मध्यकालीन भारत

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सामान्यतः मध्यकालीन भारत का अर्थ १००० इस्वी से लेकर १८५७ तक के भारत तथा उसके पड़ोसी देशों जो सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से उसके अंग रहे हैं, से लगाया जाता है।

मुस्लिम शासन का आगाज़[संपादित करें]

फ़ारस पर अरबी तथा तुर्कों के विजय के बाद इन शासकों का ध्यान भारत विजय की ओर ११वीं सदी में गया। इसके पहले छिटपुट रूप से कुछ मुस्लिम शासक उत्तर भारत के कुछ इलाकों को जीत या राज कर चुके थे पर इनका प्रभुत्व तथा शासनकाल अधिक नहीं रहा था। हालाँकि अरब सागर के मार्ग से अरब के लोग दक्षिण भारत के कई इलाकों खासकर केरल से अपना व्यापार संबंध इससे कई सदी पहले से बनाए हुए थे पर इससे भी इन दोनों प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान बहुत कम ही हुआ था।

दिल्ली सल्तनत[संपादित करें]

१२वीं सदी के अंत तक भारत पर तुर्क, अफ़गान तथा फ़ारसी आक्रमण बहुत तेज हो गए थे। महमूद गज़नवी के बारंबार आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत को हिला कर रख दिया। ११९२ इस्वी में तराईन के युद्ध में दिल्ली का शासक पृथ्वीराज चौहान पराजित हुआ और इसके बाद दिल्ली की सत्ता पर पश्चिमी आक्रांताओं का कब्जा हो गया। हालाँकि महमूद पृथ्वी राज को हराकर वापस लौट गया पर उसके ग़ुलामों (दास) ने दिल्ली की सत्ता पर राज किया और आगे यही दिल्ली सल्तनत की नींव साबित हुई।

ग़ुलाम वंश[संपादित करें]

ग़ुलाम वंश की स्थापना के साथ ही भारत में इस्लामी शासन आरंभ हो गया था। कुतुबुद्दीन ऐबक (१२०६ - १२१०) इस वंश का प्रथम शासक था। इसके बाद इल्तुतमिश (१२११-१२३६), रजिया सुल्तान (१२३६-१२४०) तथा अन्य कई शासकों के बाद उल्लेखनीय रूप से गयासुद्दीन बलबन (१२५०-१२९०) सुल्तान बने। इल्तुतमिश के समय छिटपुट मंगोल आक्रमण भी हुए। पर भारत पर कभी भी मंगोलों का बड़ा आक्रमण नहीं हुआ और मंगोल (फ़ारसी में मुग़ल) ईरान, तुर्की और मध्यपूर्व तथा मध्य एशिया तक ही सीमित रहे।

ख़िलजी वंश[संपादित करें]

ख़िलजी वंश को दिल्ली सल्तनत के विस्तार की तरह देखा जाता है। जलालुद्दीन फीरोज़ खिलजी, जो कि इस वंश का संस्थापक था वस्तुतः बलबन की मृत्यु के बाद सेनापति नियुक्त किया गया था। पर उसने सुल्तान कैकूबाद की हत्या कर दी और खुद सुल्तान बन बैठा। इसके बाद उसका दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी शासक बना। अल्लाउद्दीन ने न सिर्फ अपने साम्राज्य का विस्तार किया बल्कि उत्तर पश्चिम से होने वाले मंगोल आक्रमणो का भी डटकर सामना किया।

तुग़लक़ वंश[संपादित करें]

गयासुद्दीन तुग़लक़, [[मुहम्मद बिन तुग़लक़, फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ आदि इस वंश के प्रमुख शासक थे। फ़िरोज के उत्तराधिकारी, तैमूर लंग के आक्रमण का सामना नहीं कर सके और तुग़लक़ वंश का पतन १४०० इस्वी तक हो गया था। हालांकि तुग़लक़ व शासक अब भी राज करते थे पर उनकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी। मुहम्मद बिन तुग़लक़ वो पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए प्रयत्न किया। इसकारण उसने अपनी राजधानी दौलताबाद कर दी।

सय्यद वंश[संपादित करें]

सय्यद वंशा की स्थापना १४१४ इस्वी में खिज्र खाँ के द्वारा हुई थी। यह वंश अधिक समाय तक सत्ता में नहीं रह सका और इसके बाद लोदी वंश सत्ता में आया।

लोदी वंश[संपादित करें]

लोदी वंश की स्थापना १४५१ में तथा पतन बाबर के आक्रमण से १५२६ में हुआ। इब्राहीम लोदी इसका आखिरी शासक था।

विजयनगर साम्राज्य का उदय[संपादित करें]

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने की थी। यह १५वीं सदी में अपने चरम पर पहुँच गया था जब कृष्णा नदी के दक्षिण का सम्पूर्ण भूभाग इस साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया था। यह उस समय भारत का एकमात्र हिन्दू राज्य था। हालाँकि अलाउद्दीन खिल्जी द्वारा कैद किये जाने के बाद हरिहर तथा बुक्का ने इस्लाम कबूल कर लिया था जिसके बाद उन्हें दक्षिण विजय के लिए भेजा गया था। पर अस अभियान में सफलता न मिल पाने के कारण उन्होंने विद्यारण्य नामक संत के प्रभाव में उन्होंने वापस हिन्दू धर्म अपना लिया था। उस समय विजयनगर के शत्रुओं में बहमनी, अहमदनगर, होयसल बीजापुर तथा गोलकुंडा के राज्य थे।

मंगोल आक्रमण[संपादित करें]

दिल्ली सल्तनत का पतन[संपादित करें]

मुग़ल वंश[संपादित करें]

पंद्रहवीं सदी के शुरुआत में मध्य एशिया में फ़रगना के राजकुमार जाहिरुद्दीन को निर्वासन भुगतना पड़ा। उसने कई साल गुमनामी में रहने का बाद अपनी सेना संगठित की और राजधानी समरकंद कर धावा बोला। इसी बीच उसकी सेना ने उससे विश्वासघात कर दिया और वो समरकंद तथा अपना ठिकाना दोनों खो बैठा। अब एकबार फिर उसे गुमनामी में रहना पड़ा। इसबार वो भागकर हिन्दुकूश पर्वत पारकर काबुल आ पहुँचा जहाँ इसके किसी रिश्तेदार ने उसको शरण दी और वो फारसी साम्राज्य का काबुल प्रान्त का अधिपति नियुक्त किया गया। यहीं से शुरु होती है बाबर की कहानी। जाहिरूद्दीन ही बाबर था जिसे मध्य एशिया में बाबर नाम से बुलाया जाता था क्योंकि उन अर्धसभ्य कबाईली लोगों को जाहिरुद्दीन का उच्चारण मुश्किल लगता था।

