अन-नस्र

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सूरा अन-नस्र (इंग्लिश: An-Nasr) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 110 वां सूरा (अध्याय) है। इसमें 5 आयतें हैं।

नाम[संपादित करें]

इस सूरा के अरबी भाषा के नाम को क़ुरआन के प्रमुख हिंदी अनुवाद में सूरा अन्-नस्र [1]और प्रसिद्ध किंग फ़हद प्रेस के अनुवाद में भी सूरा अन्-नस्र [2] नाम दिया गया है।

नाम पहली ही आयत “जब अल्लाह की मदद (नस्र) आ जाए" के शब्द 'नस्र' को इस सूरा का नाम दिया गया है।

अवतरणकाल[संपादित करें]

मदनी सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मदीना के निवास के समय हिजरत के पश्चात अवतरित हुई।

विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि.) का बयान है कि यह कुरआन मजीद की अन्तिम सूरा है अर्थात् सिके पश्चात कुछ आयतें तो अवतरित हुई, किन्तु कोई पूर्ण सूरा नबी (सल्ल.) पर अवतरित नहीं हुई। (हदीस : मुस्लिम , नसी, तबरानी, इब्ने अबी शैबा, इब्ने मरदूयह) हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से उल्लिखित है कि यह सूरा हिज्जतुल-विदाअ (नबी सल्ल. का अन्तिम हज) के अवसर पर अय्यामे- तशरीक़ (क़ुरबानी के तीन दिन) के मध्य में मिना के स्थान पर अवतरित हुई और इसके पश्चात् नबी (सल्ल.) ने अपनी ऊँटनी पर सवार होकर अपना प्रसिद्ध अभिभाषण दिया, (हदीस : तिरमिज़ी , बज़्जार , बैहक़ी)। (इस अभिभाषण में लोगों को यह याद दिलाने के बाद कि) “ यह अय्यामे तशरीक़ के मध्य का दिन है और यह ' मशअरे हराम '(स्थान विशेष) है। नबी (सल्ल.) ने कहा कि मैं नहीं जानता, शायद इसके बाद में तुमसे न मिल सकूँ। सावधान रहो, तुम्हारे खून, तुम्हारी इज़्ज़तें एक दूसरे पर उसी तरह हराम हैं जिस तरह यह दिन और यह स्थान हराम है। यहाँ तक कि तुम अपने प्रभु के सामने उपस्थित हो और वह तुमसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछगछ करे। सुनो, यह बात तुममें से निकटवाला दूरवाले तक पहुँचा दे; सुनो क्या मैंने तुम्हें पहुंचा दिया? "इसके बाद जब हम लोग मदीना लौटे तो कुछ अधिक दिन नहीं बीते थे कि नबी (सल्ल.) का देहान्त हो गया।इन दोनों रिवायतों (उल्लेखों) को मिलाकर देखा जाए तो मालूम होता है कि सूरा ‘नस्र' के अवतरण और अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के दुनिया से प्रस्थान करने के मध्य तीन महीने कुछ दिन का अन्तराल था, क्योंकि इतिहास की दृष्टि से हिज्जतुल विदाअ और हुजूर (सल्ल.) के देहावसान के मध्य इतना ही समय गुज़रा था। इब्ने अब्बास (रजि.) का बयान है कि जब यह सूरा अवतरित हुई तो नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि मुझे मेरी मृत्यु की ख़बर दे दी गई है और मेरा समय पुरा हुआ (मुस्नद अहमद, इब्ने ज़रीर, इब्ने मुज़िर, इब्ने मरदूयह)। दूसरे उल्लेखों, जो हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि.) से उद्धृत हुए हैं, में बयान किया गया है कि इस सूरा के अवतरण से नबी (सल्ल.) ने यह समक्ष लिया था कि आपको संसार से विदा होने की सूचना दे दी गई है (हदीस : मुस्लिम, मुस्नद अहमद, इब्ने जरीर , तबरानी , नसई)।

विषय और वार्ता[संपादित करें]

