गुर्जर प्रतिहार राजवंश

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गुर्जर प्रतिहार शताब्दी से ११वीं शताब्दी के मध्य उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से पर राज्य करने वाला राजवंश था। मिहिरभोज इनका सबसे महान राजा था। अरब लेखक मिहिरभोज के काल को सम्पन्न काल [1][2] बताते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि इन प्रतिहारों ने भारत को अरब हमलों से लगभग ३०० साल तक बचाया था, इसलिए प्रतिहार (रक्षक) नाम पड़ा।

गुर्जर प्रतिहार राजाओ के शुरुआती नाम, सिक्के, अरबो द्वारा ज़ुज़र बोला जाना, मिहिर उपाधि धारण करना जो की हूण राजा मिहिरकुल ने धारण की, वराह उपाधि धारण करना ओर भी कई बातो स गुर्जर राजवंश प्रतिहार हूणों का वंशज शाबित होता है।ref> Sun Worship in Ancient India. Motilal Banarasidass. 2006. प॰ 80. https://books.google.co.in/books?redir_esc=y&id=A00VAAAAMAAJ&focus=searchwithinvolume&q=Gurjara+pratihara. </ref>[3]

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य
6ठीं शताब्दी – 1036 ई.
Location of गुर्जर राजवंश
गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की सीमा दर्शाता हुआ नक्शा
राजधानी Kannauj
धर्म हिंदुत्व
सरकार Monarchy
ऐतिहासिक युग मघ्यकालीन भारत
 - संस्थापित 6ठीं शताब्दी
 - विसंस्थापित 1036 ई.

राजस्थान का युध्द[संपादित करें]

Kanauj triangle

गुर्जर प्रतिहारों ने जोधपुर में स्थित मांदव्यपुर (वर्तमान मंदोर) को जीत लिया और यहाँ एक दुर्ग की स्थापना की। तीसरे के पौत्र नागभट ने जोधपुर में मेड़ांतक (वर्तमान मेड़ता) में अपनी राजधानी बनाई। यह माना जा सकता है कि हरश्चिन्द्र छठी शताब्दी के मध्य में रहा होगा और नागभट का राज्यकाल उससे एक शताब्दी पीछे निश्चित किया जा सकता है। नागभट का एक उत्तराधिकारी सिलुक, आठवीं शताब्दी के मध्य भाग में अपने वंश के वल्लमंडल नामक राज्य का शासक कहा जाता था। इसी शताब्दी के उत्तरार्ध में वल्लमंडल के गुर्जर प्रतिहारों ने मालव के गुर्जर प्रतिहारों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया, और नवीं शताब्दी के तीसरे चतुर्थांश तक राज्य करते रहे।

गुर्जर प्रतिहार राजवंश की एक शाखा, जो मालव में आठवीं शताब्दी के प्रथम भाग से शासन करती रही थी, इसका सबसे प्राचीन ज्ञात सम्राट् नागभट प्रथम था, जो अपने मालव राज्य को सिंध के अरबों के आक्रमणों से बचाने में सफल हुआ था। नागभट प्रथम दक्षिण के राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग से पराजित हुआ, जिसने अपनी विजय के पश्चात् उज्जैन में हिरण्यगर्भदान करवाया। आठवीं शताब्दी के अंतिम भाग में इस वंश के राजा वत्सराज ने गुर्जरदेश राज्य को जीत लिया और उसे अपने राज्य में मिला लिया। उसके पश्चात् उसने उत्तर भारत पर अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिये बंगाल के पालों से अपनी तलवार आजमाई। उसने गंगा और यमुना के बीच के मैदान में पाल धर्मपाल को परास्त कर दिया, और अपने सामंत शार्कभरी के चहमाण दुर्लभराज की सहायता से बंगाल पर विजय प्राप्त की, और इसी प्रकार वह गंगा के डेल्टा तक पहुँच गया। वत्सराज का पुत्र तथा उत्तराधिकारी नागभट द्वितीय, सन् ८०० ई. के लगभग गद्दी पर बैठा था। नागभट द्वितीय का पौत्र गुर्जर सम्राट मिहिर भोज इस वंश का सबसे महान् सम्राट् समझा जाता है उसके राज्यकाल में प्रतिहार राज्य पंजाब और गुजरात तक फैल गया। भोज बंगाल के पालोंt, दक्षिण के राष्ट्रकूटों और दक्षिणी गुजरात से लड़ा,

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Bakshi, S. R.; Gajrani, S.; Singh, Hari, सं (2005). Early Aryans to Swaraj. नई दिल्ली: Sarup & Sons. पृ. 319–320. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7625-537-8. https://books.google.com/books?id=Ldo1QtQigosC&pg=PA319. 
  2. New Image of Rajasthan. Directorate of Public Relations, Govt. of Rajasthan. 1966. प॰ 2. 
  3. "Bombay (India : State) (1901) Gazetteer of the Bombay Presidency". Govt. Central Pres. 1901. https://books.google.co.in/books?redir_esc=y&id=Wr4MAAAAIAAJ&focus=searchwithinvolume&q=Mihir. 
  • आर. सी. मजुमदार : गुर्जर प्रतिहार;
  • आर. एस. त्रिपाठी : कन्नौज का इतिहास।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]