कोली

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कोली, कोल्ही एंव कोलिय
Statue of Maharaja Yashwantrao Martandrao Mukne of Jawhar State.jpg
महाराजा यशवंत राव मार्तण्ड राव मुकणे, जव्हार रियासत के अंतिम कोली शासक 1948 तक
Samadhi Of Tanaji Malusare.jpg
देशमुख साहेब सरदार तानाजी राव कालोजी राव मालूसरे, महाबलेश्वर राजबाड़ा के कोली देशमुख और मराठा सेना के कोली सेनापति जिसने सिंहगढ़ का युद्ध जीता था
कुल जनसंख्या
ख़ास आवास क्षेत्र
हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक
भाषाएँ
हिंदी, गुजराती, सिंधी, कन्नड़, मराठी भाषा
धर्म
हिन्दू

कोली (en:Koli people) एक समुदाय है जो मूल रूप से भारत के गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और जम्मू कश्मीर राज्यों का निवासी रहा है।[1][2] कोली गुजरात की एक जमीदार जाती है इनका मुख्य कार्य खेतीबाड़ी है लेकिन जहां पर ये समुंद्री इलाकों में रहते हैं वहां पर खेतीबाड़ी और मछली पकड़ने के दोनों काम करते हैं। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेजी हुकूमत ने इनको खूनी जाती घोषित कर दिया था।[3] प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने कोली जाती को एक योद्धा जाती का दर्जा दिया क्योंकि कोली जाती ने प्रथम विश्व युद्ध में अपने वीरता का परिचय दिया।[4]

महरवान श्रीमंत सरदार सरखेल माणाजी राजे आंग्रे, कोलाबा रियासत

इतिहास[संपादित करें]

पंद्रहवीं सतावदी के लेखों के अनुसार कोली जागीरदार खासकर गुजरात सल्तनत में लूट पाट करते थे। लेखिका सुसान बेबी के अनुसार कोली जाती महाराष्ट्र की एक पुरानी क्षत्रिय जाती है। सन् 1940 तक तो गुजरात और महाराष्ट्र के सभी राजा और महाराजा कोली जाती को एक बदमाश जाती के रूप में देखते आए थे जिसके कारण वो अपनी सैन्य सकती बनाए रखने के लिए कोली जाती को सैनिकों के तौर पर रखते थे। ज्यादातर कोली जमींदारी में व्यस्त हो गए लेकिन कुछ कोली व्यवास करने लगे। इस्लामिक भारत के समय से ही कोली जाती अपना महत्व बनाए हुए है। गुजरात में मुस्लिम सासन के समय कोली जाती जागीरदार के तौर पर और गीरासिया के तौर पर बनी हुई है। जागीरदार कोली अपने आप को ठाकोर बोलते थे यानी की जागीरदार।[4]

जब गुजरात पर मुगलों का सासन हुुुआ तो मुगलों के लिए पहली चुनौती कोली जाती है थी। गुजरात के कोली मुगल सासन के खिलाफ थे और हथियार उठा लिए थे। जिनमें से एक यादगार लड़ाई 1615 की है जो कोली जागीरदार लाल कोली और मुगल गवर्नर जनरल अब्दुल्ला खान की है। लाल कोली ने मुगलों की नाक में दम कर दिया था। इस लड़ाई में अब्दुल्ला खान 3000 घुड़सवार और 12000 सिपाही लेकर कॊलियो के खिलाफ लड़ाई में उतरा था लेकिन लाल कोली ने और कोली जमीदारों को एक किया और सहि मुगल सेना से भिड़ गया था लेकिन एक खूनी लड़ाई के बाद अब्दुल्ला खान की जीत हुए थी और अहमदाबाद के एक दरवाजे पर लाल कोली ठाकोर का सिर लटका दिया था। लेकिन इस घटना से गुजरात की कोली जाती का निडर होना दिखाई पड़ता है।[5][6] लेखिका शुचित्रा सेठ के अनुसार जब औरंगज़ेब ने गुजरात पर सासन किया था तब भी कोली जाती ने ही हथियार उठाए थे। औरंगज़ेब के राज में कोली जाती के लोग मुस्लिम गांव में लूट पाट किया करते थे और उनके जानवर और अन्य जरूरी सामान को लूट ले जाते थे और खासकर सुक्रवार के दिन किया करते थे लेकिन सुलतान औरंजेब कोली जाती को संभालने में नाकामयाब रहा। इसलिए सुलतान ने 1665 में एक फरमान जारी किया की शुक्रवार के दिन कोई भी हिन्दू और जैन पूरी रात अपनी दुकानें खुली रखेंगे ताकि कोली जाती के लोगो का ध्यान उनको लूटने में जाए लेकिन ये तरीका फैल हुआ। लेकिन इससे यह पता चलता है कि कोली जाती का उस समय क्या महत्व रहा होगा।[3] इससे पहले 1664 में भी कोली जाती ने ऐसा ही किया था कोली जाती हमेशा से ही विद्रोही स्वाभ की रही है।[4]

1830 मे कोली जागीरदारों ने उत्तर गुजरात में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाए। कोली जागीरदारों को ठाकोर साहेब के नाम से जाना जाता था। अंब्लियारा जागीर की कोली रानी ने अंग्रेज़ो से कई सालों तक कड़ी टक्कर ली थी। लेकिन कोली जागीरदारों के विद्रोह को दवाने के ग्वालियर रियासत और बड़ौदा रियासत के महाराजाओं ने अंग्रेजों का पूरा साथ दिया। लेकीन 1857 में फिर से कोली जाती के लोगों ने कोली जागीरदारों के नेतृत्व में फिर से हथियार उठा लिए थे।[3]

समुंद्री लुटेरे[संपादित करें]

गुजरात की कोली जाती का इतिहास समुंद्री लुटेरों का भी रहा है। जब भारत में पुर्तगाली आए थे तो कोली समुंद्री लुटेरे ही थे जिन्होंने पुर्तगाली सासन को चुनौती दी थी।[7] 1734 में गुजरात के कोली समुंद्री लूट पाट में ज्यादा व्यस्त हुए थे कोली लुटेरे समुन्द्र में लूट पाट के लिए प्रसिद्ध थे। छेह महीने बाद ब्रिटिश सरकार ने कोली लुटेरों के खिलाफ रेडफोर्ड नुन्न के नेतृत्व में ब्रिटिश समुंद्री सेना भेजी । इस लड़ाई में कोली लुटेरों का काफी नुकसान हुए ब्रिटिश नेवी ने कोली लुटेरों के 19 बड़े लड़ाकू जहाज और 50 छोटे जहाज तबाह कर दिए थे और 10 जहाज जला दिए थे। कोली समुंद्री लुटेरे अमुंद्री ताकतों के लिए बड़ी परेशानी बने हुए थे। 21 जनवरी 1739 में कोली समुंद्री लुटेरों ने ब्रिटिश के कई बड़े जहाज लूट लिए थे जिनमें से एक टाइगर गलिवेट भी था जो ब्रिटिश सरकार के लिए बड़ा झटका था। फिर 1749 में कोली समुंद्री लुटेरों ने अंग्रेज़ो के फिर से जहाज लूट लिए जिनमें एक बेंगोल शिप भी था जिसमें 60,000 हजार नकदी और इतने का ही माल था ये फिर से अंग्रेज़ो के लिए बड़ा झटका था। इसके बाद डच नेवी और ब्रिटिश नेवी ने मिलकर कोली समुंद्री लुटेरों पर आक्रमण के दिया। कुर्ला नदी पर कोली लुटेरों की लड़ाई हुई जिसमें कोली लुटेरों के 23 बड़े जहाज तबाह हो गए और कोली लुटेरों को मुंह की खानी पड़ी लेकिन इससे यह तो पता चलता है कि कोली जाती का कितना ज्यादा प्रभाव था।[8]

कोली समुंद्री लुटेरों से देशी रियासतों भी परेशान थी। कोली लुटेरों ने सौराष्ट्र के किनारे आतंक मचा रखा था और अंग्रेज़ो के जहाजों को लूट लेते थे। सौराष्ट्र का तलाजा कोली समुंद्री लुटेरों का अड्डा बना हुआ था भावनगर रियासत और जूनागढ़ रियासत कोली लुटेरों से ज्यादा परेशान थी और लुटेरों को नियंत्रित करने में असफल थी। 1771 में भावनगर रियासत ने जूनागढ़ रियासत और अंग्रेज़ो के साथ हाथ मिलाया और तीनों की समुंद्री सेनाओं ने मिलकर कोली लुटेरों पर आक्रमण कर दिया जिसमें कोली लुटेरों की हार हुई और तलाजा भावनगर ने अपने कब्जे में ले लिया।[9][10]

