बिहार का मध्यकालीन इतिहास

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बिहार का मध्यकालीन इतिहास का प्रारम्भ उत्तर-पश्‍चिम सीमा पर तुर्कों के आक्रमण से होता है। मध्यकालीन काल में भारत में किसी की भी मजबूत केन्द्रीय सत्ता नहीं थी। पूरे देश में सामन्तवादी व्यवस्था चल रही थी। सभी शासक छोटे-छोटे क्षेत्रीय शासन में विभक्‍त थे।

मध्यकालीन बिहार की इतिहास की जानकारी के स्त्रोतों में अभिलेख, नुहानी राज्य के स्त्रोत, विभिन्न राजाओं एवं जमींदारों के राजनीतिक जीवन एवं अन्य सत्ताओं से उनके संघर्ष, दस्तावेज, मिथिला क्षेत्र में लिखे गये ग्रन्थ, यूरोपीय यात्रियों द्वारा दिये गये विवरण इत्यादि महत्वपूर्ण हैं।

  • बिहार का मध्यकालीन युग १२वीं शताब्दी से प्रारम्भ माना जा सकता है।
  • विद्यापति का रचित ग्रन्थ कीर्तिलता के अनुसार कर्नाट वंशीय शासक हरिसिंह के पश्‍चात मिथिला में राजनीतिक अराजकता का माहौल था।
  • मुस्लिम आक्रमण से पूर्व बिहार दो राजनीतिक क्षेत्रीय भाग में विभक्‍त था- दक्षिण बिहार का क्षेत्रीय भाग और उत्तर बिहार का क्षेत्रीय भाग।

दक्षिण बिहार का क्षेत्रीय भाग-यह भाग दक्षिण बिहार का क्षेत्र था। जिसमें मगध राज्य मुख्य था।

उत्तर बिहार का क्षेत्रीय भाग-यह भाग उत्तर बिहार का था जो तिरहुत क्षेत्र में पड़ता था जिसमें मिथिला राज्य प्रमुख था।

दोनों क्षेत्रीय भाग में कोई मजबूत शासक नहीं था। और सभी क्षेत्रो में छोटे-छोटे राजा/सामन्त स्वतन्त्र सत्ता स्थापित कर चुके थे। पाल वंशीय शासन व्यवस्था भी धीरे-धीरे बिहार में कमजोर होती जा रही थी। वे बंगाल तक ही सीमित हो चुके थे।

पाल वंश[संपादित करें]

पाल वंश के समय (१०५५-८१ ई.) तक मगध में मानस शासक विग्रहराज स्वतन्त्र हो गया। पाल वंश का बिहार में गहड़वाल वंश का अधिकार (११२६ से ११८८ई. तक) हो गया था।

  • १२वीं शताब्दी में संग्राम गुप्त नामक शासक का शासन था, जबकि गया में पिथीके सेन शासक का शासन था।
  • फूतुहाते फिरोजशाही के अनुसार फिरोजशाह तुगलक से युद्ध का वर्णन मिलता है।
  • रामपाल के समय में ही कर्नाट वंश का उदय हुआ था जिनका बंगाल के शासक सेन से संघर्ष होता रहता था।

बिहार में मध्यकालीन समय अत्यन्त ही उत्क्रमणीय था। राजनीतिक अव्यवस्था के साथ-साथ धार्मिक तनाव भी व्याप्त था। बौद्ध एवं गैर-बौध मतावलम्बियों के बीच तनावपूर्ण सम्बन्ध था। बिहार के राजनीतिक, धार्मिक एवं शासकीय अव्यवस्था की विकट परिस्थितियों में तुर्की आक्रमण प्रारम्भ हुआ।

सामान्यतः ऐसा माना जाता है। कि बिहार पर प्रथम आक्रमण प्रथम तुर्क बख्तियार खिलजी ने किया था, परन्तु उसके आक्रमण से पूर्व भी बिहार में तुर्कों का आवागमन था। तुर्कों का प्रारम्भिक प्रभाव क्षेत्र पटना जिले का मनेर था। जहाँ हदारस मोमिन यारिफ बसने आये थे।

११९७-९८ ई. के पश्‍चात्‌ बख्तियार खिलजी ने मगध क्षेत्र में प्रथम आक्रमण किया और लूटा। इसके पश्‍चात उसने आधुनिक बिहार शरीफ (ओदन्तपुरी) पर आक्रमण किया। ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय के लूटने के बाद नालन्दा विश्‍वविद्यालय को जलाकर तहस-नहस कर दिया। इसी समय उसने आधुनिक बख्तियारपुर शहर को बसाया। इसी दौरान बिहार शरीफ तुर्कों का केन्द्र के रूप में उभरा।

बौद्ध विहार[संपादित करें]

  • इतिहासकारों के अनुसार इस क्षेत्र में बौद्ध विहारों की संख्या काफी थी, अतः तुर्कों ने इसे विहारों का प्रदेश कहा है। उक्‍त क्षेत्र पहले बिहार शरीफ कहलाया।
  • बौद्ध धर्म में बौद्ध भिक्षुओं के ठहरने के स्थान को विहार कहते हैं। यही विहार जो तुर्कों द्वारा दिया गया है। वह बाद में बिहार हो गया।
  • बिहार शब्द विहार का अपभ्रंश रूप है। यह शब्द बौद्ध (मठों) विहारों कि क्षेत्रीय बहुलता के कारण (बिहार) तुर्कों द्वारा दिया हुआ नाम है।

बिहार का अर्थ- "बौद्ध भिक्षुओं का निवास"

सन्‌ १२६३ में रचित तवाकत-ए-नसीरी में ’विहार’ शब्द का उल्लेख इस प्रदेश के लिए हुआ है, जबकि १३०९ ई. में कविराज विद्यापति रचित कीर्तिलता में भी विहार शब्द का उल्लेख इस प्रदेश के लिए आया है।

१२वीं शताब्दी के अन्त में नालन्दा और औदन्तपुरी के नोकट स्थित अनेक बौद्ध विहारों की बहुलता को देखकर मुसलमान शासकों ने इस प्रदेश का नामकरण बिहार कर दिया। तुर्कों ने सेन शासकों को पराजित किया एवं जयपुर के गुप्त राजाओं को समाप्त किया।

बख्तियार खिलजी ने १२०० ई. में नालन्दा और औदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय को नष्ट कर दिया। १२०३ ई. मेंं कुतुबुद्दीन ऐबक ने बख्तियार खिलजी को जीते हुए प्रदेशों का अधिकार प्रदान कर दिया। फलतः खिलजी ने औदन्तपुरी पर विजय कर अपनी राजधानी लखनौती में बनाई।

१२०४ ई. के बाद बख्तियार खिलजी ने मिथिला के कर्नाट शासक नरसिंह देव के खिलाफ आक्रमण करके उसे भी अधिकार में कर लिया। इसके बाद बख्तियार खिलजी ने बंगाल एवं असोम क्षेत्र में आक्रमण किये। फलतः वह बीमार हो गया। उसी दौरान अलीमर्दन खिलजी ने उसकी हत्या कर दी। उसका शव बिहार शरीफ के इमादपुर मुहल्ला में दफना दिया गया।

ममलूक वंश[संपादित करें]

बख्तियार खिलजी की मृत्यु (१२०६ ई.) के बाद अलीमर्दन बिहार का कार्यकारी शासक बना। इसके बाद हस्युयद्दीन इवाज खिलजी ने गयासुद्दीन तुगलक (१२०७-२७ ई.) के नाम से लखनौती में स्वतन्त्र सत्ता कायम की और १२११ ई. में हूसामुद्दीन ने गयासुद्दीन की उपाधि धारण की। वह तिरहुत राजा से नजराना वसूला करता था। इसके बाद इजाउद्दीन तुगरील तुगान खान (१२३३-४५ ई.) ने भी तिरहुत पर आक्रमण किया था। दिल्ली में इल्तुतमिश के सुल्तान बनने के बाद उसने बिहार पर विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन १२८५ ई. तक विशाल सएना लेकर बिहार की ओर चल पड़ा, उसने बिहार शरीफ एवं बाढ़ पर अधिकार कर लिया और लखनौती के आगे बढ़ा परन्तु राजमहल की पहाड़ियों में तोलियागढ़ी शासक इवाज की सेना से मुठभेड़ हुई उसने तुरन्त अधीनता स्वीकार कर आत्मसमर्पण कर दिया। इल्तुतमिश ने मालिक अलाउद्दीन जानी को बिहार में दिल्ली के प्रथम प्रतिनिधि के रूप में नियुक्‍त किया, परन्तु शीघ्र ही इवाज ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद इल्तुतमिश का पुत्र नसीरुद्दीन महमूद अन्त में वहाँ आया। बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत से बिहार पुनः स्वतन्त्र हो गया।

ममलूक राजवंश के समय तुर्कों का मनेर, बिहार शरीफ के अलावा शाहाबाद (गया), पटना, मुंगेर, भागलपुर, नालन्दा, सासाराम एवं विक्रमशिला इत्यादि क्षेत्रों पर अधिकार रहा। परन्तु दक्षिण बिहार में तुर्कों का उतना प्रभाव क्षेत्रों पर अधिकार रहा। परन्तु दक्षिण बिहार में तुर्कों का उतना प्रभाव क्षेत्र नहीं रहा।

खिलजी वंश[संपादित करें]

जब १२९० ई. जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना और खिलजी वंश की स्थापना की तब बंगाल में बुगरा खाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र रुकनुद्दीन कैकाउस शासक बना हुआ था। उसके उत्तर और दक्षिण बिहार के भागों पर बंगाल का नियन्त्रण था।

१२९६ ई. में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना और १२९७ ई. में शेख मुहम्मद इस्माइल को बिहार के दरभंगा में भेजा वह राजा चक्र सिंह द्वारा पराजित हो गया परन्तु इस्माइल के दूसरे आक्रमण में राजा को पराजित कर बन्दी बना लिया तथा दोनों ने परस्पर समझौता कर लिया। उसने अलाउद्दीन के साथ मधुर सम्बन्ध होने के कारण रणथम्भौर (१२९९-१३०० ई.) में अभियान में भाग लिया।

