अयोध्या विवाद

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अयोध्या विवाद एक राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक विवाद है जो नब्बे के दशक में सबसे ज्यादा उभार पर था। इस विवाद का मूल मुद्दा हिंदू देवता राम की जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की स्थिति को लेकर है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाया गया या मंदिर को मस्जिद के रूप में बदल दिया गया।

राम जन्मभूमि का इतिहास[संपादित करें]

मुस्लिम शासक बाबर 1527 में फरगना से आया था। उसने चित्तौरगढ़ के हिंदू राजा राणा संग्राम सिंह को फतेहपुर सिकरी में परास्त कर दिया. बाबर ने अपने युद्ध में तोपों और गोलों का इस्तेमाल किया। जीत के बाद बाबर ने इस क्षेत्र का प्रभार मीर बांकी को दे दिया. मीर बांकी ने उस क्षेत्र में मुस्लिम शासन लागू कर दिया. उसने आम नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए आतंक का सहारा लिया। मीर बांकी 1528 में अयोध्या आया और मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनवाया,[1].

कुछ तथ्य- एक नजर में[संपादित करें]

अयोध्या पर मुकदमा ६० साल से अधिक समय तक चला। माना जा रहा है कि अपने आपमें पहला ऐसा संवेदनशील मुकदमा रहा जिसको निपटाने में इतना लम्बा समय लगा। इसमें कुल ८२ गवाह पेश हुए। हिन्दू पक्ष की ओर से ५४ गवाह और मुस्लिम पक्ष की ओर से २८ गवाह पेश किये गये। हिन्दुओं की गवाही ७१२८ पृष्ठों में लिपिबद्ध की गयी जबकि मुसलमानों की गवाही ३३४३ पृष्ठों में कलमबद्ध हुई। पुरातात्विक महत्व के मुद्दों पर हिन्दुओं की ओर से चार गवाह और मुसलमानों की ओर से आठ गवाह पेश हुए। इस मामले में हिन्दू पक्ष की गवाही १२०९ तथा मुस्लिम पक्ष की गवाही २३११ पृष्ठ में दर्ज की गयी। हिन्दुओं की ओर से अन्य सबूतों के अलावा जिन साक्ष्यों का संदर्भ दिया गया उनमें अथर्ववेद, स्कन्द पुराण, नरसिंह पुराण, बाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, केनोपनिषद और गजेटियर आदि हैं। मुस्लिम पक्ष की ओर से राजस्व रिकार्डों के अलावा बाबरनामा, हुमायूंनामा, तुजुक-ए-जहांगीरी, तारीख-ए-बदायूंनी, तारीख-ए-फरिश्ता, आइना-ए-अकबरी आदि का हवाला दिया गया। पूरा फैसला ८१८९ पृष्ठों में समाहित है।

