देव सूर्य मंदिर

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देव सूर्य मंदिर
देव सूर्य मंदिर
देव सूर्य मंदिर
स्थान: देव, बिहार, भारत
निर्देशांक: 24°39′32″N 84°26′13″E / 24.658791°N 84.437026°E / 24.658791; 84.437026
निर्माण: द्वापर युग [1][2][3]
वास्तुकार: विश्वकर्मा
वास्तु शैली(याँ): द्रविड़ शैली
पर्यटक: ३० लाख से अधिक (२००३)
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देव सूर्य मंदिर, देवार्क सूर्य मंदिर या केवल देवार्क के नाम से प्रसिद्ध, यह भारतीय राज्य बिहार के औरंगाबाद जिले में देव नामक स्थान पर स्थित एक हिंदू मंदिर है जो देवता सूर्य को समर्पित है। यह सूर्य मंदिर अन्य सूर्य मंदिरों की तरह पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है।[4]

देवार्क मंदिर अपनी अनूठी शिल्पकला के लिए भी जाना जाता है। पत्थरों को तराश कर बनाए गए इस मंदिर की नक्काशी उत्कृष्ट शिल्प कला का नमूना है। इतिहासकार इस मंदिर के निर्माण का काल छठी - आठवीं सदी के मध्य होने का अनुमान लगाते हैं जबकि अलग-अलग पौराणिक विवरणों पर आधारित मान्यताएँ और जनश्रुतियाँ इसे त्रेता युगीन अथवा द्वापर युग के मध्यकाल में निर्मित बताती हैं।

परंपरागत रूप से इसे हिंदू मिथकों में वर्णित, कृष्ण के पुत्र, साम्ब द्वारा निर्मित बारह सूर्य मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर के साथ साम्ब की कथा के अतिरिक्त, यहां देव माता अदिति ने की थी पूजा मंदिर को लेकर एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया। अतिरिक्त पुरुरवा ऐल, और शिवभक्त राक्षसद्वय माली-सुमाली की अलग-अलग कथाएँ भी जुड़ी हुई हैं जो इसके निर्माण का अलग-अलग कारण और समय बताती हैं। एक अन्य विवरण के अनुसार देवार्क को तीन प्रमुख सूर्य मंदिरों में से एक माना जाता है, अन्य दो लोलार्क (वाराणसी) और कोणार्क हैं।

मंदिर में सामान्य रूप से वर्ष भर श्रद्धालु पूजा हेतु आते रहते हैं। हालाँकि, यहाँ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष तौर पर मनाये जाने वाले छठ पर्व के अवसर पर भारी भीड़ उमड़ती है। यहाँ लगभग प्रत्येक दिन श्रद्धालु के भीड़ का जमावड़ा लगा होता है पर खास कर रविवार को यहाँ दूर दूर से हवन और पूजन करने हेतु श्रद्धालु आते रहते हैं। मान्यता है की आज तक इस मंदिर से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटा और अपने मनोवांछित फल की प्राप्ति करने के तत्पश्चात वो यहाँ की कार्तिक या पूर्णिमा के छठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ भी समर्पण करते हैं।

मान्यताएँ[संपादित करें]

प्राथमिक[संपादित करें]

  • देव के बारे में एक अन्य लोककथा भी है। एक बार भगवान शिव के भक्त माली व सोमाली सूर्यलोक जा रहे थे। यह बात सूर्य को रास नहीं आयी। उन्होंने दोनों शिवभक्तों को जलाना शुरू कर दिया। अपनी अवस्था खराब होते देख माली व सोमाली ने भगवान शिव से बचाने की अपील की। फिर, शिव ने सूर्य को मार गिराया। सूर्य तीन टुकड़ों में पृथ्वी पर गिरे। कहते हैं कि जहां-जहां सूर्य के टुकड़े गिरे, उन्हें देवार्क देव, बिहार के पास, लोलार्क सूर्य मंदिर काशी के पास और कोणार्क सूर्य मंदिर कोणार्क के पास के नाम से जाना जाता था। यहां तीन सूर्य मंदिर बने। देव का सूर्य मंदिर उन्हीं में से एक है। मंदिर निर्माण के कुछ वर्ष बाद ही एक घटना घटी की जब देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया।[5][6]

देव नाम को लेकर[संपादित करें]

  • एक अनुश्रुति यह भी है कि इस जगह का नाम कभी यहां के राजा रहे वृषपर्वा के पुरोहित शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के नाम पर देव पड़ा था।