काबुल में रहते रहते मुहम्मद शायबानी ने उसे समरकंद पर आक्रमण करने में मदद की। हालाँकि वह इसमें विजयी रहा पर एकबार फिर उसे यहाँ से भागना पड़ा और समरकंद उसके हाथों से फिर निकल गया। इसके बाद शायबानी ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के खिलाफ़ युद्ध किया। इसमें लोदी की सेना बहुत बड़ी थी लेकिन फिर भी शायबानी और उसके सहयोगी बाबर जीतनें में सफल रहे। इसके साथ ही भारत में एक ऐसे वंश की नींव पड़ चुकी थी जिसने अगले कोई ३०० वर्षों तक एकछत्र राज्य किया।

बाबर को कई राजपूत विद्रोहों का सामना करना पड़ा था जिसमें राणा सांगा की मु़खालिफ़त (विरोध) बहुत भयानक थी और ये माना जा रहा था कि बाबर, जो ऐसे भी जीवन में युद्ध करते करते थक और हार चुका है, आसानी से पराजित हो जाएगा। पर राणा संगा के एक मंत्री ने उन्हें युद्ध में धोखा दे दिया और इस तरह बाबर लगभग हारा हुआ युद्ध जीत गया। इसके बाद बाबर के पुत्र हुमाय़ुं को भी कई विद्रोहों का सामना करना पड़ी। दक्षिण बिहार के सरगना शेरशाह सूरी ने तो उसे हराकर सत्ताच्युत भी कर दिया औप हुमाँयु को जान बचाकर भागना पड़ा। लेकिन ५ साल के भीतर उसने दिल्ली की सत्ता पर वापस अधिकार कर लिया जिसके बाद अगले ३००सालों तक दिल्ली की सत्ता पर मुगलों का ही अधिकार बना रहा।

हुमायुँ का पुत्र अकबर एक महान शासक साबित हुआ और उसने साम्राज्य विस्तार के अतिरिक्त धार्मिक सहिष्णुता तथा उदार राजनीति का परिचय दिया। वह एक लोकप्रि। य शासक भी था। अकबर ने कोई ५५ साल शासन किया। उसके बाद जहाँगीर तथा शाहजहाँ सम्राट बने। शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण करवाया जो आज भी मध्यकालीन दुनिया के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। इसके बाद औरंगजेब आया। उसके शासनकाल में कई धार्मिक था सैनिक विद्रोह हुए। हालाँकि वो सभी विद्रोहों पर काबू पाने में विफल रहा पर सन् १७०७ में उसकी मृत्यु का साथ ही साम्राज्य का विघटन आरंभ हो गया था। एक तरफ मराठा तो दूसरी तरफ अंग्रेजों के आक्रमण ने दिल्ली के शाह को नाममात्र का शाह बनाकर छोडा। जैबुन्निसा और आलिकखान

