तुग़लक़ राजवंश

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सल्तनत काल

तुगलक वंश (1320-1414)

तुगलक सुल्तान करोना तुर्क थे. करोना तुर्क का मतलब जिनके पिता तुर्क हो तथा माता गैर तुर्क हो. गयासुद्दीन तुगलक के पिता तुर्क थे जबकि माता राजपूत😎😎😎 जाति की महिला थी.


गयासुद्दीन तुगलक - . गयासुद्दीन तुगलक (मलिक गाजी तुगलक) के नाम पर ही इस वंश का नाम तुगलक वंश रखा गया. गयासुद्दीन अपनी योग्यता से पंजाब व दिपालपुर का सूबेदार बना. उसने अपनी शक्ति का उपयोग कर सितंबर 1320 में खुसरवशाह से दिल्ली का सिंहासन प्राप्त किया.


प्रारंभिक कठिनाइयाँ - गयासुद्दीन के सिंहासन पर बैठने के साथ ही उसके सामने निम्नलिखित कठिनाइयाँ आई.

1. दिल्ली सल्तनत व सुल्तान की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना. 2. अधिकांश दरबारियों में धन लोलुपता विलासिता व अकर्मण्यता आ गयी थी उसे दूर करना. 3 खिलजी सरदारों के अत्यधिक धन वितरण से शाही खजाना खाली हो गया था. इसके अतिरिक्त सबसे विकट समस्या सूबेदारों व अधीनस्थ शासकों को दिल्ली की अधीनता में रखने की थी.

गयासुद्दीन की प्रशासनिक व्यवस्था-

. गयासुद्दीन ने उदारता व कठोरता की समन्वयवादी नीति अपनाई जिसे बरनी ने "रस्मोमियान" या मध्यम पंथी नीति कहा. गयासुद्दीन ने स्वयं कहा कि, " मै सभी क्षेत्रों में मध्यम मार्ग के लिए जन्मा हूँ." . गयासुद्दीन ने अमीरों को पद देने में वंशानुगतता के साथ साथ योग्यता को भी आधार बनाया. . उसने अलाउद्दीन द्वारा छीनी गयी जागीरें पुनः लौटा दी. . गयासुद्दीन ने भूराजस्व व्यवस्था में सुधार किए जिसका मुख्य उद्देश्य किसानो की स्थिति में सुधार व कृषि योग्य भूमि में वृद्धि करना था. उसने अलाउद्दीन द्वारा लागू मसाहत के तरीके को बदल कर हुक्म-ए-हासिल (गल्ला बटाई) , नस्क /कनकूत प्रथा नीति अपनाई. इस प्रणाली में भूमि कर को कम कर 1/3 कर दिया गया तथा भू राजस्व में एक बार में 1/11 से 1/10 तक की ही वृद्धि करने के आदेश दिए. . अकाल की स्थिति में भूमि कर को माफ करने की व्यवस्था की. मोरलैंड के अनुसार गयासुद्दीन के समय फसल के खराब हो जाने पर या नवीन भूमि पर उत्पादन ठीक से ना होने पर भी किसानों को लगान से मुक्त कर दिया जाता था. इसके अतिरिक्त किसानों को उसी भूमि पर कर देना होता था जिस पर उसने कृषि की है. चाहे उसके अधिकार में अन्य भूमि भी हो. . उसने सिंचाई व्यवस्था हेतु नहरों का निर्माण करवाया. ऐसा करने वाला वह दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था. इस प्रकार गयासुद्दीन कृषि संबंधी अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल हुआ. . गयासुद्दीन ने 'खुत्त मुकद्दम' और 'चौधरी' को मिलने वाले विशेषाधिकारों में "हक्क-ए-खोती" पुनः लोटा दिया पर "किस्मत-ए-खोती" नहीं दिया गया. . उसने अलाउद्दीन द्वारा लागू की गई हुलिया व दाग प्रथा को कठोरतापूर्वक लागू किया. . गयासुद्दीन ने अपने काल मे सड़कों, पुलों व नहरों का निर्माण कराया जिससे यातायात में सुविधा हुई. . उसकी डाक व्यवस्था श्रेष्ठ थी, इसके लिए उसने प्रत्येक 3/4 मील पर डाक लाने वाले कर्मचारी व घुड़सवार नियुक्त किये. उसने न्याय व्यवस्था में भी पर्याप्त सुधार किये. बरनी के अनुसार, "तुगलक शाह के न्याय से एक भेड़िये को भी इस बात का साहस नहीं होता था कि वह किसी भेड़ को देखे." गयासुद्दीन ने व्याभिचार, मदिरापान, जुआ खेलना आदि बुराइयों को भी रोकने का प्रयत्न किया.

