राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वतंत्रता संग्राम

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक भी प्रकाशन या दस्तावेज नहीं है जो कि उस महान कार्य पर कुछ प्रकाश डाल सके जो आरएसएस ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन के लिए किया था।[1][2] वे युगान्तर और अनुशीलन समिति जैसे प्रमुख विप्लवी संगठनों में डॉ. पाण्डुरंग खानखोजे, श्री अरविन्द, वारीन्द्र कुमार घोष, त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती आदि के सहयोगी रहे। रासबिहारी बोस और शचीन्द्र सान्याल द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध के समय 1915 में सम्पूर्ण भारत की सैनिक छावनियों में क्रान्ति की योजना में वे मध्यभारत के प्रमुख थे। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन का मंच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस थी। उसमें भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। 1921 और 1930 के सत्याग्रहों में भाग लेकर कारावास का दण्ड पाया।

1925 की विजयादशमी पर संघ स्थापना करते समय भी डा० हेडगेवार जी का उद्देश्य राष्ट्रीय स्वाधीनता ही था। संघ के स्वयंसेवकों को जो प्रतिज्ञा दिलाई जाती थी उसमें राष्ट्र की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तन-मन-धन पूर्वक आजन्म और प्रामाणिकता से प्रयत्नरत रहने का संकल्प होता था। संघ स्थापना के तुरन्त बाद से ही स्वयंसेवक स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने लगे थे।

गोलवलकर ने ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रवाद को लताड़ा, इसे "प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण" कहा, जो उन्होंने दावा किया, स्वतंत्रता संग्राम के पूरे पाठ्यक्रम पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। [५ ९] [६०] माना जाता है कि गोलवलकर अंग्रेजों को आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने का बहाना नहीं देना चाहते थे। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सरकार द्वारा लगाए गए सभी सख्त कदमों का अनुपालन किया, यहां तक कि आरएसएस के सैन्य विभाग की समाप्ति की भी घोषणा की। गोलवलकर ने बाद में इस तथ्य को खुले तौर पर स्वीकार किया कि आरएसएस ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया था। उन्होंने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि इस तरह के रुख से एक निष्क्रिय संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धारणा बनी, जिसके बयानों में वास्तविकता नहीं थी। [५६] [९]

1945 में ब्रिटिशों के खिलाफ रॉयल इंडियन नेवी म्यूटिनी में आरएसएस ने न तो समर्थन किया और न ही शामिल हुआ।

क्रान्तिकर्मी स्वयंसेवक[संपादित करें]

1926-27 में जब संघ नागपुर और आसपास तक ही पहुँचा था, उसी काल में प्रसिद्ध क्रांतिकारी राजगुरु नागपुर की भोंसले वेदशाला में पढ़ते समय स्वयंसेवक बने। इसी समय भगत सिंह ने भी नागपुर में डॉक्टर जी से भेंट की थी। दिसम्बर 1928 में ये क्रान्तिकारी पुलिस सांडर्स का वध करके लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेकर लाहौर से सुरक्षित आ गए थे। डॉ. हेडगेवार ने राजगुरु को उमरेड में भैया जी दाणी (जो बाद में संघ के अ.भा. सरकार्यवाह रहे) के फार्म हाउस पर छिपने की व्यवस्था की थी। 1928 में साइमन कमीशन के भारत आने पर पूरे देश में उसका बहिष्कार हुआ। नागपुर में हड़ताल और प्रदर्शन करने में संघ के स्वयंसेवक अग्रिम पंक्ति में थे।

महापुरुषों का समर्थन[संपादित करें]

1928 में विजयदशमी उत्सव पर भारत की असेम्बली के प्रथम अध्यक्ष और सरदार पटेल के बड़े भाई श्री विट्ठल भाई पटेल उपस्थित थे। अगले वर्ष 1929 में महामना मदनमोहन मालवीय जी ने उत्सव में उपस्थित ही संघ को अपना आशीर्वाद दिया। स्वतंत्रता संग्राम की अनेक प्रमुख विभूतियाँ संघ के साथ स्नेह संबंध रखती थीं।

शाखाओं पर स्वतंत्रता दिवस[संपादित करें]