एक बार औरंगजेब आब-ओ-हवा परिवर्तन के लिए लाहौर गया साथ में उसकी लडकी जैबुन्निसा भी गई। वह बडी खूबसूरत और हसीन थी। बुद्धि में भी बडी तेज थी तथा उसे कविता और साहित्य का बड़ा शौक था। उन दिनों औरगंजेब के राज्य का प्रसिद्ध प्रशासक आलिकखान लाहोर का गर्वनर था औरगंजेब के लाहौर में होने के कारण वह पहरेदारों पर कड़ी नजर रखता था वह औरगंजेब के सर्वोतम कर्मचारीयों में से एक था तथा औरगंजेब ने अपनी बहादुरी ताकत उंचे खयाल रखता था आकिलखान ने अपनी बहादुरी ताकत तथा दयालु स्वभाव के कारण सबके दिलो को जीत लिया था मुहब्बत का शिकार जैबुन्निसा ने पहले ही आलिकखान के बारे में बहुत कूछ सून लिया था परन्तु जब वह महल में बार बार आने लगा तब उसको पास से देखने और सुनने का भी उसको मौका मिला अब वह अपने हदय क भावों को नह छिपा सकी और उसने आलिकखान के सामने अपने प्रेम को प्रकट कर दिया आलिकखान भी जैबुन्निसा की मुहब्बत का शिकार हो चुका था वह राजकुमारी के प्रेम के लिये हर तरह की कुर्बानी करने के लिए तैयार था जैबुन्निसा हर रोज आलिकखान से मिलने के लिए बैचेन रहती और आलिकखान कहीं न कहीं समय निकालकर उससे मिल लिया करता कभी कभी वह बभोलेपन के आकिलखान से पूछती क्या तुम्हे बादशाह से डर नहीं लगता मैं तुम्हारी इस नजर से ज्यादा डरता हुं बादशाह का मुझे डर नहीं आकिलखान निडरता से उतर देता है कभी कभी जैबुन्निसा पुछती जब प्यार सीमा से बाहर हो जाता है तब क्या वह कम नहीं होता वह जबाव देता प्यार सागर की तरह महान है उसकी गहराई को नापा नहीं जा सकता वह आकाश की तरह सीमा से परे ह इन सुनहले दिलों का आखिर अन्त आ गया अपना स्वास्थ्य ठीक होता देख औरंगजेब ने वापस राजधानी जाने का विचार किया उस समय आकिलखान अपनी महबुबा से मिलने गया और बोला मेरी रानी आज तुम मुक्षसे विदा हो रही हो जो दिल प्यार के बंधन में बंध चुके हैं उन्हें समय स्थान या कोई भी आपति एक दूसरे से जुदा नहीं कर सकती राजकुमारी ने जबाव दिया लेकिन समय शरीर को धूल में मिला देती है उम्र प्यार की राशनी को फीका कर देती है दुरी की वजह से प्रेमी एक दुसरे को भुल जाते हैं क्या तुम अंदाज लगा सकती हो कि मैं किस तरह तुम्हारे प्यार का दीवाना हो चुका हूं अब मैं दोबारा तुमसे कैसे मिल सकता हूं राजकुमारी ने बड़े धीरज के साथ जवाब दिया लोंगो के रास्ते में ऐसी कोई बाधा नहीं जो दूर न की जा सके केवल बुद्धि से काम लेने की जरूरत है।’’ विदा का समय आ गया। सुबह जाने से पहले आकिलखान ने राजकुमारी से कहा’’इस जहां में तुम कहीं भी रहो, मै तुम्हारी पास जरूर करूगां।’’ इस समय जैबुन्न्सि बहोश होकर गिर पडी तुरन्त हकिमों को बुलाया गया उन्होंने सलाह दी कि राजकुमारी को अभी दिल्ली न ले जाया जाए कारण वे बहुत कमजोर मालुम पड रही हैं उनकी सलाह पर औरगंजेब ने राजकुमारी को लाहोर में छोड दिया और वें स्वय दिल्ली वापस चले गये आकिलखान को खास तौर पर राजकुमारी की देखभाल करने के आदेश दिये गये जैबुन्निसा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई इसी खुशी में औरगंजेब ने उसे दो माह के लिए और लाहौर में रहने की अनुमति दे दी ताकि वह वहां एक सुन्दर बगीचा बनवाकर अपनी यादगार कायम रख सके आकिल जैबुन्निसा के प्रेम में इतना दिवाना हो गया था कि उसे केवल उसे राजकुमारी को देखते रहने के लालच से वह बगीचे में मजदुर का काम करने लगा जब भी वह राजकुमारी के पास से गुजरता कविता कि एक पक्ंत कहा करता जिसका मतलब होता तेरे लिए में जमीन की धुल बन गया इसके जबाव में आकिल को चिढाने के लिए जैब भी कविता की एक कहती, जिसका मतलब था,’गर तुम हवा भी बन जाओ तो एक भी बाल नहीं छू सकते।’ खुशी के ये दिन भी पलक मारते बीत गये। औरगजेब के समय जासूसी प्रणाली अपने चरम विकास पर थी। उन दिनो दीवारो के भी कान होते थ्ंो। आकिल और जैब के प्यार का किस्सा भी उससे न छिप सका। पूरा किस्सा मालूम होने पर औरंगजेब के अचानक आने का कारण समझ गए। मिलन की आखिरी रात समझ आकिल वेश बदलकर जैबुनिसा के कमरे में गया। भय की कालिमा उसके हदय पर छाई हुई थी, किन्तु वह उस रात का सबसे अच्छा उपयोग करना चाहता था। उसने पूरी रात अपनी महबूबा के साथ गुजारने का निश्चय कर लिया। एक बहादूर की तरह वह शेर की गुफा में घुस गया। जैबुन्निसा ने खतरे को भंाप लियायफिर भी वह एक बहादुर की तरह, जिसे अपनी हार का विश्वास हो गया हो, मुस्कराती रही। आकिल को सामने देख, वह उठ खडी हुई और घायल हरिणी की तरह उसने एक नजर आकिल पर डाली। फिर वे दोनो खामोश बागीचे में घुमने लगे। उनका मौन उनके हदय की बात कह रहा था। अन्त में दोनो घास पर बैठ गए। जैब अपने आंसुओ को न रोक सकि और रोने लगी। आकिल यह देख बेचैन हो उठा और जैब को अपनी बाहो में भरकर बोला,’’हमे मुसीबत का सामना बहादूरी से करना चाहिए। इस दुनीया में नहीं तो अगले जन्म में हम अवश्य ही मिलेंगे। जैबुन्निसा जानती थी कि आकिल का भविष्य अंधकारमय है। औरंगजैब जानती थी कि आकिल का भविष्य अंधकारमय हैं। औरगजैब उसे बडी सजा देने से नहीं चूकेगा, इसलिए उसने क्षमा याचना करते हुए कहा,’’प्यारे आकिल, तुम्हारी सारी मुसीबतो का कारण मैं हूँ। इसके लिए मैं माफि चाहती हूं। आकिल ने समझते हुए कहा,’’तुम्हे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। इसमे किसीका दोष नहीं। दुनीया के लोग भले ही हमे एक-दुसरे से जुदा करने की कोशीश करें, लेकिन खुदा हमें अवश्य मिलाएगा।’’ आकिल ने फिर जैब को अपनी बाहो में जकड लिया। शायद वह रात उनके प्यारभरे जीवन की सबसे सुन्दर रात थी। जैब के आंसू खुशी में बदल गए और वह आकिल की गोद में पड गई। सबसे ज्यादा खुशी की वह रात पल-भर में बीत गई। बदला औरगजैब का बदला लेने का तरीका भी बिल्कूल अजीब था। वह अपने चेहरे पर जरा भी नाराजगी प्रकट नहीं होने देता था। और अपने मन की शांती को बनाए रखता था। राजकुमारी की देखभाल ठीक तरह से करने के लिए उसने आकिल की खूब तारीफ की और जैबुन्निसा को लेकर वह दिल्ली लौट गया। वहां जाकर वह जैबू की शादी जल्दी से जल्दी करके सारे मामले को दबा देना चाहता था। दसने खुब कोशिश की, लेकिन वह जैब को शादी के लिए तैयार न कर सका। जब उसने जैब पर बहुत दबाव डाला तो उसने एक दिन प्रश्न किया,’’ अब्बाजान, क्या आप मुझे अपना शरीकेहयात चुनने का मौका नहीं देंगे?’’ इसके जबाव में औरगंजेब ने उसे कई शाही परीवारों के लडकों के फोटो दिखाए और उसे अपना शौहर खुद चुन लेने का मौका दिया लेकिन जैबुन्निसा किसी के साथ शादी करने के लिए राजी नहीं हुई अन्त में उसने आकिलखान से शादी करने के अपना प्रस्ताव जाहिर किया उसकी सहेलिया यह खुशखबरी लेकर बादशाह के पास पहुंची इसे सुनकर औरंगजेब आपे से बाहर हो गया लेकिन उसने एक बार फिर अपनें क्रोध को दबाया और आकिलखान को बुलाने के लिए संदेश भेजा आकिलखान औरगंजेब के इरादे को अच्छी तरह समक्षता था उसके कर्मचारीयों ने भी उसे औरंगजेब के दरबार में जाने से आग्रह किया लेकिन उसमे औरगंजेब के हुक्म को टालने की हिम्मत नहीं थी और वह लाहौर छोडकर भाग खडा हुआ कुछ दिनो के बाद औरंगजेब का चोथा लडका अकबर बागी हो गया और उसने अपने पिता को कैद कर गदी प्राप्त करनी चाही कुछ समय बीतने पर आकिल भी चुफ से आकर अकबर की सेना में भरती हो गया इस उम्मीद से कि यदि औरंगजेब की पराजय हुई तो वह जैबुन्निसा से शादी करने में कामयाब हो सकेगा फिर उसने चुफ से जैबुन्निसा से खतोकिताबत शुरू कर दी जब आकिल अपने को काबु में न रख सका तो उसने जैबुन्निसा के बगीचे में माली का काम ले लिया और इस प्रकार वह फिर अपनी महबुबा से मिल गया बगीचे में दोनो घंटो तक साथ रहते और बातचीत करते औरंगजेब के जासुसो ने इसकी खबर उसे दी और उसने शीघ्र ही सारे मामले को सारे मामले को समक्ष लिया एक रात जब आकिल माली के वेश में जैबुन्निसा के कमरे में था औरंगजेब अपने नौकरों के साथ वहां पहुचा और उसने दरवाजे पर दस्तक दी बाहर जाने का कोई रास्ता न देख आकिल पहले धबराया फिर उसने यहां वहां देखा तो उसे पानी गर्म करने का एक बड़ा देग खाली दिखा और वह उसमें छिप गया फिर जैबुन्निसा ने जैब से पुछा इतनी रात तक तुम कैसे जाग रही हो अब्बाजान तबीयत ठीक न होने की वजह से मुक्षे नींद नहीं आ रही थी और इसलिए में बराडें में बैठकर कुरान शरिफ की तिलावत कर रही थी जैब ने जबाव दिया महल के इस सुने कमरे में इतनी रात तक अकेले जागते रहना एक राजकुमारी को शोभा नहीं देता जैब ने जैब औरंगजेब ने कहा चंद मिनटो क बाद औरंगजेब ने फिर कहा जैब उस बड़े देग में क्या हैं इस पर जैबुन्निसा क्षण भर के लिए धबरा सी गई लेकिन फिर उसने अपने को संभालते हुए जबाव दिया कुछ नहीं अब्बाजान उसमें वजु कि लिए ठंडा पानी है औरंगजेब ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा इतनी ठंड में यदी तुम ठंडे पानी से वजु करोगी तो बीमार पड जाओगी उसे गर्म क्यों नहीं करवा लेतीं और फिर औरंगजेब के हुक्म के मुताबिक चुल्हा जलाया गया और पानी के देग को ऊपर रखा गया किसी बहाने से जैबुन्निसा चूल्हे के पास गई और उसने धीरे से आकिल से कहा यदि तुम सचमुच मुक्षसे मुहब्बत करते हो तो हम दोनो की इज्जत की खातिर जबान से उफ भी न करना मैं तो तुम्हारा परवाना हुं तुम्हारे लिए मैं खुशी से जल जाउगा उस परवरदिगार खुदाबंद से यही दुआ मांगता हुं कि जिस चीज को हम दुनिया में हासिल न कर सके उसे हम जन्नत में बख्शें आकिल ने जबाव दिया कुछ समय बाद औरंगजेब चला गया और आकिल देग के अन्दर जलकर मर गया जैब ने अपने प्यारे को अपने बगीचे में ही दफनाया दिन और रात जैब उस जगह वह आंसु बहाती और वहीं बैठकर शरीफ पढा करती कुछ दिनों तक जैब वहां बैठकर नज्मे बनाती रहती एक बार उसने एक नज्म लिखी जिसका मतलब था मुहब्बत की भी क्या किस्मत है दुनिया की खुशी के लिा उसे अपने आपको कुर्बान कर देना पड़ता है फिर जैबुन्निसा को आकिल की कब्र पर भी बैठने से मना कर दिया बाद में औरंगजेब को आकिल को लिखे गये जब के कुछ खत मिले और उसकी सजा उसने जैब को कैद में डाल दिया जैब की सारी जायदाद और चार लाख का उसका सालाना खर्च सब औरंगजेब ने जब्त कर लिया जैबुन्निसा ने अपनी जिन्दगी के इक्कीस साल कैदखाने में काट दिये और अन्त में २६ मई १७०२ को उसने इस बेरहम दुनिया से विदा ले ली कैद के दरमियान यघपि सारी दुनिया से उसके सम्बन्ध तोड दिये गये लेकिन वह नज्में बराबर लिखती रही अपनी आखिरी नज्म में उसने इन भावों को प्रकट किया कब तक मेरे इन पैरों में ये जंजीरे पडी रहेंगी मेरे सारे दोस्त दुश्मन हो गये सारे रिश्तेदार गैर बन गये मैं बदनामी से कैसे बच सकती हूं जब मेरे सारे दोस्त और हमदर्द ही मुक्षे बदनाम करने पर तुले है जैब अब तुम कैद से छुटकारा नहीं पा सकती ऐ जैब अब केवल मौत ही तुक्षे इस कैद से छुटकारा दिला सकती है।

