नूर जहाँ

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बेगम नूर जहाँ
मुग़ल मलिका
Nurjahan.jpg
Consort to शेर अफ़ग़न कूलि खान
जहाँगीर
संतान मैहर-उर-निसार
पिता मिर्ज़ा घिअस बहेग
माता अस्मत बेगम
धर्म शिया इस्लाम

नूर जहाँ (उर्दू: نورجہاں) मुग़ल शहनशाह (राजा) जहाँगीर की मलिका (रानी) थी। इन का मज़ार लाहौर के नवाह में दरयाए रावी के किनारे मौजूद है। सुख दौर में जब लूट खसूट की गई और मक़बरों और क़बरसता वनों को भी ना बख्शा गया इस दौर में सुख मज़ालिम का शिकार मक़बरा नूर्झान भी हुआ। जिस ताबूत में मलिका को दफ़नाया गया था वो उखाड़ा गया और इस के ऊपर लगे हीरे जवाहरात पर ख़ालिसा लुटेरों ने हाथ साफ़ किए। बादअज़ां मक़बरा के मुलाज़िमों ने ताबूत को ऐन उसी जगह के नीचे झां वो लटकाया गया था ज़मीन में दफ़न करदिया।galib नूरजहाँ का वास्तविक नाम मेहरुनिशा था

नूरजहाँ का इतिहास-

Nurjahan History in Hindi- जैसा की हम सभी जानते हैं जहांगीर ने अपने जीवन काल में कई विवाह किये थे परंतु नूरजहां से उसका विवाह भारतीय इतिहास में बहुत उल्लेखनीय एवं महत्वपूर्ण है| नूर-जहां तेहरान निवासी गयास बेग की पुत्री एवं शेर अफगन की विधवा थी| उसकी माता का नाम अस्मत बेगम था| नूरजहां के बचपन का नाम मेहर-उन-नीसा था| अपनी गरीबी से त्रस्त होकर मिर्जा गयास बेग एवं असमत बेग भारत की ओर पलायन किए और जब उनका काफिला कंधार पहुंचा तो असमत बेग के गर्भ से मेहरूनिशा का जन्म 31 मई, 1577 ई को हुआ|

जहांगीर और नूरजहां का विवाह-

जब मेहरूनिशा की उम्र 17 वर्ष की थी तब उसका विवाह अलीकुली इस्ताजलू से हुआ| यही अलीकुली आगे चलकर इतिहास में शेर अफगन के नाम से प्रसिद्ध हुआ| कालांतर में शेर अफगन की हत्या कर दी गई और मेहरूनिशा विधवा हो गई| शेर अफगन की हत्या में सम्राट जहांगीर सम्मिलित था या नहीं, यह इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है और इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद है|

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जब शेर अफगन की हत्या सन 1607 ईस्वी में हो गई तो मेहरूनिशा को राज महल में सुल्तान सलीमा बेगम के संरक्षिका के तौर पर नियुक्त किया गया| सलीमा बेगम महान सम्राट अकबर की विधवा थी| शेर अफगन की हत्या के 4 वर्ष पश्चात सन 1611 इसवी में मेहरूनिशा ने सुल्तान जहांगीर से विवाह किया और नूरजहां का खिताब धारण किया|


एक आप्रवासी से मुगल शासन की महारानी बनने वाली नूरजहां उस कालखंड की सबसे प्रभावी शख्सियतों में से एक थीं। नूरजहां ने अपने शासनकाल (1611-1627) के दौरान मुगल साम्राज्य को आकार देने और विस्तार देने में महती भूमिका निभाई। इसके साथ-साथ उन्होंने मुगल काल में कला, धर्म और विदेशी व्यापार को बढ़ाने और फैलाने में भी अहम योगदान दिया।