31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में काग्रेस ने प्रथम बार पूर्ण स्वाधीनता को लक्ष्य घोषित किया और 26 जनवरी 1930 देश भर में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया गया। डॉ. हेडगेवार ने दस वर्ष पूर्व 1920 के नागपुर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव रखा था, पर तब वह पारित नहीं हो सका था। 1930 में कांग्रेस द्वारा यह लक्ष्य स्वीकार करने पर आनन्दित हुए हेडगेवार जी ने संघ की सभी शाखाओं को परिपत्र भेजकर रविवार 26 जनवरी 1930 को सायं 6 बजे राष्ट्रध्वज वन्दन करने और स्वतंत्रता की कल्पना और आवश्यकता विषय पर व्याख्यान की सूचना करवाई। इस आदेश के अनुसार संघ की सब शाखाओं पर स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

सत्याग्रह[संपादित करें]

6 अप्रैल 1930 को दांडी में समुद्रतट पर गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ा और लगभग 8 वर्ष बाद कांग्रेस ने दूसरा जनान्दोलन प्रारम्भ किया। संघ का कार्य अभी मध्यभारत प्रान्त में प्रभावी हो पाया था । यह नमक कानून के स्थान पर जंगल कानून तोड़कर सत्याग्रह करने का निश्चय हुआ। डॉ. हेडगेवार संघ के सरसंघचालक का दायित्व डा. परांजपे को सौंप स्वयं अनेक स्वयंसेवकों के साथ सत्याग्रह करने गए। जुलाई 1930 में सत्याग्रह हेतु यवतमाल जाते समय पुसद नामक स्थान पर आयोजित जनसभा में डॉ. हेडगेवार के सम्बोधन में स्वतंत्रता संग्राम में संघ का दृष्टिकोण स्पष्ट होता है। उन्होंने कहा- “स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के बूट की पालिश करने से लेकर, उनके बूट को पैर से निकाल कर उससे उनके ही सिर को लहूलुहान करने तक के सब मार्ग मेरे स्वतंत्रता प्राप्ति के साधन हो सकते हैं। मैं तो इतना ही जानता हूँ कि देश को स्वतंत्र कराना है।" डॉ. हेडगेवार के साथ गए सत्याग्रह जत्थे में आप्पा जी जोशी(बाद में सरकार्यवाह) दादाराव परमार्थ (बाद में मद्रास में प्रथम प्रान्त प्रचारक) आदि प्रमुख 12 स्वयंसेवक थे। उनको 9 मास का सश्रम कारावास दिया गया। उसके बाद अ.भा.शारीरिक शिक्षण प्रमुख (सरसेनापति) श्री मार्तण्ड राव जोग, नागपुर के जिलासंघचालक श्री अप्पाजी हलदे आदि अनेक कार्यकर्ताओं और शाखाओं के स्वयंसेवकों के जत्थों ने भी सत्याग्रहियों की सुरक्षा के लिए 100 स्वयंसेवकों की टोली बनाई जिसके सदस्य सत्याग्रह के समय उपस्थित रहते थे। 8 अगस्त को गढ़वाल दिवस पर धारा 144 तोड़कर जुलूस निकालने पर पुलिस की मार से अनेक स्वयंसेवक घायल हुए। विजयादशमी 1931 को डॉ. जी जेल में थे, उनकी अनुपस्थिति में गाँव-गाँव में संघ की शाखाओं पर एक संदेश पढ़ा गया, जिसमें कहा गया था- “देश की परतंत्रता नष्ट होकर जब तक सारा समाज बलशाली और आत्मनिर्भर नहीं होता तब तक रे मना ! तुझे निजी सुख की अभिलाषा का अधिकार नहीं ।" जनवरी 1932 में विप्लवी दल द्वारा सरकारी खजाना लूटने के लिए हुए बालाघाट काण्ड में वीर बाघा जतीन (क्रान्तिकारी जतीन्द्र नाथ) अपने साथियों सहित शहीद हुए और श्री बाला जी हुद्दार आदि कई क्रान्तिकारी बन्दी बनाए गए। श्री हुद्दार उस समय संघ के अ.भा.सरकार्यवाह थे।

संघ पर प्रतिबंध[संपादित करें]

संघ के विषय मे गुप्तचर विभाग की रपट के आधार पर ब्रिटिश भारत सरकार (जिसके क्षेत्र में नागपुर भी था) ने 15 दिसम्बर 1932 को सरकारी कर्मचारियों की संघ में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया। डॉ. हेडगेवार जी के देहान्त के बाद 5 अगस्त 1940 की सरकार ने भारत सुरक्षा कानून की धारा 56 व 58 के अन्तर्गत संघ की सैनिक वेशभूषा और प्रशिक्षण पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया।

1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन[संपादित करें]