1780 से लेकर 1790 तक राजापुर और जाफराबाद के कोली लुटेरों ने काफी आतंक मचाया था। कोली लुटेरे दमन और दीव, सूरत, बॉम्बे और वेस्टर्न भारतीय समुन्द्र पर जहाजों को लूट लेते थे और व्यापारियों के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुए थे।[11][12] 1792 में कोली लुटेरों ने खनबत की खाड़ी में अपना अड्डा बना लिया और व्यापारी जहाजों को लूट लेते थे। 8 फरवरी को व्यापारियों ने ब्रिटिश सरकार को सिकायत करी की कोली लुटेरों ने आतंक मचा रखा है और सुरक्षा होने की बाबजूद भी वो हम लूट लेते हैं। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने व्यापारी जहाजों की सुरक्षा और ज्यादा भड़ा दी। लेकिन कोली लुटेरों ने फिर भी व्यापारी जहाजों को लूट लिया जिसके बाद 6 अक्टूबर 1794 में ब्रिटिश सरकार ने सूरत से कप्तान ब्लैर, कैप्टन वेस्ट और मेजर लिटल के नेतृत्व में ब्रिटिश नेवी भेजी और 9 अक्टूबर को ब्रिटिश नेवी और कोली लुटेरों के बीच लड़ाई हुई जिसमें कोली लुटेरों ने ब्रिटिश कैप्टन वेस्ट को मार डाला और नेवी को हरा दिया। इसके बाद 13 अक्टूबर को फिर से लड़ाई हुई जिसमें कोली लूईट्रों के 10 बड़े लड़ाकू जहां और कई सारे छोटे जहाज तबाह कर दिए। यह जीत ब्रिटिश अफसरों के लिए बोहते बड़ी जीत थी और बलैर और लिटल को वीरता के लिए बधाइयां दी जा रही थी।[13]

बॉम्बे के राजपत्र में कठियावाड के सुलतानपुर के कोली लुटेरों का वर्णन भी मिलता है। सुल्तानपुर के कोली लुटेरों के वारे में ज्यादा कुछ तो नहीं लिखा गए लेकिन वो कितने खतरनाक थे इस बात का पता इससे लगाया जा सकता है की सुल्तानपुर के कोली समुंद्री लुटेरों को हराने के लिए तेघ वाखत खान, ब्रिटिश और जंजीरा के सिद्दी मुसलमानों ने आपस में हाथ मिला लिए थे और कोली लुटेरों पर आक्रमण कर दिया था।[14] जॉन व्हाले वॉटसन कहते हैं कि सुल्तानपुर के कोलियों को हराने के लिए भावनगर रियासत, जंजीरा के सिध्दि मुस्लिम, टैग भकत खान और ब्रिटिश सरकार एक हो गए थे।[9]

विद्रोह एवं लड़ाइयां[संपादित करें]

वीरांगना झलकारी बाई कोली, 1857 की क्रांति की महानायिका

जब गुजरात पर सुलतान जहांगीर का सासन आया तो सबसे पहले हथियार गुजरात की कोली जाती ने ही उठाए थे। कोली जाती के लोगो ने मुस्लिम गांव को लूटना सुरु कर दिया। कोली विद्रोह को दफन करने के लिए जहांगीर ने गुजरात सल्तनत के गवर्नर नुरुल्ला इब्राहिम को भेजा। गवर्नर नुरूल्ला इब्राहिम ने 1665 में इस फरमान को सुनते ही कोली जाती के जागीरदारों ने मोर्चा संभाला और मुगल सेना से भिड़ गए। इस लड़ाई में कोली जाती के 169 जागीरदारों मारे गए।[15][16]

इसके बाद 1694, 1721 और 1729 को मुसलमानों के खिलाफ कोली विद्रोह हुए था। गुजरात के कोली हमेशा से ही मुगल ताकत को चुनौती देते आए हैं। मोहम्मद मुबरिज खान को एक पश्तून काबिले का मुसलमान था उसको वडनगर का गवर्नर बना दिया गया और इसके बाद उष्णे कोलियों से खिलाफ संघर्ष किया लेकिन कोली जाती के लोगो ने उसे मार डाला इसके बाद ऐसा ही 1721 के हुआ गुजरात के पेठापुर के कोलियों ने हथियार उठाए और मुगल हुकूमत को चुनौती दी। इसके बाद खेड़ा के गवर्नर कासिम अली खान को कोलियो के खिलाफ भेजा गया और वो भी कोलियो के हाथों मारा गया। बिल्कुल ऐसा ही 1729 में भी हुआ, राधनपुर के कोलियों ने फिर से हथियार उठाए। राधनपुर रियासत का नवाब गुजरात सल्तनत में फौजदार था तो उसने कोली जाती को रोकना चाहा लेकिन गुजरात में बलोर के कॉलीयो के हाथों वो भी मारा गया।[17][18]

1761 में कोलियों ने गामाजी भांगरे और खेरोजी पाटीकर नाम के कोलियों के नेतृत्व में हैदराबद के मुस्लिम निज़ाम के खिलाप हथियार उठाये। गामाजी भांगरे महाराष्ट्र के महादेव कोली थे। गामाजी भांगरे गोत्र के कोलयों का सरदार था।[19] दोनों ने कोलियों को इकट्ठा किया और हैदराबद रियासत के निज़ाम के खिलाप जंग का एलान कर दिया। 1761 में कोलियों ने गामाजी और खेरोजी के नेतृत्व में ढाबा बोल दिया और ट्रिम्बक किले पर कब्जा कर लिया।[20] इसके बाद गामाजी और खेरोजी ने ट्रिम्बक किले को मराठा साम्राज्य में शामिल कर दिया।[21] जिसके वीरता के सम्मान में दोनों कोलियों को गांव दिए गए साथ ही पाटिल और देशमुख की उपाधि से भी नवाजा गया।[18]

19वी‌ सतावदी की शुरुआत में 1803 में गुजरात के खेड़ा जिले में कोली जाती ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ विद्रोह कर दिया था और कम्पनी ने भी कोली जाती को बदमाश जाती घोषित कर दिया। कोली जाती ने ईस्ट इंडिया कंपनी का कोई भी आदेश मानने से इंकार कर दिया और कम्पनी के आधीन गांव और कस्वों को लूटना सुरु कर दिया और ऐलान कर दिया की यह हमारा कर वसूलने का पैतृक तरीका है। 1808 में कोली जागीरदारों के नेतृत्व में कॉलीयों ने कम्पनी के आधीन धोलका सेहर को लूट लिया लेकिन एक कोली पकड़ा गया जिसका नाम बचुर खोकानी था लेकिन 20 फरवरी को कोलॉयो ने जेल को ही लूट दिया जिस जेल में बचूर खोकनी बंदी था। इसके बाद एक ब्रिटिश अधिकारी आर, होल्फॉर्ड ने स्थानीय सेना बनाने का प्रावधान दिया जिसके चलते काफी कोली पकड़े गए और उनको प्रिंस ऑफ वेल्स द्वीप पर भेज दिया लेकिन कुछ को गुजरात में ही रखा गया लेकिन गुजरात में बंदी बने हुए कोली को वाघी कोलियों के 500 के ग्रुप ने हमला कर दिया और कोली विद्रोही को छुड़ा लिया। इसके बाद कोली जाती ने फिर से कम्पनी आधीन क्षेत्रों में लूट पाट सुरु कर दी। कम्पनी ने बड़ौदा रियासत के गायकवाड़ महाराजा से मदद मांगी और महाराजा ने भी पूरा जोर लगा दिया लेकिन कोली नहीं रुके। 1824 में कम्पनी ने कोली जागीरदारों की जमीन हड़पने की योजना बनाई परंतु इससे कोली जागीरदारों और भी ज्यादा आक्रामक हो गए और अतांक मचा दिया। इसके बाद ब्रिटिश सेना और बड़ौदा रियासत की सेना ने मिलकर कोली जाती के कई गांव जला कर राख कर दिए और 1840 तक कोली खेतीबाड़ी में व्यस्त हो गए।[22]

1826 मे कोली जाती के एक संत ने अंग्रेज़ो के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। कोली संत का नाम गोविंद दास राम दास था वो कृष्ण और राम का भगत था। 17 मार्च को उसने कोली जाती के साथ ब्रिटिश के आधीन ठसरा और दकोर सेहरो पर हमला के दिया और कब्जा कर लिया और खुद को वहां का सासक घोषित कर दिया। कोली भगत ने 1826 से लेकर 1830 तक कोली जाती के साथ विद्रोह जारी रखा।[23][22]

