अश-शूरा

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सूरा अश-शूरा (इंग्लिश: Ash-Shura) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 42 वां सूरा या अध्याय है। इसमें 53 आयतें हैं।

नाम[संपादित करें]

सूरा अश-शूरा

सूरा 'अश्-शूरा[1]या सूरा अश़्-शूरा[2] का नाम इस सूरह की आयत 38 के वाक्यांश “अपने मामले आपस के परामर्श (अश-शूरा) से चलाते हैं" से उद्धृत है। इस नाम का मतलब यह है कि वह सूरा जिसमें शूरा शब्द आया है।

अवतरणकाल[संपादित करें]

मक्कन सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मक्का के निवास के समय हिजरत से पहले अवतरित हुई।

इस्लाम के विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि इसकी विषय-वस्तु पर विचार करने से साफ़ महसूस होता है कि यह सूरा 41 (हा . मीम . अस-सजदा) के पश्चात् संसर्गतः अवतरित हुई होगी , क्योंकि यह एक प्रकार से बिलकुल उसकी अनुपूरक दिखाई देती है। सूरा 41 (हा . मीम . अस-सजदा) कुरैश के सरदारों के अन्धे-बहरे विरोध पर बड़ी गहरी चोटें की गई थीं, उस चेतावनी के तुरन्त पश्चात् यह सूरा अवतरित की गई जिसने समझाने-बुझाने का हक़ अदा कर दिया।

विषय और वार्ता[संपादित करें]

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि बात का आरम्भ इस तरह किया गया है कि (मुहम्मद सल्ल. पर ईश-प्रकाशना कोई निराली बात नहीं।) ऐसी ही प्रकाशना इसी प्रकार के आदेश के साथ अल्लाह इससे पहले भी नबियों (उन पर ईश्वर की दया और कृपा हो) पर निरन्तर भेजता रहा है । इसके बाद बताया गया है कि नबी (सल्ल.) केवल बेसुध लोगों को चौकाने और भटके हुओं को रास्ता बताने आया है। (वह ख़ुदा के पैदा किए हुए लोगों के भाग्य का मालिक नहीं बनाया गया है।) उसकी बात न माननेवालों का संप्रेक्षण और उन्हें यातना देना या न देना अल्लाह का अपना काम है। फिर इस समस्या के रहस्य को व्यक्त किया गया है कि अल्लाह ने सारे मनुष्यों को जन्मजात सत्यनिष्ठ क्यों न बना दिया और यह मतभेद की सामर्थ्य क्यों दे दी जिसके कारण लोग विचार और कर्म के हर उल्टे-सीधे रास्ते पर चल पड़ते हैं। इसके बाद यह बताया गया है कि जिस धर्म को मुहम्मद (सल्ल.) प्रस्तु कर रहे हैं, वह वास्तव में है क्या। उसका सर्वप्रथम आधार यह है कि अल्लाह चूंकि जगत् और मानव का स्रष्टा, मालिक और वास्तविक संरक्षक मित्र है, इसलिए वही मानव का शासक भी है और उसी को यह अधिकार प्राप्त है कि मानव को दीन और शरीअत (धर्म और विधि-विधान अर्थात् धारणा और कर्म की प्रणाली) प्रदान करे। दूसरे शब्दों में नैसर्गिक प्रभुत्व की तरह विधि-विधान सम्बन्धी प्रभुत्व भी अल्लाह ही के लिए सुरक्षित है। इसी आधार पर अल्लाह ने आदिकाल से मानव के लिए धर्म निर्धारित किया है। वह एक ही धर्म था जो हरेक युग में समस्त नबियों को दिया जाता रहा । कोई नबी भी अपने किसी अलग धर्म का प्रवर्तक नहीं था। वह धर्म सदैव इस उद्देश्य के लिए भेजा गया है कि धरती पर वही स्थापित और प्रचलित और क्रियान्वित हो। पैग़म्बर ( उन पर ईश - दया और कृपा हो) इस धर्म के मात्र प्रचार पर नहीं, बल्कि उसे स्थापित करने के सेवा-कार्य पर नियुक्त किए हुए थे। मानव - जाति का दूसरा धर्म यही था, किन्तु नबियों के पश्चात् हमेशा यही होता रहा कि स्वार्थी लोग उसके अन्दर अपने स्वेच्छाचार, अहंकार और आत्म प्रदर्शन की भावना के कारण अपने व्यक्तिगत हित के लिए साम्प्रदायिकता खड़ी करके नए - नए धर्म अविष्कृत करते रहे। अब मुहम्मद (सल्ल.) इसलिए भेजे गए हैं कि कृत्रिम पंथों और कृत्रिम धर्मों और मानव - रचित धर्मों की जगह वही वास्तविक धर्म लोगों के समक्ष प्रस्तुत करें और (पूरी दृढ़ता के साथ) उसी को स्थापित करने की कोशिश करें। तुम लोगों को एहसास नहीं है कि अल्लाह के धर्म को छोड़कर अल्लाह के अतिरिक्त दूसरों के बनाए हुए धर्म और क़ानून को ग्रहण करना अल्लाह के मुक़ाबले में कितना बड़ा दुस्साहस है। अल्लाह की दृष्टि में ये निकृष्टतम बहुदेववादी प्रथा और जघन्य अपराध है , जिसका कठोर दण्ड भुगतना पड़ेगा। इस तरह धर्म की एक साफ़ और स्पष्ट धारणा प्रस्तुत करने के पश्चात् कहा गया है कि तुम लोगों को समझाकर सीधे रास्ते पर लाने के लिए जो उत्तम - से - उत्तम उपाय सम्भव था वह प्रयोग में लाया जा चुका। इसपर भी यदि तुम मार्ग न पाओ तो फिर संसार में कोई चीज़ तुम्हें सीधे रास्ते पर नहीं ला सकती। इन यथार्थ तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए बीच - बीच में संक्षिप्त रूप में एकेश्वरवाद और परलोकवाद के प्रमाण दिए गए हैं और सांसारिकता के परिणामों से सावधान किया गया है। फिर वार्ता को समाप्त करते हुए दो महत्त्वपूर्ण बाते कही गई हैं:

