राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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यह लेख भारत स्थित एक हिंदू संगठन आर एस एस के बारे में है। अन्य प्रयोग हेतु आर एस एस देखें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
Flag of Rashtriya Swayamsevak Sangh.png
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्वज
संस्थापक डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार
प्रकार स्वैच्छिक,[1] अर्द्धसैनिक[2]
स्थापना वर्ष विजयदशमी १९२५
कार्यालय नागपुर
अक्षांश-रेखांश 21°02′N 79°10′E / 21.04°N 79.16°E / 21.04; 79.16
मुख्य लोग सरसंघचालक: मोहन भागवत
सेवाक्षेत्र भारत
विशेष ध्येय हिन्दू राष्ट्रवाद के सहायक और हिन्दू परम्पराओं को कायम रखना
लक्ष्य "मातृभूमि के लिए नि:स्वार्थ सेवा"
तरीक़ा समूह चर्चा, बैठकों और अभ्यास के माध्यम से शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण
सदस्य 5-6 मिलियन[3]
वेबसाइट rss.org

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( R.S.S.) एक हिंदूवादी संगठन है जिसके सिद्धान्त हिंदुत्व में निहित और आधारित हैं। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपेक्षा संघ या आर.एस.एस. के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत सन् १९२५ में विजयादशमी के दिन डॉ॰ केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी। बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है।


राष्ट्र और राष्ट्रीयता की परिभाषा संघ के अनुसार - सिंधु (सिंधु नदी ) से सिंधु (दक्षिण मे हिन्द महासागर ) तक इस विस्तृत मातृ-भूमि को , जो पितृभूमि और पुण्यभूमि स्वीकार करता है , वही ' हिन्दू ' के नाम से जाना जाता है .

इस परिभाषा  के अनुसार हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई, सवर्ण, दलित, पिछड़े, सब जो इस मातृ-भूमि को पितृभूमि और पुण्यभूमि  स्वीकार करते  हैं सब हिन्दू  हैं.  

राष्ट्र समान्यतः राज्य या देश से समझा जाता है . राष्ट्र का एक शाश्वत अथवा जीवंत अर्थ है “ एक राज्य में बसने वाले समस्त जन समूह जो एक समान संस्कृति से बंधे हों ”. राष्ट्रवाद की तात्कालिक युग में यही शाश्वत अर्थ है . इसका सजग उदाहरण इज़राइल है जो यहूदियों ( बंजारों ) का एक ऐसा समूह था जिसके पास पहले कोई जमीन भी नहीं था .

अगर जन राष्ट्र का  भौगोलिक जिस्म (तन) है तो संस्कृति इसकी आत्मा है जो लोगों को एकजुट (जोड़े) रखता है. इनमें एकता और सामंजस्य बनाये रखता है. यही वह  धुर  है जिसपर राष्ट्र की सर्वंगीण विकास आधारित है. इसके बिना राष्ट्र का विकास अधूरा रह जाता है 
सरकारी राज्य पत्र (गज़ट) इतिहास व संस्कृति संस्करण मे यह स्पष्ट वर्णन है कि हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म एक ही शब्द हैं तथा यह भारत के संस्कृति और सभ्यता का सूचक है.1995 के अपने एक आदेश से माननीय उच्चतम न्यायालय ने हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म को भारत वासियों की जीवन जीने की शैली के रूप मे परिभाषित किया है. 

संघ में उसके झंडे जो भगवा ध्वज है को गुरु माना जाता है. सदियों से यह ध्वज हमारे पूर्वजों के द्वारा उपयोग में लाया जाता रहा है. मंदिरों , घरों और रण के मैदान में यह ध्वज अपने अपने ढंग से उपयोग में लाया जाता रहा है . भगवा रंग त्याग और हिम्मत का प्रतीक है .

