उज्जैन का इतिहास

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उज्जयिनी की ऐतिहासिकता का प्रमाण ई.पु सन 600 वर्ष पूर्व मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में जो सोलह जनपद थे उनमें 'अवंति' जनपद भी एक था। अवंति उत्तर एवं दक्षिण इन दो भागों में विभक्त होकर उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी महिष्मति थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नामक सम्राट सिंहासनारूदह थे। प्रद्योत के वंशजों का उज्जैन पर ईसा की तीसरी शताब्दी तक प्रभुत्व था।

पौराणिक संदर्भ[संपादित करें]

उज्जयिनी के प्राचीन इतिहास के विषय में अनेक भ्रांतिया है। यह निश्चत पूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि उज्जयिनी की नींव सर्वप्रथम किसने डाली। कतिपय विद्वान जन अच्युतगामी को उज्जयिनी को बसाने वाला मानते हैं। किन्तु प्रमाणिकता के आधार पर इतिहास भी मौन है। पुराणों के आधार पर उज्जयिनी के इतिहास पर प्रकाा डाला गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार त्रिपुर राक्षस का वध करके भगवान शंकर ने उज्जयिनी बसाई। इसी प्रकार अवंति खंड में भी विस्तार पूर्वक वर्णन से सनकादि ॠषियों द्वारा दिया नामोललेख उज्जयिनी बताया गयाहै।

उज्जयिनी की ऐतिहासिकता का प्रमाण ई. सन600 वर्ष पूर्व मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में जो सोलह जनपद थे उनमें अवंति जनपद भी एक था। अवंति उत्तर एवं दक्षिण इन दो भागों में विभक्त होकर उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी महिष्मति थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नामक सम्राट सिंहासनारूत्रढ थे। प्रद्योत के वंशजों का उज्जैन पर ईसा की तीसरी शताब्दी तक प्रभुत्व था। मौर्य साम्राज्य के अभुदय होने पर मगध सम्राट बिन्दुसार के पुत्र अशोक उज्जयिनी के समय नियुक्त हुए। बिन्दुसार की मृत्योपरान्त अशोक ने उज्जयिनी के शासन की बागडोर अपने हाथों में सम्हालि और उज्जयिनी का सर्वांगीण विकास कियां सम्राट अशोक के पश्चात उज्जयिनी ने दीर्घ काल तक अनेक सम्राटों का उतार चत्रढाव देखा। सातवीं शताब्दी में उज्जैन कन्नौज के हर्षवर्धन साम्राज्य में विलीन हो गया। उस काल में उज्जेन का सर्वांगीण विकास भी होता रहा।

सन् 648 ई. में हर्ष वर्धन की मृत्यु के पश्चात नवी शताब्दी तक उज्जैन परमारों के आधिपत्य में आया जो गयारहवीं शताब्दी तक कायम रहा इस काल में उज्जैन की उन्नति होती रही। इसके पश्चात उज्जैन चौहान और तोमर राजपूतों के अधिकारों मे आ गया।

सन् 1235ई. में दिल्ली का शमशुद्दीन इल्तमिश विदिशा विजय करके उज्जैन की और आया यहां उस क्रूर शासक ने ने उज्जैन को न केवल बुरी तरह लूटा अपितु उनके प्राचीन मंदिरों एवं पवित्र धार्मिक स्थानों का वैभव भी नष्ट किया। सन् 1737 ई. में उज्जैन सिंधिया वंश के अधिकार में आया उनका सन 1880 ई. तक एक छत्र राज्य रहा जिसमें उज्जैन का सर्वांगीण विकास होता रहा। राणोजी सिंधिया ने महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोध्दार कराया। उज्जयिनी में आज भी अनेक धार्मिक पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थान हैं जिनमें भगवान महाकालेश्वर मंदिर, गोपाल मंदिर, चौबीस खंभा देवी, चौसठ योगिनियां, नगर कोट की रानी, हरसिध्दिमां, गढ़ की कालका, साँदिपनी आश्रम, काल भैरव, विक्रांत भैरव, मंगलनाथ, सिध्दवट, बोहरो का रोजा, बिना नींव की मस्जिद, गज लक्ष्मी मंदिर, बृहस्पति मंदिर, नवगृह मंदिर, भूखी माता, भर्तृहरि गुफा, पीरमछन्दर नाथ समाधि, कालिया देह पैलेस, कोठी महल, घंटाघर, जन्तर मंतर महल, चिंतामन गणेश, चाैरासी(८४) महादेव मंदिर आदि प्रमुख हैं।