एक यह कि मुहम्मद (सल्ल.) को अपने जीवन के आरम्भिक 40 वर्षों मे किताब की धारणा से बिलकुल रहित और ईमान की समस्याओं और वार्ताओं से नितान्त अनभिज्ञ रहना , और फिर अचानक इन दोनों चीज़ों को लेकर संसार के समक्ष आ जाना आपके नबी होने का स्पष्ट प्रमाण है। दूसरे यह कि ईश्वर ने यह शिक्षा तमाम नबियों की तरह आप (सल्ल.) को भी तीन तारीक़ों से दी है— एक प्रकाशना, दूसरे परदे के पीछे से आवाज़ और तीसरे फ़रिश्ते के द्वारा संदेश। यह इसलिए स्पष्ट किया गया, ताकि विरोधी लोग यह मिथ्यारोपण न कर सके कि नबी (सल्ल.) ईश्वर से उसके सम्मुख होकर बात करने का दावा कर रहे हैं।

सुरह "अश-शूरा" का अनुवाद[संपादित करें]

बिस्मिल्ला हिर्रह्मा निर्रहीम अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है।

इस सूरा का प्रमुख अनुवाद:

क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी "मुहम्मद अहमद" [3] ने किया।

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

इस सूरह का दूसरे अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें ash-Shura 42:1

पिछला सूरा:
फुस्सीलत
क़ुरआन अगला सूरा:
अज़-ज़ुख़रुफ़
सूरा 42

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सन्दर्भ:[संपादित करें]

  1. अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ, भाष्य: मौलाना मौदूदी. अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित. पृ॰ 690 से.
  2. "सूरा अश़्-शूरा का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस)". https://quranenc.com. मूल से 22 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  3. "Ash-Shura सूरा का अनुवाद". http://tanzil.net. मूल से 25 अप्रैल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]