भगवा ध्वज भारतीय संस्कृति का प्रतीक है जिसने सदियों से भारतीय समाज में एकता बरकरार रखी है . यही वह सूत्र है जिसने सदियों की गुलामी के बावजूद भी भारतीय सभ्यता और राष्ट्रीयता को जिन्दा रखा है . प्रतिदिन इसकी पूजा हर एक संघ के शाखा में होती है और इसे ही प्रतीक मानकर मातृभूमि की पूजा होती है . गुरु पूर्णिमा के रोज संघ में इस ध्वज की पूजा करते हैं और अपनी श्रद्धा सुमन उसपर अर्पित करते है .

भारतीय संस्कृति में अधिकार से ज्यादा कर्तव्य की प्रधानता है, और इसे धर्म के रूप में जाना जाता था जैसे राष्ट्र धर्म, पितृधर्म , मातृधर्म , पुत्रधर्म आदि . हमारी संस्कृति ने हमेशा अधिकार से ज्यादा कर्तव्यों को प्रधानता दी है और इसी कारण यह सबसे विकसित और पुरे विश्व में स्वीकार्य थी . और यही संघ के स्वयंसेवक की भी पहचान है इसलिए किसी भी आपदा में ये आगे खड़े मिलते हैं.

सबसे पहले ५० वर्ष बाद १९७५ में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो तत्कालीन जनसंघ पर भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल हटने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ और केन्द्र में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व में मिलीजुली सरकार बनी। १९७५ के बाद से धीरे-धीरे इस संगठन का राजनैतिक महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे राजनैतिक दल के रूप में हुई जिसे आमतौर पर संघ की राजनैतिक शाखा के रूप में देखा जाता है। संघ की स्थापना के ७५ वर्ष बाद सन् २००० में प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एन०डी०ए० की मिलीजुली सरकार भारत की केन्द्रीय सत्ता पर आसीन हुई।

संघ परिवार की संरचनात्मक व्यवस्था[संपादित करें]

संघ के संस्थापक डॉ॰ केशवराव बलिरामराव हेडगेवार

संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघ चालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान में पूरे भारत में संघ की लगभग पचास हजार से ज्यादा शाखा लगती हैं। वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल, योग, वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है।

संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है:

  • केंद्र
  • क्षेत्र
  • प्रान्त
  • विभाग
  • जिला
  • तालुका
  • नगर
  • मण्डल
  • शाखा

संघ की शाखा[संपादित करें]

शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे की लगती है। शाखा में व्यायाम, खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है। शाखाएँ निम्न प्रकार की होती हैं:

  • प्रभात शाखा: सुबह लगने वाली शाखा को "प्रभात शाखा" कहते है।
  • सायं शाखा: शाम को लगने वाली शाखा को "सायं शाखा" कहते है।
  • रात्रि शाखा: रात्रि को लगने वाली शाखा को "रात्रि शाखा" कहते है।
  • मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "मिलन" कहते है।
  • संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "संघ-मण्डली" कहते है।

पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५०,००० शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ" तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के माध्यम से चलता है।
शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक" का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है।
जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता हैं।

संघ की आज 57 हज़ार शाखाएं हैं जो 2010 में 45 हज़ार थीं । संघ कि भारत के बाहर 40 देशो में 700 शाखाये लगती है।विदेशों में लगने वाली शाखा हिन्दू स्वयम् सेवक संघ के नाम से लगती है  ।

संघ वर्ग[संपादित करें]

१९३९ के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय का फोटो

ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं:

  • दीपावली वर्ग - ये वर्ग तीन दिनों का होता है। ये वर्ग तालुका या नगर स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दीपावली के आस पास आयोजित होता है।
  • शीत शिविर या (हेमंत शिविर) - ये वर्ग तीन दिनों का होता है, जो जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दिसंबर में आयोजित होता है।
  • निवासी वर्ग - ये वर्ग शाम से सुबह तक होता है। ये वर्ग हर महीने होता है। ये वर्ग शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है।
  • संघ शिक्षा वर्ग - प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं। "प्राथमिक वर्ग" एक सप्ताह का होता है, "प्रथम" और "द्वितीय वर्ग" २०-२० दिन के होते हैं, जबकि "तृतीय वर्ग" 25 दिनों का होता है। "प्राथमिक वर्ग" का आयोजन सामान्यतः जिला करता है, "प्रथम संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: प्रान्त करता है, "द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र करता है। परन्तु "तृतीय संघ शिक्षा वर्ग" हर साल नागपुर में ही होता है।
  • बौद्धिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।
  • शारीरिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।

