अज़ान

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अज़ान (उर्दू: أَذَان) या अदान। इस्लाम में मुस्लिम समुदाय अपने दिन भर की पांचों नमाज़ों के लिए बुलाने के लिए ऊँचे स्वर में जो शब्द कहते हैं, उसे अज़ान कहते हैं।

अज़ान कह कर लोगों को [मस्ज़िद] की तरफ़ बुलाने वाले को मुअज़्ज़िन कहते हैं।

अजान - हिन्दी संस्कृत अर्थ


अजान की संस्कृत व हिन्दी अर्थ इस प्रकार है।

अजान 1- विशेषण [संस्कृत अज्ञान, प्रा० अजाण [स्त्रीलिंग अजानी] 1. जो न जाने । अनजान । अबोध । अनभिज्ञ । अबूझ । नासमझ । उदाहरण-(क) तुम प्रभु अजित, अनादि लोकपति, हौं अजान मतिहीन । -सूरदास, 1 ।181 । (ख) भक्त अरु भगवत एक है बूझत नहीं अजान । -कबीर

अजान 2- संज्ञा पुलिंग 1. अज्ञानता । अनभिज्ञता । उदाहरण-(क) 'मुझसे यह काम अजान में हो गया ।' -(शब्द०) । (ख) धीरे धीरे आती है जैसे मादकता आँखों के अजान में ललाई में ही छिपती । -लहर, देखें पृष्ठ संख्या 84 । विशेष-इसका प्रयोग इस अर्थ में 'में' के साथ ही होता है और दोनों मिलकर क्रियाविशेषणवत् हो जाते हैं । कहीं कहीं इसका स्वतंत्र प्रयोग भी प्राप्त होता है ; जैसे-'जान अजान नाम जो लेइ । हरि बैकुंठ बास तिहिँ देइ । -सूरदास, 6 ।4 ।

विशेषण शब्द - (हिंदी शब्द - अ+जानना) 1. न जाननेवाला अथवा जिसे कोई न जानता हो। 2. (बालक) जिसे ज्ञान या बोध न हुआ हो। 3. (व्यक्ति) जिसे ज्ञान, बोध या समझ न हो।

शुरूआत[संपादित करें]

मदीना तैयबा में जब नमाज़ बाजमात के लिए मस्जिद बनाई गई तो जरूरत महसूस हुई कि लोगों को जमात (इकटठे नमाज पढने) का समय करीब होने की सूचना देने का कोई तरीका तय किया जाए। रसूलुल्‍लाह ने जब इस बारे में सहाबा इकराम (मुहम्मद साहिब के अनुयायी) से परामर्श किया तो इस बारे में चार प्रस्ताव सामने आए:

  1. प्रार्थना के समय कोई झंडा बुलंद किया जाए।
  2. किसी उच्च स्थान पर आग जला दी जाए।
  3. यहूदियों की तरह बिगुल बजाया जाए।
  4. ईसाइयों की तरह घंटियाँ बजाई जाएं।

उपरोक्त सभी प्रस्ताव हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को गैर मुस्लिमों से मिलते जुलते होने के कारण पसंद नहीं आए। इस समस्या में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा इकराम चिंतित थे कि उसी रात एक अंसारी सहाबी हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ैद ने स्वप्न में देखा कि फरिश्ते ने उन्हें अज़ान और इक़ामत के शब्द सिखाए हैं। उन्होंने सुबह सवेरे हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सेवा में हाज़िर होकर अपना सपना बताया तो हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इसे पसंद किया और उस सपने को अल्लाह की ओर से सच्चा सपना बताया।

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम

ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ैद से कहा कि तुम हज़रत बिलाल को अज़ान इन शब्‍दों में पढने की हिदायत कर दो, उनकी आवाज़ बुलंद है इसलिए वह हर नमाज़ के लिए इसी तरह अज़ान दिया करेंगे। इसलिए उसी दिन से अज़ान की प्रणाली स्थापित हुई और इस तरह हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु इस्लाम के पहले अज़ान देने वाले के रूप में प्रसिद्ध हुए।