विद्रोह का दमन और साम्राज्य विस्तार - . गयासुद्दीन साम्राज्य वादी शासक था. उसने दक्षिण के राज्यों को ना सिर्फ अलाउद्दीन की तरह अपने अधीन किया बल्कि उन्हें दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित भी किया. . उसने वारंगल के शासक प्रताप रूद्र देव द्वारा वार्षिक कर अदायगी बंद कर देने पर अपने पुत्र जुना खाँ को 1321 में तेलंगाना आक्रमण हेतु भेजा. यह आक्रमण सफल होते हुए भी असफल रहा. . 1323 में जूना खाँ को पुनः वारंगल हेतु भेजा गया. और इस बार उसने वारंगल को जीता. प्रताप रूद्र देव व उसके संबंधियों को कैद कर दिल्ली भेज दिया गया. तेलंगाना की राजधानी वारंगल का नाम "सुल्तानपुर" रखा गया और वारंगल को दिल्ली में मिला लिया गया. इसी अवसर पर गयासुद्दीन ने जुना खाँ को उलूग खाँ की उपाधि दी. इसके पश्चात 1323 में ही उलुग खाँ ने सुदूर दक्षिण के मालाबार तट पर आक्रमण कर मदुरै को जीता और दिल्ली राज्य के अधीन किया. . उलुग खाँ ने जाजनगर उड़ीसा पर भी आक्रमण किया परन्तु असफल होने पर पुनः दिल्ली लौट आया.


गयासुद्दीन व बंगाल विजय - बुगरा खां (बलबन का पुत्र) के समय ही बंगाल स्वतंत्र जो गया था और उसके पश्चात दिल्ली के किसी सुल्तान ने उसे अपने अधीन लाने का प्रयत्न नहीं किया. बंगाल में गयासुद्दीन के समय गयासुद्दीन बहादुर, शिहाबुद्दीन तथा नासिरुद्दीन के बीच में संघर्ष चल रहा था जिसमे गयासुद्दीन बहादुर विजय घोषित हुआ और नासिरुद्दीन ने सुल्तान गयासुद्दीन से सहायता मांगी. सुल्तान ने गयासुद्दीन बहादुर से बंगाल छीन कर नासिरुद्दीन को उत्तरी बंगाल का शासक बनाया जिसकी राजधानी "लखनौती" थी. दक्षिणी बंगाल को दिल्ली राज्य में सम्मिलित किया गया तथा सुल्तान ने बहराम खाँ को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया. इसामी के कथनानुसार सुल्तान ने बंगाल से वापस आते हुए 1324 में तिरहुत (मिथिला- बिहार) पर आक्रमण किया. वहाँ का राजा हरिसिंह देव नेपाल चला गया और तिरहुत पर दिल्ली का अधिकार हो गया.

गयासुद्दीन की विजय नीति अलाउद्दीन ने इस अर्थ में भिन्न थी कि अलाउद्दीन ने दक्षिण के राज्यों को अपनी अधीनता स्वीकार करवाने के पश्चात स्वतंत्र छोड़ दिया. उसने देवगिरी को उस समय अपने राज्य में मिलाया जबकि शंकर देव ने उसकी अधीनता स्वीकार करने से मना किया. परन्तु गयासुद्दीन ने विद्रोही और अधीनस्थ राज्यों को अपने राज्य में सम्मिलित करने की नीति अपनाई. . कम्पिली को छोड़कर सम्पूर्ण दक्षिण भारत गयासुद्दीन के समय दिल्ली सल्तनत के अधीन था.


