मान्धातृ

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हाल ही में कुछ ऐसे वैज्ञानिक शोध पत्र देखे गये हैं जो यह इशारा करते है कि तकनीक के विकास से पुरुषों द्वारा भी गर्भधारण करके अपनी संतान को जन्म देना संभव है | लेकिन क्या आप जानते है कि ये तकनीक तो हमारे पूर्वजों ने हज़ारों साल पहले ही विकसित कर ली थी | आज मैं आपको भगवान श्री राम के पूर्वज राजा युवनाश्व की कहानी सुनाऊंगा, जिन्होंने स्वयं गर्भधारण करके अपने पुत्र को जन्म दिया था जो बाद में “चक्रवती सम्राट राजा मांधाता” के नाम से प्रसिद्ध हुआ | साथ ही ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में भी जानेंगे ।

हमभी जानते है कि त्रेता युग में भगवान राम का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ जोकि भगवान राम के जन्म से कई पीढ़ियों पहले महराजा इक्ष्वाकु द्वारा प्रारम्भ किया गया था इन्ही महाराजा इक्ष्वाकु के पुत्र राजा युवनाश्व थे | राजा युवनाश्व का कोई पुत्र नहीं था इसलिए वंश वृद्धि और पुत्र प्राप्ति की कामना लिए उन्होंने अपना सारा राज-पाट त्याग कर वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय किया । वन में अपने निवास के दौरान उनकी मुलाकात महर्षि भृगु के वंशज च्यवन ऋषि से हुई। च्यवन ऋषि ने राजा युवनाश्व के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करना आरंभ किया ताकि राजा की संतान जन्म ले। यज्ञ के बाद च्यवन ऋषि ने एक मटके में अभिमंत्रित जल रखा जिसका सेवन राजा की पत्नी गौरी को करना था ताकि वह गर्भधारण कर पाए।

राजा युवनाश्व की संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से हुए यज्ञ में कई ऋषि-मुनियों ने भाग लिया और यज्ञ के बाद सभी लोग थकान की वजह से गहरी नींद में सो गए। रात्रि के समय जब राजा युवनाश्व की नींद खुली तो उन्हे भयंकर प्यास लगी । युवनाश्व ने पानी के लिए बहुत आवाज लगाई लेकिन थकान की वजह से गहरी नींद में सोने की वजह से किसी ने राजा की आवाज नहीं सुनी। ऐसे में राजा स्वयं उठे और पानी की तलाश करने लगे। राजा युवनाश्व को वह कलश दिखाई दिया जिसमें अभिमंत्रित जल था । वह इस बात से बेखबर थे कि ये जल किस उद्देश्य के लिए रखा है, राजा ने प्यास की वजह से सारा पानी पी लिया। जब इस बात की खबर ऋषि च्यवन को लगी तो उन्होंने राजा से कहा कि ये आपने क्या किया? ये मंत्रो से निरुद्ध किया गया खास जल था जिसमें ब्रह्मतेज स्थापित था और इसको पीने से आपकी पत्नी को महाबली, महापराक्रमी पुत्र उत्पन्न होता | चूंकि मैंने आपकी पत्नी की नाड़ी व अन्य जांच से यह जान लिया था कि आपकी पत्नी का गर्भाशय पूर्ण विकसित नहीं हैं अतः मैंने वैज्ञानिक तरीके से ऐसा रसायन बनाया था जो शरीर में जाकर गर्भाशय बना सकता था या अविकसित गर्भाशय को सन्तानोत्पत्ति के योग्य बना सकता है | चूंकि आप पुरुष है इसलिए ये अभिमंत्रित जल आपके शरीर से अभिक्रिया करके पेट के बायीं ओर एक गर्भाशय बना देगा और उसके अन्दर अण्डाणु भी स्त्रवित करेगा तत्पश्चात और स्वयं आपके शरीर में से शुक्राणु लेकर निषेचन कर देगा | यानी आज की भाषा में समझें तो जैसे कि मोबाइल में एप डाउनलोड करते समय एप का पासवर्ड जब एसएमएस पर आता है तो एप अपना पासवर्ड स्वयं उठा लेती है | अतः आपकी संतान अब आपके गर्भ से ही जन्म लेगी मैं एक अन्य औसधि दूंगा जिससे आपको गर्भधारण जनित कष्ट का अनुभव नहीं होगा |