1857 में, पेठ रियासत की कोली जाति के लोगों न अंग्रेजों के खिलाफ भयंकर विद्रोह किया। 6 दिसंबर 1857 को दो हज़ार बागी कोलीयो न पेठ के हरसोल नगर को लुट लिया। अंग्रेजों ने मामलातदार को हरसोल नगर की जांच पड़ताल के लिए भेजा लेकिन बागी कोलीयो ने मामलातदार को ही उठा लिया और बंदी बना लिया।इसके बाद कोली पेठ रियासत में और ज्यादा आतंकी हो गए। बागी कोलीयो ने Lieutenant Glasspool और उसके 30 साथीयों को घेरकर बोहत मारा। कोली विद्रोह को देखते हुए अंग्रेजों को पेठ रियासत के कोली राजा भार्गव राव पर सक हुआ और कचेहरी में बुलाया।[24][25] पता चला कि कोली विद्रोह की योजना राजा भार्गव राव और रानी के दिवान ने 6 हफते पहले ही बनाई थी। अंग्रेजों ने राजा और 15 साथीयों को राजद्रोही घोषित करके फांसी पर लटका दिया। इसके बाद बागी कोलीयो ने कचहरी पर हमला कर दिया और अंग्रेजी पुलिस वालों को मार डाला और हथियार लेकर खजाने पर हमला कर दिया। और फिर गांवों पर हमला कर दिया। इसके बाद कोली स्वर्गीय राजा के समारोह में गए और एक-एक करके अपना परिचय दिया। शाम को पता चला कि अंग्रेजों ने हार मानकर अंग्रेजी सेना वापस बुला ली है तो बागी कोलीयो न मामलातदार और अंग्रेजी पुलिस वालों को रिहा कर दिया। कुछ दिन बाद Lieutenant Glasspool फिर से अंग्रेजी सेना लेकर बागी कोलीयो के खिलाफ आया। लेकिन उसकी कोलीयो पर हमला करने की हिम्मत नहीं पड रही थी। इसी दोरान Captain Nuttal टरिंबक से सेना लेकर आया और Lieutenant Glasspool के साथ मिल गया। सेना काफी ताकतवर हो गई और बागी कोली पिछे हट गए । लेकिन कुछ दिन बाद बागी कोलीयो ने Lieutenant Glasspool और Captain Nuttal की फोज के साथ आमने-सामने की लड़ाई कर दी लेकिन हार गए और धर्मपुर रियासत में चले गए। धर्मपुर के राजा ने बागी कोलीयो को पकड़कर अंग्रेजों के हवाले कर दिया और अंग्रेजों ने सभी बागी कोलीयो को फांसी पर लटका दिया।[26][27]

केवल महाराष्ट्र ही नहीं गुजरात में भी विद्रोह किया था। यह विद्रोह किसी सिपाही विद्रोह की तरह तो नहीं था लेकिन कोली जागीरदारों ने इस विद्रोह में जान डाल रखी थी। माही कांठा और रेवा कांठह के कोली जागीरदारों ने विद्रोह कर दिया था। जिनमें अंबलियारा जागीर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साथ ही निहालचंद झावेरी, मगनलाल श्रॉफ , बापूजी गायकवाड़ और राजा भोंसले ने भी कोली विद्रोह को तेज किया था। इन्होंने 2000 कोली इकट्ठे किए और बड़ौदा प्र हमला की योजना बनाई लेकिन यह योजना कीजिए तरह बड़ौदा के महाराजा के पास पहुंच गई। इसके बाद ब्रिटिश सेना और बड़ौदा सेना ने मिलकर कोली विद्रोहियों प्र हमला कर दिया जिसमें काफी कोली मारे गए और कुछ को अंडमान द्वीप प्र भेज दिया गया। इसके बाद कोली जाती के दो गांव प्रतापपुर और अंघड को जला के रख कर दिया गया। इसके बाद फिर से कोली जागीरदारों ने बड़ौदा, इडर और ब्रिटिश के खिलाफ हथियार उठा विद्रोह कर दिया जिसके बाद फिर से कोलियों के दो और गांव जला दिए गए। कोली जागीरदारों ने फिर से कोली एक किए और बड़ौदा के गांधीनगर पर हमला कर दिया। इसी प्रकार कोली साबरमती नदी के आस पास 1858 तक लड़ते रहे।[28]

1879 में कोलियों ने कृष्णा साबले नाम के कोली के नेतृत्व में अंग्रेको के खिलाप लड़ाई लड़ी। नाइक कृष्णा साबले महाराष्ट्र के क्रांतिकारी थे।[29] उनका जन्म महाराष्ट्र के साबला गांव के एक कोली परिवार मे हुआ था।[30] बड़ा होने के बाद कृष्णा की शादी हुई और उनके घर एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम मारुति साबले रखा। नाइक कृष्णा साबले ब्रिटिश पुलिस में कार्यरत थे। लेकिन 1879 में नाइक कृष्णा साबले ने ब्रिटिश पुलिस की नौकरी छोड़कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हथियार उठा लिए और विद्रोह कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने नाइक कृष्णा साबले को बागी घोषित कर दिया। कृष्णा साबले के बेटे मारुति साबले ने भी अपने पिता के साथ विद्रोह किया। नाइक कृष्णा साबले के साथ बोहोत बड़ी संख्या में कोली सामिल हो गए। नाइक कृष्णा साबले ने ब्रिटिश जिला पूने पर आक्रमण कर दिया। नाइक कृष्णा साबले ने सात महीने तक लगातार हमले किए लेकिन ब्रिटिश सरकार असफल रही। नाइक कृष्णा ने 28 बार पूने पर बड़े हमले किए।[31] उन दिनों बासुदेव बलवंत फड़के कोलीयों के संरक्षण में थे। नाइक कृष्णा साबले बुड्ढे हो चुके थे लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ उनमें जोस पूरा पूरा था। जून में कृष्णा ने ब्रिटिश शहर भोर पर आक्रमण कर दिया और साथ ही ब्रिटिश हुकूमत में आने वाले कोंकण पर भी हमला बोल दिया। ब्रिटिश सरकार नाइक कृष्णा साबले के खिलाफ लगातार प्रयास कर रही थी लेकिन असफलता ही मिलती। अंत में ब्रिटिश सरकार ने मेजर वाइज के नेतृत्व में पुरंदर के ससबाड से अंग्रेजी सेना भेजी लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसी दौरान वसंत के मौसम में कोली नाइक कृष्णा साबले ने अपने हमले कम कर दिये। इसी दौरान एक और बागी कोली का नाम सामने आया जिसने अंग्रेज़ो की नाक में दम कर रखा था इसका नाम नाइक तात्या मकाजी था जो की रमोसीयों का नेतृत्व कर रहे थे।[32] नाइक तांत्या मकाजी भी कृष्णा साबले के साथ मिल गए। लेकिन 17 अक्टूबर 1879 को नाइक तांत्या मकाजी ने अपने एक रमोसी साथी को मार डाला क्योंकि वो रमोसी अंग्रेजों के साथ मिल गया था और विद्रोहियों की खबर अंग्रेजों तक पहुंचा रहा था जिसके कारण ब्रिटिश सरकार की विजय हुई मेजर वाइज (Major Wise) ने नाइक कृष्णा साबले के ठिकाने पर आक्रमण कर दिया और काफी कोलीयों को मौत के घाट उतार दिया और बाकी गिरफ्तार कर लिए। नाइक कृष्णा साबले और उनके बेटे मारुति साबले को भी गिरफ्तार कर लिया बाद में फांसी पर चढ़ा दिया।[33][34]

1879 में नाइक हरी मकाजी कोली ने सतारा के रामोसी (रमोसी) जाती के लोगों को इकट्ठा किया और विद्रोह कर दिया।[35][36] नाइक हरी मकाजी एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने ने 1879 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर हथियार उठा लिए थे। उनका जन्म कोली परिवार में हुआ था।[37] नाइक हरी मकाजी ने ब्रिटिश शासित पुणे पर लगातार हमले किए। इसके बाद नाइक हरी मकाजी ने बारामती में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग का एलान कर दिया और बारामती में भी लगातार लड़ाईयां लड़ी एवं हमले किए। ब्रिटिश सरकार पूरी तरह बोखला गई और नाइक हरी मकाजी के विद्रोह को रोकने के लिए अंग्रेजी सेना भेजी। इसके बाद नाइक हरी मकाजी पर ब्रिटिश सेना ने जोरदार हमला किया जिसमें दो रमोसी ब्रिटिश सेना के हाथ लग गये।[38] नाइक हरी मकाजी ने कुछ ब्रिटिश सेनीकों को मारा और निकल गए। इसके बाद नाइक हरी मकाजी ने मार्च में इंदापुर में विद्रोह किया लेकिन मार्च के मध्य में नाइक हरी मकाजी कोली को सोलापुर में ब्रिटिश सेना ने पकड़ लिया और फांसी पर लटका दिया। हरी मकाजी के बाद उनके भाई नाइक तांत्या मकाजी ने रामोसीयों का नेतृत्व किया।[39][40] नाइक तांत्या मकाजी कोली ने पुरंदर और सिंहगढ़ में आंदोलन किया।[41][42][43]

