कहार

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कहार (अंग्रेजी: Kahar) भारतवर्ष में हिन्दू धर्म को मानने वाली एक जाति है। इस समुदाय के लोग बिहार , पंजाब, हरियाणा और पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और [[मध्य प्रदेश|मध्यप्रदेश] में ही पाये जाते हैं। कहार की उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि यह उन सप्त ऋषियों से उत्पन्न है जिन्होंने चंद्रवंशी क्षत्रिय राजा नहुष की डोली उठाई थी । और आज उन्ही के गोत्र इनमें पाए जाते हैं। इन्हे गौड़ , गोंड , धुरिया कहार , कश्यप राजपूत, निषाद, कहार, भोई कहार के नाम से भी नाम से जाना जाता है। पूरे भारतवर्ष में कहार की अनेक उपजाति हैं । भारत के प्रत्येक राज्य में इन्हें कहार के अलावा अलग अलग नामों से जाने जाते हैं । इसी तरह बिहार के मिथलांचल या कहे दरभंगा प्रमंडल के आसपास में कहार जाति के लोग खतवे और चौपाल के नाम से जाने जाते हैं ।

कहारो की कुलदेवी मुम्बा माता है तथा इस जाति के जाति जय जल देव, बड़ादेव जो की महत्वपूर्ण पहचान है कहार जाति लोग कहते हैं कि यदि जीवन में जल देव नहीं तो कुछ भी वैसे तो कहार जाति का प्राचीन कार्य डोली उठाना और उन डोली की रक्षा करना था परंतु राजाओं का साम्राज्य खत्म होने के साथ-साथ डोली उठाने का कार्य भी समाप्त हो गया जिसके बाद यह लोग मत्स्य पालन फल फूल खेती का और विभिन्न प्रकार के कार्य करने लगे।

कहार समुदाय की उत्पत्ति[संपादित करें]

इन्द्र का ब्रह्महत्या के दोष का निवारण हो जाने पर वे पुनः शक्ति सम्पन्न हो गये किन्तु इन्द्रासन पर नहुष के होने के कारण उनकी पूर्ण शक्ति वापस न मिल पाई। इसलिये उन्होंने अपनी पत्नी शची से कहा कि तुम नहुष को आज रात में मिलने का संकेत दे दो किन्तु यह कहना कि वह तुमसे मिलने के लिये सप्तर्षियों की पालकी पर बैठ कर आये। शची के संकेत के अनुसार रात्रि में नहुष सप्तर्षियों की पालकी पर बैठ कर शची से मिलने के लिये जाने लगा। सप्तर्षियों को धीरे-धीरे चलते देख कर उसने 'सर्प-सर्प' (शीघ्र चलो) कह कर अगस्त्य मुनि को एक लात मारी। इस पर अगस्त्य मुनि ने क्रोधित होकर उसे शाप दे दिया, “मूर्ख! तेरा धर्म नष्ट हो और तू दस हज़ार वर्षों तक सर्पयोनि में पड़ा रहे।” ऋषि के शाप देते ही नहुष सर्प बन कर पृथ्वी पर गिर पड़ा और देवराज इन्द्र को उनका इन्द्रासन पुनः प्राप्त हो गया। और इन्हीं सप्त ऋषियों के वंश के लोगो को कहार कहा गया। पूरे भारतवर्ष में कहार की अनेक उपजाति हैं ।