मराठों का उत्कर्ष[संपादित करें]

जिस समय बहमनी सल्तनत का पतन हो रहा था उस समय मुगल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था - विशाल साम्राज्य, बगावतों से दूर और विलासिता में डूबा हुआ। उस समय शाहजहाँ का शासन था और शहज़ादा औरंगजेब उसका दक्कन का सूबेदार था। बहमनी के सबसे शक्तिशाली परवर्ती राज्यों में बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्य थे। बीजापुर के कई सूबेदारों में से एक थे शाहजी। शाहजी एक मराठा थे और पुणे और उसके दक्षिण के इलाकों के सूबेदार। शाहजी की दूसरी पत्नी जीजाबाई से उनके पुत्र थे शिवाजी। शिवाजी बाल्यकाल से ही पिता की उपेक्षा के शिकार थे क्योंकि शाहजी अपनी पहली पत्नी पर अधिक आसक्त थे। शिवाजी ने बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह को खबर भिजवाई कि अगर वो वे उन्हें का किला दे देंगे तो शिवाजी उन्हें तत्कालीन किलेदार के मुकाबिले अधिक पैसे देंगे। सुल्तान ने अपने दरबारियों की सलाह पर - जिन्हें शिवाजी ने पहले ही घूस देकर अपने पक्ष में कर लिया था - किला शिवाजी को दे दिया। इसके बाद शिवाजी ने एक के बाद एक कई किलों पर अधिकार कर लिया। बीजापुर के सुल्तान को शिवाजी की बढ़ती प्रभुता देखकर गुस्सा आया और उन्होंने शाहजी को अपने पुत्र को नियंत्रण पर रखने को कहा। शाहजी की बात पर शिवाजी ने कोई ध्यान नहीं दिया और मावलों की सहायता से अपने अधिकार क्षेत्र में बढ़ोतरी करते गए। आदिल शाह ने अफ़ज़ल खाँ को शिवाजी को ग़िरफ़्तार करने के लिए भेजा। शिवाजी ने अफ़ज़ल की समझते हुए उसकी सेना का वध कर दिया। इस के बाद शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार कर लिया गया। शिवाजी ने अपने पिता को छुड़ा लिया और समझौते के मुताबिक बीजापुर के खिलाफ़ आक्रमण बन्द कर दिया।

सन् 1760 का भारत

आदिलशाह की मृत्यु के बाद बीजापुर में अराजकता छा गई और स्थिति को देखकर औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया। शिवाजी ने तो उस समय तक औरंगजेब के साथ संधि वार्ता जारी रखी थी पर इस मौके पर उन्होंने कुछ मुगल किलों पर आक्रमण किया और उन्हें लूट लिया। औरंगजेब इसी बीच शाहजहाँ की बीमारी के बारे में पता चलने के कारण आगरा चला गया और वहाँ वो शाहजहाँ को कैद कर खुद शाह बन गया। औरंगजेब के बादशाह बनने के बाद उसकी शक्ति काफ़ी बढ़ गई और शिवाजी ने औरंगजेब से मुगल किलों को लूटने के सम्बन्ध में माफ़ी मांगी। अब शिवाजी ने बीजापुर के खिलाफ़ आक्रमण तेज कर दिया। अब शाहजी ने बीजापुर के सुल्तान की अपने पुत्र को सम्हालने के निवेदन पर अपनी असमर्थता ज़ाहिर की और शिवाजी एक-एक कर कुछ ४० किलों के मालिक बन गए। उन्होंने सूरत को दो बार लूटा और वहाँ मौजूद डच और अंग्रेज कोठियों से भी धन वसूला। वापस आते समय उन्होंने मुगल सेना को भी हराया। मुगलों से भी उनका संघर्ष बढ़ता गया और शिवाजी की शक्ति कोंकण और दक्षिण-पश्चिम महाराष्ट्र में सुदृढ़ में स्थापित हो गई।