रुकनुद्दीन कैकाउस की मृत्यु की बाद बिहार पर लखनौती का नियन्त्रण समाप्त हो गया। फिरोज ऐतगीन ने सुल्तान शमसुद्दीन फिरोजशाह के नाम से एक राजवंश बनाया १३०५-१५ ई. तक हातिम खाँ बिहार का गवर्नर बना रहा।

इस प्रकार बिहार पर खिलजी राजवंश का प्रभाव कम और सीमित क्षेत्रों पर रहा। (जो अवध का गवर्नर था) इवाज को गिरफ्तार कर हत्या कर दी। अवध, बिहार और लखनौती को मिलाकर एक कर दिया। १२२७-२९ ई. तक उसने शासन किया। १२२९ ई. में उसकी मृत्यु के बाद दौलतशाह खिलजी ने पुनः विद्रोह कर दिया, परन्तु इल्तुतमिश ने पुनः लखनौती जाकर वल्ख खिलजी को पराजित कर दिया तथा बिहार और बंगाल को पुनः अलग-अलग कर दिया। उसने अलालुद्दीन जानी को बंगाल का गवर्नर एवं सैफूद्दीन ऐबक को बिहार का राज्यपाल नियुक्‍त किया बाद में तुगान खाँ बिहार का राज्यपाल बना। उसके उत्तराधिकारियों में क्रमशः रुकनुद्दीन फिरोजशाह, रजिया मुइज्जुद्दीन, ब्रह्यराय शाह एवं अलाउद्दीन मसूद शाह आदि शासकों ने लखनौती एवं बिहार के तथा दिल्ली के प्रति नाममात्र के सम्बन्ध बनाये रखे।

बलबन[संपादित करें]

जब दिल्ली का सुल्तान बलबन बना तब बिहार को पुनः बंगाल से अलग कर (गया क्षेत्र) दिल्ली के अधीन कर दिया, जिसकी स्पष्टता हमें वनराज राजा की गया प्रशस्ति से मिलती है। लखनौती शासक जो स्वतन्त्र हो गये थे उन्होने बलबन की अधीनता भी स्वीकार की।

२७९-८० ई. तक तीन विद्रोह हुए। तीनों विद्रोह को दबाने के लिए तीन अभियान भेजे जो असफल रहे। अन्त में स्वयं बलबन विद्रोही के खिलाफ अभियान चलकर विद्रोही को मार डाला। उसने तुगरिक खाँ को मारकर अपने छोटे पुत्र बुगरा खाँ को राजकीय सम्मान दिया।

तुगलक वंश[संपादित करें]

तुगलक वंश की स्थापना गयासुद्दीन तुगलक (गाजी मलिक) ने १३२० ई. में दिल्ली सुल्तान खुसराव खान का अन्त करके की।

गयासुद्दीन का अन्तिम सैन्य अभियान बंगाल विजय थी। उसने १३२४ ई. में बंगाल-बिहार के लिए सैन्य अभियान भेजा। लखनौती शासक नसीरुद्दीन ने समर्पण कर दिया परन्तु सोनार गाँव के शासक गयासुद्दीन बहादुर ने विरोध किया, जिसे पराजित कर दिल्ली भेज दिया गया।

तुगलक वंश के समय में ही मुख्य रूप से बिहार पर दिल्ली के सुल्तानों का महत्वपूर्ण वर्चस्व कायम हुआ। गयासुद्दीन तुगलक ने १३२४ ई. में बंगाल अभियान से लौटते समय उत्तर बिहार के कर्नाट वंशीय शासक हरिसिंह देव को पराजित किया। इस प्रकार तुर्क सेना ने तिरहुत की राजधानी डुमरॉवगढ़ पर अधिकार कर लिया और अहमद नामक को राज्य की कमान सौंपकर दिल्ली लौट गया। गयासुद्दीन की १३२५ ई. में मृत्यु के बाद उसका पुत्र उलूख खान बाद में जौना सा मुहम्मद-बिन-तुगलक नाम से दिल्ली का सुल्तान बना।

मुहम्मद-बिन-तुगलक के काल में बिहार के प्रान्तपति मखदूल मुल्क था, जिसे कर्नाट वंश के राजा हरिसिंह देव के खिलाफ अभियान चलाकर नेपाल भागने के लिए मजबूर कर दिया था। इस प्रकार तिरहुत क्षेत्र को तुगलक साम्राज्य में मिला लिया तथा इस क्षेत्र का नाम तुगलकपुर रखा गया, जो वर्तमान दरभंगा है। दरभंगा में मुहम्मद-बिन-तुगलक ने एक दुर्ग और जामा मस्जिद बनवाई। इसी के समकालीन सूफी सन्त हजरत शर्फुउद्दीन याहया मेनरी का बिहार में आगमन हुआ। १३५१ ई. मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद दिल्ली का सुल्तान उसका चचेरा भाई फिरोज तुगलक बना।

तत्कालीन बंगाल के शासक हाजी इलियास ने ओएन वारा के शासक कामेश्‍वर सिंह के विरोध के बावजूद तिरहुत क्षेत्र को दो भागों में विभाजित कर दिया था और स्वयं बहराइच तक बढ़

फिरोजशाह तुगलक द्वारा झारखण्ड क्षेत्र से हुए बंगाल अभियान १३५९ ई. में किया। सीरते फिरोजशाही ने सुल्तान द्वारा बिहार के प्रसिद्ध सन्त शेख अहमद चिर्मपोश से मुलाकात की थी। राजगृह में जैन मन्दिरों के अभिलेखों से पता चलता है कि फिरोजशाह ने दान दिया।

तुगलक काल में बिहार की राजधानी बिहार शरीफ थी। बिहार राज्य का बिहार नाम भी इसी काल में पड़ा था। इस काल में बिहार के प्रशासकों में सबसे महत्वपूर्ण मलिक इब्राहिम था। बिहार शरीफ पहाड़ी पर स्थित इनका मकबरा तुगलक कालीन स्थापत्यकला का मन्दिर उदाहरण है

१३८८ ई. में फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद मध्यकालीन बिहार का दिल्ली सल्तनत में विघटन प्रक्रिया शुरु हो गई। फिरोजशाह के उत्तराधिकारी निष्क्रमण और कमजोर थे जो बिहार पर नियन्त्रण न रख सके। यही स्थिति दिल्ली सुल्तान सैयद वंश के शासकों में रही फलतः बिहार का क्षेत्र जौनपुर राज्य के अधीन हो गया। जौनपुर में शर्की वंशीय शासक थे जिससे जौनपुर और दिल्ली में संघर्ष प्रारम्भ हो गया। अन्तिम शर्की शासक हुसैन शाह शर्की (१४५८-१५०५ ई.) के समय बिहार भी संघर्ष में फँसा रहा। १४८९ ई. में जौनपुर पर लोंदी वंश का अधिकार होने के बाद बिहार में नुहानी वंश का उदय हुआ।

चेरो राजवंश[संपादित करें]

बिहार में चेरो राजवंश के उदय का प्रमाण मिलता है, जिसका प्रमुख चेरो राज था। वह शाहाबाद, सारण, चम्पारण एवं मुजफ्फर तक विशाल क्षेत्र पर एक शक्‍तिशाली राजवंश के रूप में विख्यात है।

१२वीं शताब्दी में चेरो राजवंश का विस्तार बनारस के पूरब में पटना तक तथा दक्षिण में बिहार शरीफ एवं गंगा तथा उत्तर में कैमूर तक था। दक्षिण भाग में चेरो सरदारों का एक मुस्लिम धर्म प्रचारक मंसुस्‍हाल्लाज शहीद था। शाहाबाद जिले में चार चेरो रान्य में विभाजित था-

  • धूधीलिया चेरो- यह शाहाबाद के मध्य में स्थित प्रथम राज्य था, जिसका मुख्यालय बिहियाँ था।
  • भोजपुर- यह शाहाबाद का दूसरा राज्य था, जिसका मुख्यालय तिरावन था। यहाँ का राजा सीताराम था।
  • तीसरा राज्य का मुख्यालय चैनपुर था, जबकि देव मार्केण्ड चौथा राज्य का मुख्यालय था। इसमें चकाई तुलसीपुर रामगठवा पीरी आदि क्षेत्र सम्मिलित थे। राजा फूलचन्द यहाँ का राजा था। जिन्होंने जगदीशपुर में मेला शुरु किया।
  • सानेपरी चेरा जो सोन नदी के आस-पास इलाकों में बसे थे जिनका प्रमुख महरटा चेरो था। इसके खिलाफ शेरशाह ने अभियान चलाया था।

भोजपुर चेरो का प्रमुख कुकुमचन्द्र कारण था। चेरो का अन्तिम राजा मेदिनीराय था। मेदिनीराय की मृत्यु के पश्‍चात्‌ उसका पुत्र प्रताप राय राजा बना। इसके समय में तीन मुगल आक्रमण हुए अन्ततः १६६० ई. में इन्हें मुगल राज्य में मिला लिया गया।

भोजपुर का उज्जैन वंशीय शासक- ऐतिहासिक स्त्रोतों में भोजराज के वृतान्तानुसार जब धार (मालवा) पर १३०५ ई. में अलाउद्दीन खिलजी की सेना का अधिकार हो गया। भोजपुर के धार पुनः अधिकार करने में विफल रहा तब अपने पुत्र देवराज और अन्य राज पुत्र अनुयायियों के साथ अपना पैतृक स्थान छोड़कर कीकट (शाहाबाद एवं पलामू) क्षेत्रों में राजा मुकुन्द के शरण में आये।

मूल स्थान उज्जैन के होने के कारण इन्हें उज्जैनी वंशीय राजपूत कहा गया। अतः इन्होने अपना राज्य भोजपुर बनाया। इनका प्रभाव क्षेत्र डुमरॉव, बक्सर एवं जगदीशपुर रहा जो ब्रिटिश शासनकाल तक बना रहा।

नूहानी वंश[संपादित करें]

