उज्जयिनी

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
उज्जैन का प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर

वर्तमान उज्जैन नगर, जो कि भारत के मध्य प्रदेश में स्थित है, उसे प्राचीन काल में उज्जयिओनी कहा जाता था। इसी से वर्तमान नाम उज्जैन पड़ा है। यह सात मोक्षदायिनी नगरियों, सप्तपुरियों में आता है।

उज्जयिनी[संपादित करें]

संसार में संभवत: कोई भी तीर्थ स्थान ऐसा नहीं होगा जिसे तीथों का तीर्थ कहा जा सके। एक तीर्थ के रूप में अनेक नगरियों की अपनी-अपनी मान्यताएँ हैं, विश्वास है। परंतु उज्जैन सही मायने में तीर्थों का तीर्थ है। महाकालेश्वर की प्राणप्रतिष्ठा यहाँ हुईं हैं। ऐसी भी मान्यता है कि महाप्रलय के बाद मानव सृष्टि का आरंभ इसी पावन भू-भाग से हुआ है।

महाकाल तीर्थ क्षेत्र की महानता केदार तीर्थ और बनारस (काशी) से भी अधिक मानी गयी है। सर्वाधिक पुण्यमय भूमि, अद्भुत पापनाशी, अलौकिक शांति और मनोवांछित फल देने में इस क्षेत्र का पृथ्वी पर कोई सानी नहीं है।

महाकालेश्वर और वीर विक्रमादित्य की प्रसिध्द नगरी उज्जैन भारत की अत्यंत प्राचीन नगरी है। भारतीय पुरातन साहित्य में अनेक स्थानों पर इसकी महिमा और वैभव के वर्णन है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से उज्जैन (अवंतिका) का महत्व उल्लेखनीय है।

आज जो नगर उज्जैन नाम से जाना जाता है वह अतीत में अवंतिका, विशाला, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णशृंगा, अमरावती आदि अनेक नामों से अभिहित रहा। मानव सभ्यता के प्रारंभ से यह भारत के एक महान तीर्थ-स्थल के रूप में विकसित हुआ। पुण्य सलिला क्षिप्रा के दाहिने तट पर बसे इस नगर को भारत की मोक्षदायक सप्तपुरियों में एक माना गया है।

कहा जाता है कि उज्जयिनी का प्रत्येक कंकर शंकर का ही स्वरूप है। भारत के सर्वज्ञात द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक महालोकेश भगवान महाकालेश्वर तो यहाँ अनंत काल से विराजित है ही। स्कन्द पुराण के अवन्तिखंड में वर्णित चौरासी महादेव का अपना अलग ही माहत्म्य है।

महाकाल की इस नगरी का महत्व इसलिये भी है कि यहां पर पांच वस्तु-श्मशान, उखर, क्षेत्र हरसिध्द पीठ तथा वन एक ही स्थान पर हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ है।

नालन्दा और काशी के पूर्व उज्जयिनी ने शैक्षणिक महत्ता प्राप्त कर ली थी। इसी कारण बलराम-कृष्ण को अपने मित्र सुदामा के साथ उज्जयिनी के सान्दीपनि आश्रम में विद्याध्ययन के लिये आना पत्रडा।

उज्जयिनी स्थित सुप्रसिध्द पुरातन शिक्षा केंद्र में चारों वेदों, वेदांगों, उपनिषदों आदि का सांगोपांग अध्यापन होता था। मंत्र, देवताओं के ज्ञान, धर्म शास्र, न्याय शास्र, राजनीति शास्र, हस्तशिल्प, अश्व शिक्षा, समस्त कलाओं, लेखा, गणित, गान्धर्व-वेद, वैद्यक-शास्र, अस्र-शस्र आदि की शिक्षा व्यवस्था यहां पर थी। शास्रों के प्रयोगकी विधिवत् क्रियात्मक एवं प्रायोगिक जानकारी दी जाती थी। राजनीति के अध्येता संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वेध और आश्रय आदि छ:भेदों का ज्ञान यहां प्राप्त करते थे।

उज्जयिनी के गौरवशाली विक्रमादित्य के राज्य में निवास करने वाले नवरत्नों को हमेशा याद किया जाता है। इनमें कवि-कुलगुरू कालिदास, प्रकांड ज्योतिषी वराह मिहिर, आयुर्वेद के सर्वोपरि आचार्य धनवंतरी, वैयाकरण वरूरूचि, अमरकोष के रचयिता ओर बौध्द धर्म के आचार्य अमर सिंह, नीतिसार ग्रंथ के रचयिता घट कर्पर, ज्योतिष के विद्वान क्षपणक, तंत्र साधन और बैताल कथाओ के नाम से जनश्रुतियों में लोकप्रिय बैताल भट्ट और शबर स्वामी के पुत्र शंकु का उल्लेख मिलता है। ज्योतिर्विदाभरण में उज्जयिनी, वहां के राजा विक्रमादित्य, विक्रमादित्य की विजयें, उसके द्वारा रोम के रोजा को पराजित करना तथा उसके आश्रित नव रत्नों सहित अनेक विद्वानों की चर्चा पायी जाती है।

सिंहस्थ के धार्मिक आध्यात्मिक स्वरूप को समझने के लिय सिंहस्थ माहात्म्य में उल्लेखित यह पंक्तियां काफी हैं-

