित्व आकार लेना यह किशोरावस्था में विकास का महत्तवपूर्ण कदम है इस उम्र में व्यक्ती को अभी तक आए अनुभव के (लैंगिक और अन्य) अन्वयार्थ लगाते रहते है और उसकी सुसंगत रचना करते रहते हैं। उसके अनुसार उसका लैंगिक दृष्टीकोन बनता है और वह वर्तमान और भविष्य कालीन लैंगिक वर्तन की दिशा निश्चित करता है।

स्वयं के बारे में लैंगिक आदर (स्वयं के पुरुष अथवा स्त्री के रूप में संतोष और अभिमान) यह लैंगिक व्यक्तित्व का सकारात्मक भाग है। यदि वह नही होगा तो लैंगिक चिंता यह नकारात्मक भावना व्यक्ति के मन में निर्माण होती है।

स्वयं के लैंगिक अनुभव के साथ ही कुटुंब में और आसपास के समाज में घटित घटनांओं में लैंगिक शिक्षा से, माध्यमाें के प्रभाव से और मित्र/समवयस्क समूह से भी व्यक्ति सीखता है और लैंगिक स्व-संकल्पना कार्यान्वित होती रहती है। सकारात्मक लैंगिक स्व-संकल्पना का लडकों और विशेषतः लडकियों को भावी जीवन में लैंगिक संबंध में; सर्वसाधारण पारिवारिक नातेसंबंधें में और पारिवारिक-सामाजिक स्थान में फायदा होता है। ऐसी व्यक्ति जोडीदार के साथ नातेसंबंध में प्रणय, प्रेम और नजदीकी संबंध जैसी बातों को महत्त्व देते हैं।

लडकों और लडकियों की तुलना करें तो सर्वसाधारणरूप से लडकों को स्वयं के बारे में कम लैंगिक आदर रहता है ऐसा कुछ वैज्ञानिकों को निदर्शित हुआ है। इसका कारण लैंगिक वर्तन को विरोध करना यह लडकियों सीखने में जितना ध्यान समाज देता है उतना लडकों को सीखने पर ध्यान नहीं देता है।(इस पर अन्य सर्व कारणों पर अलग-अलग समाज में खूप भिन्नता दिखलाई देती है यह ध्यान में रखना आवश्यक है।) इस कारण लडकें लैंगिक वर्तन को नकार देने का कौशल सीखते ही नही और उपयोग में भी नही लाते, समाज उनकी तरफ से अधिकार, वर्चस्व और नियंत्रण की अपेक्षा करता है और नाजुक नातेसंबंध में कैसे वर्तन करें यह उन्हें समझता नही है। लैंगिक संबंधाें के लिए अपने हमेशा तैयार होना चाहिए ऐसा उन्हें लगता है और इस बारे का तारतम्य और चुनने की स्वतंत्रता,विवेक की उनमें कमी होती है इसके अलावा नाजुक नाते संबंध में कैसे वर्तन करना चाहिए इसका योग्य प्रमाण में मार्गदर्शन लडकों और लडकियों को नही मिलता है इस कारण ऐसे नातेसंबंध में मन से सच्चे भाव से वर्तन करने का सोचा तो आस्था, प्रेम, अपनत्व, चिंता ये भावना कैसे व्यक्त करना चाहिए और उसी समय’पुरुषपना' ऐसी स्थिती के कारण बहुत से लडकोंं की दुविधा मनस्थिती होती है। कुछ वैज्ञानिक इस कठिन समस्या को ’पुरुषीपणा का दुधारू शस्त्र’ (double-edged sword of masculinity) ऐसा कहते हैं। समाज के इस ’पुरुष की ओर से'अपेक्षित अपेक्षा अपन पुरी कर नही सकते ऐसा समझने वाले अनेक लडकों को आत्मसम्मान की (और लैंगिक सम्मान की) भावना कम रहती है और उनमें लैंगिक चिंता, शंका और डर ये नकारात्मक भावना निर्माण होती है।

लैंगिक अभिमुखता: सम या भिन्न प्रकार की लैंगिक व्यक्तित्व की व्यक्ति में एकाद व्यक्ति के बारे में का रूझान या व्यक्ति को लगने वाला लैंगिक आकर्षण मतलब लैंगिक अभिमुखता.

वर्तमान समय में अनेक मानसविकृती विशेषज्ञों ने किए अध्ययन में किशोरावस्था में इस अभिमुखता का और व्यक्तित्व का कैसे विकास होता है यह समझ में आने लगा है। लैंगिक वृत्ती के विकास के अनेक मार्ग होने की संभावना होने के साथ एकादी व्यक्ति उसमें से कोैन-सा मार्ग चुनती है यह उसके लिंग, रूझान और पुबर्टी शुरू होने की आयु पर निर्भर हो सकता है ऐसा कुछ विशेषज्ञों को लगता है। 1989 साल में’ट्रॉइडन'ने 'समलिंगी लैंगिक व्यक्तित्व के आयु के विकास के चार टप्पों का प्रारूप' सुझाया पर अस प्रारूप के विषय पर मतभेद है और स्वयं की लैंगिक पहचान निर्माण होने की प्रक्रिया संबंधी अन्य कल्पना जाँची परखी जा रही है।