इस्लाम के विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि जैसा कि उपर्युक्त उल्लेख से मालूम होता है , इसि सूरा में अल्लाह ने अपने रसूल (सल्ल.) को यह बताया था कि जब अरब में इस्लाम की विजय पूर्ण हो जाए और अल्लाह के दीन (धर्म) में लोग दल -के- दल प्रवेश करने लगे, तो इसका अर्थ यह है कि यह काम पूरा हो गया जिसके लिए आप संसार में भेजे गए थे। तदन्तर आपको आदेश दिया गया कि आप अल्लाह की स्तुति और उसकी महानता का वर्णन करने में लग जाएँ कि उसकी उदार कृपा से आप इतना बड़ा काम सम्प्न करने में सफल हुए और उससे प्रार्थना करें कि इस सेवा के करने में जो भूल-चूक या कोताही भी आपसे हुई हो, उसे वह क्षमा कर दे। हज़रत आइशा (रजि.) कहती है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) अपने देहान्त से पहले “सुब्हा न - कल्लाहुम - म व बिहमदि - क , अस्तग़फ़िरु - क व अतूबु इलैक" (तेरी स्तुति हो ऐ अल्लाह , मैं तुझसे क्षमा - याचना करता हूँ और तेरी ही ओर लौटता हूँ।) (कुछ उल्लेखों में ये शब्द आए हैं , “ सुब्हानल्लाहि व बिहमदिही अस्तग़फ़िरुल्लाहि व अतूबु इलैह") बहुत अधिक पढ़ा करते थे । मैंने कहा , “ऐ अल्लाह के रसूल! ये कैसे शब्द है जो आपने अब पढ़ने आरम्भ कर दिए हैं? ' 'तो कहा कि मेरे लिए एक लक्षण निश्चित कर दिया गया है। जब मैं उसे देखू तो ये शब्द कहा करूं और वे हैं, "जब अल्लाह की सहायता आ जाए और विजय प्राप्त हो जाए” (हदीस: मुस्नद अहमद , मुस्लिम , इब्ने जरीर)। (इसके अतिरिक्त कुछ और ईश- स्मरण के शब्द भी हदीसों में उल्लिखित हैं जो आप (सल्ल.) अपने जीवन के अन्तिम दिनों में अधिकतर उच्चारित किया करते थे।) इब्ने अब्बास (रजि.) का बयान है कि इस सूरा के अवतरित होने के बाद अल्लाह के रसूल (सल्ल.) परलोक के लिए परिश्रम और तपस्या करने में इतनी कड़ाई के साथ व्यस्त हो गए जितने इनसे पहले कभी न हुए थे। (हदीस: नसई, तबरानी, इब्ने अबी हातिम , इब्ने मरदूयह)

सुरह "अन-नस्र का अनुवाद[संपादित करें]

बिस्मिल्लाह हिर्रह्मा निर्रहीम अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है।

इस सूरा का प्रमुख अनुवाद:

क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी [3]"मुहम्मद अहमद" ने किया:

بسم الله الرحمن الرحيم

۝ जब अल्लाह की सहायता आ जाए और विजय प्राप्त हो, (110:1)

۝ और तुम लोगों को देखो कि वे अल्लाह के दीन (धर्म) में गिरोह के गिरोह प्रवेश कर रहे है, (110:2) 

۝ तो अपने रब की प्रशंसा करो और उससे क्षमा चाहो। निस्संदेह वह बड़ा तौबा क़बूल करने वाला है (110:3)

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

इस सूरह का प्रसिद्ध अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें

पिछला सूरा:
अल-काफ़िरून
क़ुरआन अगला सूरा:
अल-मसद्द
सूरा 110 - अन-नस्र

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सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. सूरा अन्-नस्र,(अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ), भाष्य: मौलाना मौदूदी. अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित. पृ॰ 1036 से.
  2. "सूरा अन्-नस्र का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस)". https://quranenc.com. मूल से 22 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 16 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  3. "An-Nasr सूरा का अनुवाद". http://tanzil.net. मूल से 25 अप्रैल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  4. "Quran Text/ Translation - (92 Languages)". www.australianislamiclibrary.org. मूल से 30 जुलाई 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 March 2016.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]