भोई

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भोई एक सम्पन्न वर्ग को दर्शाने वाले शब्द या उपाधि हैं। भोई का आज बहुत सी जातियों द्वारा उपयोग में लिया जा रहा हैं। भोई मूलतः भोई/भोईर/भोइते मराठी समुदाय द्वारा प्रयोग में लिया जाता था, परन्तु बाद में इसको कई संपन्न वर्ग के लोग उपयोग करने लगे।

भोई उपनाम का प्रयोग भोई राजवंश उड़ीसा के द्वारा भी किया जाता हैं जो खुद को यदुवंशी कुल से सम्बंधित बताते हैं। 

वही कश्यप मूल वंश से निकले क्षत्रिय भी इसका उपयोग करते हैं। कश्यप क्षत्रिय मूल वंश के लोग इसके उपयोग करने की वजह प्रतिहार राजपूत के बन्धु या भाई होने की वजह से भाई से भोई शब्द हो जाना हुआ हैं। गोंड़ आदिवासी लोगों द्वारा भोई उपनाम का प्रयोग अपने को सम्पन्न और उच्च प्रदर्शित करने के लिए किया जाता था। सन्दर्भ देखे शहीद बादल भोई।वो भी खुद को सम्पन्न वर्ग का दिखाने के लिए भोई कहलवाना पसन्द करते हैं। इस वजह से ये भ्रम की स्तिथि हैं कि इसका जातिगत रूप में उपयोग उचित हैं या अनुचित। भोई के नाम से बहुत सी जातियां अनुसूचित जाति व जनजातियों का आरक्षण ले रही हैं। जिनका वर्गीकरण उचित प्रकार से नही हैं। गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान व महाराष्ट्र के भोई राजपूत वर्ग से सम्बंधित हैं। जो प्रायः मेहरा, भोई या कश्यप/सूर्यवंशी राजपूत कहलाते हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

भोई नामक छोटा मोटा सासक भी इतिहास में है। Schools में Social Science में आता था।