1798 में कोलियों ने वालोजी भांगरे नाम के कोली के नेतृत्व में पेशवा के खिलाप विद्रोह किया। वालोजी भांगरे महाराष्ट्र में देवगांव के पाटिल थे। उन्होंने 1798 में पेशवा के खिलाप विद्रोह किया था। वालोजी भांगरे क्रांतिकारी राघोजी भांगरे के दादाजी थे।[44] 1798 पेशवा ने राजुर का नया मनसबदार नियुक्त किया जिसे स्थानीय लोगो मे रॉस फैल गया था। वालोजी भांगरे ने अपने भाइयों के साथ मिलकर वर्तमान पेशवा के खिलाप विद्रोह का एलान कर दिया लेकिन पेशवा पर कोई असर नही हुआ। वालोजी भांगरे और कोलियों ने सबसे पहले कोंकण में विद्रोह किया और पेशवे सरकार को चुनोती दी।[45] वालोजी भांगरे के भाई गोविंदजी भांगरे को पेशवा ने कुरुंग किले पास फांसी दे दी। इसके बाद वालोजी भांगरे ने और कोलियों को इकट्ठा किया और पेशवा शासित क्षेत्रों में आतंक मचा दिया। इसके बाद पेशवा ने मराठा सेना भेजी और वालोजी भांगरे को बंदी बना कर तोफ के मुह में उड़ा दिया।[46][47]

1657 में कोलियों ने खैमी सरनाईक के नेतृत्व में मुग़लों के खिलाप बिद्रोह किया। खैमी सरनाईक महाराष्ट्र के कोलियों का सरनाईक था। खैमी सरनाईक ने सुल्तान औरंगज़ेब के खिलाप कोलियों को खड़ा किया और जंग का एलान कर दिया था। खैमी सरनाईक को खैनी नाइक के नाम से भी जाना जाता है।[48] जंग का मुख्य कारण था सुल्तान औरंगज़ेब द्वारा ज़मीन पर कर लगाना। जिससे परेसान होकर कोली ज़मीदारों ने खैमी सरनाईक के नेतृत्व में मुग़ल सुल्तान औरंगज़ेब के खिलाप हथियार उठा लिए थे। खैमी सरनाईक ने सभी कोली नायकों को इकठा किया और वादा किया कि वो एक ही वार में मुग़ल सासन से मुक्ति पा लेंगे।[49][50][51] सुल्तान ने भी जल्दी से पहाड़ी इलाकों से मुग़ल सेना भेजी लेकिन लड़ाई बोहत भयंकर थी जिसमे हज़ारों कोली मारे गए और मुग़ल सेना मारी गई। कोली विद्रोह ने औरंगज़ेब को हिला के रख दिया था। इस लड़ाई में लड़ते लड़ते खैमी सरनाईक सहीद हो गए लेकिन कोली विद्रोह इतना प्रचंड था कि औरंगज़ेब घबरा गया।[52] कोली विद्रोह को देखते हुए औरंगज़ेब ने खैमी सरनाईक के बीबी और बच्चों को मार डाला ताकि आगे चलके उसके बच्चे भी जंग ने छेड दें। उसके बाद औरंगज़ेब ने खैमी सरनाईक के रिश्तेदारों को भी ढूंढा और सर कलम कर दिए क्योंकि औरंगज़ेब को डर था कही उसके रिस्तेदारों में से कोई दुवारा ऐसी जंग ने छेड़ दे।[53] इसके बाद सुल्तान औरंगज़ेब हज़ारों कोलियों को बंदी बनाकर जुन्नर ले गया और सभी के सर कलम कर दिए। उनके ऊपर ही एक स्मारक बना दिया जिसे आज कोली चबूतरा बोला जाता हैं ।[54][55]

गुजरात मे कोलियों ने मनसा खांट नाम के कोली के नेतृत्व में मुसलमान सासन के खिलाप ढाबा बोला था। ठाकोर मनसा सिंहजी खांट गुजरात के खांट कोली थे। मनसा ने गुजरात मे मुग़लों के खिलाप विद्रोह कर दिया था।[56] जूनागढ़ रियासत का नवाब गुजरात सल्तनत में फौजदार था तो मनसा खांट ने जूनागढ़ रियासत में उत्पात मचा दिया था। मनसा खांट ने कोलियों को इकट्ठा किया और जंग का ऐलान कर दिया।मनसा खांट ने जूनागढ़ के नवाब से ऊपरकोट किला छीन लिया। इसके बाद जूनागढ़ रियासत में मुस्लिम बहुल गॉंवों में हिंदुओं का परचम लहराया। ग्यारह महीने तक जूनागढ़ के नवाब ने सभी तरह की कोसिस की लेकिन मनसा खांट को नही रोक पाए। जूनागढ़ सरकार ने नए नए नियम बनाये, नए तरीके सपनये लेकिन कुछ भी फायदा नही हुआ। जूनागढ़ के नवाब ने गोंडल रियासत के राजा ठाकुर हालोजी संग्रामजी जडेजा से मदद मांगी साथ ही अरब जमादार शेख अब्दुल्ला ज़ुबैदि से भी सेना मांगी। इसके बाद तीनों सेनाओं ने मिलकर ऊपरकोट किले पर हमला कर दिया और ठाकोर मनसा सिंहजी खांट को हरा दिया।[57]

सैन्य भागीदारी[संपादित करें]

महरवान श्रीमंत राजा सरखेल कान्होजी राजे आंग्रे, कोलाबा रियासत, आंग्रे राजवंश के संस्थापक एवं मराठा समुंद्री सेना के प्रधान सेनापति

डेक्कन कोली कोर 1857 में जनरल नट्टल द्वारा स्थापित एक अनियमित विशेष सेना बल था जिसे डेक्कन में कोली और भील जाती द्वारा कानूनहीनता और विकार को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था।[58][59] डेक्कन कोली कोर का मुख्यालय अहमदनगर और नाशिक था। यह ब्रिटिश भारतीय सेना के बॉम्बे आर्मी रेजिमेंट का हिस्सा थी।[60] कोली कोर की स्थापना का कारण स्वयं कोली थे। डेक्कन कोली कॉर्प्स की स्थापना होने पर कोली ब्रिटिश शासन के खिलाफ नहीं होंगे और क्षेत्र में अच्छी स्थिती बनाए रखेंगे। दूसरा कारण उनकी लड़ाई कौशल था। कोली पहाड़ी क्षेत्र और वन क्षेत्र में अच्छे लड़ाकू थे। कोली कोर के प्रमुख कोलीयों के बोमले कबीले के नाइक जिवाजी बोम्ला थे। उल्लेखनीय कोली लुटेरे और असरदार कोलीयों को डेक्कन कोली कोर के मुख्य अधिकारी के रूप में चुना गया था। कोली कोर में 600 कोली सिपाही थे।[61] मार्च 1861 में डेक्कन कोली कोर (डीकेसी) को तोड़ दिया गया था।[62] क्षेत्र में परेशानी खत्म होने वाली थी और नियमित सैनिकों को क्षेत्र से हटा दिया गया और उनकी जगह डेक्कन कोली कोर को तैनात किया गया क्योंकि डेक्कन कोली कोर नियमित स्थानीय कोर से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे।[63][64] डेक्कन कोली कोर बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन 1861 में डेक्कन कोली कोर के कुछ कोली सिपाही ब्रिटिश शासन के खिलाफ हो गए और विद्रोह कर दिया जिसके कारण कोली कोर को तोड दिया गया।

हथियार और पोशाक = बंदूक, काले चमड़े के लहजे, गहरे हरे रंग की मुड़ी हुई पगड़ी, गहरे हरे रंग का कपड़ा अंगरखा, डार्क ब्लड-रंगीन कमर के कपड़े के साथ उनके हथियार थे।[65][66]

महाराष्ट्र के इतिहास में कोली जाती ने अपना महत्वपूर्ण किरदार निभाया है। मराठा समुंद्री सेना खड़ी करने में कोली जाती का ही योगदान रहा है। महाराष्ट्र की कोली जाती लगभग सभी मराठा सासको के समुंद्री सेना में सेवानिवृत थी। मराठा समुंद्री सेना पर कोली जाती का ही कब्जा था मराठा समुंद्री सेना का सेनापति एक महादेव कोली था जिसका नाम कानहोजी आंग्रे था।[67] कोली जाती का महत्व इससे ही पता चलता है कि जंजीरा द्वीप पर चढ़ाई करने के लिए छत्रपति शिवाजी राजे भोंसले ने एक सोन कोली को बुलाया था जिसका नाम लय पाटिल था। कोली पाटिल ने तो जंजीरा द्वीप पर चढ़ाई कर दी थी लेकिन मराठा साम्राज्य का प्रधान मंत्री मोरोपंत पिंगल पेशवा अपनी मराठा सेना लाने में विफल हो गया जिसके कारण मराठा जंजीरा द्वीप जितने में असमर्थ रहे लेकिन शिवाजी महाराज ने कोली पाटिल के सम्मान में एक समुंद्री लड़ाकू जहाज तैयार किया जिसका नाम पालखी रखा और कोली पाटिल को सर पाटिल की उपाधि से सम्मानित किया।[68]