अज़ान का मतलब[संपादित करें]

मूल हिन्दी अर्थ

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<CHITRAKOOt .UP>
अल्लाहु अकबर
अल्लाहु अकबर,

अल्लाहु अकबर
अल्लाहु अकबर,

अल्लाह सब से महान है

अल्लाह सब से महान है

अल्लाह सब से महान है

अल्लाह सब से महान है

अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह
अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह

मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा इबादत के काबिल नहीं

मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा इबादत के काबिल नहीं

अश-हदू अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह
अश-हदू अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह

मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के रसूल हैं

मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के रसूल हैं

ह़य्य 'अलस्सलाह

ह़य्य 'अलस्सलाह,

आओ इबादत की ओर

आओ इबादत की ओर

ह़य्य 'अलल्फलाह

ह़य्य 'अलल्फलाह,

आओ सफलता की ओर

आओ सफलता की ओर

अस्‍सलातु खैरूं मिनन नउम
अस्‍सलातु खैरूं मिनन नउम *

नमाज़ नींद से बहतर है

नमाज़ नींद से बहतर है*

अल्लाहु अकबर

अल्लाहु अकबर,

अल्लाह सब से महान है

अल्लाह सब से महान है

ला-इलाहा इल्लल्लाह अल्लाह के सिवा कोई इबादत के काबिल नहीं।

*यह सिर्फ सुबह की नमाज़ में कहे जाते हैं

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

अज़ान का अर्थ और उद्देश्य[संपादित करें]

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------------अज़ान ईश्वर का प्रशस्तिगान है और ईश्वर के बन्दों को उसकी इबादत के लिये बुलाने की उद्घोषणा है। दुनिया की हर मस्जिद से दिन में पॉच बार अज़ान पुकारी जाती है जिसमें मानवता, ब्रहमाण्ड और सृष्टि के वास्तविक रचयिता, मालिक, स्वामी और संरक्षक अल्लाह यानि ईश्वर यानि गॉड यानि खुदा, परवरदिगार और रब, परमेश्वर, प्रभू और विधाता, करीम, रहीम और रहमान का प्रशस्तिगान किया जाता है। उसके बाद आखिरी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद की वास्तविकता और महानता का बखान किया जाता हैै। इसके पश्चात् लोगों को नमाज़ और भलाई की तरफ आने का दिन में पॉच बार आवाहन किया जाता है। यही अज़ान का उद्देश्य है।[संपादित करें]

------------अज़ान और नमाज इस्लाम धर्म का महत्वपूर्ण अंग है। इसके बिना इस्लाम का अनुपालन कभी पूर्ण नहीं हो सकता। इस्लाम दुनिया का सबसे ज्यादा पापुलर और महत्वपूर्ण धर्म है जिसके अरबों अनुयायी सारी दुनिया में फैले हुये हैं। ये अनुयायी दिन में पॉच बार मस्जिद में इकट्ठा होकर एक साथ नमाज के ज़रिये ईश्वर की इबादत करते हैं। उनको इस मकसद को बुलाने के लिये जो ऐलान होता है, पुकार और उद्घोषणा की जाती है उसे अज़ान कहते हैं। चूंकि इस्लाम धर्म के अनुयायी सारी दुनिया में, हर मुल्क और हर हिस्से निवास करते हैं इसलिये हर जगह एक ही तरीके से मस्जिद में इकट्ठा होकर एक साथ नमाज अदा की जाती है और इसके लिये अज़ान, पुकार, एनाउंसमेंट, उद्घोषणा की जाती है ताकि समस्त नमाज़ी समय पर एकत्र होकर नमाज़ अदा कर सकें।[संपादित करें]