शक्ति की प्रदर्शन[संपादित करें]

  • जनश्रुति है कि एक बार बर्बर लुटेरा काला पहाड़ मूर्तियों एवं मंदिरों को तोड़ता हुआ यहां पहुंचा तो देव मंदिर के पुजारियों ने उससे काफी विनती की कि इस मंदिर को न तोडें क्योंकि यहां के भगवान का बहुत बड़ा महात्म्य है। इस पर वह हंसा और बोला यदि सचमुच तुम्हारे भगवान में कोई शक्ति है तो मैं रात भर का समय देता हूं तथा यदि इसका मुंह पूरब से पश्चिम हो जाए तो मैं इसे नहीं तोडूंगा। पुजारियों ने सिर झुकाकर इसे स्वीकार कर लिया और वे रातभर भगवान से प्रार्थना करते रहे। सबेरे उठते ही हर किसी ने देखा कि सचमुच मंदिर का मुंह पूरब से पश्चिम की ओर हो गया था और तब से इस मंदिर का मुंह पश्चिम की ओर ही है। हर साल चैत्र और कार्तिक के छठ मेले में लाखों लोग विभिन्न स्थानों से यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना करते हैं भगवान भास्कर का यह त्रेतायुगीन मंदिर सदियों से लोगों को मनोवांछित फल देने वाला पवित्र धर्मस्थल रहा है। यूं तो सालों भर देश के विभिन्न जगहों से लोग यहां मनौतियां मांगने और सूर्यदेव द्वारा उनकी पूर्ति होने पर अर्ध्य देने आते हैं [7] [8]

अन्य[संपादित करें]

  • मान्यता है कि सतयुग में इक्ष्वाकु के पुत्र व अयोध्या के निर्वासित राजा ऐल एक बार देवारण्य (देव इलाके के जंगलों में) में शिकार खेलने गए थे। वे कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। शिकार खेलने पहुंचे राजा ने जब यहां के एक पुराने पोखर के जल से प्यास बुझायी और स्नान किया, तो उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। वे इस चमत्कार पर हैरान थे। बाद में उन्होंने स्वप्न देखा कि त्रिदेव रूप आदित्य उसी पुराने पोखरे में हैं, जिसके पानी से उनका कुष्ठ रोग ठीक हुआ था। इसके बाद राजा ऐल ने देव में एक सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। उसी पोखर में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु व शिव की मूर्तियां मिलीं, जिन्हें राजा ने मंदिर में स्थान देते हुए त्रिदेव स्वरूप आदित्य भगवान को स्थापित कर दिया। इसके बाद वहां भगवान सूर्य की पूजा शुरू हो गयी, जो कालांतर में छठ के रूप में विस्तार पाया।

मंदिर का निर्माण[संपादित करें]

प्रचलित मान्यता के अनुसार इसका निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्माने सिर्फ एक रात में किया है।[9] इस मंदिर के बाहर संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद राजा इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने इस सूर्य मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि पूर्व 2007 में इस पौराणिक मंदिर के निर्माणकाल का एक लाख पचास हजार सात वर्ष पूरा हुआ। पुरातत्वविद इस मंदिर का निर्माण काल आठवीं-नौवीं सदी के बीच का मानते हैं। मंदिर के नामकरण व निर्माण को लेकर अनुश्रुतियां अपनी जगह हैं, पुरातात्विक प्रमाण भी इसकी प्राचीनता की ओर इशारा करते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख से ज्ञात होता है कि त्रेतायुग के राजा एेल ने इसका निर्माण कराया था। पुरातत्व विभाग इसकी शिल्प कला को नागर शैली, द्रविड़ शैली, वेसर शैली का मिश्रित प्रभाव वाली मानता है। शिल्प कला से स्पष्ट होता है कि यह छठी - आठवीं सदी के बीच के बीच हुआ है। सन्दर्भ त्रुटि: <ref> टैग के लिए समाप्ति </ref> टैग नहीं मिला [10]

रथ यात्रा देव[संपादित करें]

