राठवा

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राठवा आदिवासी मूलतः अलीराजपुर जिले के भील आदिवासियों से संबंधित है यह लोग अलीराजपुर से ही गुजरात क्षेत्र में गए है । छोटा उदयपुर में राठवा आदिवासियों की आबादी अधिक है और इस नगर के अंतिम राठवा राजा कालिया भील थे जिन्हे 1484 में मार दिया था[1]

राठवा (Rathwa) जनजाति कापुरुष , बाँसुरी बजाते हुए

स्थान[संपादित करें]

मुख्यरूप से छोटा उदयपुर के छोटा उदयपुर, कवांट, पावी-जेतपुर,संखेडा नसवाडी और बोडेली तालुका और पंचमहल जिला के हलोल, कलोल और बारीया तालुका में रहते है।

राजा[संपादित करें]

राजा कालिया भील - छोटा उदयपुर के अंतिम राठवा राजा कालिया भील थे जिनकी हत्या 1484 ईसवी में हुई थी[2]

जनसँख्या[संपादित करें]

वर्ष १९८१ की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या ३०८६४० दर्ज है [3]

राठवा जनजाति द्वारा की जाने वाली पिथौरा चित्रकारी
पिथोरा चित्रकला

पिथोरा चित्रकला एक प्रकार की चित्रकला है। मध्य प्रदेश के पिथोरा क्षेत्र मे इस कला का उद्गम स्थल माना जाता है। इस कला के विकास में भील जनजाति के लोगों का योगदान उल्लेखनीय है। इस कला में पारम्परिक रंगों का प्रयोग किया जाता था। प्रायः घरों की दीवारों पर यह चित्रकारी की जाती थी परन्तु अद्यतन समय में यह कागजों, केन्वस, कपड़ों आदि पर की जाने लगी है। यह चित्रकला बड़ोदा से ९० किलोमीटर पर स्थित तेजगढ़ ग्राम (मध्य गुजरात) में रहने वाली राठवा जनजाति के लोगों द्वारा दीवारों पर बनाई जाती है।

इसके अतिरिक्त छोटा उग्र जिले के तेजगढ़ व छोटा उदपुर, कवांट ताल्लुक के आसपास भी पिथोरा चित्रकला घरों की तीन भीतरी दीवारों में काफी संख्या में वहां रहने वाले जनजातीय लोगों के घरों में देखी जा सकती हैं। पिथोरा चित्रकला का इन जनजातीय लोगों के जीवन में विशेष महत्व है तथा उनका यह मानना है कि इस चित्रकला को घरों की दीवारों पर चित्रित करने से घर में शान्ति, खुशहाली व सौहार्द का विकास होता है।

पिथोरा चित्रकला का चित्रण राठवा जाति के लोग ही सबसे अधिक करते हैं तथा अत्यन्त ही साधारण स्तर के किन्तु धार्मिक लोग होते हैं। इनके लिए पिथोरा बाबा अति विशिष्ठ व पूजनीय होते हैं। इस चित्रकला के चित्रण में ये लोग बहुत धन लगाते हैं तथा जो अपने घर में अधिकाधिक पिथोरा चित्र रखते हैं वे समाज में अति सम्माननीय होते हैं। पिथोरा चित्रकार को लखाड़ा कहा जाता है तथा जो इन चित्रकलाओं का खाता रखते हैं उन्हें झोखरा कहा जाता है। सर्वोच्च पद पर आसीन जो पुजारी धार्मिक अनुष्ठान करवाता है उसे बडवा या अध्यक्ष पुजारी कहते हैं। सामान्यत: लखाड़ा किसान होते हैं। इस् चित्रकला का चित्रण केवल पुरुष ही कर सकते हैं। खातों की देखरेख के अतिरिक्त लखाड़ा सामान्य चित्रण जैसे रंग भरने का कार्य ही पिथोरा चित्रकारों में शामिल होकर कर सकते हैं। वरिष्ठ कलाकारों के मार्गदर्शन में लखाड़ा अच्छे चित्रकार बन जाते हैं। महिलाओं के लिए पिथोरा चित्रण निषेध है।

चित्रदीर्घा[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. मीणा, गंगा सहाय. आदिवासी साहित्‍य पत्रिका: अंक-9. Ganga Sahay Meena.
  2. मीणा, गंगा सहाय. आदिवासी साहित्‍य पत्रिका: अंक-9. Ganga Sahay Meena.
  3. "संग्रहीत प्रति". मूल से 2 जुलाई 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 3 अगस्त 2016.