उत्तर में उत्तराधिकार सम्बंधी विवाद के खत्म होते और सिक्खों को शांत करने के बाद औरंगजेब दक्षिण की ओर आया। उसने शाइस्ता खाँ को शिवाजी के खिलाफ भेजा पर शिवाजी किसी तरह भाग निकलने में सफल रहे। लेकिन एक युद्ध में मुगल सेना ने मराठों को कगार पर पहुँचा दिया। स्थिति की नाजुकता को समझते हुए शिवाजी ने मुगलों से समझौता कर लिया और औरंगजेब ने शिवाजी और उनके पुत्र शम्भाजी को मनसबदारी देने का वचन देकर आगरा में अपने दरबार में आमंत्रित किया। आगरा पहुँचकर अपने ५००० हजार की मनसबदारी से शिवाजी खुश नहीं हुए और आरंगजेब को भरे दरबार में भला-बुरा कहा। औरंगजेब ने इस अपमान का बदला लेने के लिए शिवाजी को शम्भाजी के साथ नजरबन्द कर दिया। लेकिन दोनों पहरेदारों को धोखा में डालकर फूलों की टोकरी में छुपकर भागने में सफल रहे। बनारस, गया और पुरी होते हुए शिवाजी वापस पुणे पहुँच गए। इससे मराठों में जोश आ गया और इसी बाच शाहजी का मृत्यु १६७४ में हो गई और शिवाजी ने अपने आप को राजा घोषित कर दिया।

अपने जीवन के आखिरी दिनों में शिवाजी ने अपना ध्यान दक्षिण की ओर लगाया और मैसूर को अपने साम्राज्य में मिला लिया। १६८० में उनकी मृत्यु के समय तक मराठा साम्राज्य एक स्थापित राज के रूप में उभर चुका था और कृष्णा से कावेरी नदी के बीच के इलाकों में उनका वर्चस्व स्थापित हो चुका था। शिवाजी के बाद उनके पुत्र सम्भाजी (शम्भाजी) ने मराठों का नेतृत्व किया। आरंभ में तो वे सफल रहे पर बाद में उन्हें मुगलों से हार का मुँह देखना पड़ा। औरंगजेब ने उन्हें पकड़कर कैद कर दिया। कैद में औरंगजेब ने शम्भाजी से मुगल दरबार के उन बागियों का नाम पता करने की कोशिश की जो मुगलों के खिलाफ विश्वासघात कर रहे थे। इसकारण उन्हें यातनाए दी गई और अन्त में तंग आकर उन्होंने औरंगजेब को भला बुरा कहा और संदेश भिजवाया कि वे औरंगजेब की बेटी से शादी करना चाहते हैं। उनकी भाषा और संदेश से क्षुब्ध होकर औरंगजेब ने शम्भाजी को टुकड़े टुकड़े काटकर उनके मांस को कुत्तों को खिलाने का आदेश दे दिया।

शम्भाजी की मृत्यु के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने गद्दी सम्हाली। उनके समय मराठों का उत्तराधिकार विवाद गहरा गया पर औरंगजेब भी बूढ़ा हो चला था इस लिए मराठों को सफलता मिलने लगी और वे उत्तर में नर्मदा नदी तक पहुँच गए। बीजापुर का पतन हो गया था और मराठों ने बीजापुर के मुगल क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद तो मुगल साम्राज्य कमजोर होता चला गया और उत्तराधिकार विवाद के बावजूद मराठे शक्तिशाली होते चले गए। उत्तराधिकार विवाद के चलते मराठाओं की शक्ति पेशवाओं (प्रधानमंत्री) के हाथ में आ गई और पेशवाओं के अन्दर मराठा शक्ति में और भी विकार हुआ और वे दिल्ली तक पहुँच गए। १७६१ में नादिर शाह के सेनापति अहमद शाह अब्दाली ने मराठाओं को पानीपत की तीसरी लड़ाई में हरा दिया। इसके बाद मराठा शक्ति का ह्रास होता गया। उत्तर में सिक्खों का उदय होता गया और दक्षिण में मैसूर स्वायत्त होता गया। अंग्रेजों ने भी इस कमजोर राजनैतिक स्थिति को देखकर अपना प्रभुत्व स्थआपित करना आरंब कर दिया। बंगाल और अवध पर उनका नियंत्रऩ १७७० तक स्थापित हो गया था और अब उनकी निगाह मैसूर पर टिक गई थी।

यूरोपीय शक्तियों का प्रादुर्भाव[संपादित करें]

भारत की समृद्धि को देखकर पश्चिमी देशों में भारत के साथ व्यापार करने की इच्छा पहले से थी। यूरोपीय नाविकों द्वारा सामुद्रिक मार्गों का पता लगाना इन्हीं लालसाओं का परिणाम था। तेरहवीं सदी के आसपास मुसलमानों का अधिपत्य भूमध्य सागर और उसके पूरब के क्षेत्रों पर हो गया था और इस कारण यूरोपी देशों को भारतीय माल की आपूर्ति ठप्प पड़ गई। उस पर भी इटली के वेनिस नगर में चुंगी देना उनको रास नहीं आता था। कोलंबस भारत का पता लगाने अमरीका पहुँच गया और सन् 1487-88 में पेडरा द कोविल्हम नाम का एक पुर्तगाली नाविक पहली बार भारत के तट पर मालाबार पहुँचा। भारत पहुचने वालों में पुर्तगाली सबसे पहले थे इसके बाद डच आए और डचों ने पुर्तगालियों से कई लड़ाईयाँ लड़ीं। भारत के अलावा श्रीलंका में भी डचों ने पुर्तगालियों को खडेड़ दिया। पर डचों का मुख्य आकर्षण भारत न होकर दक्षिण पूर्व एशिया के देश थे। अतः उन्हें अंग्रेजों ने पराजित किया जो मुख्यतः भारत से अधिकार करना चाहते थे। आरंभ में तो इन यूरोपीय देशों का मुख्य काम व्यापार ही था पर बारत की राजनैतिक स्थिति को देखकर उन्होंने यहाँ साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक नीतियाँ अपनानी आरंभ की।

पुर्तगाली[संपादित करें]

22 मई 1498 को पुर्तगाल का वास्को-द-गामा भारत के तट पर आया जिसके बाद भारत आने का रास्ता तय हुआ। उसने कालीकट के राजा से व्यापार का अधिकार प्राप्त कर लिया पर वहाँ सालों से स्थापित अरबी व्यापारियों ने उसका विरोध किया। 1499 में वास्को-द-गामा स्वदेश लौट गया और उसके वापस पहुँचने के बाद ही लोगों को भारत के सामुद्रिक मार्ग की जानकारी मिली।