संघ के स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। विदर्भ के अष्टी चिमूर क्षेत्र में समानान्तर सरकार स्थापित कर दी। अमानुषिक अत्याचारों का सामना किया। उस क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक स्वयंसेवकों ने अपना बलिदान किया। नागपुर के निकट रामटेक के तत्कालीन नगर कार्यवाह श्री रमाकान्त केशव देशपाण्डे उपाख्य बालासाहब देशपाण्डे को आन्दोलन में भाग लेने पर मृत्युदण्ड सुनाया गया। आम माफी के समय मुक्त होकर उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की। देश के कोने-कोने में स्वयंसेवक जूझ रहे थे। मेरठ जिले में मवाना तहसील पर झण्डा फहराते स्वयंसेवकों पर पुलिस ने गोली चलाई, अनेक घायल हुए। आंदोलनकारियों की सहायता और शरण देने का कार्य भी बहुत महत्व का था। केवल अंग्रेज सरकार के गुप्तचर ही नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी के आदेशानुसार देशभक्तों को पकड़वा रहे थे। ऐसे जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली दिल्ली के संघचालक लाला हंसराज गुप्त के यहाँ आश्रय पाते थे। प्रसिद्ध समाजवादी श्री अच्युत पटवर्धन और साने गुरुजी ने पूना के संघचालक श्री भाऊसाहब देशमुख के घर पर केन्द्र बनाया था। 'पतरी सरकार ' गठित करने वाले प्रसिद्ध क्रान्तिकमीं नाना पाटिल को औौंध (जिला सतारा) में संघचालक पं.सातवलेकर जी ने आश्रय दिया।

स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघ की योजना[संपादित करें]

ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग ने 1943 के अन्त में संघ के विषय में जो रपट प्रस्तूत की वह राष्ट्रीय अभिलेखागार की फाइलों में सुरक्षित है । जिसमे सिद्ध किया है कि संघ योजनापूर्वक स्वतंत्रता प्राप्ति की ओर बढ़ रहा है।

आजाद हिन्द फौज के साथ सहयोग में संघ की पूर्व तैयारी[संपादित करें]

20 सितम्बर 1943 में नागपुर में हुई संघ की गुप्त बैठक में जापान की सहायता से आजाद हिन्द फौज के भारत की ओर होने वाले प्रयाण के समय, संघ की संभावित योजना पर विचार हुआ।

रियासतों में संघकार्य पर प्रतिबंध[संपादित करें]

गुप्तचर विभाग से यह सूचना प्राप्त कर कि संघ ने हिन्दू रियासतों के क्षेत्र में अपना संगठन मजबूत किया। स्वयंसेवको शस्त्रो का खुलेआम प्रक्षिक्षण दिया जा रहा है, ब्रिटिश सरकार ने सभी ब्रिटिश रेजीडेन्टों को संघ की गतिविधियों को रुकवाने व प्रमुख कार्यकर्ताओं के विषय में जानकारी एकत्र करने का निर्देश दिया। प्राप्त सूचनाओं के विश्लेषण से गुप्तचर विभाग इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि संगठन के लिए संगठन, राजनीति से संबंध नहीं, हमारा कार्य सांस्कृतिक है- जैसे वाक्य वास्तविक उद्देश्य पर आवरण डालने के लिए है।

भारत विभाजन और संघ[संपादित करें]

  • संघ भारत विभाजन क्यों नही रोक पाया ?