जिस प्रकार महाराष्ट्र की कोली जाती ने मराठा समुंद्री सेना पर कब्जा किया हुआ था उसी प्रकार अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में साही भारतीय समुंद्री सेना जिसे बॉम्बे नेवी और ब्रिटिश नेवी भी बोला जाता है पर काफी बड़ी मात्रा में कर्यत थे। केवल बॉम्बे नेवी ही नहीं बल्कि पुर्तगाली समुंद्री सेना को भी महाराष्ट्र की कोली जाती ने ही संभाल रखा था। पुर्तगाली समुंद्री सेना में कोली किस तरह सम्मानित थे इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की पुर्तगाली राजा ने कोली जाती की पसंद के अनुसार दो बड़े लड़ाकू जहाज बनाए थे जिसके कारण पुर्तगाली राजा पर कर्ज चढ़ गया था लेकिन पुर्तगाली राजा ने इस सब के बाबजूद समुंद्री जहाज बनाए क्युकी कोली जतिंके लोग युद्ध के समय अपने खुदके छोटे जहाजों कि लेकर भी लड़ते थे।[69]

कोली जाती का मराठा थल सेना में भी वोहत बड़ा योगदान रहा है। राजगढ़, टोर्णा, पुरंदर और सिंहगड के पारम्परिक सूबेदार सिर्फ कोली जाती से ही रहे हैं जो सरदार और नायक की उपाधि से सम्मानित थे। मराठा सेना के प्रधान सेनापति ऎसाजी कंक थे जो महादेव कोली थे और साथ ही तानाजी मालुसरे भी महादेव कोली थे जो मराठा सेना में सेनापति थे जिन्होंने सिंहगड की लड़ाई जीती थी। और उनके भाई सुर्याजी मालुसरे और ताणाजी के मामा कोंडाजि रामजी शेलार भी मराठा सेना में सूबेदार थे।[70][19][68]

एक तरह से देखा जाए तो समुंद्री सेनाओं पर कोली जाती का ही कब्जा था क्युकी मराठा समुंद्री सेना का प्रधान सेनापति कन्होजि आंग्रे थे जो महादेव कोली थे साथ ही औरंगज़ेब के समय में मुगल समुंद्री सेना का सेनापति भी कोली था जिसका नाम काशिम याकुत्त खान था। कशिम याकुत खान एक महादेव कोली परिवार से थे जो महाराष्ट्र के गुहागर सहर के पाटिल थे। लेकिन बाद में याकूत्त खान मुस्लिम बन गया। मुगल समुंद्री सेना में सिर्फ याकूत खान ही इकलौते सेनापति थे जिन्होंने अंग्रेज़ो का ब्यौरा हाल किया हुआ था।[71] इतना ही नहीं अहमदनगर सल्तनत की समुंद्री सेना का सेनापति भी एक कोली था जिसका नाम राम राव पाटिल था जिसने जंजीरा द्वीप को तैयार किया था यानिकी बनाए था राम राव पाटिल जंजीरा द्वीप का कोली राजा था।[72][73]

महाराष्ट्र के कोली बीजापुर सल्तनत, अहमदनगर सल्तनत और बहमनी सल्तनत के भी दम रखते थे। कोली जाती के लोग सरदार और मंसब्दार जैसी पदों पर थे और किलों के सूबेदार भी थे।[74][18]

कोली जाती की महिलाएं भी ऐसा ही इतिहास संजोए हुए हैं। झांसी रियासत की सैन्य टुकड़ी जिसका नाम दुर्गा दल था कि सेना भी कोली जाती की महिला झलकारी बाई थी जिसने 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।[75]

राजपाट[संपादित करें]

माहारानी परियमवंदे राजे मुकणे, जव्हार रियासत की कोली महारानी
  • ठाकोर धन मेर, धाधूंका के कोली राजा थे।[76][77] इन्हें धंधलजी खांट भी कहा जाता है। ये कोली राजा ठाकोर सोनंग मेर के दुसरे नंबर के बेटे थे। ठाकोर सोनंग मेर सिंद से गुजरात आये थे और वो ही खांट राजवंश के संस्थापक थे।[78][79] ठाकोर धन मेर ने इभल वालो नाम के राजपूत राजा को मारा क्योंकि इभल वालो ने पंडितों का जीना हराम कर दिया था।[76][78] इभल वालो ने पंडितों को मारना सुरू कर दिया जिसके कारण पंडितों ने इभल वाला के राज्य को छोड़ दिया और अपनी जान बचाकर ठाकोर के राज्य में चले गए। इसके बाद यह बात ठाकोर धन मेर को पता चली की वाला के इभल वालो पंडितों को मार रहा है जिसके कारण पंडित धाधूका मे आकर बस रहें हैं। तो ठाकोर ने प्रण लिया की इभल वाला का कहर खतम करुंगा। इसके बाद ठाकोर धन मेर ने अपनी 5000 सैनिकों की सैना के साथ इभल वालो पर आक्रमण कर दिया और उसे मार दिया। इभल वालो को हराने के बाद ठाकोर ने वाला राज्य को अपने राज्य में शामिल कर लिया और पंडित सरनार्थीयों को धांधूका में बसाया।[80][81]
  • जव्हार रियासत का मुकने राजवंश, मुकने राजवंश की स्थापना चौदहवीं सताब्दी के मध्य में पौपेरा नाम के एक महादेव कोली ने की थी जिसके वंसजो ने 1947 तक राज किया और वो महाराजा की उपाधि से सम्मानित थे।[82][83][84]
  • सरगना रियासत, इस रियासत पर भी पवार वंश के महादेव कोलियों का ही राजा था जिन्होंने 1947 तक राज किया।[85][86][87][88][89]
  • सोर्ड राजवंश, गुजरात के कोलियों का राजवंश था जिसने जिसने गुजरात मे ईडर रियासत पर तकरिवान 200 साल तक राज किया था।[90][91] इस राजवंश की स्थापना कोली ठाकोर हाथी सोर्ड ने की थी।[92][93] सोर्ड राजवंश की स्थापना हाथी सोर्ड नाम के एक कोली ने की थी। हाथी सोर्ड ईडर रियासत में कुछ गांव के जागीरदार, यानी कि ठाकोर थे। उस समय ईडर पर अमरसिंह परमार का राज था लेकिन वो एक लड़ाई में मारा गया उसके बाद ईडर पर ठाकोर हाथी सोर्ड ने काबू कर लिया और ईडर में कोली राज की स्थापना की। महाराजा हाथी सोर्ड ने मृत्यु तक शांतिपूर्ण राज किया।[94][95][96] सोर्ड राजवंश का अंत तेरहवी शताब्दी के अंत मे हुआ था। उस समय ईडर पर कोली महाराजा शामालिया सोर्ड का राज था। महाराजा शामालिया सोर्ड ने एक नागर ब्राह्मण को अपनी रियासत की सेना का सेनापति बना दिया जो सोर्ड राजवंश के अंत चाहता था। सेनापति राठौर राजपूतों के साथ मिल गया और महाराजा शामालिया सोर्ड के खिलाप सडयंत्र रचने लगा। लेकिन राठौर राजपूतों की हिम्मत नही हुई। लेकिन सेनापति चुप नही बैठा और कुछ समय पश्चात सेनापति ने योजना बनाई की वो महाराजा शामालिया सोर्ड को अपने घर डाबत पर बुलायेगा और फिर राठौर राजपूत चुपके से आक्रमण कर देंगे। सब कुछ योजना अनुसार हुआ लेकिन फिर भी राजपूतो की हिम्मत नही हुई तो नागर ब्राह्मण ने महाराजा शामालिया सोर्ड और उनके साथियों को शराब पिलाई और जश्न बनाया। जब महाराज और उनके साथी शराब के नशे में चूर हो गए तो छुपे हुए राजपूतो ने आक्रमण कर दिया और ईडर रियासत पर कब्जा कर लिया और सोर्ड राजवंश का अंत हुआ।[97][98]
  • खांट राजवंश, इस राजवंश की स्थापना कोली राजा °सोनांग मेर ने की थी । इस राजवंश ने धांधूक, धंदालपुर, बिलखा चिबीसी, महियारी और पेटलाद पर राज किया था।[99][100][101]
  • नाग नाइक, सिंहगड किले का कोली राजा था। नाग नाइक महादेव कोली थे। 1340 ईसा पश्चात दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलुक़ ने सिंहगड किले पर आक्रमण कर दिया था लेकिन सुल्तान कोली राजा नाग नाइक को हरा नही पाया क्योंकि नाग नाइक ने सिंहगड की किलेबन्दी बहुत ही अच्छी तरीके से की हुई थी। नाग नाइक कभी भी किसी के सामने नही झुका था। मुग़ल सेना भी नाग नाइक के किले को भेद नही पायी। सुल्तान और नाइक के बीच आठ महीने तक संघर्ष चला। दिल्ली के सुल्तान ने सिंहगड किले लो आठ महीने तक घेर के रखा और किले में खाने की कमी के कारण सुल्तान नाग नाइक को हराने में कामयाब हुआ।[102][103][104]
  • राजा शोम शाह, ये रामनगर के रराज ठगे और पुर्तगालियों से कर वसूलते थे। लेकिन ये शिवजी द्वारा हरा दिए गए।[105][106][107]