बिहार के मध्यकालीन इतिहास में नूहानी वंश का उदय एक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट स्थान रखता है क्योंकि इसके उदय में सिकन्दर लोदी (१४८९-१५१७ ई.) के शासनकालीन अवस्था में हुए राजनैतिक परिवर्तनों से जुड़ा है।

जब सिकन्दर लोदी सुल्तान बना तो उसका भाई (जो जौनपुर के गवर्नर था) वारवाक शाह ने विद्रोह कर बिहार में शरण ली। इसके पहले जौनपुर का पूर्व शासक हुसैन शाह शर्की भी बिहार में आकर तिरहुत एवं सारण के जमींदारों के साथ विद्रोही रूप में खड़े थे।

बिहार विभिन्न समस्याओं का केन्द्र बना हुआ था फलतः सिकन्दर लोदी ने बिहार तथा बंगाल के लिए अभियान चलाया।

बिहार शरीफ स्थित लोदी के अभिलेख के अनुसार सिकन्दर लोदी ने १४९५-९६ ई. में बंगाल के हुसैन शाह शर्की को हराकर बिहार में दरिया खाँ लोहानी को गवर्नर नियुक्‍त किया।

१५०४ ई. में सिकन्दर लोदी ने बंगाल के साथ एक सन्धि करके बिहार और बंगाल के बीच मुंगेर की एक सीमा रेखा निश्‍चित कर दी। बिहार का प्रभारी दरिया खाँ लोहानी (१४९५-१५२२) में नियुक्‍त कर दिया। दरिया खाँ लोहानी एक योग्य शासक की तरह इस क्षेत्र के जमींदारों एवं अन्य विद्रोही तत्वों को शान्त बनाये रखा। उसने जमींदारों, उलेमाओं एवं सन्तो के प्रति दोस्ताना नीति अपनाई।

पटना में दरियापुर, नूहानीपुर जैसे नाम भी नूहानी के प्रभाव की झलक देते हैं। परन्तु १५२३ ई. में दरिया खाँ नूहानी की मृत्यु हो गयी। दूसरी ओर पानीपत के प्रथम युद्ध १५२६ ई. में इब्राहिम लोदी उठाकर नूहानी का पुत्र सुल्तान मोहम्मद शाह नूहानी ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता की घोषणा कर दी। इसके दरबार में इब्राहिम जैसे असन्तुष्ट अफगान सरदारों का जमावाड़ा था। उसने धीरे-धीरे अपनी सेना की संख्या एक लाख कर ली और बिहार से सम्बल तक मुहम्मद लोहानी का कब्जा हो गया। इस परिस्थति से चिन्तित होकर इब्राहिम लोदी ने मुस्तफा फरश्‍ली को सुल्तान मुहम्मद के खिलाफ सेना भेजी, परन्तु इस समय मुस्तफा की मृत्यु हो गई। सेना की कमान शेख बाइजिद और फतह खान के हाथों में थी। दोनों की सेनाओं के बीच कनकपुरा में युद्ध हुआ। इब्राहिम लोदी की मृत्यु के पश्‍चात सुल्तान मुहम्मद ने सिकन्दर पुत्र मेहमूद लोदी को दिल्ली पर अधिकार करने के प्रयास में सहायता प्रदान की थी, परन्तु १५२९ ई. में घाघरा युद्ध में बाबर ने इन अफगानों को बुरी तरह पराजित किया। बाबर ने बिहार में मोहम्मद शाह नूहानी के पुत्र जलाल खान को बिहार का प्रशासक नियुक्‍त किया (१५२८ ई. में) शेर खाँ (फरीद खाँ) को उसका संरक्षक नियुक्‍त किया गया। इस प्रकार बिहार में नूहानिया का प्रभाव १४९५ ई. से प्रारम्भ होकर १५३० ई. में समाप्त हो गया।

अफगान[संपादित करें]

बिहार में अफगानों का इतिहास भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस समय सूर वंश का अभि उत्‍थान हुआ जो बिहार सहित भारत में राजनीतिक स्थिति में क्रान्तकारी परिवर्तन हुआ। यह काल सूर वंश का काल १५४० से १५४५ ई. तक माना जाता है। यहँ पठानो का लम्बी अवधि तक शासन रहा।

शेरशाह ने १५४० ई. में उत्तर भारत में सूर वंश तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की। शेरशाह को भारतीय इतिहास में उच्च कोटि का शासक, सेनानायक और साम्राज्य निर्माता कहा जाता है। वह सूर वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक था। उसने प्रारम्भिक जीवन में अरबी और फारसी में अध्यन किया। पानीपत के युद्ध के उपरान्त शेरशाह दिल्ली में बाबरी सेना में भर्ती हो गया। शेरशाह ने बाबर की सेना में रहकर युद्ध के तरीके और अस्त्रों का प्रयोग व्यापक रूप से सीखा। इसी अनुभव के आधार पर शेरशाह ने हुमायूँ को चौसा और कन्नौज के युद्ध में पराजित किया। उसने १५२७ ई. के अन्त तक मुगलों की अधीनता के साथ रहकर अपनी अफगान शक्‍ति को बढ़ाया।

बिहार का शासक-मुगलों ने विद्रोही अफगानों को पराजित कर अफगान सैनिकों के योग्य अफगान को नष्ट कर दिया। १५२८ ई. के असफल अफगान विद्रोह के बाद शेर खाँ जलाल खाँ का मन्त्री और संरक्षक नियुक्‍त हो गया। शेर खाँ ने संरक्षक की हैसियत से शासन करना प्रारम्भ कर दिया। उसने स्थानीय सरदारों पर कड़ा नियन्त्रण रखा, उसके हिसाब पर जांच कराई और प्रजा पर अत्याचार करने वालों को दण्डित किया जिससे नूहानी सरदार शत्रु हो गये। नूहानी सरदारों ने बंगाल शासक नुसरतशाह से आवेदन किया कि बिहार को शेर खाँ के प्रभाव से मुक्‍त करने का प्रयास करे।

शेरशाह सूरी[संपादित करें]

शेरशाह सूरी का वास्तविक नाम फरीद खाँ था। वह वैजवाड़ा (होशियारपुर १४७२ ई. में) में अपने पिता हसन की अफगान पत्‍नी से उत्पन्न पुत्र था। उसका पिता हसन बिहार के सासाराम का जमींदार था। दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी ने उसे एक शेर मारने के उपलक्ष्य में शेर खाँ की उपाधि से सुशोभित किया और अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्‍त किया। बहार खाँ लोहानी की मृत्यु के बाद शेर खाँ ने उसकी बेगम दूदू बेगम से विवाह कर लिया और वह दक्षिण बिहार का शासक बन गया। इस अवधि में उसने योग्य और विश्‍वासपात्र अफगानों की भर्ती की। १५२९ ई. में बंगाल शासक नुसरतशाह को पराजित करने के बाद शेर खाँ ने हजरत आली की उपाधि ग्रहण की। १५३० ई. में उसने चुनार के किलेदार ताज खाँ की विधवा लाडमलिका से विवाह करके चुनार के किले पर अधिकार कर लिया। १५३४ ई. में शेर खाँ ने सुरजमठ के युद्ध में बंगाल शासक महमूद शाह को पराजित कर १३ लाख दीनार देने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार शेरशाह ने अपने प्रारम्भिक अभियान में दिल्ली, आगरा, बंगाल, बिहार तथा पंजाब पर अधिकार कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। १५३९ ई. में चौसा के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर शेर खाँ ने शेरशाह की अवधारणा की। १५४० ई. में शेरशाह ने हुमायूँ को पुनः हराकर राजसिंहासन प्राप्त किया। उत्तर बिहार में पहले से ही हाकिम मखदूग आलम शासन कर रहा था। नुसरतशाह ने दक्षिण बिहार पर प्रभाव स्थापित करने के लालच में कुत्य खाँ के साथ एक सेना भेजी, परन्तु शेर खाँ ने उसे पराजित कर दिया। शेर खाँ धीरे-धीरे सर्वाधिक शक्‍तिशाली अफगान नेता बन गया।

नूहानी सरदारों ने उनकी हत्या के लिए असफल कोशिश की और जब शेर खाँ ने उनको नुसरतशाह के विरुद्ध युद्ध कर दिया और पराजित कर दिया। इस विजय ने बंगाल के सुल्तान की महत्वाकांक्षी योजना को विफल कर दिया। बाबर के समय शेर खाँ हमेशा अधीनता का प्रदर्शन करता रहा था परन्तु हुमायूँ के समय में अपना रुख बदलकर चुनार गढ़ को लेकर प्रथम बार चुनार लेने की चेष्टा की तब उसे महमूद लोदी के प्रत्याक्रमण के कारण वहाँ से जाना पड़ा। उसने हिन्दूबेग को सेना भेजकर शेर खाँ ने दुर्ग देने से साफ इनकार कर दिया। फलतः एक युद्ध हुआ।

चौसा का युद्ध[संपादित करें]

हुमायूँ के सेनापति हिन्दूबेग चाहते थे कि वह गंगा के उत्तरी तट से जौनपुर तक अफगानों को वहाँ से खदेड़ दे, परन्तु हुमायूँ ने अफगानो की गतिविधियों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। शेर खाँ ने एक अफगान को दूत बनाकर भेजा जिससे उसकी सेना की दुर्व्यवस्था की सूचना मिल गई। फलस्वरुप उसने अचानक रात में हमला कर दिया। बहुत से मुगल सैनिक गंगा में कूद पड़े और डूब गये या अफगानों के तीरों के शिकार हो गये। हुमायूँ स्वयं डूबते-डूबते बच गया। इस प्रकार चौसा का युद्ध में अफगानों को विजयश्री मिली।

इस समय अफगान अमीरों ने शेर खाँ से सम्राट पद स्वीकार करने का प्रस्ताव किया। शेर खाँ ने सर्वप्रथम अपना राज्याअभिषेक कराया। बंगाल के राजाओं के छत्र उसके सिर के ऊपर लाया गया और उसने शेरशाह आलम सुल्तान उल आदित्य की उपाधि धारण की। इसके बाद शेरशाह ने अपने बेटे जलाल खाँ को बंगाल पर अधिकार करने के लिए भेजा जहाँ जहाँगीर कुली की मृत्यु एवं पराजय के बाद खिज्र खाँ बंगाल का हाकिम नियुक्‍त किया गया। बिहार में शुजात खाँ को शासन का भार सौंप दिया और रोहतासगढ़ को सुपुर्द कर दिया, फिर लखनऊ, बनारस, जौनपुर होते हुए और शासन की व्यवस्था करता हुआ कन्नौज पहुँचा।

