पार्श्वनाथ मन्दिर, खजुराहो

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पार्श्वनाथ मंदिर, खजुराहो

पूर्वी समूह के अंतर्गत पार्श्वनाथ मंदिर, खजुराहो के सुंदरतम मंदिरों में से एक है। ६८' लंबा ६५' चौड़ा यह मंदिर एक विशाल जगती पर स्थापित किया गया है। मूलतः इस मंदिर में आदिनाथ की प्रतिमा थी। वर्तमान में स्थित पार्श्वनाथ प्रतिमा उन्नीसवीं शताब्दी के छटे दशक की है। इस प्रकार यह मंदिर आदिनाथ को समर्पित है। प्राप्त शिल्प, वास्तु तथा अभिलेखिक साक्ष्यों के आधार में पर इस मंदिर का निर्माण ९५० ई. से ९७० ई. सन् के बीच यशोवर्मन के पुत्र और उत्तराधिकारी धंग के शासनकाल में हुआ। इसके निर्माण में काफी समय लगा। मंदिर एक ऊँची जगती पर स्थित है, जिसकी मूल सज्जा अब लगभगसमाप्त हो गई है। मंदिर के प्रमुख भागों में मंडप, महामंडप, अंतराल तथा गर्भगृह है। इसके गिर्द परिक्रमा मार्ग का भी निर्माण किया गया है। मंडप की तोरण सज्जा में अलंकरण और मूर्तियों की बहुलता है। इसमें शाल भंजिकाओं, अप्सराओं और पार्श्वदेवी की मूर्तियाँ भी है। इसका वितान उलटे कमल पुष्प के समान है। वितान के मध्य में एक फुंदना झूल रहा है, जिसपर उडते हुए विद्याधरों की आकृतियाँ उत्कीर्ण की गई है। मंडप से मंदिर में प्रवेश करने के लिए सप्तशाखायुक्त द्वार हैं। इसके अंदर अलंकरण हिरकों, पाटल- पुष्पों, गणों, व्यालों, मिथुनों, बेलबूटों के अतिरिक्त द्वारपाल सहित मकरवाहिनी गंगा और कूमवाहिनी यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण है। विभिन्न मुद्राओं में गंधर्व और यक्ष मिथुन ढ़ोल, तुरही, मंजिरा, शंख, मृदंग तथा ततुंवाद्य बजाते हुए सरितदेवियों के ऊपर तोरण तक अंकित किये गए हैं।

मंडप की दीवार को भीतर से कुड्यस्तंभ का बाहर से मूर्तियों को तीन पंक्तियों का और मंदिर के अंतरंग भागों को प्रकाशित करने के लिए बनाए गए वातायनों का आधार प्राप्त है। इस मंदिर के भीतरी भाग की विशेषता यह है कि इसमें कुड्यस्तंभों के बीच के रिक्त स्थान का उपयोग आठ- उप- वेदिकाओं की रचना में किया गया है, जिन पर भव्य और सुंदर परिकर के साथ तीर्थकर प्रतिमाएँ स्थापित की गई है। मंडप से जुड़ा हुआ इसका गर्भगृह है। गर्भगृह में दिगंबर जैन साधु तथा साधवी वस्रहीन अवस्था में दिखाए गए हैं। इसके अतिरिक्त गर्भगृह में एक केंद्रीय स्री प्रतिमा है। मंदिर के अंतराल में बाईं ओर कमल और कलश के साथ- साथ अभय मुद्रा में चतुर्भुज शासन देवी तथा दायीं ओर चतुर्भुज वीणावादिनी अंकित है।

प्रतिमाएं[संपादित करें]

