ज्ञान योग

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ज्ञान योग स्वंज्ञान अर्थात स्वं का जानकारी प्राप्त करने को कहते है। ये अपनी और अपने परिवेश को अनुभव करने के माध्यम से समझना है। स्वामी विवेकानन्द के ज्ञानयोग सम्बन्धित व्याख्यान, उपदेशों तथा लेखों को लिपिबद्ध कर 'ज्ञानयोग' पुस्तक में संकलित किया है। ज्ञान के माध्यम से ईश्वरीय स्वरूप का ज्ञान, वास्तविक सत्य का ज्ञान ही ज्ञानयोग का लक्ष्य है। स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित ज्ञानयोग वेदांत के अंतर्गत सत्यों को बताकर वेदांत के सार रूप में प्रस्तुत है।

एक रूप में ज्ञानयोगी व्यक्ति ज्ञान द्वारा ईश्वरप्राप्ति मार्ग में प्रेरित होता है। स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित ज्ञानयोग में मायावाद,मनुष्य का यथार्थ व प्रकृत स्वरूप,माया और मुक्ति,ब्रह्म और जगत,अंतर्जगत,बहिर्जगत,बहुतत्व में एकत्व,ब्रह्म दर्शन,आत्मा का मुक्त स्वभाव आदि नामों से उनके द्वारा दिये भाषणों का संकलन है।

अब यदि विश्लेषण किया जाये तो वास्तव में ज्ञान योगी मायावाद के असल तत्व को जानकर,अपनी वास्तविकता और वेदांत के अद्वैत मत के अनुरूप आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानकर मुक्ति प्राप्त करता है।

जिस प्रकार प्राणशक्ति का हठयोग से, मनःशक्ति का ध्यानयोग से और क्रिया शक्ति का कर्मयोग से, तथा भावना शक्ति का भक्ति योग से सम्बन्ध है उसी प्रकार बुद्धि शक्ति का ज्ञानयोग से सम्बन्ध है। ज्ञानयोग की दृष्टि से संसार असत् , जड़ तथा दुख रूप है। ज्ञान में विवेक मुख्य रहता है, और विवेक में सत्-असत् , नित्य-अनित्य, नाशवान अविनाशी दोनों रहते हैं । विवेकी पुरूष संसार को दुख रूप समझ कर उनका परित्याग करता है। ज्ञानयोग मे संसार के साथ संबंध विच्छेद करने की मुख्यता है। संसार से सम्बन्ध विच्छेद करने में विवेक ही काम आता है । इसलिए यह एक लौकिक साधन है। ज्ञानी संसार के माने हुए संबंध एवं 'मै' और 'मेरे 'का त्याग करता है तथा पदार्थ और क्रिया का भी त्याग करता है तथा इनमें असंग रहता है। यदि साधक अपने ज्ञान का अनादर न करे तो ज्ञानयोग सिद्ध हो जाता है,किन्तु ज्ञानयोग के साधक का स्खलन से बचे रहना दुष्कर है क्योंकि इन मार्गों की किञ्चित त्रुटियाँ भी अक्षम्य हैं। ज्ञान में द्वेत का अद्वैत हो जाता है अर्थात जीव और ब्रह्म एक हो जाते हैं। ज्ञानी सोचते हैं कि हम इसी मुहूर्त में चरम लक्ष्य पर पहुँचना है इसलिए ज्ञान मार्ग में ईश्वर के साक्षात्कार के लिए उनके पास चलकर जाना होता है। ज्ञानयोगी स्वाधीन होता है। अहंकार इसमें बाधक होता है।

माया के संबंध में ब्रह्म को ईश्वर कहते हैं और अविद्या के संबंध से जीव। जीव अविद्या के कारण अपने ब्रह्म स्वरूप को भूलकर बुुद्धि, अहंकार,मन, इन्द्रियों और शरीर आदि की उपाधियों को अपना वास्तविक स्वरूप समझ कर उनकी अवस्थाओं को अपनी अवस्था मान लेता है। इस अध्यास के कारण अल्पज्ञता, अल्पशक्तिमत्ता और परिछिन्नता की सीमा में आकर कर्ता और भोक्ता बन जाता है।और सकाम कर्मों द्वारा पुण्य और पाप का संचय करता हुआ आवागमन के चक्र मे फँसकर उनके फलों को भोगता है आत्मा और परमात्मा अर्थात् जीव और ब्रह्म की एकता के अनुभव सिद्ध पूर्ण ज्ञान से अविद्या के नाश हो जाने पर शरीर, इन्द्रियों, मन, अहंकार और बुद्धि आदि उपाधियों से आत्मभाव मिट जाता है, जिसके उपरांत कर्ता-भोक्ता का अभिमान निवृत्त हो जाने पर कर्म उनके फलों और आवागमन से मुक्ति पाकर परिछिन्नता और अल्पज्ञता की सीमा को तोड़कर अपने अनन्त शुद्ध ज्ञान स्वरूप में अवस्थित हो जाता है। माया रहित शुद्ध जीव और ब्रह्म ( परब्रह्म,शुद्धब्रह्म )एक ही हैं दो नहीं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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