सहकार भारती

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सहकार भारती, सहकार के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक आनुसांगिक संगठन है। यह पंजीकृत अशासकीय संस्था है। सन् १९७८ में गणेश चतुर्थी के दिन पुणे में सहकार-भारती की स्थापना की गई थी। सहकारिता के आंदोलन को जनकल्याणकारी स्वरूप देकर और अधिक मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से ११ जनवरी १९७९ को मुम्बई (महाराष्ट्र) में "सहकार भारती" नामक सामाजिक संस्था की स्थापना हुई। इसके संस्थापक अध्यक्ष स्व. माधवराव गोडबोले थे, जिन्होने सन्‌ १९३५ में सांगली में जनता सहकारी बैंक की शुरुआत की थी।

अभी सहकार भारती का १५ कार्यकर्ताओं का एक केन्द्रीय दल है, जिसमें ३ पूर्ण कालिक कार्यकर्ता हैं, किन्तु सभी १५ कार्यकर्ता देश में प्रवास करते हैं।

सहकार-भारती की ३ मासिक पत्रिकाएं क्रमश: अमदाबाद से "सहकार चेतना', पुणे से "सहकार सुगंध' एवं ग्वालियर से "सहकार श्री' प्रकाशित होती है।

उद्देश्य[संपादित करें]

सहकार भारती का मुख्य उद्देश्य जनता की आर्थिक सेवा द्वारा समाज का आर्थिक उत्थान करने वाली सहकारिता को शुद्ध करना एवं मजबूत बनाना है- जैसे सहकारिता में आए हुए दोषों को दूर करना, सहकारी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित एवं संस्कारित करना, सहकारिता का जनसाधारण में प्रचार व प्रसार करना, परिसंवाद, परिचर्चा, सम्मेलन, प्रशिक्षण वर्ग इत्यादि कार्यक्रमों द्वारा जन प्रबोधन करना, सहकारिता का साहित्य छापना, सहकारिता की समस्याओं को सुलझाने हेतु मार्गदर्शन करना, आदर्श सहकारी संस्थाएं आरम्भ करना, चलाना एवं बढ़ाना, समाजसेवी आदर्श सहकारिता-कार्यकर्ताओं को सम्मानित व संगठित करना तथा सहकारिता को समाजोपयोगी बनाना इत्यादि सहकार भारती के अन्य उद्देश्य एवं कार्य हैं।

पृठभूमि एवं इतिहास[संपादित करें]

भारत में सहकारिता १८९४ से आरम्भ हुई, ऐसा कहा जाता है। कारण तब वडोदरा में प्रथम सहकारी संस्था गठित हुई। देश स्वाधीन होने के बाद भारत की सरकार ने सहकारिता को एक जनोपयोगी कार्य समझकर इसे बढ़ाने में पर्याप्त रुचि ली। आर्थिक मदद देकर इसे खूब प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप सहकारिता का प्रचार गांव-गांव तक हो गया। आज देश में साढ़े छह लाख सहकारी संस्थाएं हैं, जिनसे इक्कीस करोड़ लोग जुड़े हैं। विश्व की सहकारिता का एक चौथाई भाग भारत में विभिन्न सहकारी संस्थाओं से जुड़ा हुआ है। सहकारिता की विभिन्न विधाएं भी देश में आरम्भ हो गईं। साख, गृह निर्माण, उपभोक्ता भंडार, यातायात, मुद्रण, मछुआरे, कर्मचारी, जुलाहे, क्रय-विक्रय, चीनी उद्योग, वस्त्र-उद्योग, बैंक इत्यादि सभी क्षेत्रों में सहकारी संस्थाएं कार्यरत हैं।

सरकारी उत्साह एवं प्रोत्साहन के कारण धीरे-धीरे सहकारी संस्थाएं सरकार-निर्भर हो गईं। उनकी आत्मनिर्भरता ही समाप्त हो गई। कई सहकारी संस्थाएं तो सरकारी संस्थाओं में ही बदल गईं। सहकारिता सरकारी धन की स्वाहाकारिता के रूप में प्रयोग की जाने लगी। परिणामस्वरूप आज देशभर में सभी राज्यों में सहकारिता बदनाम है। उस पर लोगों का विश्वास खत्म-सा हो गया है।

ऐसे समय में संघ के स्वयंसेवक जो सहकारिता के क्षेत्र में किसी न किसी रूप में कार्यरत थे, उनका चिंतित होना स्वाभाविक था। ग्रेवाल समिति ने अपनी रपट में कहा था कि भारत में सहकारिता आंदोलन पूर्णत: असफल हो गया है। रपट में आगे कहा गया कि इस आंदोलन को सफल जरूर बनाना चाहिए, क्योंकि सहकारिता द्वारा ही सामान्य व्यक्ति का आर्थिक उत्थान संभव है।

भारत में सहकारिता आन्दोलन[संपादित करें]

मुख्य लेख - सहकारिता का इतिहास

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]