उज्जैन के शासक[संपादित करें]

इतिहास काल के पूर्व महाभारत में विद और अनुविंद उज्जयिनी के शासक बताये गये हैं, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। बौद्धकाल में यह एक विस्तृत राज्य के रूप में था, जिसमें उज्जयिनी एक बड़ी व्यापारिक मण्डी के रूप में विकसित थी। पाली साहित्यों के अनुसार यह नगरी राजा चंद्रप्रद्योत की राजधानी थी। यह राजा गौतम बुद्ध का समकालीन था। उसके तीन पुत्र तथा वासवदत्ता नामक एक पुत्री थी। वासवदत्ता ही बाद मे कौशल सम्राट उदयन की प्रधान रानी हुई। धम्मपद के टीका में इसका उल्लेख है। दण्डिन ने इसी आधार पर ""वासवदत्ता' लिखी। "मंझिम निकाय' से पता चलता है कि राजा चण्डप्रद्योत ने आसपास के राजाओं को अपने अधिपत्य में कर लिया था। उसकी बढ़ती हुई शक्ति को देखकर सम्राट् बिम्बसार के पुत्र अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह को सुरक्षित कर लिया था।

मगध अधीन[संपादित करें]

इसके बाद ईसा से ४थी सदी पूर्व यह मगध साम्राज्य के अधीन हो गई। मौर्य साम्राज्य में यह अवन्ति प्रांत की राजधानी के रूप में थी। पाटलिपुत्र की भांति इस शहर का प्रबंध भी एक नगरवेक्षिका समिति के अंतर्गत होता था। वहाँ मौर्य सम्राट की ओर से एक राज्य प्रतिनिधि रहने लगा। सम्राट अशोक को उसके पिता बिंदुसार ने मालवा का प्रतिनिधि बनाकर भेजा था। अपने पिता के मृत्युपर्यंत वे यहीं रहे।

मौर्य साम्राज्य के अंत के साथ ही उज्जैन की प्रभुता भी घट गई। टालेमी के अनुसार यह (ओजन) चेष्टन की राजधानी थी। चेष्टन पर क्षत्रप राजाओं का शासन था। कुछ ही समय बाद गौतमपुत्र शातकर्णी ने चष्टन को हराकर इस पर अपना अधिकार कर लिया। सातवाहनों का अधिकार भी उज्जैन पर अधिक दिनों तक नहीं रह सका। रुद्रदमन ने अवन्ति तथा अन्य प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया। आंध्र तथा गिरनार अभिलेख इसके प्रमाण हैं। इस समय उज्जैन पुनः क्षत्रपों की राजधानी हो गई।

प्रतापी शासक विक्रमादित्य के काल के संबंध में बहुत मतभेद है। कहा जाता है कि बर्बर शकों पर विजयी प्राप्त करने के उपलक्ष्य में विक्रम संवत् की शुरुआत करने विक्रमादित्य अपने नवरत्नों के साथ यहीं राज्यसभा करते थे। इन नवरत्नों में मेघदूत के रचयिता कालिदास सबसे प्रसिद्ध हैं।

हर्षवर्धन अधीन[संपादित करें]

सातवीं शताब्दी में उज्जैन कन्नौज-नरेश हर्षवर्धन के राज्य में सम्मिलित हो गया। चीनी यात्री ह्मवेनसांग ने लिखा है कि इस काल में भी यह एक प्रसिद्ध नगर था। यहाँ के लोग समृद्ध थे। उनकी चाल-ढ़ाल सुराष्ट्र के लोगों जैसी थी।

सम्राट हर्ष की मृत्यू के बाद उत्तरी भारत में राज्य निप्लव हुआ। इससे उज्जैन भी प्रभावित हुआ। ९ वीं सदी के आरंभ में राजपूतों का उदय हुआ। उज्जैन परमार राजपूतों के अधिकार में आ गया। १२ वीं शताब्दी तक वे इस पर शासन करते रहे। इसी काल में गुजरात के चालुक्त्, चेदि के कलचुरी, बुँदेलखण्ड के चन्देल, मान्यखेत के राआजों तथा कई अन्य राजपूत वंश बारी-बारी से उज्जैन पर आक्रमण करते रहे। इससे उज्जैन की स्थिति खराब ही होती गई। परमारों क पतन के पश्चात यहाँ तोमर राजपूतों का राज्य रहा, किंतु इसके पश्चात से उज्जयिनी का अधःपतन आरंभ होगा। सन् १२३५ ई. में इल्तुतमिश ने उज्जयिनी में लुटपाट की अनेक मंदिरों को तो तोड़ डाला। महाकाल मंदिर से महादेव की स्वर्ण मूर्ति तथा कई अन्य मूर्तियों को अपने साथ दिल्ली ले गया।

दिल्ली सल्तनत[संपादित करें]

सन् १४०१ से १५५१ ई. तक यह नगरी दिल्ली सल्तनत के अधीन ही रहा। सन् १५५१ में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने उज्जैन को अपने अधिकार में कर लिया। फिर हुमायूं ने बहादुरशाह को युद्ध में परास्त करके गुजरात के सरदार मल्लूखः से उज्जैन छीन लिया, किंतु हुमायूं के चले जाने के पश्चात् मल्लूखा ने उज्जैन पर पुद्ध: अधिकार कर लिया। सन् १५३६ में उसने कादिरशाह के नाम से अपने को मालवा का शासक घोषित कर दिया। सन् १५४२ में शेरशाह ने मालवा जीतकर उज्जैप पर कब्जा कर लिया। सन् १५५४ तक यहाँ पर "सूरी' शासको का कब्जा बना रहा। शासक शुजात खाँ की मृत्यू के बाद उसका पुत्र बाजबहादुर स्वाधीन हो गया। सन् १५६२ ई. में अकबर ने बाजबहादुर को परास्त कर उज्जैन को मालवा प्रान्त की राजधानी बनाकर एक प्रतिनिधि सूबा रख दिया। सन् १६५८ में उज्जैन के समीप ही औरंगजेब और उसके भाई मुराद ने राजकुमार दारा की ओर से लड़ रहे जोधपुर नरेश जसवन्तसिंह को परास्त किया। इस काल में भी उज्जैन की शोभा व प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। सन् १७३३ ई. में मोहम्मदशाह ने अचानक जयपुर महाराजा सवाई जयसिंह को उज्जैन का प्रांताध्यक्ष सूबा नियत कर दिया। इसके बाद उज्जैन पुनः उन्नति की ओर अग्रसर हुआ।

उज्जैन की मुद्राएँ[संपादित करें]

उज्जैन के ऐतिहासिक स्रोतों में मुद्राओं का विशेष योगदान है। इस नगरी के नाम से प्रसिद्ध उज्जैन मुद्रा यहाँ की राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं व्यावसायिक इतिहास पर प्रकाश डालती है। इन सिक्कों पर एक प्रकार का चिंह खुदा हुआ होता था, जिसमें धन चिंह के चारों सिरों पर एक-एक बिंदू बनाई गई होती थी। इन चिंहों के अनेक विस्तृत रूप भी पाये गये हैं, जो संभवतः शुभ-संकेत द्योतक स्वास्तिक का ही रुपांतर है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि धन चिंह व उसके चारों तरफ बने बिंदूओं से उज्जैन के चारों तरफ बसे नगरों और समृद्ध क्षेत्रों से उसके संबंध का बोध होता है। इसी प्रकार के चिंह सुदूरवर्ती आंध्रप्रदेश के राजाओं के सिक्कों पर भी मिलते हैं। इससे उज्जैन के विस्तीर्ण क्षेत्र, उसकी घनी बस्ती, उनके संपर्क, आवागमन तथा व्यवसायिक संबंधों का पता चलता है।

