अज़-ज़ुख़रुफ़

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सूरा अज़-जुख़रुफ़

सूरा अज़-ज़ुख़रुफ़ (इंग्लिश: Az-Zukhruf) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 43 वां सूरा (अध्याय) है। इसमें 89 आयतें हैं।

नाम[संपादित करें]

सूरा 'अज़-जुख़रुफ़[1]या सूरा अज़्-ज़ुख़रुफ़[2] का नाम आयत 35 के शब्द ‘वज़्जुख़रुफ़न' (चाँदी और सोने के) से उद्धृत है। मतलब यह है कि यह वह सूरा है जिसमें जुख़रुफ़ शब्द आया है।

अवतरणकाल[संपादित करें]

मक्कन सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मक्का के निवास के समय हिजरत से पहले अवतरित हुई।

इस्लाम के विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि इसकी वार्ताओं पर विचार करने से साफ़ महसूस होता है कि यह सूरा भी उसी कालखण्ड में अवतरित हुई है, जिसमें सूरा 40 (अल-मोमिन), सूरा 41 (हा. मीम. अस-सजदा) और सूरा 42 (अश-शूरा) अवतरित हुई। (यह वह समय था) जब मक्का के काफ़िर नबी (सल्ल.) की जान के पीछे पड़े हुए थे।

विषय और वार्ताएँ[संपादित करें]

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि;

इस सूरा में बड़े ज़ोर के साथ कुरैश और अरब वालों की उन अज्ञानपूर्ण धारणाओं और अन्धविश्वासों की अलोचना की गई है जिन पर वे दुराग्रह किए चले जा रहे थे और अत्यन्त मज़बूत और दिल में घर करनेवाले तरीके से उनके बुद्धिसंगत न होने को उजागर किया गया है। वार्ता का आरम्भ इस तरह किया गया है कि तुम लोग अपनी दुष्टता के बल पर यह चाहते हो कि इस किताब का अवतरण रोक दिया जाए, किन्तु अल्लाह ने दुष्टताओं के कारण नबियों को भेजना और किताबों को उतारना बन्द नहीं किया है, बल्कि उन ज़ालिमों को विनष्ट कर दिया है जो उनके मार्गदर्शन का रास्ता रोक कर खड़े हुए थे। यही कुछ वह अब भी करेगा । इसके बाद बताया गया है कि वह धर्म क्या है जिसे लोग छाती से लगाए हुए हैं, और वे प्रमाण क्या है जिसके बल-बूते पर वे मुहम्मद (सल्ल.) का मुक़ाबला कर रहे हैं । ये स्वयं मानते हैं कि धरती और आकाश का, और इनका अपना और इनके उपास्यों का स्रष्टा (भी और इनका दाता भी) सर्वोच्च अल्लाह ही है फिर भी दूसरों को अल्लाह के साथ प्रभुत्व में शरीक करने पर हठ किए चले जा रहे हैं। बन्दों को अल्लाह की संतान घोषित करते हैं और (फ़रिश्तों के विषय में ) कहते हैं कि ये अल्लाह की बेटियाँ हैं। उनकी उपासना करते हैं। आख़िर इन्हें कैसे मालूम हुआ कि फ़रिश्ते स्त्रियाँ हैं? इन अज्ञानपूर्ण बातों पर टोका जाता है तो नियति का बहाना पेश करते हैं और कहते हैं कि यदि अल्लाह हमारे इस काम को पसन्द न करता तो हम कैसे इन मूर्तियों की पूजा कर सकते थे। हालाँकि अल्लाह की पसन्द और नापसन्द मालूम होने का माध्यम उसकी किताबें हैं , न कि वे कार्य जो संसार में उसकी इच्छा (उसकी दी हुई छू ) के अन्तर्गत हो रहे हैं। (अपने बड़े बहुदेववाद की पुष्टि में एक प्रमाण यह भी) देते हैं कि बाप-दादा से यह काम ऐसे ही होता चला आ रहा है। मानो इनकी दृष्टि में किसी धर्म के सत्य होने के लिए यह पर्याप्त प्रमाण है। हालाँकि इबराहीम (अलै.) ने जिनकी सन्तान होने पर ही इनका सारा गर्व और इनकी विशिष्टता निर्भर करती है, ऐस अंधे अनुसरण को रद्द कर दिया था जिसका साथ कोई बुद्धिसंगत प्रमाण न देता हो। फिर यदि इन लोगों को पूर्वजों का अनुसरण ही करना था तो इसके लिए भी अपने सबसे अधिक महान पूर्वज इबराहीम और इसमाईल (अलै.) को छोड़कर इन्होंने अपने अत्यन्त अज्ञानी पूर्वजों का निर्वाचन किया। मुहम्मद (सल्ल.) की पैग़म्बरी स्वीकार करने में इन्हें संकोच है तो इस कारण कि उनके पास धन - दौलत, राज्य और प्रतिष्ठा तो है ही नहीं। कहते है कि यदि ईश्वर हमारे यहाँ किसी को नबी बनाना चाहता तो हमारे दोनों नगरों (मक्का और ताइफ़) के बड़े आदमियों में से किसी को बनाता। इसी कारण फ़िरऔन ने भी हज़रत मूसा (अलै.) को हीन जाना था और कहा था कि आकाश का सम्राट अगर मुझ धरती के सम्राट के पास कोई राजदूत भेजता तो उसे सोने के कंगन पहनाकर और फ़रिश्तों की एक सेना उसकी अर्दली में देकर भेजता। यह फ़कीर कहाँ से आ खड़ा हुआ। अन्त में साफ़ - साफ़ कहा गया है कि न ईश्वर की कोई सन्तान है, न आकाश और धरती के प्रभु अलग - अलग हैं, और न अल्लाह के यहाँ कोई ऐसा सिफ़रिशी है जो जान - बूझकर गुमराही अंगीकार करनवालों को उसके दण्ड से बचा सके।