सन् 1500 में पुर्तगालियों ने कोचीन के पास अपनी कोठी बनाई। शासक सामुरी (जमोरिन) से उसने कोठी की सुरक्षा का भी इंतजाम करवा लिया क्योंकि अरब व्यापारी उसके ख़िलाफ़ थे। इसके बाद कालीकट और कन्ननोर में भी पुर्तगालियों ने कोठियाँ बनाई। उस समय तक पुर्तगाली भारत में अकेली यूरोपी व्यापारिक शक्ति थी। उन्हें बस अरबों के विरोध का सामना करना पड़ता था। सन् 1506 में पुर्तगालियों ने गोवा पर अपना अधिकार कर लिया। ये घटना जमोरिन को पसन्द नहीं आई और वो पुर्तगालियों के खिलाफ हो गया। पुर्तगालियों के भारतीय क्षेत्र का पहला वायसऱय था डी-अल्मीडा। उसके बाद [[अल्बूकर्क](1509)] पुर्तगालियों का वॉयसराय नियुक्त हुआ। उसने 1510 में कालीकट के शासक जमोरिन का महल लूट लिया।

पुर्तगाली इसके बाद व्यापारी से ज्यादे साम्राज्यवादी नज़र आने लगे। वे पूरब के तट पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करना चाहते थे। अल्बूकर्क के मरने के बाद पुर्तगाली और क्षेत्रों पर अधिकार करते गए। सन् 1571 में बीजापुर, अहमदनगर और कालीकट के शासकों ने मिलकर पुर्तगालियों को निकालने की चेष्टा की पर वे सफल नहीं हुए। 1579 में वे मद्रास के निकच थोमें, बंगाल में हुगली और चटगाँव में अधिकार करने में सफल रहे। 1580 में मुगल बादशाह अकबर के दरबार में पुर्तगालियों ने पहला ईसाई मिशन भेजा। वे अकबर को ईसाई धर्म में दीक्षित करना चाहते थे पर कई बार अपने नुमाइन्दों को भेजने के बाद भी वो सफल नहीं रहे। पर पुर्तगाली भारत के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार नहीं कर पाए थे। उधर स्पेन के साथ पुर्तगाल का युद्ध और पुर्तगालियों द्वारा ईसाई धर्म के अन्धाधुन्ध और कट्टर प्रचार के के कारण वे स्थानीय शासकों के शत्रु बन गए और 1612 में कुछ मुगल जहाज को लूटने के बाद उन्हें भारतीय प्रदेशों से हाथ धोना पड़ा।

डच[संपादित करें]

पुर्तगालियों की समृद्धि देख कर डच भी भारत और श्रीलंका की ओर आकर्षित हुए। सर्वप्रथम 1598 में डचों का पहला जहाज अफ्रीका और जावा के रास्ते भारत पहुँचा। 1602 में प्रथम डच कम्पनी की स्थापना की गई जो भारत से व्यापार करने के लिए बनाई गई थी। इस समय तक अंग्रेज और फ्रांसिसी लोग भी भारत में पहुँच चुके थे पर नाविक दृष्टि से डच इनसे वरीय थे। सन् 1602 में डचों ने अम्बोयना पर पुर्तगालियों को हरा कर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1612 में श्रीलंका में भी डचों ने पुर्गालियों को खदेड़ दिया। उन्होंने पुलीकट (1610), सूरत (1616), चिनसुरा (1653), क़ासिम बाज़ार, बड़ानगर, पटना, बालेश्वर (उड़ीसा), नागापट्टनम् (1659) और कोचीन (1653) में अपनी कोठियाँ स्थापित कर लीं। पर, एक तो डचों का मुख्य उद्येश्य भारत से व्यापार न करके पूर्वी एशिया के देशों में अपने व्यापार के लिए कड़ी के रूप में स्थापित करना था और दूसरे अंग्रेजों ओर फ्रांसिसियों ने उन्हें यहाँ और यूरोप दोनों जगह युद्धों में हरा दिया। इस कारण डचों का प्रभुत्व बहुत दिनों तक भारत में नहीं रह पाया था।

अंग्रेज़ और फ्रांसिसी[संपादित करें]

इंग्लैँड के नाविको को भारत का पता कोई 1578 इस्वी तक नहीं लग पाया था। 1578 में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक अंग्रेज़ नाविक ने लिस्बन जाने वाले एक जहाज को लूट लिया। इस जहाज़ से उसे भारत जाने लावे रास्ते का मानचित्र मिला। 31 मई सन् 1600 को कुछ व्यापारियों ने इंग्लैँड की महारानी एलिज़ाबेथ को ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना का अधिकार पत्र दिया। उन्हें पूरब के देशों के साथ व्यापार की अनुमति मिल गई। 1601-03 के दौरान कम्पनी ने सुमात्रा में वेण्टम नामक स्थान पर अपनी एक कोठी खोली। हेक्टर नाम का एक अंग्रेज़ नाविक सर्वप्रथम सूरत पहुँचा। वहाँ आकर वो आगरा गया और जहाँगीर के दरबार में अपनी एक कोठी खोलने की विनती की। जहाँगीर के दरबार में पुर्तगालियों की धाक पहले से थी ऐर उस समय तक मुगलों से पुर्तगालियों की कोई लड़ाई नहीं हुई थी इस कारण पुर्तगालियों की मुगलों से मित्रता बनी हुई थी। हॉकिन्स को वापस लौट जाना पड़ा। पुर्तगालियों को अंग्रेजों ने 1612 में सूरत में पराजित कर दिया और सर टॉमस रो को इंग्लैंड के शासर जेम्स प्रथम ने अपना राजदूत बनाकर जहाँगीर के दरबार में भेजा। वहाँ उसे सूरत में अंग्रेज कोठी खोलने की अनुमति मिली।

इसके बाद बालासोर (बालेश्वर), हरिहरपुर, मद्रास (1633), हुगली (1651) और बंबई (1688) में अंग्रेज कोठियाँ स्थापित की गईं। पर अंग्रेजों की बढ़ती उपस्थिति और उनके द्वारा अपने सिक्के चलाने से मुगल नाराज हुए। उन्हें हुगली, कासिम बाज़ार, पटना, मछली पट्टनम्, विशाखा पत्तनम और बम्बई से निकाल दिया गया। 1690 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह औरंगजेब से क्षमा याचना की और अर्थदण्ड का भुगतानकर नई कोठियाँ खोलने और किलेबंदी करने की आज्ञा प्राप्त करने में सफल रहे।

इसी समय सन् 1611 में भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से एक फ्रांसीसी क्म्पनी की स्थापना की गई थी। फ्रांसिसियों ने 1668 में सूरत, 1669 में मछली पट्टणम् थथा 1674 में पाण्डिचेरी में अपनी कोठियाँ खोल लीं। आरंभ में फ्रांसिसयों को भी डचों से उलझना पड़ा पर बाद में उन्हें सफलता मिली और कई जगहों पर वे प्रतिष्ठित हो गए। पर बाद में उन्हें अंग्रेजों ने निकाल दिया।

