ग्यारसपुर

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मालादेवी का मंदिर

ग्यारसपुर, विदिशा से पूर्वोत्तर दिशा में २३ मील की दूरी पर एक पहाड़ी की उपत्यका में बसा हुआ है। इसके इर्द-गिर्द मिले अवशेषों से पता चलता है कि यहाँ बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण तीनों संप्रदायों का प्रभाव रहा है। संपूर्ण दशार्ण क्षेत्र में ग्यारसपुर को विदिशा के बाद सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान कहा जाता है।

अठखम्भा[संपादित करें]

आठ स्तंभों का यह समुह एक विशाल मंदिर का अवशेष है। एक स्तंभ पर उत्कीर्ण अभिलेख सन् ९८२ (वि. सं. १०३९) का है।

अठखम्भा

बाजरा मठ (बज्र मठ)[संपादित करें]

यह एक विरल मंदिर है, जिसमें एक ही पंक्ति की तीन मूर्तियाँ स्थापित की गई है। यह वास्तव में ब्राह्मण धर्म से संबद्ध था, जिसमें हिंदूओं के तीनों मुख्य आराध्य त्रिदेव के रूप में रखे गये थे। मध्य स्थित मूर्ति सूर्य की थी, जो विष्णु के समतुल्य माने जाते हैं। यह दोनों तरफ से ब्रह्मा तथा शिव की मूर्तियों से घिरी थी। दरवाजे और ताखों पर भी देवी- देवताओं की प्रतिमा उत्कीर्ण है। बाद में मुख्य मूर्तियों के स्थान पर जैन मूर्तियाँ स्थापित कर दी गई। मंदिर शिखर योजना तथा डिजाइन के दृष्टिकोण से अन्य मंदिरों से भिन्न है।

बज्रमठ मंदिर N-MP-280 (3)

मालवदेव का मंदिर[संपादित करें]

ग्यासपुर मे स्थित स्मारकों में यह सबसे बड़ा है। इसे स्थानीय लोग मालादेई का मंदिर के नाम से जानते हैं। राजा भोज के वंशज तथा उदयादित्य के पौत्र मालवदेव ne एक पहाड़ी की इस रमणीय स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करवाया। इसे पहाड़ी स्थित पत्थरों को काट कर बनाया गया है। इसमें गर्भगृह के अलावा एक हौल तथा दलाननुमा प्रवेशद्वार है। गर्भगृह शिखर से ढ़का हुआ है।

बज्र मठ की तरह यह भी पहले ब्राह्मण धर्म से संबद्ध मंदिर था, जिसमें देवी की स्थापना की गई थी। बाद में कई जैन प्रतिमाओं को स्थापित कर दिया गया। अभी भी दरवाजें के बाहर सुंदर प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं।

बौद्ध स्तूप[संपादित करें]

ग्यारसपुर के उत्तर की ओर पहाड़ी पर अनगढ़े पत्थरों के कुछ ध्वस्त हो रहे चबुतरे दिखते हैं, जो स्तूप के साक्ष्य माने जाते हैं। इन स्तूपों को खजाने की खोज में लोगों ने खोल दिया है। यहाँ बुद्ध की बैठी हुई अवस्था में एक प्रतिमा मिली है।

वहाँ से २ मील की दूरी पर पश्चिम की ओर पहाड़ी के पत्थर को काटकर बुद्ध की दो अन्य प्रतिमाएँ भी उत्कीर्ण की गई है।

मंदिर तथा मानसरोवर ताल[संपादित करें]

बौद्ध स्तूपों से २०० गज की दूरी पर पूर्वी ढलान पर, मानसरोवर नामक एक छोटा-सा ताल अवस्थित है। इसे गौड़ नरेश मानसिंह ने १७ वीं सदी में बनवाया था। ताल के किनारे ही कई छोटे- छोटे मंदिर बनाये गये थे। बचे हुए अवशेषों के अध्ययन से पता चलता है कि ये ८ वीं- ९ वीं सदी में बने हैं। एक मंदिर के गरुड़ की उत्कीर्ण प्रतिमा के आधार पर वैष्णव मंदिर बताया जाता है।

हिंडोला तोरण[संपादित करें]

हिंडोला तोरण

यह विष्णु या त्रिमूर्ति को समर्पित एक विशाल मंदिर का अलंकृत मेहराबनुमा तोरण है। दो उदग्र स्तंभों से निर्मित यह रचना देखने में पारंपरिक हिंडोले के समान ही लगता है। स्तंभ के चारों तरफ विष्णु के सभी दस अवतारों का चित्रण है।