सुरह "अज़्-ज़ुख़रुफ़ का अनुवाद[संपादित करें]

अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है।


सूरए अज़ ज़ुख़रूफ़ मक्का में नाजि़ल हुआ और उसकी (89) नवासी आयतें हैं।

ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

हा मीम (1)

रौशन किताब (क़़ुरआन) की क़सम (2)

हमने इस किताब को अरबी ज़बान कु़रआन ज़रूर बनाया है ताकि तुम समझो (3)

और बेशक ये (क़़ुरआन) असली किताब (लौह महफूज़) में (भी जो) मेरे पास है लिखी हुयी है (और) यक़ीनन बड़े रूतबे की (और) पुरअज़ हिकमत है (4)

भला इस वजह से कि तुम ज़्यादती करने वाले लोग हो हम तुमको नसीहत करने से मुँह मोड़ेंगे (हरगिज़ नहीं) (5)

और हमने अगले लोगों को बहुत से पैग़म्बर भेजे थे (6)

और कोई पैग़म्बर उनके पास ऐसा नहीं आया जिससे इन लोगों ने ठट्ठे नहीं किए हो (7)

तो उनमें से जो ज़्यादा ज़ोरावर थे तो उनको हमने हलाक कर मारा और (दुनिया में) अगलों के अफ़साने जारी हो गए (8)

और (ऐ रसूल) अगर तुम उनसे पूछो कि सारे आसमान व ज़मीन को किसने पैदा किया तो वह ज़रूर कह देंगे कि उनको बड़े वाकि़फ़कार ज़बरदस्त (ख़ुदा ने) पैदा किया है (9)

जिसने तुम लोगों के वास्ते ज़मीन का बिछौना बनाया और (फिर) उसमें तुम्हारे नफ़े के लिए रास्ते बनाए ताकि तुम राह मालूम करो (10)

और जिसने एक (मुनासिब) अन्दाजे़ के साथ आसमान से पानी बरसाया फिर हम ही ने उसके (ज़रिए) से मुर्दा (परती) शहर को जि़न्दा (आबाद) किया उसी तरह तुम भी (क़यामत के दिन क़ब्रों से) निकाले जाओगे (11)

और जिसने हर किस्म की चीज़े पैदा कीं और तुम्हारे लिए कष्तियाँ बनायीं और चारपाए (पैदा किए) जिन पर तुम सवार होते हो (12)

ताकि तुम उसकी पीठ पर चढ़ो और जब उस पर (अच्छी तरह) सीधे हो बैठो तो अपने परवरदिगार का एहसान माना करो और कहो कि वह (ख़ुदा हर ऐब से) पाक है जिसने इसको हमारा ताबेदार बनाया हालांकि हम तो ऐसे (ताक़तवर) न थे कि उस पर क़ाबू पाते (13)

और हमको तो यक़ीनन अपने परवरदिगार की तरफ़ लौट कर जाना है (14)