विभाजन से पूर्व कांग्रेस ही वह मंच था, जिससे मुस्लिम लीग तथा ब्रिटिश सरकार सत्ता हस्तांतरण अथवा विभाजन के संबंध में बात करते थे। 3 जून 1947 को वायसराय माउण्टबेटन ने भारत को विभाजित कर जून 1948 तक स्वतंत्र करने की योजना घोषित की थी। संघ सहित सम्पूर्ण देश विश्वास कर रहा था कि कांग्रेस भारत विभाजन स्वीकार नहीं करेगी। परन्तु 14-15 जून को कांग्रेस कार्यसमिति ने इस योजना को स्वीकार कर सारे देश को स्तब्ध कर दिया। नेहरू जी ने 1960 में स्वीकार किया था- “सच्चाई यह है कि हम थक चुके थे और आयु भी अधिक हो गई थी।.... और यदि हम अखण्ड भारत पर डटे रहते.... तो स्पष्ट है हमें जेल जाना पड़ता।” (दि ब्रिटिश राज— लियोनार्ड मोस्ले पृ. 285) श्री राम मनोहर लोहिया ने लिखा- “नेताओं की तो अध् गोगति हुई। वे लालच के फन्दे मे फंस गए।(दि गिल्टीमैन ऑफ इण्डियाज पार्टीशन पृ. 37)” इण्डियाज पार्टीशन पृ. 37)” भारत विभाजन की मँग करने वाली मुस्लिम लीग को ब्रिटिश सरकार का समर्थन तो प्राप्त था ही कोंग्रेस के थके हुए पद लोपुप नेतृत्व के द्वारा विभाजन स्वीकार कर लेने पर राष्ट्र की एकता के समर्थक संघ तथा हिन्दू महासभा आदि ने अपना प्रयास प्रारम्भ कर दिया। इसी बीच विभाजन विरोधी शक्तियाँ तेजी से उभरने लगीं। उन शक्तियों को संगठित होते देख कर ब्रिटिश सत्ताधीशों का माथा ठनका। उन्होंने सोचा कि यदि इस विरोध को चरम सीमा तक पहुँचने का अवसर मिल गया तो भारत को तोड़कर छोड़ने का उनका मन्सूबा पूरा नहीं हो सकेगा। इसलिए उस व्यापक विरोध से बचने के लिए ब्रिटिश शासन ने अपने भारत छोड़ने की पूर्व घोषित तिथि जून अन्त 1948 के 10 माह पहले ही भारत छोड़ दिया। (बाला साहब देवरस पहली अग्नि-परीक्षा) माउण्टबेटन ने कहा- 'इससे पूर्व कि देश में विभाजन के विरुद्ध कोई प्रभावी प्रतिरोध खड़ा हो सके, समस्या का झटपट निपटारा कर डाला। (दि ब्रिटिश राज पृ. 118)' कांग्रेस द्वारा विभाजन की स्वीकृति के मात्र 60 दिन में देश का विभाजन कर अंग्रेज ने सत्ता हस्तांतरण कर दिया। यदि 10 मास का समय और मिला होता तो समाज को विभाजन के विरुद्ध तैयार कर लिया जाता।

  • विभाजन काल में हिन्दुओं की रक्षा

भारत विभाजन केवल भूखण्ड का बँटवारा नहीं, यह था अनादिकाल से पूजित भारत माता का खण्डन और असंख्य हुतात्माओं और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों का ध्वंस। इस महाविध्वंस में हिन्दू समाज ने जो महाविनाश देखा, उसमें लगभग 20 लाख व्यक्ति काल कवलित हुए और 2 करोड़ लोगों को अपने पुरखों की भूमि छोड़नी पड़ी। तत्कालीन अन्तरिम सरकार के मंत्री श्री एन.वी. गाडगिल ने अपनी पुस्तक 'गवर्मेन्ट फ्रॉम इनसाइड' में उस स्थिति का वर्णन किया है— 'पश्चिमी पंजाब हिंदुओं और सिखों से खाली कर दिया गया। 60 लाख गैर मुस्लिमों में से स्वीपर रोक कर और सब निकाल दिये गये।.... पाकिस्तान की नीति स्पष्ट थी। सिन्ध में से हिन्दुओं को निकाल देना और उनका सब धन लूट लेना चाहते थे।.... पूर्वी पाकिस्तान की अनहोनी दशा थी, वहाँ से 80 लाख हिन्दू निकाल दिये गए।.... पाकिस्तान के एक-एक हिंदू(सनातनी और सिख) भारत की ओर आ गया । इस स्थानातरण में अनगिनत स्त्रियों का अपहरण हुआ, उनसे बलात्कार हुआ और अनगिनत स्त्री-पुरुष व बच्चे मार डाले गये।' न्यायमूर्ति खोसला ने अपनी पुस्तक Stern Reckoning में इस थोड़े से काल में पंजाब और सिन्ध में मारे गए लोगों की संख्या कम से कम 10 लाख बताई है।

  • दिल्ली की रक्षा स्वयंसेवकों ने की

नव स्वतंत्र भारत को संकट में डालने के लिए मुस्लिम लीग ने षड्यंत्र रचा था। दिल्ली में हथियार और विस्फोटक एकत्र किये थे। अनेकों प्रशिक्षित लीगी कार्यकर्ता और विशाल शस्त्रागार तैयार था। उस संकट काल में अपनी जान जोखिम में डाल कर स्वयंसेवकों ने उस षड्यंत्र का भंडाफोड़ किया।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "RSS Freedom". मूल से 13 जून 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 4 अप्रैल 2020.
  2. "RSS And Freedom Struggle: Separating Facts From Fiction, Propaganda From History". मूल से 16 मई 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 22 मई 2019.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]