-----------अज़ान अरबी ज़बान का शब्द है। यह अरबी धात् 'उज़्न' से बना है जिसका अर्थ है कान लगाकर सुनना। ’अलउज़्न’ का अर्थ है ’कान’ जबकि अज़ान का अर्थ होता है कोई ख़बर, कोई बात किसी के कान तक पहुॅचाना। अज़ान देने वाले को मुअज़्ज़िन कहते हैं। अज़ान के शब्दो का अर्थ इस प्रकार है:---[संपादित करें]

*********सबसे पहले अल्लाहु अकबर चार बार बोला जाता है। अल्लाहू अकबर का अर्थ है कि अल्लाह यानि ईश्वर सबसे बड़ा है।[संपादित करें]

*********इसके बाद दो बार अशहदु अन्लाइलाहा इल्लल्लाहु बोला जाता है जिसका अर्थ होता है कि मैं गवाही देता हूॅ कि बेशक अल्लाह यानि ईश्वर के अलावा कोई दूसरा उपास्य, पूज्यनीय, माबूद नहीं यानि उपासना, पूजा और इबादत के लायक नहीं है।[संपादित करें]

**********फिर दो बार कहा जाता है कि अशहदु अन्ना मुहम्मदुर्रसूल्लाह जिसका अर्थ होता है कि मैं गवाही देता हूॅ कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल यानि अल्लाह की तरफ से इन्सानों की तरफ भेजे गये पैगम्बर, संदेशवाहक, संदेश्टा, प्रोफेट, रहवर, रहनुमा और मार्गदर्शक हैं।[संपादित करें]

*********फिर दो बार कहा जाता है कि हैया अलस्सलाह जिसका अर्थ है कि नमाज़ की तरफ आओ लोगो और दो बार कहा जाता है कि हैया अललफलाह यानि की फलाह, कामयाबी, सफलता और भलाई की तरफ आओ लोगो।[संपादित करें]

**********इसके बाद अन्त में फिर से दो बार अल्लाहू अकबर और एक बार लाइलाहा इल्लल्लाहु कहा जाता है अर्थात अल्लाह सबसे बड़ा और सबसे महान है और उसके सिवा कोई दूसरा उपास्य, पूज्यनीय, माबूद नहीं यानि उपासना, पूजा और इबादत के लायक नहीं है।[संपादित करें]

**********सुबह जब अज़ान पुकारी जाती है तब उसमे दो बार यह भी कहा जाता है कि अस्सलातु खैरुम्मिनन्नौम जिसका अर्थ है नमाज़ नींद से बेहतर है[संपादित करें]

--------------सारी दुनिया में इसी तरह, एक ही मकसद के लिए, समान तरीके से अज़ान होती है जिसमें उपरोक्त शब्दों का उच्चारण सिर्फ अरबी ज़बान में होता है। दुनिया की हर मसजिद से अज़ान देने वाला मुअजि़्ज़न इन्हीं शब्दों और जुमलों को बोल कर पुकार लगाता है। अज़ान के दौरान मुअज़्ज़िन द्वारा बुलन्द आवाज़ में बोले गये उपरोक्त जुमलों के अर्थ पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि अज़ान सिर्फ ईश्वर का प्रशस्तिगान है और उसके बन्दों को उसकी इबादत के लिये बुलाने की उद्घोषणा है। इस उद्घोषणा में हमेशा कायनात और सृष्टि के वास्तविक मालिक, स्वामी और संरक्षक अल्लाह यानि ईश्वर यानि गॉड यानि खुदा, परवरदिगार और रब, परमेश्वर, प्रभू और विधाता, करीम, रहीम और रहमान की और उसके आखिरी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद की इस प्रकार वास्तविकता और महानता का बखान करने के बाद, प्रशस्तिगान करने के पश्चात् लोगों को नमाज़ और भलाई की तरफ आने का आवाहन किया जाता है। यही अज़ान का उद्देश्य है।[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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