और उन लोगों ने उसके बन्दों में से उसके लिए औलाद क़रार दी है इसमें शक नहीं कि इन्सान खुल्लम खुल्ला बड़ा ही नाशुक्रा है (15)

क्या उसने अपनी मख़लूक़ात में से ख़ुद तो बेटियाँ ली हैं और तुमको चुनकर बेटे दिए हैं (16)

हालांकि जब उनमें किसी शख़्स को उस चीज़ (बेटी) की ख़ुशख़बरी दी जाती है जिसकी मिसल उसने ख़ुदा के लिए बयान की है तो वह (ग़ुस्से के मारे) सियाह हो जाता है और ताव पेंच खाने लगता है (17)

क्या वह (औरत) जो ज़ेवरों में पाली पोसी जाए और झगड़े में (अच्छी तरह) बात तक न कर सकें (ख़ुदा की बेटी हो सकती है) (18)

और उन लोगों ने फ़रिश्तों को कि वह भी ख़ुदा के बन्दे हैं (ख़ुदा की) बेटियाँ बनायी हैं लोग फ़रिश्तों की पैदाइश क्यों खड़े देख रहे थे अभी उनकी शहादत क़लम बन्द कर ली जाती है (19)

और (क़यामत) में उनसे बाज़पुर्स की जाएगी और कहते हैं कि अगर ख़ुदा चाहता तो हम उनकी परसतिश न करते उनको उसकी कुछ ख़बर ही नहीं ये लोग तो बस अटकल पच्चू बातें किया करते हैं (20)

या हमने उनको उससे पहले कोई किताब दी थी कि ये लोग उसे मज़बूत थामें हुए हैं (21)

बल्कि ये लोग तो ये कहते हैं कि हमने अपने बाप दादाओं को एक तरीके़ पर पाया और हम उनको क़दम ब क़दम ठीक रास्ते पर चले जा रहें हैं (22)

और (ऐ रसूल) इसी तरह हमने तुमसे पहले किसी बस्ती में कोई डराने वाला (पैग़म्बर) नहीं भेजा मगर वहाँ के ख़ुशहाल लोगों ने यही कहा कि हमने अपने बाप दादाओं को एक तरीके़ पर पाया, और हम यक़ीनी उनके क़दम ब क़दम चले जा रहे हैं (23)

(इस पर) उनके पैग़म्बर ने कहा भी जिस तरीक़े पर तुमने अपने बाप दादाओं को पाया अगरचे मैं तुम्हारे पास इससे बेहतर राहे रास्त पर लाने वाला दीन लेकर आया हूँ (तो भी न मानोगे) वह बोले (कुछ हो मगर) हम तो उस दीन को जो तुम देकर भेजे गए हो मानने वाले नहीं (24)

तो हमने उनसे बदला लिया (तो ज़रा) देखो तो कि झुठलाने वालों का क्या अन्जाम हुआ (25)

(और वह वख़्त याद करो) जब इबराहीम ने अपने (मुँह बोले) बाप (आज़र) और अपनी क़ौम से कहा कि जिन चीज़ों को तुम लोग पूजते हो मैं यक़ीनन उससे बेज़ार हूँ (26)

मगर उसकी इबादत करता हूँ, जिसने मुझे पैदा किया तो वही बहुत जल्द मेरी हिदायत करेगा (27)

और उसी (ईमान) को इबराहीम ने अपनी औलाद में हमेशा बाक़ी रहने वाली बात छोड़ गए ताकि वह (ख़ुदा की तरफ़ रूजू) करें (28)

बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता रहा यहाँ तक कि उनके पास (दीने) हक़ और साफ़ साफ़ बयान करने वाला रसूल आ पहुँचा (29)

और जब उनके पास (दीन) हक़ आ गया तो कहने लगे ये तो जादू है और हम तो हरगिज़ इसके मानने वाले नहीं (30)

और कहने लगे कि ये क़़ुरआन इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाजि़ल किया गया (31)

ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी जि़न्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से खि़दमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है (32)

और अगर ये बात न होती कि (आखि़र) सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम उनके लिए जो ख़ुदा से इन्कार करते हैं उनके घरों की छतें और वही सीढि़याँ जिन पर वह चढ़ते हैं (उतरते हैं) (33)

और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख़्त जिन पर तकिये लगाते हैं चाँदी और सोने के बना देते (34)

