अल-मुनाफ़िक़ून

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सूरा अल-मुनाफ़िक़ून (इंग्लिश: Al-Munafiqun) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 63 वां सूरा (अध्याय) है। इसमें 11 आयतें हैं।

नाम[संपादित करें]

इस सूरा के अरबी भाषा के नाम को क़ुरआन के प्रमुख हिंदी अनुवाद में सूरा अल-मुनाफ़िक़ून [1]और प्रसिद्ध किंग फ़हद प्रेस के अनुवाद में सूरा अल्-मुनाफ़िक़ून[2] नाम दिया गया है।

नाम पहली आयत के वाक्यांश “जब ये कपटाचारी (मनाफ़िकून) तुम्हारे पास आते हैं" से उद्धृत है। यह इस सूरा का नाम भी है और इसके विषय का शीर्षक भी, क्योंकि इसमें कपटाचारियों ही की नीति की समीक्षा की गई है।

अवतरणकाल[संपादित करें]

मदनी सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मदीना के निवास के समय हिजरत के पश्चात अवतरित हुई।

यह सूरा बनी मुस्तलिक़ के अभियान (जो सन् 6 हिजरी में घटित हुआ था) से अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की वापसी पर या तो यात्रा के बीच में अवतरित हुई है या नबी (सल्ल.) के मदीना तैबा पहुँचने के पश्चात् तुरन्त ही इसका अवतरण हुआ।

ऐतिहासिक पृष्टभूमि[संपादित करें]

इस्लाम के विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि जिस विशिष्ट घटना के विषय में यह सूरा अवतरित हुई है, उसका उल्लेख करने से पहले यह आवश्यक है कि मदीना के कपटाचारियों के इतिहास पर एक दृष्टि डाल ली जाए , क्योंकि जो घटना उस समय घटी थी, वह मात्र एक आकस्मिक घटना न थी, बल्कि उसके पीछे घटनाओं की एक पूरी श्रृंखला थी जो अन्ततः इस नौबत तक पहुँची . मदीना तैबा में अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के पदार्पण से पहले औस और ख़ज़रज के क़बीले आपस के घरेलू युद्धों से थककर (ख़ज़रज क़बीले के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल के नेतृत्व और श्रेष्ठता पर लगभग सहमत हो चुके थे।) और इस बात की तैयारियाँ कर रहे थे कि उसको अपना बादशाह बनाकर विधिवत् रूप से उसकी ताजपोशी का उत्सव मनाएँ, यहाँ तक कि उसके लिए ताजभी बना लिया गया था। इस स्थिति में इस्लाम की चर्चा मदीना पहुँची और दोनों क़बीलों के प्रभावशाली व्यक्ति मुसलमान होने शुरू हो गए। जब नबी (सल्ल.) मदीना पहुँचे तो अनसार के हर घराने में इस्लाम इतना फैल चुका था कि अब्दुल्लाह बिन उबई बेबस हो गया और उसको अपनी सरदारी बचाने का इसके सिवा कोई उपाय दिखाई न दिया कि वह ख़ुद भी मुसलमान हो जाए। हालाँकि उसको इस बात का बड़ा दुःख था कि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने उसकी बादशाही छीन ली है। कई वर्ष तक उसका यह कपटाचार युक्त ईमान और अपनी रियासत छीन जाने का यह ग़म तरह-तरह के रंग दिखाता रहा। बद्र के युद्ध के पश्चात् जब यहूदी बनी फ़ैनुक़ा के स्पष्टतः प्रतिज्ञाभंग और बिना किसी उत्तेजना के सरकशी पर अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने उनपर आक्रमण किया तो यह व्यक्ति उनकी सहायता के लिए उठ खड़ा हुआ। ( इब्ने हिशाम , भाग -3 , पृ . 51-52 )

उहुद के युद्ध के अवसर पर इस व्यक्ति ने खुली ग़द्दारी की और ठीक समय पर अपने 300 साथियों को लेकर रणक्षेत्र से उलटा वापस आ गया। जिस नाजुक घड़ी में उसने यह हरकत की थी, उसी गम्भीरता का अनुमान इस बात से किया जा सकता है कि कुरैश के लोग 3000 की सेना लेकर मदीना पर चढ़ आए थे और रसूल (सल्ल.) उसके मुक़ाबले में केवल एक हज़ार आदमी साथ लेकर प्रतिरक्षा के लिए निकले थे। इन एक हज़ार में से भी यह कपटाचारी 300 आदमी तोड़ लाया और नबी (सल्ल.) को सिर्फ 700 के जत्थे के साथ दुश्मनों का मुक़ाबला करना पड़ा। फिर सन् 4 हिजरी में बनी नज़ीर के अभियान का अवसर आया और इस अवसर पर इस व्यक्ति ने और इसके साथियों ने और भी ज्यादा खुलकर इस्लाम के विरुद्ध इस्लाम के शत्रुओं की सहायता की।