सामाजिक सुधार में योगदान[संपादित करें]

हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है।[4]

महात्मा गान्धी ने १९३४ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहाँ पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं।[5]

राहत और पुनर्वास[संपादित करें]

सुनामी के उपरान्त सहायता कार्य में जुटे स्वयंसेवक

राहत और पुर्नवास संघ कि पुरानी परंपरा रही है। संघ ने १९७१ के उड़ीसा चक्रवात और १९७७ के आंध्र प्रदेश चक्रवात में रहत कार्यों में महती भूमिका निभाई है।[6]

संघ से जुडी सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान ५७ अनाथ बच्चों को गोद लिया हे जिनमे ३८ मुस्लिम और १९ हिंदू है।

आलोचनाएँ[संपादित करें]

महात्मा गाँधी की १९४८ में संघ के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी जिसके बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भूतपूर्व स्वयंसेवक थे। बाद में एक जाँच समिति की रिपोर्ट आ जाने के बाद संघ को इस आरोप से बरी किया और प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया।

संघ के आलोचकों द्वारा संघ को एक अतिवादी दक्षिणपंथी संगठन बताया जाता रहा है एवं हिंदूवादी और फ़ासीवादी संगठन के तौर पर संघ की आलोचना भी की जाती रही है। जबकि संघ के स्वयंसेवकों का यह कहना है कि सरकार एवं देश की अधिकांश पार्टियाँ अल्पसंख्यक तुष्टीकरण में लिप्त रहती हैं। विवादास्पद शाहबानो प्रकरण एवं हज-यात्रा में दी जानेवाली सब्सिडी इत्यादि की सरकारी नीति इसके प्रमाण हैं।

संघ का यह मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में हमेशा से ही उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं और वह सिर्फ़ हिंदुओं के जायज अधिकारों की ही बात करता है जबकि उसके विपरीत उसके आलोचकों का यह आरोप है कि ऐसे विचारों के प्रचार से भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद कमज़ोर होती है। संघ की इस बारे में मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहते हों ऐसा नहीं है। हर वह व्यक्ति जो भारत को अपनी जन्म-भूमि मानता है, मातृ-भूमि व पितृ-भूमि मानता है (अर्थात्‌ जहाँ उसके पूर्वज रहते आये हैं) तथा उसे पुण्य भूमि भी मानता है (अर्थात्‌ जहां उसके देवी देवताओं का वास है); हिन्दू है। संघ की यह भी मान्यता है कि भारत यदि धर्मनिरपेक्ष है तो इसका कारण भी केवल यह है कि यहां हिन्दू बहुमत में हैं। इस क्रम में सबसे विवादास्पद और चर्चित मामला अयोध्या विवाद रहा है जिसमें बाबर द्वारा सोलहवीं सदी में निर्मित एक बाबरी मसजिद के स्थान पर राम मंदिर का निर्माण करना है।

उपलब्धियाँ[संपादित करें]

संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन १९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी, उपराष्ट्रपति पद पर भैरोंसिंह शेखावत, एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं। अतुलनीय योगदान जो आरएसएस ने देश हित में किए संघ के ऐसे ही 10 प्रमुख कार्य 1-कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय ये संघ ही था और इसके स्वयंसेवक थे जो अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पडोसी मुल्क पाकिस्तान की सेना की हर एक गतिविधि पर बिना किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रख रहे थे l यह काम न तत्कालीन भारत सरकार कर रही थी, और न ही कश्मीर की राजा हरिसिंह की सरकारl उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर में घुसना चाहा तो भारतीय सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ प्राण दिए l विभाजन के बाद जब दंगे भड़के तो नेहरू सरकार पूरी तरह परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे 2- 1962 का युद्ध इस युद्ध में हिस्सा लेकर मात्रभूमि की रक्षार्थ और सेना की मदद के लिए देश के कोने कोने से संघ के स्वयंसेवक जिस जोश के साथ सीमा पर पहुंचे, उसका गवाह पूरा हिंदुस्तान था lइन स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और खास तौर पर सेना के जवानों की सहायता में पूरा जोर लगा दिया l स्वयंसेवकों के योगदान का हिसाब आप इस बात से लगा सकते है कि जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ाl परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गएl हालाँकि निमंत्रण दिए जाने पर नेहरु की जमकर आलोचना हुई किन्तु नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गयाl ” 3-कश्मीर का विलय ये वो दौर था जब स्वतंत्र रियासत कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ये फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे कि कश्मीर का विलय आखिर कहाँ हो और दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती ही जा रही थीl और ऐसे में नेहरु सरकार हाँथ पर हाँथ धरे बैठे हुए थी l ऐसे समय में सरदार बल्लभभाई पटेल ने गुरु गोलवलकर से सहायता मांगी l सरदार के निवेदन पर गोलवरकर श्रीनगर पहुंचे और वहां जाकर महाराजा हारी सिंह से मुलाक़ात की l इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दियाl 4-1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली ऐसा नही है कि कश्मीर विलय के समय सिर्फ पटेल को ही संघ याद आया हो बल्कि जब पाकिस्तान से युद्ध हो रहा था तो ऐसे समय में तत्कालीन प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री को भी संघ की याद आगयी थी l शास्त्री जी ने संघ के स्वयंसेवको से क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में सहायता देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने जिम्मे लेने का निवेदन किया, जिससे कि इन कामों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद के लिए भेजा जा सके l घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान देने वाले भी संघ के स्वयंसेवक ही थेl युद्ध के समय कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया थाl 5-गोवा का विलय भारत में दादरा, नगर हवेली और गोवा का विलय कराने में आरएसएस ने निर्णायक भूमिका अदा की थीl वो तारीख 21 जुलाई 1954 थी जब दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गईl संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की भोर पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा लहरा दिया l पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर आरएसएस ने भारत सरकार को सौंप दियाl संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा को मुक्त कराने के लिए जोर शोर से सक्रीय हो गये l गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू सरकार ने मना कर दिया lसरकार का ऐसा रवैया देखकर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन आरम्भ कर दिया l इस आन्दोलन का नतीजा ये हुआ कि जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कई कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाई गयी l हालत जब काबू से बहार हो गये तब मजबूरन भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ 6-आपातकाल 1975 से 1977 के मध्य का दौर आपातकाल का दौर था जो बड़ा ही कठिन दौर साबित हुआ था l इस आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में आरएसएस की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए जीवान्त होगी l सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी हुई l इस गिरफ्तारी के उपरान्त संघ के स्वयंसेवकों ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना आरम्भ कर दिया l आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं –नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम इन्ही संघ कार्यकर्ताओं ने किया l जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से संभव हो सकी थी l 7-भारतीय मज़दूर संघ 1955 में अस्तित्व में आया भारतीय मज़दूर संघ विश्व का इकलौता ऐसा मज़दूर आंदोलन था,जो विध्वंस के बजाए निर्माण की विचारधारा लिए आगे आया था l कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही आरम्भ कराया थाl आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन हैl 8-ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा राजस्थान,ऐसी जगह जहां एक बहुत बड़ी तादात ज़मींदारों की हुआ करती थी, उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि संघ के स्वयंसेवक भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैंl शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी चुने गये l भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना. विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है. केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं. संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं. 9-सेवा कार्य चाहे वो 1971 में ओडिशा में आया भयंकर चंक्रवात हो या फिर भोपाल की गैस त्रासदी, चाहे फिर वो 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों हो या गुजरात का भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा हर एक विपदा में संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया हैl न सिर्फ भारत में बल्कि नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में जाकर संघ ने राहत कार्य को अंजाम दिया है l

संघ के सरसंघचालक[संपादित करें]

संघ की प्रार्थना[संपादित करें]