उपजाति[संपादित करें]

  1. ठाकोर गुजरात के क्षत्रिय कोलियों की उपजाति है।[76][108][109] इनका मुख्य कार्य खेती करना है।[78] ठाकोर कोलियों में कई गोत्र पाए जाते हैं जिनमे से कुछ इस तरह हैं। परमार, गुहिलोत, राठौड़, मकवाना, झाला, जेठवा, चूड़ासमा, चौहान, सोलंकी, डाभी, बारिया, सरवैया, , वाघेला इतियादी।[76][78] ठाकोर कोलियों ने गुजरात मे कई छोटी छोटी रियासतों पर राज किया था। जैसे कि: लिखी जागीर, गाबत जागीर,[110] घोडासर जागीर, अमलियारा जागीर, ईलोल जागीर, कटोसन जागीर, सथाम्बा जागीर।[111]
  2. महादेव महाराष्ट्र में पाए जाने वाली कोली जाती की उपजाति है।[112] महादेव कोलियों को डोंगर कोली और राज कोली के नाम से भी जाना जाता है। इन्हें डोंगर कोली इसलिए बोला जाता है क्योंकि ये पुराने समय से ही पहाड़ी इलाकों में रहते हैं और राज कोली इसलिए बोला जाता है क्योंकि जव्हार रियासत के मुकने राजवंश के महाराजा इसी जाती के थे। महादेव कोली अपने आप को रामायण के आदिकवि वाल्मीकि का वंसज मानते हैं।[76] महादेव कोलियों का मुख्य कार्य खेतीवाड़ी हैं और कुछ पढ़े लिखे महादेव कोली सरकारी और प्राइवेट नोकरियाँ करते हैं। महाराष्ट्र सरकार ने महादेव कोलियों को अनुसूचीत जनजाति की श्रेणी में रखा है जिसके तहत महादेव कोली अनुसूचित जनजाति के कोटे में सरकार नोकरी करते हैं।[78] अंग्रेजी सरकार द्वारा महादेव कोली जाती को खूनी जाती घोसित कर दिया गया था।[113] पुराने समय मे महादेव कोली किलेदार थे। मुख्य तौर पर कोली लूट मार करके जिया करते थे।[114] सन 1657 में महादेव कोलियों ने खैमी सरनाईक के नेतृत्व में मुग़ल सुल्तान औरंगज़ेब के खिलाप विद्रोह किया था। खैमी सरनाईक ने सभी कोलियों को वक किया और मुग़ल हुकूमत को हिला रखने का वादा किया। मुग़ल सेना पहाड़ी इलाकों से आई और आक्रमण किया। मुग़ल सुल्तान ने खैमी सरनाईक के पूरे परिवार को मार डाला साथ ही उसके रिस्तेदारो को भी मर डाला। हज़ारों महादेव कोलियो को बंदी बनाकर जुन्नर ले गया और सिर कलम कर दिया और उनके ऊपर कोली चबूतरा बना दिया।[114] ऐसा ही 1741-42 में हुआ। महादेव कोली कुरंग किले पर राज करते थे लेकिन 1741 में पेशवा बालाजी बाजीराव ने कोलियों से कुरंग किला छीनना चाहा जिसके चलते पेशवा और महादेव कोकियों के बीच जंग छिड़ी और कोलियों का नरसंघार किया गया। इसी के इसी वर्ष पेक्सहवा ने वदावली गांव पर भी हमला कर दिया जो कि महादेव कोलियों के राज में था इसे भी छीन लिया और प्रचंड विद्रोह हुआ।[114] 1750-51 में पेशवा ने महादेव कोलियों के चौदह प्रान्त छीन लिए साथ ही किले भी जिसके दौरान पेशवा और महादेव कोलियों के बीच संगर्ष हुआ और कोलियों ने वीरगति प्राप्त की। 1760 से लेकर 1799 तक पेशव इसी तरह महादेव कोलियों से किले छिनता रहा जिसके कारण लूट मार, चोरी डकैती, और बाकी सभी आपराधिक गतिविधियां करने लगे।[114] 1761 में भांगरे और पाटीकर गोत्र के कोलियों ने हैदराबद के निज़ाम के खिलाप विन्द्रोह कर दिया था और निज़ाम से ट्रिम्बक किला छीन लिया।[114] 1818 में अंग्रेजों ने मराठों को हर दिया उसके बाद 1830 तक महादेव कोली विद्रोह करते रहे। इसके बाद राघोजी भांगरे नाम के एक क्रांतिकारी महादेव कोली ने विद्रोह कर दिया। जिसको 1848 में अंग्रेजो ने फ़सनसी पर चढ़ा दिया।[114] महादेव कोली जाती में कई गोत्र पाए जाते हैं जिनमें से कुछ जाने माने गोत्र इस प्रकार हैं:[76][115], अघासी, भागिवन्त,चव्हाण, भोंसले, बुद्धिवंत, दाजीई, दलवी, गायकवाड़, गावली, जगताप, कदम, केदार, खरड़, ख़िरसागर, नामदेव, पवार, पोलेवास, सागर, सेष शिवा, सलिखि, सूर्यवंशी, उटेरेचा
  3. चुुुवालिया कोली जाती की उपजाति है। चुवालिया कोली गुजरात मे पाए जाते हैं। चुवालिया कोलियों ने तीन पड़ाव पार किये हैं, पहला, चुवालिया कोली जासूसी का काम करते थे ये अपराधी के पैरों के सहारे अपराधी का पता लगा लेते थे इसलिए इन्हें पगी कोली भी कहा जाता है, दूसरा, चुवालिया कोली लूट पाट करए थे जिसके कारण अंग्रेजों ने इनको खूनी जाती घोसित कर दिया था और ये अब ज़मीदारी पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं फिलहाल के समय ये सभी ज़मीदार हैं।[76] चुनवलिया कोली गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के सभी जिलों में रहते हैं और सुरेंद्रनगर जिले के सभी गांव और शहरों में वास करते हैं। चुवालिया कोलियों में कई गोत्र पाए जाते हैं जैसे कि परमार, मकवाना, चौहान, झाला, राठौड़, करमिया और गरचमिया इत्यादि।
  4. पटेल गुजरात की कोली जाती का उपनाम है। ये सभी ज़मीदार होते हैं और खासकर दक्षिण गुजरात एवं दमन और दीव में पाए जाते हैं।[116][117] गुजरात के सभी कोली पटेल अपने आप को गौतम बुद्ध का वंसज मानते हैं।[118] ब्रिटिश शासन की सुरुआत में कोली पटेलों को अंग्रेजों द्वारा खूनी जाती घोसित कर दिया गया था। अंग्रेजी इतिहास्कार Rosa Maria Perez ने लिखा है कि कोली पटेल लूट मार के लिए बोहोत ज्यादा बदनाम जाती थी।[76] कोली पटेलों को मान्धाता पटेल के नाम से भी जाना जाता था।[119] कोली पटेलों में ये गोत्र ज्यादा पाए जाते हैं।[76] चौहान, राठौड़, मकवाना
  5. कोतवाल गुजरात के तलपड़ा कोलियों की उपाधि है। उन्होंने गुजरात मे गांव एवं किले के कोतवाल के तौर पर सेवा की थी। जिसके लिए उन्हें कोतवाल की उपाधि से नवाजा गया था। ये ज्यादातर गुजरात कर माही कांठा में पाए जाते हैं।[120][121]
  6. बारिया गुजरात में पाए जाने वाली कोली जाती की उपजाति है।[3][122] इन्होंने अपना नाम गुजरात के देवगढ़ बारिया सहर से लिया है।[123] जो 1782 तक सिर्फ बारिया नाम से जाना जाता था। बारिया कोली गुजरात के तलपडा कोली की ही एक शाखा है।[124] इनका मुख्य कार्य खेती बाड़ी है।[76][125] बारिया कोलियों का इतिहास समुंद्री लूटेरों के रूप में भी रहा है। बारिया कोलियों ने वाजा राजपूतो से तलाजा छीन लिया था। बारिया कोली काफी साहसी समुंद्री लूटेरे थे। उन्होंने ब्रिटिश जहाजों को भी लूट लिया था। जिसको देखते हुए 1771 में ब्रिटिश समुंद्री सेना और भावनगर रियासत की समुंद्री सेना ने कोली समुंद्री लूटेरों पर आक्रमण कर दिया। कोली और सेनाओ के बीच लड़ाई हुई जिसमें कोली हार गए थे।[126][127][128] बारिया कोलियों में कई गोत्र पाए जाते हैं जिनमे से कुछ इस तरह हैं। बारिया, पटेल, पगी, डामोर, खांट, परमार, चौहान, पंडोर, रंगड़ा और मालिवाड़।[76] बारिया कोली गुजरात मे नरुकोट रियासत पर राज करते थे।[129] बारिया कोलियों ने गुजरात मे सथाम्बा रियासत पर भी 1948 तक राज किया था। यह रियासत माही कांथा एजेंसी में आती थी।[130]