यह था वह परिप्रेक्ष्य जिसके साथ वह और उसके साथी कपटाचारी बनी मुस्तलिक़ के अभियान में सम्मिलित हुए थे । इस अवसर पर उन्होंने एक साथ दो ऐसे बड़े उपद्रव खड़े कर दिए जो मुसलमानों के जत्थे को बिलकुल टुकड़े - टुकड़े कर सकते थे, किन्तु पवित्र कुरआन की शिक्षा और अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की संगति से ईमानवालों को जो उत्कृष्ट प्रशिक्षण प्राप्त था उसके कारण उन दोनो उपद्रवों का ठीक समय पर अन्मूलन हो गया और ये कपटाचारी स्वयं अपमानित होकर रह गए । इसमें से एक उपद्रव तो यह था जिसका उल्लेख सूरा 24 ( नूर ) में गुज़र चुका है और दूसरा उपद्रव यह है जिसका इस सूरा में उल्लेख किया गया है । इस घटना का (संक्षिप्त विवरण यह है कि) बनी मुस्तलिक़ को पराजित करने के बाद अभी इस्लामी सेना उस बस्ती में ठहरी हुई थी जो मुरैसीअ नामक कुएँ पर आबाद थी कि अचानक पानी पर दो व्यक्तियों का झगड़ा हो गया। उनमें से एक का नाम जहजाह बिन मसऊद ग़फ़्फ़ारी था , जो हज़रत उमर (रजि.) के सेवक थे और उनका घोड़ा सँभालने का काम करते थे और दूसरे व्यक्ति सिनान बिन दबर अल जोहनी थे जिनका क़बीला ख़ज़रज एक क़बीले का प्रतिज्ञाबद्ध मित्र था। मौखिक कटुवचन से आगे बढ़कर नौबत हाथपाई तक पहुँची और जहजाह ने सिनान को एक लात मार दी, जिसे अपनी प्राचीन यमनी परम्पराओं के अनुसार अनसार बड़ा अपमान समझते थे। इसपर सिनान ने अनसार को मदद के लिए पुकारा और जहजाह ने मुहाजिरों को पुकारा। इब्ने उबई ने इस झगड़े की ख़बर सुनते ही औस और ख़ज़रज के लोगों को भड़काना शुरू कर दिया कि दौड़ो और अपने मित्र क़बीले की सहायता करो। उधर से कुछ मुहाजिर भी निकल आए। बहुत सम्भव था कि बात बढ़ जाती और उसी जगह अनसार और मुहाजिर आपस में लड़ पड़ते जहाँ अभी-अभी वे मिलकर एक दुश्मन क़बीले से लड़े थे और उसे पराजित करके अभी उसी के क्षेत्र में ठहरे हुए थे, किन्तु यह शोर सुनकर अल्लाह के रसूल (सल्ल.) निकल आए और आपने कहा, "यह अज्ञान की पुकार कैसी? तुम लोग कहाँ और यह अज्ञान की पुकार कहाँ? इसे छोड़ो यह बड़ी गन्दी चीज़ है।" इसपर दोनों तरफ़ के नेक लोगों ने आगे बढ़कर मामला समाप्त करा दिया और सिनान ने जहजाह को क्षमा करके सुलह कर ली। इसके बाद हर व्यक्ति जिसके दिल में कपट (निफ़ाक़) था अब्दुल्लाह बिन उबई के पास पहुँचा और इन लोगों ने एकत्र होकर उससे कहा कि “अब तक तो तुमसे आशाएँ थीं और तुम प्रतिरक्षा कर रहे थे; मगर अब मालूम होता है कि तुम हमारे मुक़ाबले में इन कंगालों के सहायक बन गए हो।" इब्ने उबई पहले ही खौल रहा था। इन बातों से वह और भी ज़्यादा भड़क उठा। कहने लगा, “यह सब कुछ तुम्हारा ही किया - धरा है। तुमने इन लोगों को अपने देश में जगह दी ; इनपर अपने धन बांटे; यहाँ तक कि अब ये फल फूलकर स्वयं हमारे ही शत्रु और विपक्षी बन गए हैं। हमारी और इन कुरैश के कंगालों (या मुहम्मद, के साथियों) की हालत पर यह कहावत घटित होती है कि अपने कुत्ते को खिला - पिलाकर मोटा कर , ताकि तुझी को फाड़ खाए। तुम लोग इनसे हाथ रोक लो, तो ये चलते फिरते नज़र आएँ। अल्लाह की क़सम , मदीना वापस पहुँचकर हममें जो प्रतिष्ठित है वह हीन को निकाल देगा। ”नबी (सल्ल.) को जब यह बात मालूम हुई तो तुरन्त ही कूच का हुक्म दे दिया , हालाँकि नबी (सल्ल.) के सामान्य नियम के अनुसार वह कूच का समय न था। निरन्तर 30 घंटे चलते रहे, यहाँ तक कि लोग थककर चूर हो गए। फिर आपने एक जगह पड़ाव किया और थके हुए लोग ज़मीन पर कमर टिकाते ही सो गए। यह आपने इस लिए किया कि जो कुछ मुरैसी के कुएँ पर घटित हुआ था, उसका प्रभाव लोगों के मन से मिट जाए। (किन्तु) धीरे - धीरे वह बात तमाम अनसार में फैल गई और उनमें इब्ने उबई के विरुद्ध अत्यन्त रोष उत्पन्न हो गया। लोगों ने इब्ने उबई से कहा कि जाकर अल्लाह के रसूल (सल्ल.) से माफ़ी माँगो। किन्तु उसने बिगड़कर उत्तर दिया, “तुमने कहा कि उनपर ईमान लाओ। मैं ईमान ले आया। तुमने कहा कि अपने माल की ज़कात दो। मैंने ज़कात भी दे दी। अब बस यही काम रह गया है कि मैं मुहम्मद को सजदा करूँ। ”इन बातों से उसके विरुद्ध अनसारी मुसलमानों का क्रोध और अधिक बढ़ गया और हर ओर से उसपर फटकार पड़ने लगी। जब यह क़ाफ़िला मदीना तैबा में दाखिल होने लगा तो अब्दुल्लाह बिन उबई के बेटे , जिनका नाम भी अब्दुल्लाह ही था , तलवार खींचकर बाप के आगे खड़े हो गए और बोले, “आपने कहा था कि मदीना वापस पहुँचकर प्रतिष्ठित; हीन को निकाल देगा, अब आपको मालूम हो जाएगा कि प्रष्ठिा आपकी है या अल्लाह या उसके रसूल (सल्ल.) की। अल्लाह की क़सम, आप मदीना में दाख़िल नहीं हो सकते जब तक अल्लाह के रसूल (सल्ल.) आपको इजाज़त न दें। "इस पर इब्ने उबई चीख उठा , " ख़ज़रज के लोगो , तनिक देखो, मेरा बेटा ही मुझे मदीना में दाखिल होने से रोक रहा है। लोगों ने यह ख़बर नबी (सल्ल.) तक पहुँचाई और आपने कहा, “अब्दुल्लाह से कहो कि, अपने बाप को घर आने दे। "अब्दुल्लाह (रजि.) ने कहा, "उनका आदेश है तो अब आप दाख़िल हो सकते हैं।" ये थीं वे परिस्थितियाँ जिनमें यह सूरा, अधिक सम्भावना इसकी है कि नबी (सल्ल.) के मदीना पहुँचने के बाद अवतरित हुई ।

सुरह "अल-मुनाफ़िक़ून का अनुवाद[संपादित करें]

बिस्मिल्ला हिर्रह्मा निर्रहीम अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है।

इस सूरा का प्रमुख अनुवाद:

क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी [3]"मुहम्मद अहमद" ने किया।

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

इस सूरह का प्रसिद्ध अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें

पिछला सूरा:
अल-जुमुआ
क़ुरआन अगला सूरा:
अत-तग़ाबुन
सूरा 63 - अल-मुनाफ़िक़ून

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सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. सूरा अल-मुनाफ़िक़ून ,(अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ), भाष्य: मौलाना मौदूदी. अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित. पृ॰ 855 से.
  2. "सूरा अल्-मुनाफ़िक़ून का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस)". https://quranenc.com. मूल से 22 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 16 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  3. "Al-Munafiqun सूरा का अनुवाद". http://tanzil.net. मूल से 25 अप्रैल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  4. "Quran Text/ Translation - (92 Languages - Largest Collection - AUSTRALIAN ISLAMIC LIBRARY". www.australianislamiclibrary.org. मूल से 30 जुलाई 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 March 2016.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]