प्रार्थना की मुद्रा में स्वयंसेवक

संघ की प्रार्थना संस्कृत में है। प्रार्थना की आखरी पंक्ति हिंदी में है।
लड़कियों/स्त्रियों की शाखा राष्ट्र सेविका समिति और विदेशों में लगने वाली हिन्दू स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना अलग है। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यत: गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।


नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥

समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम्।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥

॥ भारत माता की जय ॥

प्रार्थना का हिन्दी में अर्थ[संपादित करें]

हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे कोई न जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा विश्व हमारी विनयशीलता के सामने नतमस्तक हो। यह रास्ता काटों से भरा है, इस कार्य को हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे सुगम कर काँटों रहित करेंगे।

ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र श्रेष्ट साधन उग्र वीरव्रत की भावना हमारे अन्दर सदेव जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में जलती रहे। आपकी असीम कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने में समर्थ हो।

॥ भारत माता की जय॥

हिन्दी काव्यानुवाद[7][संपादित करें]


हे परम वत्सला मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत कोटि बार।
हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन हजार॥

हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे मुझको बड़ा किया;
तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले एक बार।
हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के सभी घटक,
तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे कोटिशः नमस्कार॥

तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त कटिबद्ध हुए;
वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ आशीर्वाद।
सम्पूर्ण विश्व के लिये जिसे, जीतना न सम्भव हो पाये;
ऐसी अजेय दे शक्ति कि जिससे, हम समर्थ हों सब प्रकार॥

दे ऐसा उत्तम शील कि जिसके, सम्मुख हो यह जग विनम्र;
दे ज्ञान जो कि कर सके सुगम, स्वीकृत कन्टक पथ दुर्निवार।
कल्याण और अभ्युदय का, एक ही उग्र साधन है जो;
वह मेरे इस अन्तर में हो, स्फुरित वीरव्रत एक बार॥

जो कभी न होवे क्षीण निरन्तर और तीव्रतर हो ऐसी;
सम्पूर्ण ह्र्दय में जगे ध्येय, निष्ठा स्वराष्ट्र से बढे प्यार।
निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित कार्य-शक्ति;
यह राष्ट्र परम वैभव पाये, ऐसा उपजे मन में विचार॥

सहयोगी सँस्थाएँ[संपादित करें]

संघ दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशो में कार्यरत है।"संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रीय है।जिनमे कुछ राष्ट्रवादी,सामाजिक, राजनेतिक, युवा वर्गे के बीच में कार्य करने वाले,शिक्षा के क्षेत्र में,सेवा के क्षेत्र में,सुरक्षा के क्षेत्र में,धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में,अन्य कई क्षेत्रो में संघ परिवार के संघठन सक्रीय रहते है,जिनमे प्रमुख है:- ⛳🐅विश्व हिन्दू परिषद् ⛳🐅 बजरंगदल ⛳🐅अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ⛳🐅सेवा भारती ⛳🐅भारतीय किसान संघ ⛳🐅भारतीय जनता पार्टी ⛳🐅भारत स्वाभिमान दल ⛳🐅भारतीय मजदूर संघ ⛳🐅भारतीय शिक्षक संघ ⛳🐅विद्या भारती-सरस्वती शिशु मंदिर ⛳🐅सनातन संस्कृति संघ ⛳🐅स्वदेशी जागरण मंच ⛳🐅धर्म जागरण विभाग ⛳🐅युवा क्रांति मंच ⛳🐅नव निर्माण मंच ⛳🐅श्रीराम सेना ⛳🐅भारत जागो!-विश्व जगाओ ⛳🐅धर्म रक्षा मंच ⛳🐅संस्कृति रक्षा मंच ⛳🐅हिन्दू स्वयंसेवक संघ ⛳🐅प्रवासी भारतीय संघ ⛳🐅नर्मदा बचाओ जागरण मंच ⛳🐅धर्मांतरण विरुद्ध विभाग ⛳🐅वनवासी कल्याण परिषद् ⛳🐅एकल विद्यालय योजना ⛳🐅दुर्गा वाहिनी👩 ⛳🐅मातृशक्ति👩 ⛳🐅राष्ट्र सेविका👩 ⛳🐅ग्राम भारती ⛳🐅 मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ⛳🐅राष्ट्रीय सिक्ख संगत्

विश्व विभाग,इंजीनियरींग, मेडिकल,अनुसंधान, प्रशासनिक सेवा, अर्थशास्त्र जैसे विषयो के लिये भी संगठन है.