कन्नौज (बिलग्राम १५४० ई.) का युद्ध- हुमायूँ चौसा के युद्ध में पराजित होने के बाद कालपीहोता आगरा पहुँचा, वहाँ मुगल परिवार के लोगो ने शेर खाँ को पराजित करने का निर्णय लिया। शेरशाह तेजी से दिल्ली की और बढ़ रहा था फलतः मुगल बिना तैयारी के कन्‍नौज में आकर भिड़ गये। तुरन्त आक्रमण के लिए दोनों में से कोई तैयार नहीं था। शेरशाह ख्वास खाँ के आने की प्रतीक्षा में था। हुमायूँ की सेना हतोत्साहित होने लगी। मुहम्मद सुल्तान मिर्जा और उसका शत्रु रणस्थल से भाग खड़े हुए। कामरान के ३ हजार से अधिक सैनिक भी भाग खड़े हुए फलतः ख्वास खाँ, शेरशाह से मिल गया। शेरशाह ने ५ भागों में सेना को विभक्‍त करके मुगलों पर आक्रमण कर दिया।

जिस रणनीति को अपनाकर पानीपत के प्रथम युद्ध में अफगान की शक्‍ति को समाप्त कर दिया उसी नीति को अपनाकर शेरशाह ने हुमायूँ की शक्‍ति को नष्ट कर दिया। मुगलों की सेना चारों ओर से घिर गयी और पूर्ण पराजय हो गयी। हुमायूँ और उसके सेनापति आगरा भाग गये। इस युद्ध में शेरशाह के साथ ख्वास खाँ, हेबत खाँ, नियाजी खाँ, ईसा खाँ, केन्द्र में स्वयं शेरशाह, पार्श्‍व में बेटे जलाल खाँ और जालू दूसरे पार्श्‍व में राजकुमार आद्रित खाँ, कुत्बु खाँ, बुवेत हुसेन खाँ, जालवानी आदि एवं कोतल सेना थी। दूसरी और हुमायूँ के साथ उसका भाई हिन्दाल व अस्करी तथा हैदर मिर्जा दगलात, यादगार नसरी और कासिम हुसैन सुल्तान थे।

शेरशाह का राज्याभिषेक[संपादित करें]

शेरशाह कन्‍नौज युद्ध की विजय के बाद वह कन्नौज में ही रहा और शुजात खाँ को ग्वालियर विजय के लिए भेजा। वर्यजीद गुर को हुमायूँ को बन्दी बनाकर लाने के लिए भेजा। नसीर खाँ नुहानी को दिल्ली तथा सम्बलपुर का भार सौंप दिया।

अन्ततः शेरशाह का १० जून १५४० को आगरा में विधिवत्‌ राज्याभिषेक हुआ। उसके बाद १५४० ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया। बाद में ख्वास खाँ और हैबत खाँ ने पूरे पंजाब पर अधिकार कर लिया। फलतः शेरशाह ने भारत में पुनः द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की। इतिहास में इसे सूरवंश के नाम से जाना जाता है। सिंहासन पर बैठते समय शेरशाह ६८ वर्ष का हो चुका था और ५ वर्ष तक शासन सम्भालने के बाद मई १५४५ ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

द्वितीय अफगान साम्राज्य[संपादित करें]

शेरशाह ने उत्तरी भारत (बिहार) में सूर वंश तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की थी। इस स्थापना में उसने अनेकों प्रतिशोध एवं युद्धों को लड़ा।

पश्‍चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा- शेरशाह ने सर्वप्रथम पश्‍चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। उसने मुगलों के प्रभाव को पूर्णतः समाप्त कर दिया। मुगलों पर विशेष नजर रखने के लिए एक गढ़ बनवया जिसका निर्माण टोडरमल और हैबत खाँ नियाजी की अध्यक्षता में करवाया गया और इस्लामशाह के काल में पूरा हुआ। हुमायूँ का पीछा करते हुए शेरशाह मुल्तान तक गया वहाँ बलूची सरदारों ने भी उसको सम्राट मानकर अधीनता स्वीकार की। मुल्तान के लिए पृथक्‌ हाकिम नियुक्‍त किया गया। निपुण सेनानायकों मसलन हैबत खाँ नियाजी, ख्वास खाँ, राय हुसैन जलवानी आदि की नियुक्‍ति की। उसे ३० हजार सेना रखने की अनुमति दे दी।

मालवा पर अधिकार- मारवाड़ में मालदेव शासन कर रहा था। शेरशाह के भय से हुमायूँ मालदेव की शरण में गया। शेरशाह ने हुमायूँ को बन्दी बनाकर सौंप देने का सम्वाद भेजा लेकिन मालदेव ने ऐसा नहीं किया।

फलतः शेरशाह ने अप्रसन्‍न होकर १५४२ ई. में मालवा पर आक्रमण कर दिया। राजपूत सामन्तों ने शेरशाह का पूरी बहादुरी के साथ मुकाबला किया लेकिन शेरशाह की सेना के सामने टिक नहीं सके फलतः १५४३ ई. तक विजय प्राप्त की। इस दौरान पूरनमल ने भी अधीनता स्वीकार कर ली।

इस युद्ध में राजपूतों की वीरता देखकर शेरशाह ने अपने उद्‍गार प्रकट किए थे- मैंने मुट्ठी भर बाजरे के लिए (इस प्रदेश की मुख्य फसल थी) लगभग अपना साम्राज्य ही खो दिया था। बाद में सारंगपुर में कादिरशाह ने अधीनता स्वीकार कर ली। इस प्रकार मांडू और सतवास पर शेरशाह का अधिकार हो गया।

शेरशाह ने शुजात खाँ को रूपवास में, दरिया खाँ को उज्जैन में, आलम खाँ को सारंगपुर में, पूरनमल को रायसीन में तथा मिलसा को चन्देरी में नियुक्‍त किया। शेरशाह ने बाद में शुजात खाँ को सम्पूर्ण मालवा का हाकिम नियुक्‍त किया और १२ हजार सैनिक रखने की अनुमति दे दी।

रणथम्भौर पर अधिकार[संपादित करें]

शेरशाह १५४३ ई. में रणथम्भौर होता हुआ आया, फलतः वहाँ के हाकिम ने अपनागढ़ पर उनकी अधीनता स्वीकार की। शेरशाह ने अपने बड़े पुत्र आदित्य को वहाँ का हाकिम नियुक्‍त किया।

रायसीन पर अधिकार- पूरनमल के विरुद्ध शेरशाह ने कट्टरपंथियों व उलेमाओं की बात में आकर कार्यवाही की। उसने अपने किये वायदे को तोड़ा। स्वयं जाँच करने पर सही पाया फलतः पूरनमल अपने सम्मान को बचाते हुए स्वयं लड़ते हुए मारा गया।

शेरशाह ने सम्राट बनने से पूर्व विभिन्‍न स्थानों पर अपनी सुविधा और फायदे को ध्यान में रखकर विश्‍वासघात किया था। पूरनमल को एक सम्राट की हैसियत से आश्‍वासन देकर खुले मैदान में हराने में सक्षम होते हुए भी उलेमा की राय का बहाना बनाकर जो विश्‍वासघात किया वह उसके यश को सदा के लिए कलंकित करता रहेगा। फलतः बिना किसी हानि के राजपूतों का नाश हुआ और मिलसा, रायसीन तथा चंदेरी पर शेरशाह का अधिकार हो गया।

कालिंजर युद्ध[संपादित करें]

यह शेरशाह का अन्तिम युद्ध था। यह युद्ध चन्देल राजपूतों के साथ हुआ। भाटा के राजा वीरभानु ने हुमायूँ की सहायता की थी, जिससे शेरशाह ने एक दूत वीरभानु के पास भेज दिया। वीरभानु डरकर कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चन्देल की शरण में चला गया। शेरशाह ने कीर्तिसिंह से वीरभानु की माँग की जिसे उसने अस्वीकार कर दिया। फलतः शेरशाह ८०,००० घुड़सवार, २,००० हाथी और अनेक तोपों के साथ कालिंजर पर आक्रमण कर दिया। उसने अपने बेटे आदित्य खाँ को आदेश दिया कि वह रणथम्भौर, अजमेर, बयाना और निकटवर्ती प्रदेश पर कड़ी नजर रखे। पटना स्थित जलाल खाँ को आज्ञा भेजी कि वह पूरब की ओर से बघेल चन्देल राज्य को घेर ले। यह व्यवस्था करके उसने कालिंजर का घेरा डाला। कीर्तिसिंह और शेरशाह के साथ छः माह तक युद्ध चलता रहा। बड़ी तोपों के लिए सबाते और सरकोव (ऊँचे खम्भे) बनाये गये और उसके ऊपर से किले की दीवार पर गोलीबारी प्रारम्भ की गई। एक दिन शेरशाह अपने सैकों का निरीक्षण कर रहा था, उसने देखा कि जलाल खाँ जलवानी हुक्‍के (हुक्‍के-एक प्रकार के अग्निबाण, जो हाथ से फेंके जाते थे) तैयार कराये हैं और उसका प्रयोग करके दुर्ग के भीतर संकट उपस्थित करने की योजना बनाई है। शेरशाह ने स्वयं हुक्‍कों को फेंकना शुरू कर दिया। एक हुक्‍का किले की बाहरी दीवार से टकराकर उस ढेर पर आ गिरा जहाँ शेरशाह खड़ा था, तुरन्त एक भीषण ज्वाला प्रज्वलित हो उठी और शेरशाह बुरी तरह जल गया। शेरशाह की हालत बिगड़ने लगी और उनके सैनिक और सेनापति पास आकर दुःख प्रकट करने लगे।