लैंगिक व्यक्तित्व-पहचान बाबत में ज्यादातर समय किशोर अपनी लैंगिक भावना का अर्थ समझने का और रूझान कौन-सी दिशा में है इसकी पहचान होने की यह शुरुआत की आयु है। बहुत से व्यक्तितयों के बारे अपना लैंगिक व्यक्तित्व का स्वागत करने का (coming out) यही समय होता है। पर पहचान को नकार देने पर कुछ लोग स्वयं को प्रश्न करते रहते है और भिन्नलिंगी वतथा समलिंगी लैंगिक नातेसंबंध में आए अनुभव के बारे में प्रयोग करते रहते हैं। अनेक व्यक्तिगत और सामाजिक कारणाें से अनेकाें को समलिंगी व्यक्तित्व के वास्तव स्वीकारना कठिन होता है। स्वयं के लैंगिक व्यक्तित्व की खोज करते समय आसपास के भिन्नलिंगी (’प्राकृत’) लैंगिक व्यक्तित्व के दोस्तों के समूह में दूसरो से भिन्न होने का और निकालने का डर, दबाव रहता है। समलिंगी व्यक्तित्व खुलेआम करने के कुछ मानसशास्त्रीय फायदे होंगे तो भी खूप निर्बंध वाले अनेक समाज में और देश में वह बहुत धोखे का है। इसी कारण यौवन काल में आत्महत्या करनेवाले समलिंगी व्यक्तियों का प्रमाण बहुत ज्यादा (लगभग 4 पट) दिखाई देता है।

बढ़ते सामाजिक संबंध और सामाजिक वर्तन इस उम्र में लड़कों का समाज का ज्यादा घटकाें से संबंध अाने लगता है। स्वयं की पहचान से निर्माण होनेवाली स्वयंकेंद्रित वृत्ती और बढ़ते सामाजिक संपर्क और संबंध इनके मिश्र प्रभावा से उनका सामाजिक वर्तन घटित होता है। कुटुंब में, मित्राें में और समाज में अपना स्वीकार हो पर इसके साथ ही अपनी विशिषट पहचान निर्माण हो, अपने को महत्त्व मिले और अपने मत का सम्मान हो ऐसा उन्हें लगता है। स्वयं के हक्क और कर्तव्ये; सामाजिक नातेसंबंध; योग्य सामाजिक वर्तन (आदर्श व वस्तुस्थिती); न्याय-अन्याय; नियम-कायदे; अनुशासन, स्वयं अनुशासन इत्यादीं संबंध में वह विचार करते रहते हैं और उसके अनुसार अपने सामाजिक वर्तन वह जाँचता परंखता है। उसके लिए सर्वसंमत और समाजमान्य वर्तन, व्यवहार के विरुद्ध अथवा आक्रमक वर्तन भी वे बहुत बार करते हैं। इस कारण उनका परिवार में बडे-बुजुर्गों से(विशेषतः लडकियों का माँ से और लडकों का पिता से) मतभेद होते है। समाज में अपना विशिष्ट स्थान निर्माण करने के लिए यह प्रयत्न रहता है। लडकें अपना अधिकार और स्वतंत्रता प्रस्थापित करने का प्रयत्न करते है व दूसरों को आधार देने का तो लडकियाँ दूसरो को (विशेषतः मित्र-सहेलियों को) आधार देने और मदद करने का प्रयत्न करते हैं। बढ़ता सामर्थ्य: इस उम्र में सर्व प्रकार की शक्ती, क्षमता और सामर्थ्य में बढ़ोतरी होती है। बढ़ती शारीरिक शक्ति का उपयोग, बढ़ती जिम्मेदारी निभाई, बड़े काम करना, रक्षण करना (स्वयं का, निराधार का, अन्य लोगों का– छोटे, दुर्बल, अपंग इत्यादीं का; स्वयं के मालकी की चीजे, और हितसंबंधो़ का इ.); कठीण प्रसंगाें का सामना करना इत्यादि के लिए होता है। सहनशक्ति भी बढ़ती है। मानसिक शक्ति के विकास के कारण विचारपूर्वक निर्णयानुसार वर्तन के लिए निर्भयता, धैर्य, संकट के समय न डगमगाते प्रश्नों का सामना करना इत्यादि क्षमता बढ़ती है। बौद्धिक सामर्थ्य यह मनुष्य के प्रमुख सामर्थ्य और विशेषता है। इस आयु में बढ़ने से इसका उपयोग उसे स्वयं को, समाज को उपयोगी शिक्षा लेने, स्वयं का स्वतंत्र पर समाजाभिमुख विचार करना, नवीन कल्पना करना और नवनिर्मिती इत्यादि के लिए होता है।

इस तरह सामर्थ्य के बढ़ने से आत्मसम्मान की अनुभूति होती है तो और बढ़ाने की ओर प्रयत्न किए जाते है। इससे आत्मविश्वास में बढौतरी होती है अर्थात, अति आत्मविश्वास, प्रौढी, घमंड, दूसरों को कमी समजना उन्हें कीमत न देना, उन पर वर्चस्व दिखाना ये बातें भी उसके साथ आ सकती है अथवा इन सर्व सामर्थ्य के बढ़ने का दुरुपयोग भी किया जा सकता है।

सामर्थ्य के बढ़ने का लडकों और लडकियों में कैसा परिणाम होगा यह इस उम्र के संस्कार पर निर्भर होता है।

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