काग़ज़

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कागज का पुलिन्दा
चीन में कागज का निर्माण

कागज एक पतला पदार्थ है जिस पर लिखा या प्रिन्ट किया जाता है। कागज मुख्य रूप से लिखने और छपाई के लिए प्रयुक्त होता है। यह वस्तुओं की पैकेजिंग करने के काम भी आता है। मानव सभ्यता के विकास में कागज का बहुत बड़ा योगदान है। गीले तन्तुओं (फाइबर्स्) को दबाकर एवं तत्पश्चात सुखाकर कागज बनाया जाता है। ये तन्तु प्राय: सेलुलोज की लुगदी (पल्प) होते हैं जो लकड़ी, घास, बांस, या चिथड़ों से बनाये जाते हैं।

पौधों में सेल्यूलोस नामक एक कार्बोहाइड्रेट होता है। पौधों की कोशिकाओं की भित्ति सेल्यूलोज की ही बनी होतीं है। अत: सेल्यूलोस पौधों के पंजर का मुख्य पदार्थ है। सेल्यूलोस के रेशों को परस्पर जुटाकर एकसम पतली चद्दर के रूप में जो वस्तु बनाई जाती है उसे कागज कहते हैं। कोई भी पौधा या पदार्थ, जिसमें सेल्यूलोस अच्छी मात्रा में हो, कागज बनाने के लिए उपयुक्त हो सकता है। रुई लगभग शुद्ध सेल्यूलोस है, किंतु कागज बनाने में इसका उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि यह महँगी होती है और मुख्य रूप से कपड़ा बनाने के काम में आती है। परस्पर जुटकर चद्दर के रूप में हो सकने का गुण सेल्यूलोस के रेशों में ही होता है, इस कारण कागज केवल इसी से बनाया जा सकता है। रेशम और ऊन के रेशों में इस प्रकार परस्पर जुटने का गुण न होने के कारण ये कागज बनाने के काम में नहीं आ सकते। जितना अधिक शुद्ध सेल्यूलोस होता है, कागज भी उतना ही स्वच्छ और सुंदर बनता है। कपड़ों के चिथड़े तथा कागज की रद्दी में लगभग शतप्रतिशत सेल्यूलोस होता है, अत: इनसे कागज सरलता से और अच्छा बनता है। इतिहासज्ञों का ऐसा अनुमान है कि पहला कागज कपड़ों के चिथड़ों से ही चीन में बना था।

पौधों में सेल्यूलोस के साथ अन्य कई पदार्थ मिले रहते हैं, जिनमें लिग्निन और पेक्टिन पर्याप्त मात्रा में तथा खनिज लवण, वसा और रंग पदार्थ सूक्ष्म मात्राओं में रहते हैं। इन पदार्थों को जब तक पर्याप्त अंशतक निकालकर सूल्यूलोस को पृथक रूप में नहीं प्राप्त किया जाता तब तक सेल्यूलोस से अच्छा कागज नहीं बनाया जा सकता। लिग्निन का निकालना विशेष आवश्यक होता है। यदि लिग्निन की पर्याप्त मात्रा में सेल्यूलोस में विद्यमान रहती है तो सेल्यूलोस के रेशे परस्पर प्राप्त करना कठिन होता है। आरंभ में जब तक सेल्यूलोस को पौधों से शुद्ध रूप में प्राप्त करने की कोई अच्छी विधि ज्ञात नहीं हो सकी थी, कागज मुख्य रूप से फटे सूती कपड़ों से ही बनाया जाता था। चिथड़ों तथा कागज की रद्दी से यद्यपि कागज बहुत सरलता से और उत्तम कोटि का बनता है, तथापि इनकी इतनी मात्रा का मिल सकना संभव नहीं है कि कागज़ की हामरी पूरी आवश्यकता इनसे बनाए गए कागज से पूरी हो सके।

आजकल कागज बनाने के लिए निम्नलिखित वस्तुओं का उपयोग मुख्य रूप से होता है : चिथड़े, कागज की रद्दी, बाँस, विभिन्न पेड़ों की लकड़ी, जैसे स्प्रूस और चीड़, तथा विविध घासें जैसे सबई और एस्पार्टो। भारत में बाँस और सबई घास का उपयोग कागज बनाने में मुख्य रूप से होता है।

कागज-निर्माण की प्रक्रिया[संपादित करें]

कागज बनाने की पूरी क्रिया के कई अंग हैं :-

  • (१) सेल्यूलोस की लुगदी (pulp) बनाना,
  • (२) लुगदी को विरंजित करना और इसके रेशों को आवश्यक अंश तक महीन और कोमल करना तथा
  • (३) अंत में लुगदी को चद्दर के रूप में परिणत करना।
कागज निर्माण की प्रमुख प्रक्रियाएँ

वातावरण पर प्रभाव[संपादित करें]

पेपर के उत्पादन और उपयोग पर पर्यावरण के कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं।

पिछले 40 सालों में दुनिया भर में कागज की खपत में 400% की वृद्धि हुई है जिससे वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, 35% पेड जो काटे जाते हैं वो पेपर के निर्माण के लिये इस्तेमाल किये जा रहे है। अधिकांश पेपर कंपनियों ने वनों को फिर से वन्य बनाने में मदद करने के लिए पेड़ों के पेड़ लगाए हैं।  10% से भी कम लकड़ी के गूदे पुरानी विकास जंगलों के काट्ने से आता है, लेकिन सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक है।

पेपर अपशिष्ट अमेरिका में हर साल उत्पादित कुल कचरे का 40% तक का हिस्सा है, जो अकेले अमेरिका में प्रति वर्ष 71.6 मिलियन कागज अपशिष्ट को जोड़ता है। अमेरिका का एक सधरण कार्यालय कर्मचारी करीब ३१ कगज के पन्ने छापता है।  अमेरिकी प्रति वर्ष 16 अरब पेपर कप उपयोग करते हैं।

कागज को सफेद (ब्लीच) करने के साधारण नरीके पर्यावरण मे अधिक क्लोरिन सहित रासयन (क्लोरिनेटड डाइअॉॉक्सिन भि) छोडते है। डाइअॉॉक्सिन को दृढ़ पर्यवरणीय प्रधूशक मना जता है, जिस्के प्रयोग पर अन्तर्रष्ट्रिय नियंत्रण है  डाइअॉॉक्सिन अत्यधिक विषैले होते हैं, और मानव पर स्वास्थ्य प्रभाव में प्रजनन, विकास, बिमरी से प्रतिरक्षा और हार्मोन संबंधी समस्याएं शामिल हैं। वे कार्सिनोजेनिक (कैन्सर उत्पन्न करने वले पधार्थ) होने के लिए जाना जाता है मनुष्यों मे ९०% डाइअॉॉक्सिन भोजन के द्वारा आता है, ख़ास तौर पर, मांस, डेयरी (दूद), मछली और शंख जैसे भोजन से आता है, क्योंकि पशुओं के चरबी में डाइअॉॉक्सिन जमा होते हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]