शेरशाह ने कहा कि यदि वे उसके जीवित रहते गढ़ पर अधिकार कर लें तो वह शान्ति से प्राण छोड़ सकेगा। फलतः भीषणता से आक्रमण कर दुर्ग पर शेरशाह का अधिकार हो गया। जीत की सूचना पाकर वह मई १५४५ ई. में मर गया।

शेरशाह ने अपने अल्पकालीन शासनकाल में अनेक सार्वजनिक कार्य किये जो निम्न हैं-

शासन सुधार[संपादित करें]

शेरशाह ने एक जनहितकारी शासन प्रणाली की स्थापना की। शासन को सुविधाजनक प्रबन्ध के लिए सारा साम्राज्य को ४७ भागों में बाँट दिया, जिसे प्रान्त कहा जाता है। प्रत्येक प्रान्त में एक फौजदार था जो सूबेदार होता था। प्रत्येक प्रान्त सरकार, परगनों तथा गाँव परगने में बँटे थे। सरकार में प्रमुख अधिकारी होते थे-शिकदार-ए-शिकदारा तथा मुन्सिफ-ए-मुन्सिफा। प्रथम सैन्य अधिकारी होता था, जबकि दूसरा दीवानी मुकदमों का फैसला देता था।

शेरशाह के प्रशासनिक सुधार में महत्वपूर्ण स्थानों पर मजबूत किलों का निर्माण शामिल था। बिहार में रोहतास का किला निर्माण कर सुरेमान करारानी को बिहार का सुल्तान नियुक्‍त किया।

ऐसा माना जाता है कि शेरशाह बंगाल पर अधिकार करने के बाद वह बिहार में पटना आया। एक दिन वह गंगा किनारे पर खड़ा था तो उसे यह जगह सामरिक महत्व की ओर ध्यान गया, उसने एक किले का निर्माण कराया। मौर्यों के पतन के बाद पटना पुनः प्रान्तीय राजधानी बनी, अतः आधुनिक पटना को शेरशाह द्वारा बसाया माना जाता है।

भूमि व्यवस्था[संपादित करें]

शेरशाह द्वारा भूमि व्यवस्था अत्यन्त ही उत्कृष्ट था। उसके शासनकाल के भू-विशेषज्ञ टोडरमल खत्री था।

शेरशाह ने भूमि सुधार के लिए अनेक कार्य किए। भूमि की नाप कराई, भूमि को बीघों में बाँटा, उपज का १/३ भाग भूमिकर के लिए निर्धारित किया, अनाज एवं नकद दोनों रू में लेने की प्रणाली विकसित कराई। पट्टे पर मालगुजारी लिखने की व्यवस्था की गई। किसानों की सुविधा दी गई कि वह भूमिकर स्वयं राजकोष में जमा कर सकता था।

सैन्य व्यवस्था[संपादित करें]

शेरशाह ने एक सशक्‍त एवं अनुशासित सैन्य व्यवस्था का गठन किया। सेना में लड़ाकू एवं निपुण अफगानों एवं राजपूतों को भर्ती किया, लेकिन ज्यादा से ज्यादा अफगान ही थे। सेना का प्रत्येक भाग एक फौजदार के अधीन कर दिया गया। शेरशाह ने घोड़ा दागने की प्रथा शुरू थी। उसके पास डेढ़ लाख घुड़सवार, २५ हजार पैदल सेना थी। वह सैनिकों के प्रति नम्र लेकिन अनुशासन भंग करने वाले को कठोर दण्ड दिया करता था।

न्याय व्यवस्था[संपादित करें]

शेरशाह की न्यासी व्यवस्था अत्यन्त सुव्यवस्थित थी। शेरशाह के शासनकाल में माल और दीवानी के स्थानीय मामले की सुनवाई के लिए दौरा करने वाले मुंसिफ नियुक्‍त किये गये। प्रधान नगरों के काजियों के अलावा सरकार में एक प्रधान मुंसिफ भी रहता था जिसे अपील सुनने तथा मुंसिफों के कार्यों के निरीक्षण करने का अधिकार था।

शेरशाह ने पुलिस एवं खुफिया विभाग की स्थापना की। शान्ति व्यवस्था के लिए शिकों में प्रधान शिकदार, परगनों में शिकदार तथा गाँवों में पटवारी थे। षड्‍यन्त्रों का पता लगाने के लिए खूफिया विभाग था।

साहित्य, कला, एवं सांस्कृतिक भवन- शेरशाह के शासन काल में साहित्य, कला एवं सांस्कृतिक भवनों का संरक्षण एवं निर्माण हुआ। इसी के शासनकाल में मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्‍मावत की रचना की। इसके शासनकाल में महदवी नेता शेख अलाई का शिक्षा विचार उल्लेखनीय है। इसके दरबार में अनेक प्रसिद्ध विद्वान मीर सैयद, मंझन, खान मोहम्मद, फरयूली और मुसान थे। इनके शासन में फारसी तथा हिन्दी का पूर्ण विकास हुआ।

उसने अनेकों भवनों जिसमें रोहतासगढ़, सहरसा का दुर्ग प्रसिद्ध दुर्ग हैं। इस प्रकार शेरशाह ने अल्प अवधि में बंगाल से सिंह तक जाने वाली ५०० कोस लम्बी ग्रांड ट्रंक सड़क का निर्माण किया। आगरा से बुहारनपुर तक, आगरा से बयाना, मारवाड़, चित्तौड़ तक एवं लाहौर से मुल्तान तक ये उपर्युक्‍त चार सड़कों का निर्माण किया। शेरशाह ने अनेक सरायों (लगभग १,७००) का निर्माण किया। सरायों की देखभाल शिकदार करता था।

शेरशाह के उत्तराधिकारी[संपादित करें]

शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका योग्य एवं चरित्रवान पुत्र जलाल खाँ गद्दी पर बैठा, लेकिन अपने बड़े भाई आदिल खाँ के रहते सम्राट बनना स्वीकार नहीं किया था। उसने अमीरों व सरदारों के विशेष आग्रह पर राजपद ग्रहण किया। गद्दी पर बैठते ही अपना नाम इस्लामशाह धारण किया और उसने आठ वर्षों तक शासन किया। इस्लामशाह के समय विद्रोह और षड्‍यन्त्र का दौर चला। उनकी हत्या के लिए अनेक बार प्रयास किया गया, लेकिन इस्लामशाह ने धीरे-धीरे लगभग सभी पुराने विश्‍वासी सेनापतियों, हाकिमों व अधिकारियों आदि जो सन्देह के घेरे में आते गये उनकी हत्या करवा दी। सुल्तान के षड्‍यन्त्र में एकमात्र रिश्तेदार शाला को छोड़ा गया।

मुगलों के आक्रमण के भय से (१५५२-५३ ई.) वह रोगशय्या से उठकर तीन हजार सैनिकों के साथ लड़ाई के लिए चल पड़ा। यह खबर पाकर मुगल सेना भाग खड़ी हुई। हुमायूँ के लौट जाने पर इस्लामशाह ग्वालियर (उपराजधानी) में लौट आया। अन्ततः १५५३ ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

इस्लामशाह के बाद उसका पुत्र फिरोजशाह गद्दी पर आसीन हुआ। उसके अभिषेक के दो दिन बाद ही उसके मामा मुवारिज खाँ ने उसकी हत्या कर दी और वह स्वयं मुहम्मद शाह आदिल नाम से गद्दी पर बैठ गया लेकिन आदिल के चचेरे भाई इब्राहिम खाँ सूर ने विद्रोह कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसके बाद उसका भाई सिकन्दर सूर दिल्ली का शासक बना। सूरवंशीय शासक के रूप में सिकन्दर सूर दिल्ली के शासक बनने के बाद उसे मुगलों (हुमायूँ) के आक्रमण का भय था।

१५४५ ई. हुमायूँ ने ईरान शाह की सहायता से काबुल तथा कन्धार पर अधिकार कर लिया। १५५५ ई. में लाहौर को जीता। १५ मई १५५५ में मच्छीवाड़ा युद्ध में सम्पूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया। २२ जून १५५५ के सरहिन्द युद्ध में अफगानों (सिकन्दर सूर) पर निर्णायक विजय प्राप्त कर हुमायूँ ने भारत के राजसिंहासन को प्राप्त किया तथा २३ जुलाई १५५५ को भारत का सम्राट बना लेकिन १५५६ ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इससे पहले उसने १५ वर्षीय सूर वंश को समाप्त कर दिया।

मुगल शासन[संपादित करें]

बिहार के महान अफगान सम्राट शेरशाह का स्थापित सूर वंश के पतन के बाद भी बिहार अफगानो के अधीन बना रहा। ताज खाँ करारानी, सुलेमान खाँ एवं दाऊद खाँ करारानी आदि के अधीन में रहा।

इन अफगान शासकों ने बिहार पर अपना नियन्त्रण १५८० ई. तक बनाये रखा। सुलेमान खाँ ने १५५६ ई. से १५७२ ई. तक शासन किया और अपना अधिकार क्षेत्र को उड़ीसा तक विस्तार किया। उसने तत्कालीन सम्राट के साथ सम्मानप‘ऊर्ण व्यवहारिकता बनाये रखी, लेकिन उसका पुत्र दाऊद खाँ करारानी ने अकबर के प्रति अहंकारी रवैया अपनाया। फलतः मुगल शासक अकबर ने १५७४ ई. में बिहार पर आक्रमण किया और पटना पर अधिकार कर लिया। दाऊद खाँ भाग गया। बिहार मुगलों के अधीन १५७४ ई. से १५८० ई. तक पूर्णत हो गया। १५८० ई. तक बिहार को मुगल साम्राज्य एक प्रान्त के रूप में घोषित कर दिया गया।

अफगानों ने विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया तथा खान-ए-खनाम मुनीम खान को बिहार का गवर्नर नियुक्‍त किया गया। मुजफ्फर खान, टोडरमल एवं मुनीम खाँ ने इस अवधि में रोहतासगढ़, सूरजगढ़, मुंगेर भागलपुर एवं अन्य इलाकों पर कब्जा कर लिया।

