रोहतास जिला

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
रोहतास ज़िला
Rohtas district
मानचित्र जिसमें रोहतास ज़िला Rohtas district हाइलाइटेड है
सूचना
राजधानी : सासाराम
क्षेत्रफल : 3,847.82 किमी²
जनसंख्या(2011):
 • घनत्व :
29,62,593
 770/किमी²
उपविभागों के नाम: विधानसभा सीटें
उपविभागों की संख्या: 2
मुख्य भाषा(एँ): हिन्दी


रोहतास ज़िला भारत के बिहार राज्य का एक ज़िला है। ज़िले का मुख्यालय सासाराम है।[1][2]

विवरण[संपादित करें]

जिले में तीन अनुमंडल हैं, जिनमें डेहरी आन सोन, बिक्रमगंज और सासाराम है।

रोहतास जिले के बिक्रमगंज में मां अस्कामिनी [3]का बेहद प्राचीन मंदिर है। रोहतास जिले के रोहतासगढ़ किले का भी ऐतिहासिक महत्व है। वहीं, सासाराम में शेरशाह सूरी का प्रसिद्ध मकबरा भी अवस्थित है। ऐसा कहा जाता है कि शेरशाह सूरी ने ही वर्तमान डाक-तार व्यवस्था की शुरुआत की थी। इस जिले की सबसे खास बात यह भी है कि यहाँ का जिलाधिकारी कार्यालय सासाराम में है, जबकि पुलिस मुख्यालय डेहरी आन सोन में है। साथ में न्यायिक कार्यालय क्रमशः सासाराम और बिक्रमगंज में है। बिक्रमगंज के समीप स्थित धारुपुर की मां काली का मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। यह एक मात्र ऐसा मंदिर है, जो नहर के बीचों-बीच अवस्थित है।

रोहतास जिला पटना डिवीजन का एक हिस्सा है और यह ३८५० वर्ग किलोमीटर का एक क्षेत्र है, २४,४८,७६२ (२००१ जनगणना) की आबादी और किमी² प्रति ६३६ व्यक्तियों की आबादी के घनत्व। इस क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी है। जिले के प्रशासनिक मुख्यालय, सासाराम ऐ9तिहासिक महत्व की एक जगह है। राष्ट्रीय गौरव का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रतीक सोन पुल, सोन नदी के ऊपर बना हुआ है वहाँ दो समानांतर पुलों, सड़क के लिए एक और रेलवे के लिए एक और कर रहे हैं। सड़क पुल (जवाहर सेतु १९६३-६५ में गैमन इंडिया द्वारा निर्मित) सोन पर लंबे समय तक एशिया में (३०६१ मी) था जब तक यह पटना में गंगा नदी के ऊपर महात्मा गांधी सेतु (5475 मीटर) द्वारा को पार कर गया था। रेलवे पुल अभी भी सबसे लंबे समय तक एशिया में रेलवे पुल है।

इसके तीन अनुमंडल बिक्रमगन्ज, सासाराम और डेहरी है। बिक्रमगंज में अस्कामिनि माँ का मन्दिर काफी प्रसिद्ध है। बिक्रमगन्ज के पास स्थित धारुपुर काली माँ का मन्दिर भी बहुत प्रसिद्ध है। ये मन्दिर नहर के बीचोबीच है। कैमूर पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित मां ताराचंडी का शक्तिपिठ और जिला मुख्यालय सासाराम से 35 किलोमीटर दूर मां तुत्लेशवरी देवी की मंदिर तुत्राही झील के बीचोंबीच स्थित है कैमूर पहाड़ियाँ पर्यटन के लिये भी प्रसिद्ध हैं। सासाराम में प्रसिद्ध शेरशाह का मकबरा है।

इतिहास[संपादित करें]