मंदिर के चारों ओर अनगिनत प्रतिमाएँ हैं, जो तीन पालियों में हैं। नीचे की दो पालियों की प्रतिमाएँ उतिष्ठ मुद्रा में है, जबकि ऊपरी पाली में उड़ती हुई या बैठक मुद्रा की प्रतिमाएँ स्थापित है। ये प्रतिमाएँ सूक्ष्म संगतराशी की आदर्श दिखाई देती है। प्रसाधन, कंटक भेटन, पत्रलेखन इत्यादि दिनचर्या के कार्यों में व्यस्त सुंदरियाँ अद्भूत है। खजुराहो मूर्तिकला की अद्भूत कृति पैरों में लाख लगाती तरुणी भी इसी मंदिर में अंकित की गई है। मंदिर की रूप रेखा अपने आप में विशेष है। मुख चतुष्कि गूढ़मंडल के भीतर खुलती हे। इसके गूठमंडल की चौखट अलंकरण में अद्वितीय है। मंदिर के जैन मंडप का वितान बहुत सुंदर है। इसमें बड़ी सावधानी से बारीक नक्काशी की गई है। इसके महामंडप और गर्भगृह की छतों को जोड़कर शिखर की स्थापना की गई है। प्रतिमाओं की पट्टियाँ लगातार क्रम में स्थापित की गई है।

पार्श्वनाथ मंदिर का जंघा भाग भी अति सुंदर नारियों के अंकन से समृद्ध है। इसके सभी ओर भद्र हैं, जिनपर पाँच- पाँच रथिकाएँ हैं। जैन प्रतिमाएँ केवल बाहरी रथिकाओं पर ही निर्मित है, शेष स्थानों पर तथा कथित ब्राह्मणत्व प्रभाव की प्रतिमाएँ अंकित हैं। यहाँ छोटे- छोटे छज्जों या विश्रांतियों से प्राप्त किए गए छोटे रथ भी हैं। इन छज्जों पर जंघा की देव, अप्सरा तथा विद्याधर प्रतिमाएँ हैं। जंघा पर तीन पंक्तियों में प्रतिमाएँ स्थापित की गई है। यहाँ की जंघा का विभाजन पट्टिकाओं से किया गया है। मंदिर के शिखर के लिए दक्षिणी ओर गर्भगृह पर भद्र हैं, जो उद्गमों के रूप में पार्श्वलिंदों पर उतरते हैं। पार्श्वालिंदों के ऊपर रथिकाएँ हैं, जो प्रमुख विश्रांतियों के ऊपर तक गई है। इस स्थान पर उरु: श्रृंग और मूलमंजरी का रूप लेते हैं। करण श्रृंगों के साथ ऊपरी पार्श्वालिंदों पर श्रृंग हैं। केंद्रीय श्रृंग पंचरथ प्रकृति का है तथा शेष त्रिरथ प्रकृति का है। मूलमंजरी सप्तरथ प्रकृति का है तथा ग्यारह भूमि युक्त है। मूलमंजरी के दोनों ओर दो- दो उरु: श्रृंग हैं। करणश्रृंग का ऊपरी भाग उरु: श्रृंगों की सतह से ही शुरु होता है। दोनों ओर कुल बारह करण श्रृंग है।

अन्य विशेषताएँ[संपादित करें]