संघ साहित्य के प्रकाशक[संपादित करें]

निम्नलिखित प्रकाशन संघ की योजना द्वारा संचालित नहीं है, निजी हैं। इन प्रकाशनों ने भी उच्च कोटि का संघ साहित्य बड़ी संख्या में प्रकाशित किया है।

१. सुरुचि प्रकाशन , देशबन्धु गुप्ता मार्ग , झण्डेवाला, नई दिल्ली-५५

२. लोकहित प्रकाशन , संस्कृति भवन ; राजेन्द्र नगर, लखनऊ-४

३. राष्ट्रोत्थान साहित्य , केशव शिल्प ; केम्पगौड़ा नगर, बंगलौर-१९

४. भारतीय विचार साधना

(क) डॉ॰ हेडगेवार भवन महाल, नागपुर-४४०००२
(ख) मोती बाग ; ३०९, शनिवार पेठ, पुणे-४११०३०
(ग) मंगलदास बाड़ी, डॉ॰ भडकम्कर मार्ग नाज सिनेमा परिसर, मुम्बई-४०००४

५. ज्ञान गंगा प्रकाशन , भारती भवन, बी-१५, न्यू कालोनी, जयपुर-३०२००१

६. अर्चना प्रकाशन , एच.आई.जी.-१८, शिवाजी नगर, भोपाल-४६२०१६

७. साधना पुस्तक प्रकाशन , राम निवास ; बलिया काका मार्ग, जूनाढोर बाजार के सामने, कांकरिया, अमदाबाद -३८००२८

८. सातवलेकर स्वाध्याय , पो - किलापारडी , मण्डल जिला-वलसाड, गुजरात-३९६१२५

९. साहित्य निकेतन , ३-४/८५२, बरकतपुरा, हैदराबाद-५०००२७

१०. स्वस्तिश्री प्रकाशन , ४४/९, नवसहयाद्री सोसाइटी , नवसहयाद्री पोस्टास मोर पुणे-४११०५२

११. जागृति प्रकाशन , एफ. १०९, सेक्टर-२७ , नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) उ.प्र. २०१३०१

१२. सूर्य भारती प्रकाशन , २५९६, नई सड़क, दिल्ली-११०००६

चित्र दीर्घा[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. एंडरसन, वाल्टर के॰; श्रीधर डी॰ दामले (1987) (अंग्रेज़ी में). The Brotherhood in Saffron: The Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism. बोल्डर: वेस्टव्यू प्रेस. प॰ 111. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-8133-7358-1. 
  2. मैकलियोड, जॉन (2002) (अंग्रेज़ी में). The history of India [भारत का इतिहास]. ग्रीनवुड पब्लिशिंग ग्रुप. pp. 209–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-313-31459-9. http://books.google.com/?id=DAwmUphO6eAC&pg=PA209. अभिगमन तिथि: 10 अगस्त 2010. 
  3. भट्ट, चेतन (2001) (अंग्रेज़ी में). Hindu Nationalism: Origins, Ideologies and Modern Myths [हिन्दू राष्ट्रवाद: उद्भव, विचारधाराएँ और आधुनिक मिथक]. न्यूयॉर्क: बर्ग पब्लिशर्स. प॰ 113. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 1-85973-348-4. 
  4. http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2007-01-03/india/27884065_1_jagannath-temple-upper-caste-dalits
  5. K S Bharati, Encyclopedia of Eminent Thinkers, Volume 7, 1998
  6. http://www.hindu.com/2001/02/18/stories/13180012.htm
  7. 'क्रांत' अर्चना १९९२ किंवा प्रकाशन नोएडा २०१३०१ पृष्ठ १७

यह भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]