रथ यात्रा देव सूर्य नगरी देव में सर्वप्रथम २०१८ में सूर्य सप्तमी के दिन जिसे प्रारंभ हुआ था जो संज्ञा समिति के द्वारा एक दिवसीय त्रिकोण सूर्य रथयात्रा रविवार को भानू सप्तमी या यूँ कहें अचला भानु सूर्य सप्तमी को ऐतिहासिक उदयाचलगामी सूर्य मंदिर उमगा से प्रारंभ हुआ था। जो उमगा से देव-देवकुंड होते हुए पुन: उदयाचलगामी उमगा पहुंचकर सूर्य यात्रा का समापन किया गया था। लेकिन सूर्य देव की रथ यात्रा शन २०१९ से देव में कार्य कर रहे संस्था एवम शहरवासी के द्वारा आयोजित किया जाता है। जो एक भव्य सूर्य रथ यात्रा निकलती है।[11][12]

रख-रखाव[संपादित करें]

देव सूर्य मंदिर न्यास समिति[संपादित करें]

इस मंदिर के देखभाल का दायित्व देव सूर्य मंदिर न्यास समिति का है। [13] देव सूर्य मंदिर न्यास समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र प्रसाद है। देव छठ मेला 2018 से तीन माह पूर्व डीएम राहुल रंजन महिवाल व एसपी डॉ. सत्य प्रकाश ने देव सूर्य मंदिर न्यास समिति के सौजन्य से एप बनवाई। ताकि देव छठ मेला में देशभर से आनेवाले छठ व्रती व श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा दी जा सके। आप अपने स्मार्टफोन के गूगल प्ले स्टोर पर जाएं। आप अंग्रेजी में Deo Chhath Puja लिखकर सर्च करें। आप इसे इंस्टाॅल कर लें। इसके बाद आप अपनी सुविधा के अनुसार मोबाइल से घर बैठे इसका आनंद उठा सकते हैं। [14][15]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

यह भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "छठ पर्व: सिर्फ एक रात में बना था ये सूर्य मंदिर, छठ पर लगती है श्रद्धालुओं की भीड़". abpnews.abplive.in. 22 अक्तू॰ 2017. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  2. "बिहार के इस सूर्य मंदिर में दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएं". www.patrika.com. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  3. "यह सूर्य मंदिर स्‍वयं देव शिल्‍पी ने बनाया था". Dainik Jagran. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  4. {{cite web | last=Sharma | first=Sunil | title=खुद को बचाने के लिए सूर्य मंदिर ने बदल ली थी दिशा | website=www.patrika.com | date=3 जनवरी 2015 | url=https://www.patrika.com/news/temples/ancient-surya-temple-changed-direction-from-east-to-west-to-save-itself-1001498
  5. "Lord Vishwakarma himself built the Deo Sun temple of Aurangabad". Jagran.com. 4 नवंबर 2016. अभिगमन तिथि 29 नवंबर 2018.
  6. "छठ पर्व: सिर्फ एक रात में बना था ये सूर्य मंदिर, छठ पर लगती है श्रद्धालुओं की भीड़". Abpnews.abplive.in. 23 अक्टूबर 2017. अभिगमन तिथि 29 नवंबर 2018.
  7. "विश्वकर्मा ने किया है देव के सूर्यमंदिर का निर्माण". www.ucnews.in. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  8. "खुद को बचाने के लिए सूर्य मंदिर ने बदल ली थी दिशा". www.patrika.com. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  9. "Chhath Puja 2017: भगवान विश्वकर्मा ने किया था इस सूर्य मंदिर का निर्माण, पूजा से पूरी होतीं मनोकामनाएं". NDTVIndia. 9 जनवरी 2018. अभिगमन तिथि 10 जनवरी 2018.
  10. "औरंगाबाद में दो दिवसीय देव सूर्य महोत्सव का हुआ आगाज". Dainik Bhaskar. 27 जन॰ 2015. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  11. "बैंड बाजे के साथ भगवान के रथ का हुआ स्वागत". Dainik Jagran. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  12. Automation, Bhaskar (8 फ़र॰ 2019). "सूर्य सप्तमी 12 फरवरी काे, निकलेगी रथयात्रा, होगा सामूहिक यज्ञोपवित". Dainik Bhaskar. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  13. "एसडीओ ने सूर्य मंदिर में किया दर्शन". Dainik Jagran. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  14. sheikh, sajid (10 नव॰ 2018). "देव सूर्य मंदिर का घर बैठे कर सकते हैं लाइव दर्शन, छठ पूर्व एप लाॅन्च". Dainik Bhaskar. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  15. "Deosuryamandir.org". www.deosuryamandir.org. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.