ये सब साज़ो सामान, तो बस दुनियावी जि़न्दगी के (चन्द रोज़ा) साज़ो सामान हैं (जो मिट जाएँगे) और आख़ेरत (का सामान) तो तुम्हारे परवरदिगार के यहाँ ख़ास परहेज़गारों के लिए है (35)

और जो शख़्स ख़ुदा की चाह से अन्धा बनता है हम (गोया ख़ुद) उसके वास्ते शैतान मुक़र्रर कर देते हैं तो वही उसका (हर दम का) साथी है (36)

और वह (शयातीन) उन लोगों को (ख़ुदा की) राह से रोकते रहते हैं बावजूद इसके वह उसी ख़्याल में हैं कि वह यक़ीनी राहे रास्त पर हैं (37)

यहाँ तक कि जब (क़यामत में) हमारे पास आएगा तो (अपने साथी शैतान से) कहेगा काश मुझमें और तुममें पूरब पष्चिम का फ़ासला होता ग़रज़ (शैतान भी) क्या ही बुरा रफीक़ है (38)

और जब तुम नाफ़रमानियाँ कर चुके तो (शैयातीन के साथ) तुम्हारा अज़ाब में शरीक होना भी आज तुमको (अज़ाब की कमी में) कोई फायदा नहीं पहुँचा सकता (39)

तो (ऐ रसूल) क्या तुम बहरों को सुना सकते हो या अन्धे को और उस शख़्स को जो सरीही गुमराही में पड़ा हो रास्ता दिखा सकते हो (हरगिज़ नहीं) (40)

तो अगर हम तुमको (दुनिया से) ले भी जाएँ तो भी हमको उनसे बदला लेना ज़रूरी है (41)

या (तुम्हारी जि़न्दगी ही में) जिस अज़ाब का हमने उनसे वायदा किया है तुमको दिखा दें तो उन पर हर तरह क़ाबू रखते हैं (42)

तो तुम्हारे पास जो वही भेजी गयी है तुम उसे मज़बूत पकड़े रहो इसमें शक नहीं कि तुम सीधी राह पर हो (43)

और ये (क़ुरआन) तुम्हारे लिए और तुम्हारी क़ौम के लिए नसीहत है और अनक़रीब ही तुम लोगों से इसकी बाज़पुर्स की जाएगी (44)

और हमने तुमसे पहले अपने जितने पैग़म्बर भेजे हैं उन सब से दरियाफ्त कर देखो क्या हमने ख़ुदा कि सिवा और माबूद बनाएा थे कि उनकी इबादत की जाए (45)

और हम ही ने यक़ीनन मूसा को अपनी निशानियाँ देकर फ़िरऔन और उसके दरबारियों के पास (पैग़म्बर बनाकर) भेजा था तो मूसा ने कहा कि मैं सारे जहाँन के पालने वाले (ख़ुदा) का रसूल हूँ (46)

तो जब मूसा उन लोगों के पास हमारे मौजिज़े लेकर आए तो वह लोग उन मौजिज़ों की हँसी उड़ाने लगे (47)

और हम जो मौजिज़ा उन को दिखाते थे वह दूसरे से बढ़ कर होता था और आखि़र हमने उनको अज़ाब में गिरफ़्तार किया ताकि ये लोग बाज़ आएँ (48)

और (जब) अज़ाब में गिरफ़्तार हुए तो (मूसा से) कहने लगे ऐ जादूगर इस एहद के मुताबिक़ जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुमसे किया है हमारे वास्ते दुआ कर (49)

(अगर अब की छूटे) तो हम ज़रूर ऊपर आ जाएँगे फिर जब हमने उनसे अज़ाब को हटा दिया तो वह फौरन (अपना) अहद तोड़ बैठे (50)

और फ़िरऔन ने अपने लोगों में पुकार कर कहा ऐ मेरी क़ौम क्या (ये) मुल्क मिस्र हमारा नहीं और (क्या) ये नहरें जो हमारे (शाही महल के) नीचे बह रही हैं (हमारी नहीं) तो क्या तुमको इतना भी नहीं सूझता (51)

या (सूझता है कि) मैं इस शख़्स (मूसा) से जो एक ज़लील आदमी है और (हकले पन की वजह से) साफ़ गुफ़्तगू भी नहीं कर सकता (52)

कहीं बहुत बेहतर हूँ (अगर ये बेहतर है तो इसके लिए सोने के कंगन) (ख़़ुदा के हाँ से) क्यों नहीं उतारे गये या उसके साथ फ़रिश्ते जमा होकर आते (53)