अफगानों के छुटपुट नेता बहादुर खान, अधम खाँ, बतनी खाँ, दरिया खाँ नूहानी इत्यादि का विद्रोह हुआ, जिसे मुजफ्फर खान ने दबाया। मुजफ्फर खान ने गंगा पार कर चम्पारण के जमींदार उदय सिंह करण से सहायता प्राप्त कर विद्रोही पर आक्रमण कर हाजीपुर को जीता। पुनः मुजफ्फर खान अफगानों के जमावड़ों की खबर पाकर (मरहा गंडक नदी के पास) पहुँचा, लेकिन इसी युद्ध में मुगल सेना हार गयी और इस पराजय से मुगल सेना में गहरी मायूसी छाई हुई थी, लेकिन मुजफ्फर खान पुनः मुगल सेना को संगठित कर पुनः अफगान विद्रोही पर आक्रमण कर दिया। इस संघर्ष में ताज खाँ पनवार भाग गया तथा अफगान जमाल खान गिलजई गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद बिहार का गवर्नर (१५७५-८१ ई.) तक मुजफ्फर खान बना रहा।

इसी अवधि में मुनीम खाँ ने बंगाल और उड़ीसा के शासक दाऊद खाँ को पराजित करके मुगल प्रभुत्व की स्थापना की परन्तु अक्टूबर १५७५ ई. में मुनीम खाँ की मृत्यु हो जाने के बाद दाऊद खाँ ने पुनः सम्पूर्ण बंगाल पर अधिकार कर लिया। अकबर ने हुसैन कुली को बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा साथ-साथ बिहार के गवर्नर मुजफ्फर खान के खिलाफ ५,००० सेना भी भेजी। १५८२ ई. में खान-ए-आजम भी शाही दरबार में लौट गया, परन्तु विद्रोह भड़क जाने के कारण पुनः बिहर लौट गया और वह बिहार को पूर्णतः विद्रोह मुक्‍त कर दिया। अब मुगलों ने बंगाल में उठे विद्रोह को दबाने की कोशिश करने लगा। बिहार के प्रमुख अधिकारियोंं एवं खान-ए-आजम, भी बंगाल गये। बारी-बारी से खान-ए-आजम, शाहनबाज, सईद खान चधता तथा युसूफ खाँ को भेजा गया। अन्त में सईद खान को गवर्नर बनाकर ये सभी अधिकारी शाही दरबार में चले गये। सईद खान को बंगाल का सूबेदार बनाया गया।

१५८७ ई. में कुँवर मानसिंह को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। १५८९ ई. में राजा भगवान दास की मत्यु के पश्‍चात्‌ मानसिंह को राजा की पद्‍वी दी गई। उन्होंने गिद्दौर के राजा पूरनमल की पुत्री से शादी की। खड्‍गपुर के राजा संग्राम सिंह एवं चेरो राजा अनन्त सिंह को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

राजा मानसिंह के पुत्र जगत सिंह ने बंगाल के विद्रोही सुल्तान कुली कायमक एवं कचेना (जो बिहार के तांजपुर एवं दरभंगा में उत्पात मचा रहे थे) को शान्त किया। बिहार में मुगलों की सत्ता स्थापित होने के दौर में अफगानों ने अनेक बार विद्रोह किये।

१९४ ई. में सईद खान तीसरी बार बिहार का सूबेदार बना और १५९८ ई. तक बना रहा। १५९९ ई. में जब उज्जैन शासक दलपत शाही ने विद्रोह किया तो इलाहाबाद के गवर्नर राजकुमार दानियाम ने उसकी पुत्री से विवाह कर लिया।

इस प्रकार अकबर के समय बिहार पठानों एवं मुगलों की लड़ाई का केन्द्र बना रहा और भोजपुर तथा उज्जैन ने मुगलों से ज्यादा पठानों के साथ अपना नजदीकी सम्बन्ध बनाये रखा। अकबर के अन्तिम समय में बिहार सलीम के विद्रोह से मुख्य रूप से प्रभावित हुआ। तत्कालीन गवर्नर असद खान को हटाकर असफ खान को गवर्नर नियुक्‍त किया गया।

जब जहाँगीर ने दिल्ली के राजसिंहासन १६०६ ई. में बैठा, तब उसने बिहार का सूबेदार लाल बेग या बाज बहादुर को नियुक्‍त किया। बाज बहादुर ने खडगपुर ने राजा संग्रामसिंह के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबाया। बाज बहादुर ने नूरसराय का निर्माण कराया (जो स्थानीय परम्पराओं के अनुसार दरभंगा में एक मस्जिद एवं एक सराय है) यह नूरसराय मेहरुनिसा (नूरजहाँ) के बंगाल से दिल्ली जाने के क्रम में यहाँ रुकने के क्रम में बनायी गयी थी। १६०७ ई. बाज बहादुर ने जहाँगीर कुली खान की उपाधि पा गया था और उसे बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा गया। इसके बाद इस्लाम खान बिहार का गवर्नर बन गया १६०८ ई. में पुनः उसे भी बंगाल का गवर्नर बना दिया गया। इस्लाम के बाद अबुल फजल का पुत्र अब्दुर्रहीम या अफजल खान बिहार का सूबेदार बना तथा कुतुबशाह नामक विद्रोही को कुछ कठिनाइयों के बाद सफलतापूर्वक दबा दिया गया था।

१६१३ ई. में अफजल खान की मृत्यु के बाद जफर खान बिहार का सूबेदार बना। १६१५ ई. में नूरजहाँ का भाई इब्राहिम खाँ बिहार का सूबेदार बना लेकिन खडगपुर के राजा संग्राम सिंह के पुत्र द्वारा इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद उसने अपना राज्य प्राप्त कर लिया। इब्राहिम खान को १६१७ ई. में बंगाल के गवर्नर के रूप में स्थानान्तरण किया गया तथा जहाँगीर कुली खाँ द्वितीय को १६१८ ई. तक बिहार का गवर्नर नियुक्‍त कर दिया। फिर एक बार अफगानों और मुगलों की सेना के बीच १२ जुलाई १५७६ को राजमहल का युद्ध हुआ और अफगान पराजित हुए। इधर भोजपुर एवं जगदीशपुर में उज्जैन सरदार राजा गज्जनशाही ने विद्रोह कर दिया। प्रारम्भ में मुगल सेना को काफी सहायता दी। उसने विद्रोह कर आरा पर कब्जा जमाया और वहाँ के जागीरदार फरहत खाँ को घेर लिया। उसका पुत्र फहरंग खान ने अपने पिता को गज्जनशाही के घेरे से मुक्‍त कराने का प्रयास किया, परन्तु इस प्रयास में वह मारा गया तथा फरहत भी मारा गया। गज्जनशाही गाजीपुर की ओर खान-ए-जहाँ के परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार करने के उद्देश्य से गया लेकिन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्‍त शाहवाज खान कम्बो ने पीछा करते हुए जगदीशपुर पहुँच गया और तीन माह तक घेराबन्दी कर अन्त में उसे पराजित कर दिया।

इसके पश्‍चात्‌ रोहतास के क्षेत्रों में अफगानों का उपद्रव शुरू हो गया। काला पहाड़ नामक अफगान (जो बंगाल से आया था) के साथ मिलकर विद्रोह शुरू कर दिया। मालुम खान ने इसे पराजित कर मार डाला। फलतः शाहवाज खान ने रोहतास के किले एवं शेरगढ़ पर अधिकार कर लिया।

१५७७ ई. में मुजफ्फर खान को बिहार से आगरा बुला लिया गया और शुजात खान को बिहार का गवर्नर बनाया गया। १५७८ ई. से १५८० ई. तक बिहार का कोई मुगल गवर्नर नहीं रहा। इस अवधि में छोटे-छोटे सरदार ही शासन करते थे। पटना, रोहतास, आरा, सासाराम, हाजीपुर, तिरहुत के क्षेत्रों में सरदारों का शासन चलता था। बिहार में सूबेदार के अभाव में अव्यवस्था तथा अराजकता का माहौल बना हुआ था।

१५७९ ई. में शेरशाह ने मुल्ला तैयब को दीवान एवं राय पुरुषोत्तम को मीर बक्शी नियुक्‍त किया था, लेकिन अधिकारियों की अदूरदर्शिता से शासन प्रणाली और अधिक चरमरा गई। इसी दौरान बिहार में अरब बहादुर के नेतृत्व में विद्रोह भड़क उठा। पटना में बंगाल से सम्पत्ति ले जा रही गाड़ियों को लूट लिया गया तथा १५८० ई. में विद्रोहियों ने मुजफ्फर खान की हत्या कर दी। कुशाग्र एवं बुद्धि वाला सेनापति राजा टोडरमल ने अतिरिक्‍त शाही सैनिक सहायता से बंगाल का विद्रोही नेता बाबा खान कमाल को मार डाला तथा मुंगेर शासक यासुम खान को घेर लिया।

यासुम खान पराजित हो गया फलतः शाही सेना गया होते हुए शेर घाटी पहुँची। १५८० ई. के अन्त तक लगभग सम्पूर्ण दक्षिणी बिहार पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया।

अकबर ने अपने साम्राज्य को १२ सूबों में बाँटा था। उसमें बिहार भी एक अलग सूबा था जिसका गवर्नर खान-ए-आजम मिर्जा अजीज कोकलतास को बनाया गया। इस समय बिहार की कुल आय २२ करोड़ दाय अर्थात्‌ ५५,४७,९८५ रु. थी।

१६१८ ई. मुर्करव खान को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। वह अपने पिता के अनुरूप एक अच्छा चिकित्सक एवं अंग्रेजी साझी व्यापारी था। १६२१ ई. में बिहार का गवर्नर बनने वाला पहला राजकुमार था। वह शहजादा परवेज था। उसके प्रशासनिक कार्यों में मुखलिस खान सहायता करता था। इस समय बिहार में एक अफगान सरदार नाहर बहादुर खवेशगी द्वारा १६३६ ई. में पटना में पत्थर की मस्जिद का निर्माण करवाया था।