जब संतान के जन्म लेने का सही समय आया तब देवों के चिकित्सक अश्विन कुमारों ने राजा युवनाश्व की बायीं कोख को काटकर बच्चे को बाहर निकाला और जन्म दिया | संभवतः विश्व में पहली बार ही पिता ने गर्भधारण करके सन्तान को जन्म दिया था साथ ही पेट काटकर ऑपरेशन से बच्चे का जन्म लेने की विश्व की यह प्रथम घटना है | दुनिया समझती है कि जूलियर सीजर ऐसा प्रथम व्यक्ति था जबकि वह घटना तब से कई हज़ार साल पहले ही पृथ्वीलोक पर मान्धाता के जन्म के रूप में घटी जा चुकी थी ।

बच्चे के जन्म के बाद यह समस्या उत्पन्न हुई कि बच्चा अपनी भूख कैसे मिटाएगा | चूकिं बच्चे ने पिता के गर्भ से जन्म लिया तो माता के स्तनों में दूध नहीं उतरा और पिता के स्तन ही नहीं थे | सभी देवतागण वहां उपस्थित थे, इतने में इंद्र देव ने उनसे कहा कि वह उस बच्चे के लिए मां की कमी पूरी करेंगे । इन्द्र ने अपनी अंगुली शिशु के मुंह में डाली जिसमें से दूध निकल रहा था और कहा “मम धाता” अर्थात मैं इसकी मां हूं । इसी वजह से उस शिशु का नाम ममधाता या मांधाता पड़ा। जैसे ही इंद्र देव ने शिशु को अपनी अंगुली से दूध पिलाना शुरू किया वह शिशु 13 बित्ता बढ़ गया । बालक ने चिंतनमात्र से धनुर्वेद सहित समस्त वेदों का ऐसे ही ज्ञान प्राप्त कर लिया था मानो कंप्यूटर में हार्ड डिस्क लगाकर डाटा डाउनलोड कर दिया हो और शीघ्र ही इंद्र की कृपा से उनके पास परम शक्तिशाली धनुष बाण और कवच इत्यादि आ गये | इसके बाद राजा युवनाश्व ने अपना राज पाट मांधाता को देकर उसे राजा बना दिया | इंद्र ने उसका राज्याभिषेक किया। मांधाता ने धर्म से तीनों लोकों को नाप लिया। बारह वर्ष की अनावृष्टि के समय इंद्र के देखते-देखते मांधाता ने स्वयं पानी की वर्षा की थी।

मान्धाता की राजधानी उस समय अयोध्या थी | मान्धाता भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे | उन्होंने नर्मदा नदी के तट पर खण्डवा के पास एक पहाड़ी पर शिवलिंग की स्थापना कर तपस्था की और नदी का रुख इस तरीके से घुमाया कि वहां ॐ बन गया | जो कि आज ओमकारेश्वर ज्योतिलिंग के नाम से प्रसिद्ध है | और वह स्थान मान्धाता पहाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुआ | बाद में मान्धाता अपनी राजधानी यहीं ले गये | यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं, जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और पचास कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं | मांधाता ने युद्ध में उस समय के लगभग सभी राजाओं जैसे कि अंगार, मरूत, असित, गय तथा बृहद्रथ आदि को पराजित कर पूरे पृथ्वीलोक पर अधिकार कर लिया था। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक का समस्त प्रदेश मांधाता का ही कहलाता था। उन्होंने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे और एक योजन ऊंचे रोहित नामक सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिये थे। दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करने के उपरांत मांधाता ने विष्णु के दर्शनों के निमित्त तपस्या की और भगवान विष्णु के वाराह अवतार का ध्यान करते हुये एकादशी का व्रत रखा जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने दर्शन दिये तथा क्षत्रियोचित कर्म का निर्वाह करने का उपदेश देकर अंतर्धान हो गये और तब से उस एकादशी का नाम बरुथिनी एकादशी रखा गया जो सर्वाधिक फल देने वाली एकादशी मानी जाती हैं |