  7. खांट गुजरात में पाई जाने वाली कोली जाती की उपजाति है।[131][132][133] खांट कोली राजा धन मेर ने धांधूक और धंदालपुर कि स्थापना की और पेटलाद की स्थापना भी खांट कोली ने ही कि थी।[134] गुजरात के खांट कोलियों ने गुजरात मे अमलियारा रियासत पर 1948 तक राज किया।[135] गुजरात के खांट कोलियों ने गुजरात मे धांधूक, धंदालपुर, पेटलाद, महियारी की स्थापना की और राज किया। साथ ही बिलखा चोवीसी पर भी राज किया।[136] खांट कोलियों ने गुजरात मे संत रियासत की पुनर्स्थापना की थी। संत रियासत (गुजरात) पर परमार राजपूतों का सासन था। लेकिन 1753 में संत रियासत के राजा रत्न सिंह की मृत्यु हो गई और इसी का फायदा उठाते हुए बांसवाड़ा रियासत के महारावल पृथ्वी सिंह ने संत रियासत पर आक्रमण कर दिया और संत रियासत के 3 राजकुमारों को मार डाला लेकिन चौथा राजकुमार बदन सिंह को मालवा क्षेत्र के खांट कोलीयों ने छुपा लिया राजकुमार बदन सिंह उस समय एक शिशु ही था। बांसवाड़ा रियासत के महारावल पृथ्वी सिंह सिसोदिया ने संत रियासत पर कब्जा कर लिया और अपनी सेना तैनात कर दी। संत रियासत के राजकुमार बदन सिंह को मालवा के एक खांट कोली ने पाल पोस कर बड़ा किया। कुछ सालों बाद जब राजकुमार बदन सिंह बड़ा हुआ तो मालवा के कोलीयों ने महारावल पृथ्वी सिंह सिसोदिया की सेना पर आक्रमण कर दिया। महारावल की सेना और मालवा क्षेत्र के कोलीयों के बीच युद्ध हुआ और कोली जाती ने बांसवाड़ा के महारावल पृथ्वी सिंह सिसोदिया को युद्ध में हरा दिया और संत रियासत को अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद संत रियासत के राजकुमार बदन सिंह को बुलाया गया और राणा बदन सिंह परमार का राज्य अभिषेक किया।[137][138]
  8. घेडिया कोली जाती की उपजाति है जो भारत के गुजरात राज्य में पाई जाती है।[139] इन्होंने यह नाम सौराष्ट्र के घेड़ विस्तार से लिया है। अब इन्होंने चुवालिया कोली के साथ वैवाहिक सम्बंद बनाने सुरु कर दिए हैं। घेडिया कोली सूर्यवंशी होते हैं और भगवान मान्धाता के वंसज हैं। इनका मुख्य कार्य खेती बाड़ी है।[76]
  9. धराला गुजरात के कोलियों का उपनाम है।[140] धराला उन कोलियों को बोला जाता था जो तलवारबाजी में बोहत ज्यादा माहिर थे। ये खासकर तलपडे कोली होते थे।[141][142] गुजरात के खेड़ा जिले पर कब्जा करने के लिए 1803 में ब्रिटीश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोलियों के ऊपर Disarming Act लगाया जिसके तहत कोली अपने पास हथियार नही रख सकते थे। लेकिन कोली जाती ने इस एक्ट का पुरजोर विरोद किया और मरने मारने पर उतारू हो गए। इसके बाद अंग्रेजों ने कोली जाती को खूनी जाती घोसित कर दिया।[76][143] लेकिन कोली मुखियाओं (कोली ठाकोर, कोली पटेल) ने कचेरी में अर्जी लगाई की ब्रिटिश सरकार का कोलियों पर कोई अधिकार नही है ये सब बन्द किया जाए लेकिन कुछ नही हुआ। इसके बाद कोली ज़मीदारों ने ब्रिटिश शासित शहरों और गांव में लूट मार सूरु कर दी। ब्रिटिश सरकार ने कोलियों को चेतबनी दी लेकिन कोलियों ने ब्रिटिश सरकार को नकारते हुए बोला की ये हमारा खानदानी अधिकार है हम चाहे कुछ भी करें यह हमारा कर बसूलने का तरीका है और लंबे समय तक कोली इसी तरह ब्रिटिश सरकार की नसबन्दी करते रहे।[76][144] 1808 में कोली और ज्यादा प्रचंड हो गए और अंग्रेजी चमचो और अंग्रेजों को जान से मारने लगे और उनके हथियारों को इखट्टा कर लेते थे। फरबरी 1808 में कंपनी ने ब्रिटिश सेना भेजी और कुछ कोलियों को बंदी बना जेल में बंद कर दिया। लेकिन अंधेरा होते होते कोली विद्रोहियों ने जेल पर ही आक्रमण कर दिया। जेल के सभी सिपाही और कर्मचारियों को मार डाला हथियार लूटे और जेल को तहस नहस करके कोलियों को छुड़ा लिया। 1810 में अंग्रेजों ने कोली के खिलाप आर्मी बनाई और बड़े पैमाने पर कोलियों को बंदी बना लिया गया और प्रिंस ऑफ वेल्स द्विप पर ले जाया गया और कुछ कोलियों को खेड़ा जेल में रखा गया। इसके बाद 500 कोलियों ने मिलकर खेड़ा जेल पर आक्रमण कर दिया और तगड़ा ही उत्पात मचा दिया सभी कोली आजाद कर लिए। लेकिन जिन कोलियों को प्रिंस ऑफ वेल्स दबिप ले जाया गया उनको नही बचा पाए। इसके बाद कोली और भी ज्यादा खूंखार हो गए। अंग्रेजों ने अपनी सेना की मात्रा बड़ाई लेकिन कुछ नही हुआ तो अंग्रेजों ने वडोदरा रियासत से मदद मांगी क्योंकि उनके पास स्थानीय जानकारी सही तरीके से थी और वडोदरा रियासत ने अपनी सेना बड़ी मात्रा में भेजी ताकि अंग्रेजों के साथ उनके रिसते और मजबूत हों। लेकिन कोलियों ने अंग्रेजी सेना और वडोदरा सेना दोनो को ही मात दे दी।[76] इसके बाद अहमदाबाद के ब्रिटिश कलेक्टर ने सुझाब दिए कि उनको सिर्फ कोली मुखियाओं पर ही हमला करना चाहिए और ये सुझाब काम आया। लेकिन इससे सिर्फ कुछ ही कोलियों पर काबू कर पाए थे कोली 1840 तक इसी तरह लड़ते रहे। 1840 के बाद अंग्रेजों को थोड़ा आराम मिला क्योंकि अब कोली ज़मीदारी पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे लेकिन 1857 में फिर से महाराष्ट्र और गुजरात के गांव गांव और सहर सहर में कोलियों ने अंग्रेजों के खिलाप हथियार उठा लिए थे।[76][145]
  10. सोन कोली महाराष्ट्र के कोली जाती की एक उपजाति है। केोलियों ने अपना नाम सोने से लिया है। सोन कोली मत्स्य उध्योग से जुड़े हुए हैं लेकिन कुछ सोन कोली जमीदार हैं। सोन कोली मर्द और औरतों के लिए अलग अलग कई प्रकार के डांस के लिए भी प्रसिद्ध है।[146] कुछ सोन कोली भारत में पुर्तगाली सासन के दौरान ईसाई धर्म को मानने लगे को आज भी मुख्यतार मुंबई में पाए जाते हैं।[147] सोन कोली बोहट अच्छे तैराक थे और उन्होंने पुर्तगाली समुंद्री सेना, मराठा समुंद्री सेना और ब्रिटिश भारतीय समुंद्री सेना में काफी बड़ी संख्या में काम किया था। लई पाटिल जो कि मराठा सेना में सेनापति था जाती से सोन कोली था।[148]
  11. तलपड़ा गुजरात की कोली जाती की उपजाति है। ये खासकर जमींदार होते हैं और सरकारी महकमे में कार्यत हैं। गुजरात सरकार द्वारा तलपदा कोली को अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा गया है।[149][150] कुछ तलपादा कोलियों को बारिया कोली भी कहा जाता है क्युकी कुछ तल्पदा कोली देवगढ़ बारिया में रहने चले गए थे और अपने आप को बारिया कोली कहने लगे थे।[151] गुजरात के तलपड़ा कोली न्यूजीलैंड और फिजी देश में भी पाए जाते हैं।[152]
  12. पाटणवाढीया गुजरात की कोली जाती की एक उपजाति है।[153] पटनवाडिया कोली को बारिया कोली, ध्राला कोली और ठाकोर कोली भी बोला जाता है। इन कोलियों ने अपना नाम गुजरात के मेहसाणा जिले के पाटन सहर से लिया है। पतानवाडिया कोली खासकर गुजरात के मेहसाणा, सूरत, खेड़ा, वडोदरा और भरूच जिले में पाए जाते हैं। ये गुजराती भाषा बोलते हैं और गुजरात सरकार ने इनको भी अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा हुआ है।[154] पतनवाडिया कोलियो में कई गोत्र भी पाए जाते हैं जो इस प्रकार हैं: सोलंकी, झाला, चावड़ा, गोहिल, परमार, चौहान, वाघेला और राठौड़। पातनवाडिया कोली मुख्यतर खेतीबाड़ी करते हैं और धर्म से हिन्दू हैं।[154]
  13. महावर और माहौर कोली जाती की एक उपजाति है जो हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पाई जाती है। माहवार कोली शाक्य कोलियों में सादी रचा लेते हैं और अपने आप को प्राचीन क्षत्रीय का वंशज मानते हैं। इन्होंने अपना नाम कोली महाराजा मावर देव से लिया है जिन्होंने राजस्थान पर राज किया था।[155]
  14. टोकरे कोली कोली जाती की उपजाति है को मुख्यत महाराष्ट्र और कर्नाटक में पाई जाती हैं । महाराष्ट्र ज्ञानकोष के अनुसार टोकरे कोली मुख्यत लूट पाट किया करते थे। इनमे कई प्रकार के गोत्र पाए जाते हैं। जैसे की अंबेकर, अर्डे, भोया, चौधरी, गायकवाड़, गवित, पवार, जाधव, पोलकर और तलवार[156][157][158][159][18]
  15. सुच्चा कोली कोली की उपजाति है जो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पाई जाती हैं। यह हिमाचल के सभी कोलिय में से सबसे ऊंची उपजाति मनी जाती है। सूचा एक हिमाचली सब्द है जिसका मतलब पवित्र होता है। इनका मुख्य कार्य कृषि है लेकिन नई जमात सरकारी कर्मचारी है।[160][161]