१६२२-२४ ई. की अवधि में शहजादा खुर्रम ने बादशाह के खिलाफ विद्रोह कर दिया। खुर्रम ने पटना, रोहतास आदि क्षेत्रों पर परवेज का अधिकार छीन लिया। इसी समय खुर्रम ने खाने दुर्रान (बैरम बेग) को बिहार का गवर्नर बनाया।

२६ अक्टूबर १६२४ को बहादुरपुर के निकट टोंस नदी पर शहजादा परवेज की सेना ने खुर्रम को पराजित कर दिया। खुर्रम पटना होते हुए अकबर नगर चला गया फिर जहाँगीर द्वारा सुलह कर लिया गया। १६२६-२७ ई. में शहजादा परवेज के स्थान पर मिर्जा रुस्तम एफावी को को बिहार का सूबेदार बनाया गय जो जहाँगीर का अन्तिम गवर्नर था। १६२८ ई. में खान-ए-आलम बिहार का सूबेदार आठ वर्षों तक बना रहा। इसके बाद गुजरात के गवर्नर सैफ खान को बिहार का गवर्नर बना दिया गया। वह योग्य गवर्नरों में एक था उसने ही १६२८-२९ ई. में पटना में सैफ खान मदरसा का निर्माण कराया था। १६३२ ई. में बिहार का गवर्नर शाहजहाँ ने अपने विश्‍वस्त अब्दुल्ला खान बहादुर फिरोज जंग को बनाया। इस समय भोजपुर के उज्जैन शासक ने विद्रोह कर दिया। वह पहले मुगल अधीन मनसबदार था। अन्त में पराजित होकर राजा प्रताप को मार डाला।

एक शाही अधिकारी शहनवाज खान बिहार आया। उसने खान-ए-आजम के साथ मिलकर उज्जैन के सरदार दलपत शाही एवं अन्य विद्रोही अरब बहादुर को शान्त किया। राजा टोडरमल के शाही दरबार में लौटने के बाद शाहनवाज को वजीर नियुक्‍त किया गया। अब्दुल्ला खान के बाद मुमताज महल का भाई शाहस्ता खाँ को बिहार का गवर्नर (१६३९-४३ ई.) बनाया गया।

शाइस्ता खाँ ने १६४२ ई. में चेरो शासकों को पराजित कर दिया। उसके बाद उसने मिर्जा सपुर या इतिहाद खाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त कर दिया। १६४३ ई. से १६४६ ई. तक चेरी शासक के खिलाफ पुनः अभियान चलाया गया। १६४६ ई. में बिहार का सूबेदार आजम खान को नियुक्‍ किया गया। उसके बाद सईद खाँ बहादुर जंग को सूबेदार बनाया। इसके प्रकार १६५६ ई. में जुल्फिकार खाँ तथा १६५७ ई. में अल्लाहवर्दी ने बिहार का सूबेदारी का भा सम्भाला। अल्लाहवर्दी खान शाहजादा शुजा का साथ देने लगा, लेकिन शाही सेना ने शहजादा सुलेमान शिकोह एवं मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में शहजादा शुजा को पराजित कर दिया। १६ जनवरी १६५९ को खानवा के युद्ध में औरंगजेब ने शुजा को पराजित किया और शुजा बहादुर पटना एवं मुंगेर होते हुए राजमहल पहुँच गया।

मुईउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब शाहजहाँ तथा मुमताज महल का छठवाँ पुत्र था जब औरंगजेब दिल्ली (५ जून १६५९) को सम्राट बना तो बिहार का गवर्नर दाऊद खाँ कुरेशी को नियुक्‍त किया गया। वह १६५९ ई. से १६६४ ई. तक बिहार का सूबेदार रहा। दाऊद खाँ के बाद १६६५ ई. में बिहार में लश्कर खाँ को गवर्नर बनाया गया इसी के शासन काल में अंग्रेज यात्री बर्नीयर बिहार आया था। उसने अपने यात्रा वृतान्त में सामान्य प्रशासन एवं वित्तीय व्यवस्था का उल्लेख किया है। उस समय पटना शोरा व्यापार का केन्द्र था। वह पटना में आठ वर्षों तक रहा। १६६८ ई. में लश्कर खाँ का स्थानान्तरण कर इब्राहिम खाँ बिहार का सूबेदार बना। इसके शासनकाल में बिहार में जॉन मार्शल आया था। उसने भयंकर अकाल का वर्णन किया है।

एक अन्य डच यात्री डी ग्रैफी भी इब्राहिम के शासनकाल में आया था। जॉन मार्शल ने बिहार के विभिन्‍न शहर भागलपुर, मुंगेर, फतुहा एवं हाजीपुर की चर्चा की है।

इब्राहिम खाँ के बाद अमीर खाँ एक साल के लिए बिहार का सूबेदार नियुक्‍त हुआ, उसके बाद १६७५ ई. में तरवियात खाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। १६७७ ई. में औरंगजेब का तीसरा पुत्र शहजादा आजम को बिहार का गवर्नर नियुक्‍त किया गया। इसी अवधि में पटना में गंगाराम नामक व्यक्‍ति ने विद्रोह कर दिया। भोजपुर एवं बक्सर के राजा रूद्रसिंह ने भी असफल बगावत की। शफी खाँ के पश्‍चात्‌ बजरंग उम्मीद खाँ बिहार का गवर्नर बना परन्तु अपने अधिकारियों से मतभेद के कारण ज्यादा दिनों तक गद्दी पर नहीं रहा।

फिदा खाँ १६९५ ई. से १७०२ ई. तक बिहार का सूबेदार बना रहा। इस अवधि में तिरहुत और संथाल परगना (झारखण्ड) में अशान्ति रही। कुंवर धीर ने विद्रोह कर दिया। इसे पकड़कर दिल्ली लाया गया। फिदा खाँ के बाद शहजादा अजीम बिहार के साथ-साथ बंगाल का भी शासक बना। शहजादा अजीम आलसी और आरामफरोश होने के कारण शीघ्र ही सत्ता का भार करतलब खाँ को दे दिया गया जो बाद में मुर्शिद कुली खाँ के नाम से जाना गया। परस्पर सम्बन्ध में कतुता आ गयी। १७०४ ई. में शहजादा अजीम स्वयं पटना पहुँचा। प्रशासनिक सुदृढ़ता के कारण शहर (पटना) का नाम अजीमाबाद रखा गया। बाद में अलीमर्दन के विद्रोह को दबाने को चला गया। १७०७ ई. में जब औरंगजेब की मृत्यु हो गई तथा बहादुरशाह १७०७ ई. में शसक बना और १७१२ ई. तक दिल्ली का शासक रहा तब राजकुमार अजीम बिहार का गवर्नर पद पर अधिक शक्‍ति के साथ बना हुआ था। उसका नाम अजीम उश शान हो गया।

१७१२ ई. में बहादुरशाह की मृत्यु हो गयी तो अजीम उश शान ने भी दिल्ली की गद्दी प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन वह असफल होकर मारा गया। जब दिल्ली की गद्दी पर जहाँदरशाह बादशाह बना तब अजीम उश शान का पुत्र फर्रुखशियर पटना में था। उसने अपना राज्याभिषेक किया और आगरा पर अधिकार के लिए चल पड़ा। आगरा के समीप फर्रुखशियर ने जहाँदरशाह को पराजित कर दिल्ली का बादशाह बन गया।

१७०२ ई. में मुगल सम्राट औरंगजेब के पौत्र राजकुमार को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। प्रशासनिक सुधार उन्होंने विशेष रूप से पटना में किया फलतः पटना का नाम बदलकर ‘अजीमाबाद’ रख दिया।

  • अजीम का पुत्र फर्रूखशियर पहला मुगल सम्राट था जिसका राज्याभिषेक बिहार के (पटना में) हुआ था।
  • मुगलकालीन बिहार में शोरा, हीरे तथा संगमरमर नामक खनिजों का व्यापार होता था।
  • फर्रूखशियर के शासनकाल से बिहार का एक प्रान्तीय प्रशासन प्रभाव धीरे-धीरे कम होते-होते अलग सूबा की पहचान समाप्त हो गई।

१७१२ ई. से १७१९ ई. तक फर्रूखशियर दिल्ली का बादशाह बना इसी अवधि में बिहार में चार गवर्नर- खैरात खाँ- १७१२ ई. से १७१४ ई. तक, मीलू जुमला- १७१४ ई. से १७१५ ई. तक, सर बुलन्द खाँ-१७१६ ई. से १७१८ ई. तक बना। इस दौरान जमींदारों के खिलाफ अनेक सैनिक अभियान चलाए गये। भोजपुर के उज्जैन जमींदार सुदिष्ट नारायण का विद्रोह, धर्मपुर के जमींदार हरिसिंह का विद्रोह आदि प्रमुख विद्रोही थे। इन विद्रोहियों का तत्कालीन गवर्नर सूर बुलन्द खाँ ने दमन किया। सूर बुलन्द खाँ के पश्‍चात्‌ खान जमान खाँ १७१८-२१ ई. में बिहार का सूबेदार बना। अगले पाँच वर्षों के लिए नुसरत खाँ को बिहार का नया गवर्नर बना दिया गया। बाद में फखरुद्दौला बिहार का सूबेदार बनकर उसने छोटा नागपुर, पलामू (झारखण्ड) जगदीशपुर के उदवन्त सिंह के खिलाफ सैन्य अभियान छेड़ा।

इसी के शासनकाल में ही पटना में दाऊल उदल (कोर्ट ऑफ जस्टिस) का निर्माण किया गया। परन्तु कुछ कारणवश इन्हें १७३४ ई. में पद से विमुक्‍त कर दिया गया। फखरुद्दौला की नियुक्‍ति के बाद शहजादा मिर्जा अहमद को बिहार का नाममात्र का अधिकारी गवर्नर नियुक्‍त किया गया बाद में इसे सहायक रूप में बंगाल में (नाजिम शुजाउद्दीन) को नियुक्‍त किया गया। शुजाउद्दीन ने अपने विश्‍वत अधिकारी अलीवर्दी खाँ को अजीमाबाद में शासन की देखभाल के लिए भेजा। वह अजीमाबाद (पटना में) १७३४ ई. से १७४० ई. तक नवाब बना रहा। उसने अपनी शासन अवधि में बिहार के विद्रोहों को दबाया और एक सश्रम प्रणाली का विकास कर राज्य की आय में बढ़ोत्तरी की। यही बढ़ी आय को उसने बंगाल अभियान में लगाया। वह १७३९ ई. में शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद गिरियाँ युद्ध में शुजाउद्दीन के वंशज को हराकर बिहार और बंगाल का स्वतन्त्र नवाब बन गया। इसी समय बंगाल पर मराठों और अफगानों का खतरा बढ़ गया। अफगानों ने १७४८ ई. में हैबतजंग की हत्या कर दी।