रोहतास एक जिले का नहीं, एक इतिहास का नाम है, जो बिहार में आर्यों के प्रसार के साथ बढ़ा। सतयुगी सूर्यवंसी राजा सत्यहरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व [4]द्वारा स्थापित रोहतासगढ़ के नाम पर इस क्षेत्र का नामकरण रोहतास हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड ने लिखा है कि रोहतास क़िला का निर्माण कुशवंशी (कुशवाहा) लोगों ने करवाया है।1582 ई. यानि मुग़ल बादशाह अकबर के समय रोहतास, सासाराम, चैनपुर सहित सोन के दक्षिण-पूर्वी भाग के परगनों- जपला, बेलौंजा, सिरिस और कुटुंबा शामिल थे। 1784 ई. में तीन परगनों- रोहतास, सासाराम और चैनपुर को मिलाकर रोहतास जिला बना और फिर 1787 ई. में यह जिला शाहाबाद जिले का अंग हो गया। 10 नवम्बर 1972 को शाहाबाद से अलग होकर रोहतास जिला पुनः अस्तित्व में आ गया। अंग्रेजों के जमाने में यह क्षेत्र पुरातात्विक महत्व का रहा। 1861 ई. में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना के साथ अलेक्जेंडर कनिंघम पुरातात्विक सर्वेयर नियुक्त हुए। उन्होंने गया जिले से लेकर पश्चिम में सिंध तक के पुरास्थलों का सर्वे किया इस क्रम में रोहतास भी अछूता न था बाद में 1871 ई. में कनिंघम को भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण का महानिदेशक नियुक्त किया गया तो उसी समय 1882 ई. में सासाराम स्थित शेरशाह रौजे का जीर्णोद्वार हुआ।

रोहतास में रोहतास के किले, मकबरे, मंदिर, और मस्जिदों के अतिरिक्त यहाँ के प्रपात,बराज एवम बांध आदि पर्यटकों को आकर्षित करने के भरपूर संभावना रखते है।

भूगोल[संपादित करें]

उप प्रभागों: सासाराम, डेहरी, बिक्रमगन्ज

ब्लॉक: नौहट्टा, चेनारी, नासरीगन्ज्, रोहतास, नोखा, डेहरी, बिक्रमगन्ज,दावथ, दिनारा, राजपुर, शिवसागर ,तिलौथु,KARGAHAR

कृषि: धान, गेहूं, दाल

उद्योग: सीमेंट, पत्थर माइंस

नदियों: सोन, काव

काव नदी पर संकट

कैमूर घाटी में गोरिया गांव के निकट से एक छोटी नदी काव का उदगम है, घाटी में उसे गोरिया नदी कहते हैं । घाटी से निकलकर यह नदी मांजर कुंड के पास जमीन पर उतरती है और वहां से काव नदी कहलाती है। कैमूर पहाड़ी से निकलकर विशाल धारा के साथ सासाराम, बिक्रमगंज, दावथ, नावानगर, मलियाबाग, सिकरौल, डुमरांव होते हुए नया भोजपुर के कोकिला ताल में इस नदी का पानी गिरने के बाद गंगा नदी में मिल जाता था. जानकारों की माने तो इस नदी का अस्तित्व आदि काल से है। शाहाबाद की शान हुआ करती थी काव नदी, लेकिन इसका अस्तित्व मिटने के कगार पर है। दुनियाभर में जलपुरुष के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह ने इस नदी के उदग्म स्थल का दौरा कर इसके सुखने के कारणों की जानकारी प्राप्त की और सरकार को अपने सुझाव से अवगत कराया है। इसके बाद उनके सहयोगी पंकज मालवीय ने इस नदी की समस्याओं का अध्ययन कर सरकार के प्रधान सचिव संजीव हंस को बदहाली की विस्तार से जानकारी दी।

नदी के भूभाग पर अतिक्रमण व राज-समाज की उपेक्षा ने इसे नाला में बदल दिया है। सुखते ताल-तलैया  और काव नदी को देखकर इलाके के बुजुर्ग उन दिनों को याद करने लगते हैं, जब इस नदी में कल-कल करती धारा पुरे वर्ष बहती थी। इससे शाहाबाद के बड़े भूभाग की सिंचाई होती थी, साथ ही कई प्रजाति के वन्य प्राणियों की शरण स्थली थी काव नदी। जहां पशु पक्षियों को विचरण करते देखना आनंद विभोर करने वाला दृश्य होता था। लेकिन आज इसका अस्तित्व सिमटने से वीरानगी छायी हुई है। अब न तो यहां हिरणों के झुंड आते हैं और न ही तोता, मैना, कोयल जैसे असंख्य पक्षियों की चहचाहट। नदी की जमीन पर अतिक्रमण का आलम यह है कि अनुमंडल सहित स्थानीय नगर में भी इसकी जमीन पर प्रभावशाली लोगों के द्वारा खेती की जाती है और जमीन को हड़पने का प्रयास भी।