गोत्र[संपादित करें]

जेम्स टॉड के अनुसार भारत के छत्तीस साही गोत्र
  • आंग्रे महाराष्ट्र की कोली जाती का गोत्र है। आंग्रे गोत्र के कोलियो ने कोलाबा रियासत प्र राज किया था और मराठा साम्राज्य में भी सेवा की थी।[162]
  • बाबरिया गुजरात के कोलियों का गोत्र है। इनको बावलिया भी बोला जाता है। बाबरिया कोलियों की बजह से ही गुजरात के बाबरियाबाढ़ का नाम पड़ा।[163][164] बाबरिया कोली लूट पाट के लिए ज्यादा बदनाम थे जब भी वो कहीं पर भी डांका डालने के लिए इकठा होते थे तो वो बोलते थे कि हम वहां धांग करेंगे यानी कि कोली की लूट को धांग बोला जाता था।[165]
  • मकवाना गुजरात में रहने वाली कोली जाती का गोत्र है।[166] यह गोत्र कोली पटेल और तलपडा कोली में पाया जाता है। कुछ मकवाना कोलियों ने मुस्लिम धर्म अपना लिया था वो मुस्लिम जमींदार हैं।[167][168][7] मकवाना कोलियों ने कई छोटी छोटी रियासतों पर राज किया था जैसे कि देधरोता रियासत, ईलोल रियासत, कड़ोली रियासत, पालेज रियासत, प्रेमपुर रियासत, वक्तापुर रियासत,कटोसन रियासत, डाभा रियासत, पूनादरा रियासत, खडल रियासत, रमास रियासत, डेरोल रियासत, हापा रियासत।[169][170][171] सभी कोली राजाओं ने ठाकोर की उपाधि धारण की हुई थी।[172]
  • चिवहे महाराष्ट्र के कोलियों का गोत्र है। जो की खासकर ज़मीदार थे और मराठा साम्राज्य में किलेदार थे जो नाइक और सरनाईक की उपाधियों से सम्मानित थे। चिवहे गोत्र के कोलियों ने छत्रपति राजाराम राजे भोंसले के कहने पर मुग़लों से पुरंदर किला छीन लिया था। पुरंदर किले और सिंहगड किले पर चिवहे कोलियों की ही सरदारी रही है। ईसू चिवहे नाम के कोली को पुरंदर के सरनाईक की उपाधि से नवाजा गया और उसे 6030 बीघा जमीन भी दी गई थी।[76] 1763 में पेशवा ने आभा पुरंदरे को सरनाईक बना दिया था जिसके कारण चिवहे कोलियों ने पेशवा के खिलाप विद्रोह कर दिया और पुरंदर एवं सिंहगढ़ किले पर कब्जा कर लिया था। कोलियों को आभा पुरंदरे पसंद नही आया तो आभा ने कोलियों को किलेदारी से हटा दिया और नए किलेदार तैनात कर दिए थे जिसके कारण कोलियों ने 7 मई 1764 में किलों पर आक्रमण कर दिया और अपने कब्जे में ले लिया। पांच दिन बाद रुद्रमल किले को भी कब्जे में ले लिया और मराठा साम्राज्य के प्रधान मंत्री पेशवा रघुनाथराव को चुनोती पेश की। कुछ दिन बाद पेशवा पुरंदर किले के अंदर देवता की पूजा करने के लिए किले में आया लेकिन पेशवा कोलियों में हथथे चढ़ गया। कोलियों ने पेशवा का सारा सामान और हथियार लूट लिए और उसको बन्दी बना लिया लेकिन कुछ समय बाद छोड़ दिया। इसके बाद कोलियों ने आस पास के छेत्र से कर बसूलना सुरु कर दिया। इसके बाद कोलियों के सरनाईक कोंडाजी चिवहे ने पेशवा के पास पत्र भेजा जिसमे लिखा हुआ था 'और जनाब क्या हाल चाल है,सरकार कैसी चल रही है मज़े में हो'। यह पत्र पढ़कर पेशवा कुछ ज्यादा ही अपमानित महसूस करने लगा और बौखलाकर मराठा सेना को आक्रमण का आदेश दे दिया लेकिन सेना कुछ भी नही कर पाई क्योंकि कोली खुद ही किलेदार थे और किलों की अछि तरह से किलेबन्दी कर रखी थी और पेशवा को नाकामी का मुहूं देखना पड़ा।[179][180] इश्के बाद अपमानित पेशवा ने चिवहे गोत्र (वंस) के कोलियों को बंदी बनाना सुरु कर दिया। जितने भी चिवहे गोत्र के कोली पेशवा के अधिकृत हिस्से में रह रहे थे सभी को बाघी घोसित कर दिया और बन्दी बनाना सुरु कर दिया। इसके बाद चिवहे कोलियों ने माधवराव के पास पत्र भेजा और पेशवा को समझाया गया इसके बाद कोलियों ने किलों को माधवराव को सौंप दिया और चिवहे कोलियों को फिर से किलेदारी सौंप दी गई।[76][181]
  • जालिया गुजरात के कोलीयों का एक गोत्र है। जालीया गोत्र के काेलियों ने गुजरात के देहवान छेत्र पर राज किया था। जालीया गोत्र के कोलियोंं को ठाकुर साहेब बोला जाता है।[187]

सन्त महात्मा[संपादित करें]

  • कुबेर दास गुजरात के आनंद सेहर के पास सरसा गांव के एक संत थे। इनको कुबेरा के नाम से भी जाना जाता है।[188] वो गुजरात की कोली जाती से संबंद रखते थे। लेकिन उनको पूजने वाले ज्यादातर लुहार जाती के लोग थे। कुबेर के गुरुजी का का कृष्णदास था।[189] कुबेरजी के बिस हज़ार से ज्यादा अनुयायी थे जो अपने आप को कुबेरपंथी बोलते थे। संत कुबेर के अनुयायी उनको अपना जनक मानते हैं।[190][191]

प्रसिद्ध कोली[संपादित करें]

  1. कान्होजी आंग्रे, मराठा समुंद्री सेना के अध्यक्ष।[162]
  2. झलकारी बाई, 1857 की क्रांति की प्रथम सेनानी एवं झांसी की महिला सेना की सेनापति।[75]
  3. तानाजी मालुसरे, शिवाजी महाराज की मराठा सेना का सेनापति एवं महाबलेश्वर राजवाड़े के कोली देशमुख[192]
  4. यशवंत राव मुकने, जव्हार रियासत के अंतिम कोली महाराजा[193]
  5. राजेश चुडासमा, गुजरात सरकार में मंत्री।[194]
  6. देवजीभाई गोविंदभाई फतेपारा, भारत की सोलहवीं लोकसभा में सांसद हैं। 2014 के चुनावों में इन्होंने गुजरात की सुरेन्द्रनगर सीट से भारतीय जनता पार्टी की ओर से भाग लिया।[195]
  7. भारती शियाल, भारत की सोलहवीं लोकसभा में सांसद हैं। 2014 के चुनावों में इन्होंने गुजरात की भावनगर सीट से भारतीय जनता पार्टी की ओर से भाग लिया।[196]
  8. प्राजक्ता कोली यूट्यूबर जिनको MostlySane के नाम से जाना जाता है।
  9. रामनाथ कोविंद देश के राष्ट्रपति हैं।

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