अलीवर्दी खाँ ने स्वयं रानी सराय एवं पटना के युद्ध में अफगान विद्रोहियों को शान्त किया। उसने १७५१ ई. में फतुहा के पास मराठों को पराजित किया था किन्तु मराठों ने उड़ीसा के अधिकांश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसमें मराठा विद्रोही का नेतृत्व रघु जी के पुत्र भानु जी ने किया था।

१७५६ ई. में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना लेकिन एक प्रशासनिक अधिकारी रामनारायण को बिहार का उपनवाब बनाया गया।

अप्रैल, १७६६ में सिराजुद्दौला बंगाल की गद्दी पर बैठा, गद्दी पर बैठते ही उसे शौकत जंग, घसीटी बेगम तथा उसके दीवान राज वल्लभ के सम्मिलित षड्‍यन्त्र का सामना करना पड़ा।

सिराजुद्दौला का प्रबल शत्रु मीर जाफर था। वह अलीवर्दी खाँ का सेनापति था। मीर जाफर बलपूर्वक बंगाल की गद्दी पर बैठना चहता था दूसरी तरफ अंग्रेज बंगाल पर अधिकार के लिए षड्‍यन्त्रकारियों की सहायता करते थे।

फलतः व्यापारिक सुविधाओं के प्रश्‍न पर तथा फरवरी, १७५७ ई. में हुई अलीनगर की सन्धि की शर्तों का ईमानदारी के पालन नहीं करने के कारण २३ जून १७५७ में प्लासी के मैदान में क्लाइव और नवाब सेना के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में सिराजुद्दौला मारा गया। इसके बाद मीर जाफर बंगाल का नवाब बना।

इस प्रकार बिहार, बंगाल एवं उड़ीसा का नवाबी साम्राज्य धीरे-धीरे समाप्त हो गया और अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ गई।

मध्यकालीन बिहार के ऐतिहासिक स्रोत[संपादित करें]

बिहार का मध्यकालीन युग १२ वीं शताब्दी से प्रारंभ होता है। ऐसा माना जाता है कि कर्नाटक राजवंश के साथ ही प्राचीन इतिहास का क्रम टूट गया था। इसी काल में तुर्कों का आक्रमण भी प्रारंभ हो गया था तथा बिहार एक संगठित राजनीतिक इकाई के रूप में न था बल्कि उत्तर क्षेत्र और दक्षिण क्षेत्रीय प्रभाव में बँटा था।

अतः मध्यकालीन बिहार का ऐतिहासिक स्रोत प्राप्त करने के लिए विभिन्‍न ऐतिहासिक ग्रन्थों का दृष्टिपात करना पड़ता है जो इस काल में रचित हुए थे।

मध्यकालीन बिहार के स्रोतों में अभिलेख, नुहानी राज्य के स्रोत, विभिन्‍न राजाओं एवं जमींदारों के राजनीतिक जीवन एवं अन्य सत्ताओं से उनके संघर्ष, यात्रियों द्वारा दिये गये विवरण इत्यादि महत्वपूर्ण हैं।

ऐतिहासिक ग्रन्थों में मिनहाज उस शिराज की “तबाकत-ए-नासिरी" रचना है जिसमें बिहार में प्रारंभिक तुर्क आक्रमण की गतिविधियों के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है। बरनी का तारीख-ए-फिरोजशाही भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है।

मुल्ला ताकिया द्वारा रचित यात्रा वृतान्त से भी बिहार में तुर्की आक्रमण बिहार और दिल्ली के सुल्तानों (अकबर कालीन, तुर्की शासन, दिल्ली सम्पर्क) के बीच सम्बन्धों इत्यादि की जानकारियाँ मिलती हैं। प्रमुख ऐतिहासिक ग्रन्थ ‘बसातीनुल उन्स’ जो इखत्सान देहलवी द्वारा रचित है। इसमें सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के तिरहुत आक्रमण का वृतान्त दिया गया है।

रिजकुल्लाह की वकियाते मुश्ताकी, शेख कबीर की अफसानाएँ से भी सोलहवीं शताब्दी बिहार की जानकारी प्राप्त होती है।

मध्यकालीन मुगलकालीन बिहार के सन्दर्भ में जानकारी अबुल फजल द्वारा रचित अकबरनामा से प्राप्त होती है। आलमगीरनामा से मुहम्मद कासिम के सन्दर्भ में बिहार की जानकारी होती है।

उत्तर मुगलकालीन ऐतिहासिक स्रोत गुलाम हुसैन तबाताई की सीयर उल मुताखेरीन, करीम आयी मुजफ्फरनामा, राजा कल्याण सिंह का खुलासातुत तवासिरत महत्वपूर्ण है जिसमें बंगाल और बिहार के जमींदारों की गतिविधियों की चर्चा है। बाबर द्वारा रचित तुजुके-ए-बाबरी एवं जहाँगीर द्वारा रचित तुजुके में भी बिहार के मुगल शासनकालीन गतिविधियों की जानकारी मिलती है। इन दोनों ग्रन्थों से अपने समय में मुगलों की बिहार के सैनिक अभियान की जानकारी प्राप्त होती है।

  • मिर्जा नाथन का रचित ऐतिहासिक ग्रन्थ बहारिस्ताने गैबी, ख्वाजा कामागार दूसैनी का मासिर-ए-जहाँगीरी भी १७ वीं शताब्दी के बिहार की जानकारी देती है।
  • बिहार के मध्यकालीन ऐतिहासिक स्रोतों में भू-राजस्व से सम्बन्धित दस्तावेज भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भू-राजस्व विभाग के संगठन, अधिकारियों के कार्य एवं अधिकार, आय एवं व्यय के आँकड़े एवं विभिन्‍न स्तरों पर अधिकारियों के द्वारा जमा किये गये दस्तावेज बहुत महत्वपूर्ण हैं।
  • ऐसे दस्तावेज रूपी पुस्तक में आइने अकबरी, दस्तुरूल आयाम-ए-सलातीन-ए-हिन्द एवं कैफियत-ए-रजवा जमींदारी, राजा-ए-सूबा बिहार भू-कर व्यवस्था के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
  • सूफी सन्तों के पत्रों से भी तत्कालीन बिहार की धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की झाँकी मिलती है।
  • अहमद सर्फूद्दीन माहिया मनेरी, अब्दुल कूटूस गंगोई इत्यादि के पत्रों से धार्मिक स्थिति के सन्दर्भ में जानकारी मिलती है।
  • मध्यकालीन बिहार के ऐतिहासिक स्रोतों में यूरोपीय यात्रियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
  • यूरोपीय यात्रियों द्वारा वर्णित यात्रा वृतान्त में बिहार के सन्दर्भ में जानकारी मिलती है।
  • राल्फ फिच, एडवर्ड टेरी, मैनरीक, जॉन मार्शल, पीटर मुंडी, मनुची, ट्रैवरनियर, मनुक्‍की इत्यादि के यात्रा वृतान्त प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं।
  • यूरोपीय यात्रा वृतान्त के अलावा विभिन्‍न विदेशी व्यापारिक कम्पनियों (डेनिस, फ्रेंच, इंगलिश) आदि फैक्ट्री रिकार्ड्‍स आदि बहुत महत्वपूर्ण हैं जो बिहार की तत्कालीन आर्थिक गतिविधियों की जानकारी देता है।
  • बिहार के मध्यकालीन ऐतिहासिक स्रोत पटना परिषद, कलकत्ता परिषद एवं फोर्ट विलियम के बीच पत्राचार से प्राप्त होते हैं।
  • बिहार के जमींदारों एवं दिल्ली सम्बन्ध से तत्कालीन गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है।
  • डुमरॉव, दरभंगा, हथूआ एवं बेतिया के जमींदार घरानों के रिकार्डों से बाहर की गतिविधियों की जानकारी मिलती है।
  • मध्यकालीन बिहार के ऐतिहासिक स्रोत में पुरालेखों का भी महत्व है। ये पुरालेख अरबी या फारसी में विशेषकर मस्जिद, कब्र या इमामबाड़ा आदि की दीवारों पर उत्कीर्ण हैं।
  • बिहार शरीफ एवं पटना में भी पुरालेख की जानकारी मिलती है। विभिन्‍न शासकों द्वारा जारी अभिलेख, खड़गपुर के राजा के अभिलेख, शेरशाह का ममूआ अभिलेख, मुहम्मद-बिन-तुगलक का बेदीवन अभिलेख महत्वपूर्ण हैं।
  • मध्यकालीन बिहार के अध्ययन के लिये गैर-फारसी साहित्य एवं अन्य स्रोतों में मिथिला के क्षेत्र में लिखे साहित्य अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
  • संस्कृत के लेखकों में वर्तमान में शंकर मिश्र, चन्द्रशेखर, विद्यापति के प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत हैं।
  • गैर-फारसी अभिलेख बिहार में सर्वाधिक उपलब्ध हैं। बल्लाल सेन का सनोखर अभिलेख पूर्वी बिहार में लेखों के प्रसार का साक्षी है। खरवार के अभिलेख से पता चलता है उसका पलामू क्षेत्र तक प्रभाव था।
  • वुइ सेन का बोधगया अभिलेख, बिहार शरीफ का पत्थर अभिलेख, फिरोज तुगलक का राजगृह अभिलेख, जैन अभिलेख इत्यादि में प्रचुर पुरातात्विक सामग्री उपलब्ध होती हैं।

इस प्रकार मध्यकालीन बिहार के ऐतिहासिक स्रोत बिहार की जानकारी के अत्यन्त महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]