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जैबुन्निसा और आलिकखान

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एक बार औरंगजेब आब हवा परीवर्तन के लिए लाहौर गया साथ में उसकी लडकीं जैबुन्निसा भी गई वह बडी खुबसुरत और हसीन थी बुद्धि में भी बडी तेज थी तथा उसे कविता और साहित्य का बड़ा शौक था उन दिनों औरगंजेब के राज्य का प्रसिद्ध प्रशासक आलिकखान लाहोर का गर्वनर था औरगंजेब के लाहौर में होने के कारण वह पहरेदारों पर कड़ी नजर रखता था वह औरगंजेब के सर्वोतम कर्मचारीयों में से एक था तथा औरगंजेब ने अपनी बहादुरी ताकत उंचे खयाल रखता था आकिलखान ने अपनी बहादुरी ताकत तथा दयालु स्वभाव के कारण सबके दिलो को जीत लिया था मुहब्बत का शिकार जैबुन्निसा ने पहले ही आलिकखान के बारे में बहुत कूछ सून लिया था परन्तु जब वह महल में बार बार आने लगा तब उसको पास से देखने और सुनने का भी उसको मौका मिला अब वह अपने हदय क भावों को नह छिपा सकी और उसने आलिकखान के सामने अपने प्रेम को प्रकट कर दिया आलिकखान भी जैबुन्निसा की मुहब्बत का शिकार हो चुका था वह राजकुमारी के प्रेम के लिये हर तरह की कुर्बानी करने के लिए तैयार था जैबुन्निसा हर रोज आलिकखान से मिलने के लिए बैचेन रहती और आलिकखान कहीं न कहीं समय निकालकर उससे मिल लिया करता कभी कभी वह बभोलेपन के आकिलखान से पूछती क्या तुम्हे बादशाह से डर नहीं लगता मैं तुम्हारी इस नजर से ज्यादा डरता हुं बादशाह का मुझे डर नहीं आकिलखान निडरता से उतर देता है कभी कभी जैबुन्निसा पुछती जब प्यार सीमा से बाहर हो जाता है तब क्या वह कम नहीं होता वह जबाव देता प्यार सागर की तरह महान है उसकी गहराई को नापा नहीं जा सकता वह आकाश की तरह सीमा से परे ह इन सुनहले दिलों का आखिर अन्त आ गया अपना स्वास्थ्य ठीक होता देख औरंगजेब ने वापस राजधानी जाने का विचार किया उस समय आकिलखान अपनी महबुबा से मिलने गया और बोला मेरी रानी आज तुम मुक्षसे विदा हो रही हो जो दिल प्यार के बंधन में बंध चुके हैं उन्हें समय स्थान या कोई भी आपति एक दूसरे से जुदा नहीं कर सकती राजकुमारी ने जबाव दिया लेकिन समय शरीर को धूल में मिला देती है उम्र प्यार की राशनी को फीका कर देती है दुरी की वजह से प्रेमी एक दुसरे को भुल जाते हैं क्या तुम अंदाज लगा सकती हो कि मैं किस तरह तुम्हारे प्यार का दीवाना हो चुका हूं अब मैं दोबारा तुमसे कैसे मिल सकता हूं राजकुमारी ने बड़े धीरज के साथ जवाब दिया लोंगो के रास्ते में ऐसी कोई बाधा नहीं जो दूर न की जा सके केवल बुद्धि से काम लेने की जरूरत है।’’ विदा का समय आ गया। सुबह जाने से पहले आकिलखान ने राजकुमारी से कहा’’इस जहां में तुम कहीं भी रहो, मै तुम्हारी पास जरूर करूगां।’’ इस समय जैबुन्न्सि बहोश होकर गिर पडी तुरन्त हकिमों को बुलाया गया उन्होंने सलाह दी कि राजकुमारी को अभी दिल्ली न ले जाया जाए कारण वे बहुत कमजोर मालुम पड रही हैं उनकी सलाह पर औरगंजेब ने राजकुमारी को लाहोर में छोड दिया और वें स्वय दिल्ली वापस चले गये आकिलखान को खास तौर पर राजकुमारी की देखभाल करने के आदेश दिये गये जैबुन्निसा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई इसी खुशी में औरगंजेब ने उसे दो माह के लिए और लाहौर में रहने की अनुमति दे दी ताकि वह वहां एक सुन्दर बगीचा बनवाकर अपनी यादगार कायम रख सके आकिल जैबुन्निसा के प्रेम में इतना दिवाना हो गया था कि उसे केवल उसे राजकुमारी को देखते रहने के लालच से वह बगीचे में मजदुर का काम करने लगा जब भी वह राजकुमारी के पास से गुजरता कविता कि एक पक्ंत कहा करता जिसका मतलब होता तेरे लिए में जमीन की धुल बन गया इसके जबाव में आकिल को चिढाने के लिए जैब भी कविता की एक कहती, जिसका मतलब था,’गर तुम हवा भी बन जाओ तो एक भी बाल नहीं छू सकते।’ खुशी के ये दिन भी पलक मारते बीत गये। औरगजेब के समय जासूसी प्रणाली अपने चरम विकास पर थी। उन दिनो दीवारो के भी कान होते थ्ंो। आकिल और जैब के प्यार का किस्सा भी उससे न छिप सका। पूरा किस्सा मालूम होने पर औरंगजेब के अचानक आने का कारण समझ गए। मिलन की आखिरी रात समझ आकिल वेश बदलकर जैबुनिसा के कमरे में गया। भय की कालिमा उसके हदय पर छाई हुई थी, किन्तु वह उस रात का सबसे अच्छा उपयोग करना चाहता था। उसने पूरी रात अपनी महबूबा के साथ गुजारने का निश्चय कर लिया। एक बहादूर की तरह वह शेर की गुफा में घुस गया। जैबुन्निसा ने खतरे को भंाप लियायफिर भी वह एक बहादुर की तरह, जिसे अपनी हार का विश्वास हो गया हो, मुस्कराती रही। आकिल को सामने देख, वह उठ खडी हुई और घायल हरिणी की तरह उसने एक नजर आकिल पर डाली। फिर वे दोनो खामोश बागीचे में घुमने लगे। उनका मौन उनके हदय की बात कह रहा था। अन्त में दोनो घास पर बैठ गए। जैब अपने आंसुओ को न रोक सकि और रोने लगी। आकिल यह देख बेचैन हो उठा और जैब को अपनी बाहो में भरकर बोला,’’हमे मुसीबत का सामना बहादूरी से करना चाहिए। इस दुनीया में नहीं तो अगले जन्म में हम अवश्य ही मिलेंगे। जैबुन्निसा जानती थी कि आकिल का भविष्य अंधकारमय है। औरंगजैब जानती थी कि आकिल का भविष्य अंधकारमय हैं। औरगजैब उसे बडी सजा देने से नहीं चूकेगा, इसलिए उसने क्षमा याचना करते हुए कहा,’’प्यारे आकिल, तुम्हारी सारी मुसीबतो का कारण मैं हूँ। इसके लिए मैं माफि चाहती हूं। आकिल ने समझते हुए कहा,’’तुम्हे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। इसमे किसीका दोष नहीं। दुनीया के लोग भले ही हमे एक-दुसरे से जुदा करने की कोशीश करें, लेकिन खुदा हमें अवश्य मिलाएगा।’’ आकिल ने फिर जैब को अपनी बाहो में जकड लिया। शायद वह रात उनके प्यारभरे जीवन की सबसे सुन्दर रात थी। जैब के आंसू खुशी में बदल गए और वह आकिल की गोद में पड गई। सबसे ज्यादा खुशी की वह रात पल-भर में बीत गई। बदला औरगजैब का बदला लेने का तरीका भी बिल्कूल अजीब था। वह अपने चेहरे पर जरा भी नाराजगी प्रकट नहीं होने देता था। और अपने मन की शांती को बनाए रखता था। राजकुमारी की देखभाल ठीक तरह से करने के लिए उसने आकिल की खूब तारीफ की और जैबुन्निसा को लेकर वह दिल्ली लौट गया। वहां जाकर वह जैबू की शादी जल्दी से जल्दी करके सारे मामले को दबा देना चाहता था। दसने खुब कोशिश की, लेकिन वह जैब को शादी के लिए तैयार न कर सका। जब उसने जैब पर बहुत दबाव डाला तो उसने एक दिन प्रश्न किया,’’ अब्बाजान, क्या आप मुझे अपना शरीकेहयात चुनने का मौका नहीं देंगे?’’ इसके जबाव में औरगंजेब ने उसे कई शाही परीवारों के लडकों के फोटो दिखाए और उसे अपना शौहर खुद चुन लेने का मौका दिया लेकिन जैबुन्निसा किसी के साथ शादी करने के लिए राजी नहीं हुई अन्त में उसने आकिलखान से शादी करने के अपना प्रस्ताव जाहिर किया उसकी सहेलिया यह खुशखबरी लेकर बादशाह के पास पहुंची इसे सुनकर औरंगजेब आपे से बाहर हो गया लेकिन उसने एक बार फिर अपनें क्रोध को दबाया और आकिलखान को बुलाने के लिए संदेश भेजा आकिलखान औरगंजेब के इरादे को अच्छी तरह समक्षता था उसके कर्मचारीयों ने भी उसे औरंगजेब के दरबार में जाने से आग्रह किया लेकिन उसमे औरगंजेब के हुक्म को टालने की हिम्मत नहीं थी और वह लाहौर छोडकर भाग खडा हुआ कुछ दिनो के बाद औरंगजेब का चोथा लडका अकबर बागी हो गया और उसने अपने पिता को कैद कर गदी प्राप्त करनी चाही कुछ समय बीतने पर आकिल भी चुफ से आकर अकबर की सेना में भरती हो गया इस उम्मीद से कि यदि औरंगजेब की पराजय हुई तो वह जैबुन्निसा से शादी करने में कामयाब हो सकेगा फिर उसने चुफ से जैबुन्निसा से खतोकिताबत शुरू कर दी जब आकिल अपने को काबु में न रख सका तो उसने जैबुन्निसा के बगीचे में माली का काम ले लिया और इस प्रकार वह फिर अपनी महबुबा से मिल गया बगीचे में दोनो घंटो तक साथ रहते और बातचीत करते औरंगजेब के जासुसो ने इसकी खबर उसे दी और उसने शीघ्र ही सारे मामले को सारे मामले को समक्ष लिया एक रात जब आकिल माली के वेश में जैबुन्निसा के कमरे में था औरंगजेब अपने नौकरों के साथ वहां पहुचा और उसने दरवाजे पर दस्तक दी बाहर जाने का कोई रास्ता न देख आकिल पहले धबराया फिर उसने यहां वहां देखा तो उसे पानी गर्म करने का एक बड़ा देग खाली दिखा और वह उसमें छिप गया फिर जैबुन्निसा ने जैब से पुछा इतनी रात तक तुम कैसे जाग रही हो अब्बाजान तबीयत ठीक न होने की वजह से मुक्षे नींद नहीं आ रही थी और इसलिए में बराडें में बैठकर कुरान शरिफ की तिलावत कर रही थी जैब ने जबाव दिया महल के इस सुने कमरे में इतनी रात तक अकेले जागते रहना एक राजकुमारी को शोभा नहीं देता जैब ने जैब औरंगजेब ने कहा चंद मिनटो क बाद औरंगजेब ने फिर कहा जैब उस बड़े देग में क्या हैं इस पर जैबुन्निसा क्षण भर के लिए धबरा सी गई लेकिन फिर उसने अपने को संभालते हुए जबाव दिया कुछ नहीं अब्बाजान उसमें वजु कि लिए ठंडा पानी है औरंगजेब ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा इतनी ठंड में यदी तुम ठंडे पानी से वजु करोगी तो बीमार पड जाओगी उसे गर्म क्यों नहीं करवा लेतीं और फिर औरंगजेब के हुक्म के मुताबिक चुल्हा जलाया गया और पानी के देग को ऊपर रखा गया किसी बहाने से जैबुन्निसा चूल्हे के पास गई और उसने धीरे से आकिल से कहा यदि तुम सचमुच मुक्षसे मुहब्बत करते हो तो हम दोनो की इज्जत की खातिर जबान से उफ भी न करना मैं तो तुम्हारा परवाना हुं तुम्हारे लिए मैं खुशी से जल जाउगा उस परवरदिगार खुदाबंद से यही दुआ मांगता हुं कि जिस चीज को हम दुनिया में हासिल न कर सके उसे हम जन्नत में बख्शें आकिल ने जबाव दिया कुछ समय बाद औरंगजेब चला गया और आकिल देग के अन्दर जलकर मर गया जैब ने अपने प्यारे को अपने बगीचे में ही दफनाया दिन और रात जैब उस जगह वह आंसु बहाती और वहीं बैठकर शरीफ पढा करती कुछ दिनों तक जैब वहां बैठकर नज्मे बनाती रहती एक बार उसने एक नज्म लिखी जिसका मतलब था मुहब्बत की भी क्या किस्मत है दुनिया की खुशी के लिा उसे अपने आपको कुर्बान कर देना पड़ता है फिर जैबुन्निसा को आकिल की कब्र पर भी बैठने से मना कर दिया बाद में औरंगजेब को आकिल को लिखे गये जब के कुछ खत मिले और उसकी सजा उसने जैब को कैद में डाल दिया जैब की सारी जायदाद और चार लाख का उसका सालाना खर्च सब औरंगजेब ने जब्त कर लिया जैबुन्निसा ने अपनी जिन्दगी के इक्कीस साल कैदखाने में काट दिये और अन्त में २६ मई १७०२ को उसने इस बेरहम दुनिया से विदा ले ली कैद के दरमियान यघपि सारी दुनिया से उसके सम्बन्ध तोड दिये गये लेकिन वह नज्में बराबर लिखती रही अपनी आखिरी नज्म में उसने इन भावों को प्रकट किया कब तक मेरे इन पैरों में ये जंजीरे पडी रहेंगी मेरे सारे दोस्त दुश्मन हो गये सारे रिश्तेदार गैर बन गये मैं बदनामी से कैसे बच सकती हूं जब मेरे सारे दोस्त और हमदर्द ही मुक्षे बदनाम करने पर तुले है जैब अब तुम कैद से छुटकारा नहीं पा सकती ऐ जैब अब केवल मौत ही तुक्षे इस कैद से छुटकारा दिला सकती है।