ग़रज़ फ़िरऔन ने (बातें बनाकर) अपनी क़ौम की अक़ल मार दी और वह लोग उसके ताबेदार बन गये बेशक वह लोग बदकार थे ही (54)

ग़रज़ जब उन लोगों ने हमको झुझंला दिया तो हमने भी उनसे बदला लिया तो हमने उन सब (के सब) को डुबो दिया (55)

फिर हमने उनको गया गुज़रा और पिछलों के वास्ते इबरत बना दिया (56)

और(ऐ रसूल) जब मरियम के बेटे (ईसा) की मिसाल बयान की गयी तो उससे तुम्हारी क़ौम के लोग खिलखिला कर हंसने लगे (57)

और बोल उठे कि भला हमारे माबूद अच्छे हैं या वह (ईसा) उन लोगों ने जो ईसा की मिसाल तुमसे बयान की है तो सिर्फ़ झगड़ने को (58)

बल्कि (हक़ तो यह है कि) ये लोग हैं झगड़ालू ईसा तो बस हमारे एक बन्दे थे जिन पर हमने एहसान किया (नबी बनाया और मौजिज़े दिये) और उनको हमने बनी इसराईल के लिए (अपनी क़ुदरत का) नमूना बनाया (59)

और अगर हम चाहते तो तुम ही लोगों में से (किसी को) फ़रिश्ते बना देते जो तुम्हारी जगह ज़मीन में रहते (60)

और वह तो यक़ीनन क़यामत की एक रौशन दलील है तुम लोग इसमें हरगिज़ शक न करो और मेरी पैरवी करो यही सीधा रास्ता है (61)

और (कहीं) शैतान तुम लोगों को (इससे) रोक न दे वही यक़ीनन तुम्हारा खुल्लम खुल्ला दुश्मन है (62)

और जब ईसा वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आये तो (लोगों से) कहा मैं तुम्हारे पास दानाई (की किताब) लेकर आया हूँ ताकि बाज़ बातें जिन में तुम लोग एख़्तेलाफ़ करते थे तुमको साफ़-साफ़ बता दूँ तो तुम लोग ख़ुदा से डरो और मेरा कहा मानो (63)

बेषक ख़़ुदा ही मेरा और तुम्हार परवरदिगार है तो उसी की इबादत करो यही सीधा रास्ता है (64)

तो इनमें से कई फिरक़े उनसे एख़्तेलाफ़ करने लगे तो जिन लोगों ने ज़़ुल्म किया उन पर दर्दनांक दिन के अज़ब से अफ़सोस है (65)

क्या ये लोग बस क़यामत के ही मुन्तज़िर बैठे हैं कि अचानक ही उन पर आ जाए और उन को ख़बर तक न हो (66)

(दिली) दोस्त इस दिन (बाहम) एक दूसरे के दुशमन होगें मगर परहेज़गार कि वह दोस्त ही रहेगें (67)

और ख़़ुदा उनसे कहेगा ऐ मेरे बन्दों आज न तो तुमको कोई ख़ौफ है और न तुम ग़मग़ीन होगे (68)

(यह) वह लोग हैं जो हमारी आयतों पर ईमान लाए और (हमारे) फ़रमाबरदार थे (69)

तो तुम अपनी बीवियों समैत एजाज़ व इकराम से बेहिश्त में दाखिल हो जाओ (70)

उन पर सोने की एक रिक़ाबियों और प्यालियों का दौर चलेगा और वहाँ जिस चीज़ को जी चाहे और जिससे आँखें लज़्ज़त उठाएं (सब मौजूद हैं) और तुम उसमें हमेशा रहोगे (71)

और ये जन्नत जिसके तुम वारिस (हिस्सेदार) कर दिये गये हो तुम्हारी क़ारगुज़ारियों का सिला है (72)

वहाँ तुम्हारे वास्ते बहुत से मेवे हैं जिनको तुम खाओगे (73)

(गुनाहगार कुफ़्फ़ार) तो यक़ीकन जहन्नुम के अज़ाब में हमेशा रहेगें (74)

जो उनसे कभी नाग़ा न किया जाएगा और वह इसी अज़ाब में नाउम्मीद होकर रहेंगें (75)

और हमने उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया बल्कि वह लोग ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म कर रहे हैं (76)