मेहरूनिसा की पहली शादी 17 साल की उम्र में एक पारसी साहसी शेर अफगान अली कुली खान इस्ताजलु से हुई थी। उनके पहले पति का अपने क्षेत्र में दबदबा था। उनसे उन्हें पहली संतान भी हुई, जिसका नाम उन्होंने लाड़ली बेगम रखा था। 1607 में शेर अफगान के निधन के बाद मेहरूनिसा ने मुगल साम्राज्य की सेवा करना शुरू की। 1605 में अकबर के निधन के बाद जहांगीर ने उत्तराधिकारी के तौर पर शासन किया। इस दौरान मेहरूनिसा की जिम्मेदारी जहांगीर की सौतेली माताओं में से एक रुकैया सुल्ताना बेगम की सेवा करने की थी। 1607 में मेहरूनिसा ने बहुत ही बुरा दौर देखा। उनके परिवार के दो सदस्यों को राजद्रोह के आरोप में मृत्युदंड की सजा दी गई। इसके बाद भी जैसे भाग्य मेहरूनिसा पर मेहरबान था और आगे चलकर उनका भाग्य ही बदल गया।

1611 में नौरोज उत्सव के दौरान, जहांगीर ने मीना बाजार पैलेस में मेहरूनिसा को पहली बार देखा। उनकी खूबसूरती देखकर वह मोहित हो गए। उसी साल कुछ ही महीनों बाद जहांगीर ने मेहरूनिसा से निकाह कर लिया। दोनों का आपसी प्यार इतना मजबूत था कि कुछ ही दिनों में मेहरूनिसा उनकी पसंदीदा पत्नी बन गईं। शादी के बाद जहांगीर ने उन्हें नाम दिया नूर महल (महल की रौशनी)। बाद में 1616 में उन्हें नूर जहां (दुनिया की रौशनी) कहा जाने लगा। जहांगीर ने नूरजहां को सरकारी कामकाज के अधिकार भी दे दिए। इससे उनके परिजन भी फले-फूले। जहांगीर को शराब और अफीम की लत लग चुकी थी। इससे नूरजहां का शासन पर प्रभाव बढ़ गया था। धीरे-धीरे वह ही पर्दे के पीछे से मुगल शासन को चलाने लगी। यह वह दौर था जब मुगल शासन ने तेजी से विकास किया। सरकारी कामकाज के प्रबंधन के साथ ही नूरजहां ने अपने नाम से सिक्के भी बनवाकर जारी किए। नूरजहां ने प्रशासनिक कामकाज भी अच्छे-से संभाला। महिलाओं के मामले हो या घरेलू और विदेशी व्यापार, व्यापारियों से कर संग्रह की व्यवस्थाओं को सुधारा, जिससे आगरा कारोबार का एक गढ़ बन चुका था। 1627 में जहांगीर के निधन के बाद, सौतेले बेटे खुर्रम ने नूरजहां को आलीशान महल तक सीमित कर दिया। यहीं खुर्रम आगे चलकर शाहजहां हुए, जिन्होंने नूरजहां के भाई आसफ खान की बेटी मुमताज महल से शादी की। नूरजहां का ज्यादातर समय आगरा में अपने पिता की याद में आलीशान मकबरा इत्माद-उद-दौला बनवाने में चला गया। हरियाली से आच्छादित यह इलाका आज भी दर्शनीय है।

नूरजहां की पारिवारिक पृष्ठभूमि में साहित्य था। लिहाजा इसका असर उन पर भी दिखा। नूरजहां ने अपने साहित्य सृजन से अपनी अलग पहचान बनाई। परंपरागत पारसी संस्कृति में उनकी रुचि और विशेषज्ञता की बदौलत ही उन्होंने इत्र-निर्माण, जेवरात, परिधान, फैशनेबल डिजाइंस के विकास में अहम योगदान दिया। यह मुगलकाल की भारत को बड़ी देन रही। नूरजहां के काल में कई पेंटिंग्स भी बनीं, जो मुगल कला पद्धति का बेजोड़ नमूना है। इसके अलावा बेहतरीन बगीचे और शानदार वास्तुकला भी देखने को मिली। जालंधर में नूर महल सराय इसका एक नमूना है। नूरजहां का निधन 1645 में हुआ। लाहौर में जहांगीर के मकबरे के करीब ही शाहदरा में उनकी कब्र है।