ईसा-पूर्व चौथी या तीसरी सदी (मौर्य काल के आसपास) तक यहाँ आहत मुद्राओं का प्रचलन रहा। यहाँ की कुछ आहत मुद्राएँ अन्य समकालीन आहत मुद्राओं से भिन्न है। तक्षशिला और कौशांबी की कुछ चिंहांकित मुद्राएँ महेश्वर और उसके पास कसरावद नामक स्थान पर मिली है। ये सभी ताम्र-मुद्राएँ हैं, जो मुद्रा-शास्र के सिद्धांतानुसार अधिक दूर तक प्रवास नहीं करते। इसके बाद से उज्जैन चिंह वाली मुद्राएँ मिलनी शुरु हो जाती है।

चिंहांकित मुद्राओं के बाद अनंतर जातीय और स्थानीय मुद्राओं का काल माना जाता है, जो चिंहित सिक्कों के ही परिवर्धित रूप कहे जा सकते हैं। मुद्रा-शास्र में इन मुद्राएँ सात वर्गों में विभक्त की गई है। इनके भी कई उपवर्ग हैं। ऐसी ज्यादातर मुद्राएँ अभिलेखहीन हैं, जिससे उनके कालक्रम को जानने का एक मात्र साधन उनपर अंकित चिंह ही है। संभवतः २ री सदी के मध्य से ही मुद्राओं पर लेख आने शुरु हुए। उज्जैन की मुद्राओं पर "ऊ-जिनीय' शब्द मिलता है। इसके बाद की मुद्राओं में स्थान के साथ-साथ शासकों के नाम आने लगे, जो अंततः शासक के नाम के रूप में रह गये। बाद में यह विरुदों से युक्त हो गया।

इस श्रेणी के सिक्कों में वैसे हैं, जिसमें एक ओर "जिष्णु' शब्द ब्राह्मी लिपि में खुदा है और दूसरी तरफ शंख, चक्र और त्रिपुण्ड का आकार है। वैसे तो उज्जैन शैव मत के केंद्र के रूप में जाना जाता है, लेकिन सिक्कों में शंख, चक्र आदि का दिखना यह निश्चित करता है कि कभी-न-कभी यहाँ वैष्णव धर्म का भी प्राबल्य रहा होगा। लिपि की दृष्टि से ये मुद्राएँ चौथी सदी ई. की लगती है, जो गुप्तकाल था। चंद्रगुप्त द्वितीय (३८०-४१३ ई.) के सिक्कों का यहाँ मिलना यह बताता है कि पश्चिमी मालवा पर अधिकार करने वाला वह पहला गुप्त नरेश था। मुद्राओं पर अधिकार करने वाला वह पहला गुप्त नरेश था। मुद्राओं पर अंकित "जिष्णु' संभवतः इस भू-भाग पर अधिकार करने वाले चंद्रगुप्त द्वारा प्रचलित मुद्राएँ हो सकती है, जिसका अर्थ "जयशील' हो सकता है।

यहाँ कुछ ऐसी भी मुद्राएँ बनी है, जिसकें एक ओर कलश या सिंह है तथा दूसरी ओर कुछ बिखरे अक्षर, जिन्हें मिलाकर "रामगुप्त' शब्द बनता है। रामगुप्त चंद्रगुप्त का बड़ा भाई था और उसके पूर्व का शासक भी। ये मुद्राएँ गुप्तकाल की अन्य मुद्राओं से कुछ हद तक असमानता रखती है। इसका आकार और तौल गुप्त-मुद्राओं से भिन्न, मालव-मुद्राओं के सदृश है, जिससे यह पता चलता है कि गुप्त शासकों ने मुद्राएँ ढ़ालने में मालव सिक्कों का ही अनुसरण किया था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस समय तक निश्चित रूप से ही मालव जाति के लोग यहाँ आकर बस गये थे।

गुप्तकाल के बाद से उज्जैन के इतिहसा की जानकारी के कई अन्य स्रोत भी सामने आ जाते थे। सिक्के विशेष सहायता नहीं देते।