  1. . अर्धमंडप के अधिष्ठान की सज्जापट्टी पर हाथियों की प्रक्षेपित पट्टी उत्कृष्ट है।
  2. . भूत टोड़ा, कीर्तिमुख, शालमंजिका टोड़ा, नाग प्रतिमाएँ यहाँ वर्तमान है।
  3. . कीर्तिमुख तथा विद्याधर एक प्रस्तर की श्रृंखला के तंतु से जुड़े हुए हैं।
  4. . शाखाओं की सज्जा मंदार पुष्प, व्याल, मिथुन तथा बेलबूटों से ही गई है।
  5. . इसका द्वार पंचशाला प्रकृति का है।
  6. . खार पत्थर की कुर्सी पर पार्श्वनाथ की काली प्रतिमा है।
  7. . यहाँ ॠषभनाथ के प्रतीक ॠषभ उपस्थित हैं।
  8. . इसमें हृदयाकार पुष्पों वाली शोभापट्टी वर्तमान है।
  9. . जंघा की उपरी पंक्ति में मूर्तियों के मध्य चैत्य मेहराबों के उद्गम है तथा जंघा पर उत्कीर्ण तीनों पंक्तियों का शिल्प मूर्तिकला का श्रेष्ठ उदाहरण है।
  10. . केवल पार्श्वनाथ मंदिर में ही कृष्ण लीला से संबंधित दृश्य उत्कीर्ण है।
  11. . इस मंदिर की मूर्तियों का वर्तूलाकार प्रतिरुपण और सामान्य रूप रेखा केशविन्यास उत्कृष्ट है।
  12. . यहाँ शिर्षतोरण तथा कृशकाय, वायोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध तथा तपोधन अठारह दिगंबर मुनियों से वंदित अर्हत प्रतिमाएँ सुशोभित हैं।
पार्श्वनाथ मंदिर में वर्तमान प्रतिमाओं की संख्याएँ निम्नलिखित है-
  • चतुर्भुज इंद्र, अग्नि, व्याल २८
  • चतुर्भुज देवी ०३
  • अप्सरा १६
  • चतुर्भुज शिव १४
  • खड़ी हुई नारी, लक्ष्मीनारायण ०८
  • यम, नृति, त्रिभंगी मुद्रा में नारी ०२
  • जिन पद्यप्रभु, चतुर्भुज विष्णु ०९
  • दाढ़ी युक्त संत, देव* युक्त १६
  • नारीफल तथा रुमाल के नारी ०२
  • त्रिभंगी मुद्रा में देव* युग्म ०५
  • पक्षी के साथ अप्सरा मानवयुग्म ०७
  • नारी कमल पुष्प के साथ ०२
  • द्विबाहु कृष्णा, जिन परशुराम ०२
  • ब्रह्म ०३
  • इशान, चतुर्भुज देव सपत्नीक ०३

उपर्युक्त में कोष्टकों में दी गई संख्या कृति विशेष प्रतिमाओं की संख्या है। इसके अतिरिक्त उत्तरी पश्चिमी कोने के उत्तरी मुख पर काम और रति की एक सुंदर प्रतिमा है। काम के हाथ में पक्षी है, तीन बाण मानव सिर समेत ऊपरी हाथ में है। यह प्रतिमा बाएं हाथ से रति को थामें हुए हैं। इसके दूसरे हाथ में धनुष है। बाहरी भाग में दो प्रतिमाएँ सेविकाओं की है, जो स्वतंत्र तराशी गई हैं। रथिकाओं पर पाँच वातायन भी स्वतंत्र हैं और उन पर प्रतिमाएँ रखना संभव नहीं है। ऐसा कहा जा सकता है कि यह मंदिर प्रतिमाओं की विविधता में सर्वप्रथम है।

भीतरी भाग में महामंडप के द्वार पर चक्रेश्वरी की एक ललित प्रतिमा विद्यमान है, वह किरीट मुकुट पहने हैं। उसके दहिने चतुर्भुज सरस्वती है। वराह व हंस इसके साथ- साथ है, जबकि दूसरी और ऐसा ही अन्य प्रतिमा वाहन विहीन हैं। इसका द्वारपाल पुस्तक एवं गडा धारण किए है। गर्भगृह के द्वार पर गंगा- यमुना दोनों ओर है। भीतरी परिक्रमा के छज्जों पर देव, अप्सरा तथा विश्रांति पर व्याल प्रतिमाएँ वर्तमान है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह मंदिर वस्तुतः देवताओं का संग्रहालय है। अधिकांश देव गंधर्व, किन्नर, यक्ष, अप्सराएँ यहाँ मूर्ति रूप में उपस्थित है। देवों की अनेक श्रेणियाँ व प्रकार हैं। मंदिर की प्रतिमाएँ सुंदर है और बड़े भक्ति भाव से धर्म की सार्वभौमिकता को चरितार्थ करती है।

चित्र[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]