काव नदी का उद्गम स्थल रोहतास की पहाड़ी से निकल मलियाबाग से यह अनुमंडल मुख्यालय में प्रवेश करती है। वहीं, नया भोजपुर के पास से भोजपुर ताल के सहारे गंगा नदी में मिल जाती है। प्राचीन काल में इसका क्षेत्र बहुत व्यापक था। स्थानीय लोग बताते हैं कि इसमें भयंकर बाढ़ भी आती थी। इसके विशालता को कम करने व बाढ़ से जानमाल की क्षति को रोकने के लिये विजय प्रताप सिंह द्वारा सैकड़ों वर्ष पूर्व मलई बाराज के पास बांध का निर्माण कराया गया था। लेकिन, तब भी इसकी विशालता इतनी कम नहीं हुई थी। समय के साथ लोगों में बढ़ी स्वार्थपरता से कहीं ऐसा न हो जाय कि नदी का अस्तित्व सिर्फ कथा-कहानियों तक ही सिमट कर न रह जाये। अवैध खनन व अतिक्रमण से काव नदी का अस्तित्व खतरे में आ गया है. कई नहरों का संगम बना काव नदी में पानी नहीं आने से इलाके के हजारों किसानों के समक्ष सिंचाई की समस्या उत्पन्न हो गयी है. खेतों में पैदावार की कमी हो गयी है.

रोहतास के मलियाबाग से लेकर बक्सर के नया भोजपुर ताल तक काव नदी के दोनों तटों पर अतिक्रमण का सिलसिला जारी है. विगत एक दशक के अंदर यह नदी संकीर्ण हो कर अपनी पहचान बनाये रखने में नाकाम साबित हो रही है. दो दशक पूर्व काव नदी में पानी भरा रहता था, जिससे किसान अपने खेतों की सिंचाई कर पैदावार बढ़ाते थे. जैसे-जैसे समय गुजरता गया, नदी का पानी भी सूखता चला गया. आज इस नदी में पानी का कहीं अता-पता नहीं है. काव नदी के गर्भ से कहीं मिट्टी तो कहीं बालू के लालच में अवैध खनन जारी है. अनुमंडल के सैकड़ों गांव के किसान पानी सुख जाने से परेशान हैं. क्षेत्र के किसानों को अब बारिश पर निर्भर करना पड़ रहा है या फिर ट्यूबवेल के भरोसे रहना पड़ रहा है. जानकार बताते हैं कि यह नदी अंग्रेजों के कार्यकाल में रूपसागर के पास ठोरा नदी में मिला दी गई थी, ऐसे में वहां  से यह नदी ठोरा कहलाते हुये गंगा में जा मिलती है। काव नदी रोहतास के भभुआ-मोहनिया के बीच कैमूर की पहाड़ी से निकल कर मलियाबाग के समीप रूप सागर गांव में ठोरा नदी में मिलती है। मलियाबाग स्थित कवई धवई गांव के समीप काव नदी की खुदाई करा कर पांच धाराओं में जल को मोड़ा था। यह गांव पचधरवा गांव से विख्यात है. काव और ठोरा नदी के मिलन के बाद रोहतास के रूप सागर, दिनारा, लिलवछ, गुमसेज के बड़े इलाके एवं बक्सर के नावानगर, मनहथा, बेलाव व सिकरौल के लाखों किसानों को खेती के लिए पर्याप्त मात्र में पानी मिलता था।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Bihar Tourism: Retrospect and Prospect," Udai Prakash Sinha and Swargesh Kumar, Concept Publishing Company, 2012, ISBN 9788180697999
  2. "Revenue Administration in India: A Case Study of Bihar," G. P. Singh, Mittal Publications, 1993, ISBN 9788170993810
  3. "‌Bhagwan budh, Ranchi Hindi News". https://www.livehindustan.com. 1 दिसम्बर 2016. अभिगमन तिथि 20 दिसम्बर 2017. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  4. "रोहतासगढ़ के किले का रहस्‍य - खजाने का रहस्‍य". aajtak.intoday.in. 2 फ़रवरी 2011. अभिगमन तिथि 20 दिसम्बर 2017.