गुलिया

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गुलिया एक जाट गोत्र है। गुलिया की उत्पति प्राचीन कुल्या जाति से है। यह पुराण के कुल्या के वंश जैसे हैं। मरकान्दया पुराण इसे मध्य भारत के मत्सयस के साथ जिक्र करते हैं। भीमसिंह दाहिया बताते हैं मत्सय पुराण कुलिया नाम के लोगों को जिक्र करते हैं। दाहिया बताते हैं अभी अन्तरास्टीय क्षेत्र में आने से यह देखा जाता है कि कुछ जाति के वंश आज भी गालत के नाम से जाने जाते हैं। मनडटर और गुलिया वंश ऐसा माना जाता है कि यह ग्रीक के गलाटेन्स लेखकों से सम्बन्धित है जो इतिहासिक रुप से यूरोप के लोग हैं । यह एक ऐसा शंका है जिसकी खोज अनिवर्य है । भीमसिंह दाहिया वरदक के लेखन के बारे में लिखते हैं कि करीब १२९ में बरामारेगा द्वारा भगवान बुध्द के स्तुपा के स्थापाना के समय सम्बनध रखती है, यह स्कीओन के कामा गुलिया को भी याद दिलाती है। बर्ड दाहिया के अनुसार प्रिथ्वीराज चौहान के शासनकाल में बदली गाँव के रोहतक क्षेत्र तक राजा बद्रा सुन द्वारा शासन किया जाता था । कुछ समय बाद दो व्यक्ति सैयद सरकार, नासिर हुसैन मसहादे और अताउल्ला मसाहादे काबूल से बाल्दी भीरा सैयद के नेर्त्त्वा में हारियाणा को नष्ट करने आये और बद्रा सेन को मारकर नये शासन प्राप्त किये । ११९२ में ताराई की युध्द में मोहम्मद घोरी ने प्रिथ्वीराज को मारकर युध्द में विजयी बना । उस युध्द के दौरान सात ब्रह्मीण सैनिक वहाँ से भागकर दक्षिण बल्दी के मंदिर में शरण लिया। वे इन्द्रगड के उदय चन्द के पुत्र थे। उनका नाम आउसर, रहल, असल, महल और चहल था। वे मदिरा को पानी समझकर पी लिये और ब्र्ह्मीण के शुध्द्ता को नष्ट कर दिये। वहीं से वे अपने पास वाले घडे़ पर धागा बाँधना शुरु किया। तभी से ये ब्र्ह्मीण लोग गुलिया के नाम से जाने गये जो बाद में बल्दी के निकट रहने लगे। उनका प्रारंभिक इतिहास इस तरह बहुत ही अविश्वसनीय और जटिल रह रहा है।