गद्दी

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गडरिया

गडरिया (बघेल) जनजाति हिमाचल प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर पाई जाती है। इनकी क़द-काठी राजस्थान की मरुभूति के राजपूत समाज से मिलती है। यह भी अपने आप को राजस्थान के ' शासकों के वंशज बातते हैं। इस जाति का विश्वास है कि मुग़लों के आक्रमण काल में धर्म एवं समाज की पवित्रता बनाये रखने के लिए यह राजस्थान छोड़कर पवित्र हिमालय की शरण में यहाँ के सुरक्षित भागों में आकर बस गये।

निवास क्षेत्र[संपादित करें]

गडरिया समाज भारत की प्राचीन जातियों में है | ये जाति भारत के उत्तराखंड ,हिमाचल प्रदेश , जम्मू व कश्मीर , पाकिस्तान , लद्दाख में पाई जाती है

निवास वर्तमान समय में गडरिया जनजाति के लोग धौलाधर श्रेणी के निचले भागों में हिमाचल प्रदेश के चम्बा एवं कांगड़ा ज़िलों में बसे हुए हैं। प्रारम्भ में यह ऊँचे पर्वतीय भागों में आकर बसे रहे, किंतु बाद में धीरे-धीरे धौलाघर पर्वत की निचली श्रेणियों, घाटियों एवं समतलप्राय भागों में भी इन्होंने अपनी बस्तियाँ स्थापित कर लीं। इसके बाद धीरे-धीरे यह जनजाति स्थानीय जनजातियों से अच्छे सम्पर्क एवं सम्बन्ध बनाकर उनसे घुल-मिल गई और अपने आप को पूर्ण रूप से स्थापित कर लिया

धर्म[संपादित करें]

धर्म गडरिया जनजाति के लोग हिन्दू धर्मावलम्बी होते हैं। यह शिव एवं माँ पार्वती के विविध रूपों एवं शक्ति की आराधना विशेष रूप से करते हैं। पूजा करते समय यह उत्तम स्वास्थ्य एवं सम्पन्नता की कामना भी करते हैं। गडरिया जनजाति के विश्वास के अनुसार अनेक प्रकार की बीमारियाँ, पशुओं की महामारी एवं गर्भपात का कारण प्रतिकूल आत्माओं या प्रेतात्मा का कोपयुक्त प्रभाव है। अत: ऐसी कठोर या क्रूर स्वाभाव वाली प्रेतात्माओं को प्रसन्न करने के लिए ये लोग भेड़ या बकरे की बलि चढ़ाते हैं।

समाज गडरिया एकता[संपादित करें]

गद्दी जाति पहाड़ी गड़ेरिय (बघेल) होते है | ये गड़रिया समाज का अंग है | धनगर, गड़ेरिया,भरवाड़, कुरुबा, रबारी, देवासी (रायका), गद्दी ये भारत की भेड़-बकरी पालने वाली जातिया है