कुशस्थली तीर्थवर, देवानामपि, दुर्लभम्।

माधर्व, धवलें पक्षे सिंहे जीवे इनोश्चगे॥

तुलाराशौ क्षपानाथे स्वातिथे पूर्णिमा तिथौ।

व्यतिपाते तु सम्प्राप्से चंद्रवासर संयुते॥

एतेनशत महायोग: स्नानान्मुक्ति फलप्रदा।

वैशाख मास[संपादित करें]

वैशाख मास में अवंतिका वास का विशेष पुण्य कहा गया है। चैत्र पूर्णिमा से वैशाखी पूर्णिमा पर्यन्त कल्पवास, नित्य क्षिप्रा स्नान-दान, तीर्थ के प्रधान देवताओं के दर्शन, स्वाध्याय, मनन-चिंतन, सत्संग, धर्म ग्रंथों का पाठन-श्रवण, संत-तपस्वी, विद्वान और विप्रो की सेवा, संयम, नियम, उपवास आदि के संकल्प के साथ तीर्थवास का महत्व है। जो आस्थावान व्यक्ति बैशाख मास में यहां वास करता है, वह स्वत: शिवरूप हो जाता है।

सिंहस्थ कुम्भ[संपादित करें]

सिंहस्थ महापर्व के अवसर पर उज्जयिनी का धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व स्वयमेव कई गुना बत्रढ जाता है। साधु संतों का जमाव, सर्वत्र पावन स्वरों का गुंजन, शब्द एवं स्वर शक्ति का आत्मिक प्रभाव यहां प्राणी मात्र को अलौकिक शांति देता है।

सिंहस्थ (कुंभ) महापर्व धार्मिक व आध्यात्मिक चेतना का महापर्व है। धार्मिक जागृति द्वारा मानवता, त्याग, सेवा, उपकार, प्रेम, सदाचरण, अनुशासन, अहिंसा, सत्संग, भक्ति-भाव अध्ययन-चिंतन परम शक्ति में विश्वास और सन्मार्ग आदि आदर्श गुणों को स्थापित करने वाला पर्व है।

कुंभ महापर्व में भारतवासियों की आत्मा, आस्था, विश्वास और संस्कृति का शंखनाद करती है हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जयिनी की पावन सरिताओं के तट पर। उज्जैन और नासिक का कुंभ (सिंह राशि के गुरू में) मनाये जाने के कारण सिंहस्थ कहलाते है। बारह वर्ष बाद फिर-फिर आने वाले कुंभ के माध्यम से उज्जैन के क्षिप्रा तट पर उभरता है एक लघु भारत।

भारतीय संस्कृति, आस्था ओर विश्वास के प्रतीक कुंभ का उज्जैन के लिये केवल पौराणिक कथा का आधार ही नहीं, अपितु काल चक्र या काल गणना का वैज्ञानिक आधार भी है। भौगोलिक दृष्टि से अवंतिका-उज्जयिनी या उज्जैन कर्कअयन एवं भूमध्य रेखा के मध्य बिंदु पर अवस्थित है।

भारतीय संस्कृति के समौच्च दर्शन कहां होते हैं? इस प्रश्न का सर्वाधिक निर्विवाद उत्तर है मेले और पर्व। धार्मिक दृष्टि से सिंहस्थ महापर्व की अपनी महिमा है परंतु इसके समाजशास्रीय महत्व सेभी बिरले ही इंकार करेंगे।

सिंहस्थ सामाजिक परिवर्तन और नियंत्रण की स्थितियों को समझने और तद् नुरूप समाज निर्माण का एक श्रेष्ठ अवसर है। एक मायने के हम इसे द्वादश वर्षीय 'जन सम्मेलन' कह सकते हैं।

सिंहस्थ पर्व का सर्वाधिक आकर्षण विभिन्न मतावलंबी साधुओंका आगमन, निवास एवं विशिष्ट पर्वों पर बत्रडे उत्साह, श्रध्दा, प्रदर्शन एवं समूहबध्द अपनी-अपनी अनियों सहित क्षिप्रा स्नान है। लाखों की संख्या में दर्शक एवं यात्रीगण इनका दर्शन करते हैं और इनके स्नान करने पर ही स्वयं स्नान करते हैं। इन साधु-संतों व उनके अखात्रडों की अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं।

महाकालेश्वर मंदिर[संपादित करें]

भूतभावन भगवान महाकालेश्वर की गणना भारतवर्ष के सुप्रसिध्द द्वादश ज्योतिर्लिंगों में की गयी है। पुराणों के अनुसार भगवान महाकालेश्वर अवंती क्षेत्र एवं महाकाल वन के शैव क्षेत्र के क्षेत्राधिपति माने गये हैं।महाकालेश्वर मंदिर हिन्दुओ का प्रमुख तीर्थ स्थान है.

ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर स्वयंभू माने गये हैं। दक्षिणामूर्ति होने से तंत्र की दृष्टि से उनका विशिष्ट महत्व है। प्रतिवर्ष लाखों तीर्थयात्री उनके दर्शन कर स्वयं को कृतकृत्य मानते हैं। कुंभ के पावन पर्व पर पवित्र क्षिप्रा में स्नान करते हैं और भगवान महाकाल के दर्शन करते हैं।

प्रजा व सृष्टि के कारण रूप, भयविनाशक, देवाराधित, ध्यानस्थ महात्माओं के अव्यक्त हृदय में एकाग्र रूप से विराजित, सोमलेखा, कपाल एवं महिवलय से मंडित-आदिदेव द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक भगवान महाकालेश्वर की जय-जयकार को पुनीत-अवंतिका नगरी युग-युग से सुनती आ रही है।

देखें[संपादित करें]