जब मांधाता ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार कर लिया तो उनमे घमंड आ गया और अपनी शक्ति का गुमान हो गया था और अब वह स्वर्ग को जीतना चाहते थे । इससे इंद्र सहित अन्य देवता बहुत घबरा गये । उन्होंने मांधाता को आधा देवराज्य देना चाहा, पर वे नहीं माने। वे संपूर्ण देवलोक के इच्छुक थे | इस पर इंद्र ने ताना मारते हुये कहा कि कहा अभी तो सारी पृथ्वी ही तुम्हारे अधीन नहीं है, लवणासुर तुम्हारा कहा नहीं मानता।” मांधाता लज्जित होकर मृत्युलोक में लौट आये। उन्होंने लवणासुर के पास दूत भजा, जिसे उसने खा लिया। फिर दोनों ओर की सेनाओं का युद्ध हुआ | लवणासुर ने भगवान शंकर की तपस्या करके एक खास त्रिशूल प्राप्त किया था जिसका वार रोकना असंभव था | लवणासुर ने अपने त्रिशूल से राजा मांधाता और उसकी सेना को भस्म कर दिया । मांधाता की मृत्यु के बाद मुचकुन्द राजा बने |

ज्ञात रहे मान्धाता को अब तक का सम्पूर्ण विश्व के चारों युगों का सबसे महान, शक्तिशाली और प्रतापी राजा समझा जाता हैं | मान्धाता के चित्र बने सिक्के व मूर्तियां मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हुई है जिनसे यह जाना जा सकता है कि मान्धाता के राज्य का विस्तार कहां तक था | आज भी भारत का कोली (कोरी) समाज जोकि मुख्यतः महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश आदि में निवास करता है वह महाराज मान्धाता को ही अपना इष्टदेव मानता है | यह बात इस बात को भी सिद्ध करती है कि कोली समाज पहले क्षत्रिय कर्म भी करता था और हमारी वर्ण व्यवस्था जाति आधारित न होकर कर्म आधरित थी |

मान्धातृ मान्धाता अयोध्या के राजा, वैदिक काल के सम्राट हैं।

राजा मान्धाता ने पूरी पृथ्वी पर शासन किया, इसी कारण से मांधाता को पृथ्वीपति के नाम से जाना जाता है

मान्धातृ अथवा मांधाता, इक्ष्वाकुवंशीय नरेश युवनाश्व और गौरी के पुत्र। उन्हे सौ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों का कर्ता और दानवीर, धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट् जो वैदिक अयोध्या नरेश मंधातृ से अभिन्न माना जाता है।

यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और 50 कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं जो एक ही साथ सौभरि ऋषि से ब्याही गई थीं। पूत्रेष्ठियज्ञ के हवियुक्त मंत्रपूत जल को प्यास में भूल से पी लेने के कारण युवनाश्व को गर्भ रह गया जिसे ऋषियों ने उसका पेट फाड़कर निकाला। वह गर्भ एक पूर्ण बालक के रूप में उत्पन्न हुआ था जो इंद्र की अमृतस्त्राविणी तर्जनी उँगली चूसकर रहस्यात्मक ढंग से पला और बढ़ा। इंद्रपालित (इंद्र के यह कहने पर कि माता के स्तनों के अभाव में यह शिशु "मेरे द्वारा धारण किया" अथवा पाला जाएगा) होने के कारण उसका नाम मांधाता पड़ा। यह बालक आगे चलकर पर पराक्रमी हुआ और रावण समेत अनेक योद्धाओं को इसने परास्त किया। इसने विष्णु तथा उतथ्य से राजधर्म और वसुहोम से दंडनीति की शिक्षा ली थी। गर्वोन्मत्त होने पर या लवणासुर द्वारा युद्ध में मारा गया।

इनके जन्म के बारे में एक बात यह भी पता चलती है कि इनका जन्म धनु लग्न में अर्ध रात्रि से पहले लगभग रात ९-१०बजे हुआ था व इनके जन्म के समय सभी ग्रह उच्च के थे। जिससे ये चक्रवर्ती सम्राट बने। पर ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य उच्च हों तो बुध उच्च नहीं हो सकते तो इनके जन्म के बुध मेष अथवा मिथुन के ही होंगे।