  • अयोध्या की स्थापना - वैवस्वत मनु महाराज द्वारा सरयू तट पर अयोध्या की स्थापना की गई। मनु उन १४ मनवंतरों के उद्गाता हैं जिनसे मिलकर कल्प बना है। वर्तमान में ७वां मनवंतर चल रहा है।
  • हिन्दुत्व की विजय - ३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खड़ी की गईं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया।
  • कारसेवकों का बलिदान - २ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें कोलकाता के राम कोठारी और शरद कोठारी (दोनों भाई) सहित अनेक रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दीं।
  • ऐतिहासिक रैली - ४ अप्रैल १९९१ को दिल्ली के वोट क्लब पर अभूतपूर्व रैली हुई। इसी दिन कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दिया।
  • रामपादुका पूजन - सितम्बर, १९९२ में भारत के गांव-गांव में श्री राम पादुका पूजन का आयोजन किया गया और गीता जयंती (६ दिसम्बर १९९२) के दिन रामभक्तों से अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया गया।
  • अपमान का प्रतीक ध्वस्त - लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक मस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया।
  • वर्तमान स्वरूप - कारसेवकों द्वारा तिरपाल की मदद से अस्थायी मंदिर का निर्माण किया गया। यह मंदिर उसी स्थान पर बनाया गया जहां ध्वंस से पहले श्रीरामलला विराजमान थे। श्री पी.वी.नरसिंह राव के नेतृत्व वाली तत्कालीन केन्द्र सरकार के एक अध्यादेश द्वारा श्रीरामलला की सुरक्षा के नाम पर लगभग ६७ एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई। यह अध्यादेश संसद ने ७ जनवरी १९९३ को एक कानून के जरिए पारित किया था।
  • दर्शन-पूजन निविर्घ्न - भक्तों द्वारा श्रीरामलला की दैनिक सेवा-पूजा की अनुमति दिए जाने के संबंध में अधिवक्ता श्री हरिशंकर जैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की। १ जनवरी १९९३ को अनुमति दे दी गई। तब से दर्शन-पूजन का क्रम लगातार जारी है।
  • राष्ट्रपति का प्रश्न - भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰शंकर दयाल शर्मा ने संविधान की धारा १४३(ए) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रश्न "रेफर" किया। प्रश्न था, "क्या जिस स्थान पर ढांचा खड़ा था वहां रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले कोई हिन्दू मंदिर या हिन्दू धार्मिक इमारत थी?"
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा - सर्वोच्च न्यायालय ने करीब २० महीने सुनवाई की और २४ अक्टूबर १९९४ को अपने निर्णय में कहा-इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ विवादित स्थल के स्वामित्व का निर्णय करेगी और राष्ट्रपति द्वारा दिए गए विशेष "रेफरेंस" का जवाब देगी।
  • लखनऊ खण्डपीठ - तीन न्यायमूर्तियों (दो हिन्दू और एक मुस्लिम) की पूर्ण पीठ ने १९९५ में मामले की सुनवाई शुरू की। मुद्दों का पुनर्नियोजन किया गया। मौखिक साक्ष्यों को रिकार्ड करना शुरू किया गया।
  • भूगर्भीय सर्वेक्षण - अगस्त, २००२ में राष्ट्रपति के विशेष "रेफरेंस" का सीधा जवाब तलाशने के लिए उक्त पीठ ने उक्त स्थल पर "ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार सर्वे" का आदेश दिया जिसे कनाडा से आए विशेषज्ञों के साथ तोजो विकास इंटरनेशनल द्वारा किया गया। अपनी रपट में विशेषज्ञों ने ध्वस्त ढांचे के नीचे बड़े क्षेत्र तक फैले एक विशाल ढांचे के मौजूद होने का उल्लेख किया जो वैज्ञानिक तौर पर साबित करता था कि बाबरी ढांचा किसी खाली जगह पर नहीं बनाया गया था, जैसा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दिसम्बर, १९६१ में फैजाबाद के दीवानी दंडाधिकारी के सामने दायर अपने मुकदमे में दावा किया है। विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक उत्खनन के जरिए जीपीआरएस रपट की सत्यता हेतु अपना मंतव्य भी दिया।
  • खुदाई - २००३ में उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को वैज्ञानिक तौर पर उस स्थल की खुदाई करने और जीपीआरएस रपट को सत्यापित करने का आदेश दिया। अदालत द्वारा नियुक्त दो पर्यवेक्षकों (फैजाबाद के दो अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी) की उपस्थिति में खुदाई की गई। संबंधित पक्षों, उनके वकीलों, उनके विशेषज्ञों या प्रतिनिधियों को खुदाई के दौरान वहां बराबर उपस्थित रहने की अनुमति दी गई। निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आदेश दिया गया कि श्रमिकों में ४० प्रतिशत मुस्लिम होंगे।
  • कानूनी प्रक्रिया पूरी - करीब ६० सालों (जिला न्यायालय में ४० साल और उच्च न्यायालय में २० साल) की सुनवाई के बाद इस मामले में न्यायालय की प्रक्रिया अब पूरी हो गई।
  • राम मंदिर के निर्माण में हो रही देरी को देखते हुए पुन: जनजागरण हेतु - ५ अप्रैल २०१० को हरिद्वार कुंभ मेला में संतों और धर्माचार्यों ने अपनी बैठक में श्री हनुमत शक्ति जागरण समिति के तत्वावधान में तुलसी जयंती (१६ अगस्त २०१०) से अक्षय नवमी (१६ नवम्बर २०१०) तक देश भर में हनुमान चालीसा पाठ करने की घोषणा की। प्रत्येक प्रखंड में देवोत्थान एकादशी (१७ नवम्बर २०१०) से गीता जयंती (१६ दिसम्बर २०१०) तक श्री हनुमत शक्ति जागरण महायज्ञ संपन्न होंगे। ये सभी यज्ञ भारत में लगभग आठ हजार स्थानों पर आयोजित किए जाएंगे।
  • ऐतिहासिक निर्णय - उक्त तीनों माननीय न्यायधीशों ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि जो विवादित ढांचा था वह एक बड़े भग्नावशेष पर खड़ा था। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि वह १२वीं शताब्दी के राम मंदिर को तोड़कर बनाया गया था, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि वह किसी बड़े हिन्दू धर्मस्थान को तोड़कर बनाया गया और न्यायमूर्ति खान ने कहा कि वह किसी पुराने ढांचे पर बना।

संदर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  • Sayyid Shahabuddin Abdur Rahman, Babri Masjid, 3rd print, Azamgarh: Darul Musannifin Shibli Academy, 1987, pp. 29-30.