और (जहन्नुमी) पुकारेगें कि ऐ मालिक (दरोग़ा ए जहन्नुम कोई तरकीब करो) तुम्हारा परवरदिगार हमें मौत ही दे दे वह जवाब देगा कि तुमको इसी हाल में रहना है (77)

(ऐ कुफ़्फ़ार मक्का) हम तो तुम्हारे पास हक़ लेकर आयें हैं तुम मे से बहुत से हक़ (बात से चिढ़ते) हैं (78)

क्या उन लोगों ने कोई बात ठान ली है हमने भी (कुछ ठान लिया है) (79)

क्या ये लोग कुछ समझते हैं कि हम उनके भेद और उनकी सरग़ोशियों को नहीं सुनते हाँ (ज़रूर सुनते हैं) और हमारे फ़रिश्ते उनके पास हैं और उनकी सब बातें लिखते जाते हैं (80)

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर ख़़ुदा की कोई औलाद होती तो मैं सबसे पहले उसकी इबादत को तैयार हूँ (81)

ये लोग जो कुछ बयान करते हैं सारे आसमान व ज़मीन का मालिक अर्श का मालिक (ख़़ुदा) उससे पाक व पाक़ीज़ा है (82)

तो तुम उन्हें छोड़ दो कि पड़े बक बक करते और खेलते रहते हैं यहाँ तक कि जिस दिन का उनसे वायदा किया जाता है (83)

उनके सामने आ मौजूद हो और आसमान में भी (उसी की इबादत की जाती है और वही ज़मीन में भी माबूद है और वही वाकिफ़कार हिकमत वाला है (84)

और वही बहुत बाबरकत है जिसके लिए सारे आसमान व ज़मीन और दोनों के दरमियान की हुक़ुमत है और क़यामत की ख़बर भी उसी को है और तुम लोग उसकी तरफ लौटाए जाओगे (85)

और ख़ु़दा के सिवा जिनकी ये लोग इबादत करतें हैं वह तो सिफ़ारिश का भी एख़्तेयार नहीं रख़ते मगर (हाँ) जो लोग समझ बूझ कर हक़ बात (तौहीद) की गवाही दें (तो खैर) (86)

और अगर तुम उनसे पूछोगे कि उनको किसने पैदा किया तो ज़रूर कह देगें कि अल्लाह ने फिर (बावजूद इसके) ये कहाँ बहके जा रहे हैं (87)

और (उसी को) रसूल के उस क़ौल का भी इल्म है कि परवरदिगार ये लोग हरगिज़ ईमान न लाएँगे (88)

तो तुम उनसे मुँह फेर लो और कह दो कि तुम को सलाम तो उन्हें अनक़रीब ही (शरारत का नतीजा) मालूम हो जाएगा (89)

सूरए अज़ ज़ुख़रूफ़ ख़त्म

इस सूरा का प्रमुख अनुवाद:

क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी "मुहम्मद अहमद" [3] ने किया।

इस सूरह में सफ़र की दुआ[संपादित करें]

सफ़र की दुआ अज-ज़ुख़रुफ़ (43), 13-14 में है।

मूल अरबी "بِسْمِ اللهِ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ سُبْحَانَ الَّذِيْ سَخَّرَ لَناَ هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقرِنِيْنَ وإِنَّا إِلَى رَبِّناَ لمُنْقَلِبُوْنَ"

(उच्चारण: "सुब्हानल्लज़ी-सख्खर-लना-हाज़ा-वमा-कुन्ना-लहू-मुक़रिनीन-व-इन्ना-इला-रब्बीना लमुनक़लिबुन")

का अर्थ है: "वो पाक(अल्लाह) है जिसने इसको (सफर) हमारे काबू में कर दिया और हम में ताक़त ना थी की इसको(सफर) काबू में कर लेते और हमको अपने रब(अल्लाह) की तरफ ही लौट कर जाना है"। यह दुआ यात्रा पर निकलने से पहले पढ़ी जाती है।

पिछला सूरा:
अश-शूरा
क़ुरआन अगला सूरा:
अद-दुख़ान
सूरा 43

1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114


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इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ:[संपादित करें]

  1. अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ, भाष्य: मौलाना मौदूदी. अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित. पृ॰ 701 से.
  2. "सूरा अज़्-ज़ुख़रुफ़ का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस)". https://quranenc.com. मूल से 22 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  3. "Az-Zukhruf सूरा का अनुवाद". http://tanzil.net. मूल से 25 अप्रैल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

इस सूरह का प्रसिद्ध अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें Az-Zukhruf 43:1