राजा गर्दभिल्ल

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राजा गर्दभिल्ल उज्जैन के एक शक्तिशाली और पराक्रमी राजा थे। उज्जैन में उनके वंश का शासन लंबे समय तक रहा वह भील [1] शासक थे [2] । राजा गर्दभिल्ल ही गंधर्वसेन अथवा गंधर्व भिल्ल परमार है [3] , इनके बेटे का नाम विक्रमादित्य था जिन्होंने भारत से शको को खदेड़ा था [4]। सम्राट विक्रमादित्य का नाम संभवतः भील्ल इल्ल से संबंधित रहा [5]

इस जनजाति से संबंधित ओडिशा के पूर्वी भाग के क्षेत्र को गर्दभिल्ल और भील प्रदेश कहा जाता है [6] । मौर्यकाल में पश्चिम और मध्य भारत में भील जनजाति के अंतर्गत 4 नाग राजा , 7गर्दभिल्ल भील राजा और 13 पुष्प मित्र राजाओं की स्वतंत्र सत्ता थी [7]

इतिहास[संपादित करें]

[8] राजा गर्दभिल्ल को कलकाचर्या नामक साधु की बहन सरस्वती से प्रेम था , साधु के खिलाफ जाकर उन्होंने सरस्वती का अपहरण कर लिया , इस पर उस साधु ने स्किथी/ स्किथियन राजा से सहयोग मांगा , लेकिन राजा गर्दभिल्ल से युद्ध करने की हिम्मत उस राजा में नहीं थी [9] , तब साधु ने शकों से सहायता मांगी , शक और गर्दभिल्ल की सेना में भयानक युद्ध हुआ , और गर्दभिल्ल युद्ध हार गए , लेकिन उनके वंशज सम्राट विक्रमादित्य ने पुनः शकों को पराजित कर उज्जैन पर पुनः अधिकार कर लिया ,राजा गर्दभिल्ल भील जनजाति से संबंधित थे [10] [11]। राजा गर्धभिल्ल की कुल 7 रानिया थी जिनमें भील रानी की कोख से धन्वन्तरि , ब्राह्मणी रानी की कोख से वररुचि, बनयानी की कोख से शंकु, शूद्रा रानी की कोख से बेतालभट्ट, सतधारी नाम की रानी से वराहमिहिर पैदा हुए थे। उनकी क्षत्रिय रानी मृगनयनी थी शिवकी परमाराध्या थी नित्य भण्डारा करती थी। क्षिप्रा के जल से सूर्य को अर्घ्य देने वाली चम्पावर्णी स्त्री होने के कारण चम्पावती कहलायी थी ऐसा लिखा मिलता है [12] । इन्हीं रानियों में एक अड़ोलिया रानी का भी वर्णन मिलता है जो युद्ध भूमि में अपनी वीरता के करना प्रसिद्ध थी [13] । राजा विक्रमादित्य [14]की विजय से प्रभावित होकर आगे आने वाले समय में कुल 14 उपाधियों विक्रमादित्य नाम से अन्य राजाओं को दी गई ।

शासक[संपादित करें]

अवंती में गर्दभिल्ल वंश का शासन 152 वर्ष तक रहा [15]। राजा गर्दभिल्ल के बाद शकों ने महज 4 वर्ष अवंती पर शासन किया उन्हें सम्राट विक्रमादित्य ने प्रास्त कर के पुनः अवंती साम्राज्य पर गर्दभिल्ल वंश का शासन स्थापित किया । गर्दभिल्ल वंश में कुल 7 भील राजा हुए [16]

गदर्भ सिक्के[संपादित करें]

गर्दभिल्ल वंश गदर्भ सिक्के चलाते थे जो 3-4 मासा चांदी के होते थे [17]

इन्हें देखे[संपादित करें]

गर्दभिल्ल

संदर्भ[संपादित करें]

  1. D.D, Kosambi (1994). The Culture and Civilisation of Ancient India in Historical Outline (अंग्रेज़ी में). S. Chand Publishing. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-7069-8613-6.
  2. "Gardabhilla bhil dynasty - Google Search". www.google.com. अभिगमन तिथि 2022-08-04.
  3. समन्वयीइ साधक श्री हरिभाऊ उपाध्याय अभिनन्दन ग्रन्थ
  4. Visāriyā, Saroja (1990). Harikr̥shṇa Premī kā nāṭya śilpa. Śānti Prakāśana.
  5. Sūrideva, Śrīrañjana (1965). Meghadūta : eka anucintana: mūla aura mūlyāṇkana. Nāgarī Prakāśana.
  6. Nāgari prācharini pātrika.
  7. Singh, Vipul (2008). Bhartiya Itihas: Pragtihais. Pearson Education India. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-317-0891-0.
  8. विक्रमादित्य: संवत्-प्रवर्तक. Caukhambā Vidyābhavana. 1960. पपृ॰ 68-70.
  9. Pruthi, Raj (2004). Jainism and Indian Civilization (अंग्रेज़ी में). Discovery Publishing House. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7141-796-4.
  10. Parishad, Bihāra Rāshṭrabhāshā (1979). Parishad-patrikā. Bihāra Rāshtrabhāshā Parishad.
  11. Basant, P. K. (2012). The City and the Country in Early India: A Study of Malwa (अंग्रेज़ी में). Primus Books. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-80607-15-3.
  12. "ग्राम विहार : राजा विक्रमादित्य के पिता गन्धर्वसेन की गन्धर्वपुरी, तालोद का सूरजकुण्ड विक्रमादित्य का षष्ठी पूजन स्थल - 7 का पृष्ठ 6". हिन्दी ब्लॉग: दिशा अविनाश शर्मा. 2019-11-01. अभिगमन तिथि 2022-07-26.
  13. Śarmā, Hariśaṅkara (1992). Hajārī Prasāda Dvivedī ke upanyāsoṃ meṃ nārī. Ārādhanā Bradarsa.
  14. Śarmā, Hariśaṅkara (1992). Hajārī Prasāda Dvivedī ke upanyāsoṃ meṃ nārī. Ārādhanā Bradarsa.
  15. Śarmā, Gaṅgā Prasāda (2007). Siṃhāsana battīsī. Atmaram & Sons. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-904815-0-2.
  16. Kanungo, Shobha (1972). Ujjayinī kā sāṃskr̥tika itihāsa ; pūrva-pradyota tathā paurāṇika-yuga se ādhunika yuga taka sāṃskr̥tika svarūpa kā vivecana. Prema Prakāśana.
  17. Bhūtoṛiyā, Māṅgīlāla (1988). Itihāsa kī amara bela, Osavāla. Priyadarśī Prakāśana.