उत्खनन[संपादित करें]

राज्य पुरातत्व विभाग ने यहाँ के तीन स्थलों वैश्य टेकड़ी, कुम्हार टेकड़ी और गढ़ भैरवगढ़ में उत्खनन करवाया। इसमें कई मृदभाण्ड व उसके टुकड़े, विविध प्रकार के मार्ग, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, पाषाण्स्र एवं ताम्रास्र, ताम्र-मुद्राएँ तथा कई अस्थि पं प्राप्त हुई है। इस खुदाई में उनके गृह-निर्माण शैली की भी जानकारी मिली।

भारतीय पुरातत्व विभाग ने यहाँ के तीन स्थलों वैश्य टेकड़ी, कुम्हार टेकड़ी और गढ़ तथा भैरवगढ़ में उत्खनन करवाया। इसमें कई मृद्भाण्ड व उसके टुकड़े, विविध प्रकार के मणि, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, पाषाणास्र एवं ताम्रास्र, ताम्र-मुद्राएँ तथा कई अस्थिपं प्राप्त हुई हैं। इस खुदाई में उनके गृह-निर्माण शैली की भी जानकारी मिली।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने गढ़ कलिका के मंदिर के निकट खुदाई का कार्य करवाया है। इस स्थान के विधिवत खुदाई से कई पुरातात्विक साक्ष्य सामने आये हैं। उत्खनन से पता चलता है कि यह स्थान ईसा पूव्र ७ वीं सदी से लेकर मध्यकाल के अंत (१४ वीं सदी) तक बसा हुआ था। शुरु की दो शताब्दियों के बारे में पता चलता है कि यहाँ की बस्ती के आसपास मिट्टी का प्राकार बना था, जिसमें लोहे तथा बाँस का प्रयोग किया गया था। प्राकार का पश्चिमी भाग नदी के बाहरी हिस्से में लकड़ी के दूहों और पटियों की एक सुव्यवस्थित कतार बनाई गई थी। प्राकार के बाहरी किनारों में छोड़े हुए जगह संभवतः इसके प्रवेश-द्वार थे। घर मिट्टी, पत्थर व पक्की ईंटों के बनते थे। निम्न-श्रेणी के लोग प्राकार से बाहर रहते थे।

५वीं सदी ई. पू. से लोगों का जीवन स्तर समुन्नत होता चला गया। किले को पानी से बचाने के लिए उसकी भींत कुछ उठा दी गई थी तथा बाहर की तरफ एक ईंट की दीवार बना दी गई थी। फर्श में पलस्तर का प्रयोग होने लगा था। घरों की छड़े लंबे कवेलुओं से ढ़कीं होती थी। ईंटों के तलघर भी बनने लगे थे।

धीरे-धीरे लोहे व ताम्बे का व्यवसाय बढ़ा। लोहे से भांति-भांति के औजार बनाये जाने लगे। खुदाई में उस समय की एक भट्टी का भी प्रमाण मिला है। कई स्थानों पर मिट्टी और मूल्यवान पत्थरों से बने गुटिकाएँ मिली है। संभवतः इन तैयार वस्तुओं का निर्यात भी किया जाता था। इसके अलावा यहाँ हाथी दाँत, पकी मिट्टी व पत्थरो की बनी वस्तुएँ, केश-सवर्तिकाएँ, बुनने की सूचियाँ, खेल के पासे, चूड़ियाँ, बाजूबंद, कंघे, दपंण के हत्थे आदि कई चीजें मिली है, जो वहाँ के लोगों की समुन्नत दिनचर्या का मान कराती है।

धीरे-धीरे वस्तुओं की बनावट सुगढ़ होती गई। ताम्र मुद्राओं में कई विविधताएँ आ गई। इनकी संख्या भी पहले के अपेक्षा बढ़ गई। १४ वीं सदी आते-आते मुस्लिम आक्रमणों से यहाँ की सभ्यता में ह्रास के लक्षण दिखने लगे। लोग इन पुरातात्विक स्थलों को छोड़कर दूसरे स्थानों में बस गये।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]