गयासुद्दीन के अंतिम दिन - गयासुद्दीन की मृत्यु को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है. बरनी के अनुसार उसकी मृत्यु एक दुर्घटना मात्र थी. बरनी कहता है कि अचानक बिजली गिरने से सुल्तान दुर्घटनाग्रस्त हो गये. लेकिन इब्नबतूता व बदायूंनी उलुग खाँ पर अपने पिता की मृत्यु का आरोप लगाते हैं.

. इब्नबतूता के अनुसार गयासुद्दीन जब बंगाल में था तभी उसे सूचना मिली कि उलुग खाँ निजामुद्दीन औलिया के साथ मिलकर अपने समर्थकों की संख्या बढ़ा रहा है.

Note. निजामुद्दीन औलिया से 5 लाख टंके जो कि खुसरवशाह ने निजामुद्दीन औलिया को दिए थे, को वापस माँगने के कारण विवाद चल रहा था. गयासुद्दीन ने दिल्ली पहुँचने पर उलुग खाँ व निजामुद्दीन को दंड देने की धमकी दी जिसे सुनकर औलिया ने कहा, "हुनुस दिल्ली दूर अस्त". सुल्तान के लौटने पर उलुग खाँ ने तुगलकाबाद के पास अफ़गान पुर में एक लकड़ी का महल बनवाया जिसे अहमद अय्याज द्वारा बनवाया गया. इस महल को इस प्रकार बनाया गया कि हाथियों द्वारा धक्का लगने पर यह गिर सकता था. उलुग खाँ ने अपने पिता से बंगाल से लाए गए हाथियों का खेल देखने की इच्छा जाहिर की, अतः धक्का लगने पर महल गिर गया. तथा 1325 में सुल्तान व उसका पुत्र महमूद उसमें दबकर मर गए. Ibnbatuta ने लिखा है कि उसे ये विवरण शेख रुकरुद्दीन ने बताया जो उस समय महल में उपस्थित था, और उलुग खाँ ने नमाज पढ़ने के बहाने उसे वहाँ से हटा दिया था.


मोहम्मद बिन तुगलक (1325-1351)- . MBT दिल्ली सल्तनत का सर्वाधिक विद्वान, विवाहित व विरोधाभासों में रहने वाला सुल्तान था. उसने बलबन के द्वारा बनाए गए लाल महल में अपना राज्याभिषेक करवाया. . MBT के काल में ही अफ्रीकी यात्री (मोरक्को - अफ्रीका) "इब्नबतूता" 1333 में भारत आया था जिसे सुल्तान ने दिल्ली का काजी नियुक्त किया व चीन में अपना राजदूत बनाकर भेजा. . इब्नबतूता के अनुसार MBT के समय तुगलक साम्राज्य 23 प्रान्तों में बंटा हुआ था. . मेहंदी हुसैन के अनुसार सुल्तान के समय 1328-29 में मंगोलों का एकमात्र आक्रमण तार्माशीरीन के नेतृत्व में हुआ. इस आक्रमण के समय MBT ने तार्माशीरीन को 500 दीनार व कुछ बहुमूल्य उपहार देकर वापस भेज दिया. परन्तु इस आक्रमण के बाद सुल्तान ने उत्तर पश्चिमी सीमा की ओर ध्यान केंद्रित किया, तथा कलानूर व पेशावर को जीतकर यहाँ सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की. . राजमुन्दरी अभिलेख (आंध्र प्रदेश) में MBT को दुनिया का ख़ान कहा गया है. . बरनी ने MBT को "अजूबा-ए-रोजगार" कहा है.


मोहम्मद बिन तुगलक की धार्मिक नीति - . MBT एक धर्म सहिष्णु शासक था जिसे सल्तनत काल के अन्य सुल्तानों की अपेक्षा धार्मिक दृष्टि से उदार माना जाता है. . इसामी ने अपनी पुस्तक फुतुह-ए-सलातीन में लिखा है कि MBT होली, दीवाली आदि हिन्दू त्योहारों में व्यक्तिगत रूप से सम्मिलित होता था. . उसके दरबार में दो जैन विद्वान जिन प्रभ सूरी व राजशेखर स्थाई रूप से रहते थे, जिनका सुल्तान बड़ा सम्मान करता था. इसी संदर्भ में MBT को अकबर का पूर्वगामी कहा जाता है. . MBT ने उच्च प्रशासनिक पदों पर हिंदुओं की नियुक्ति की तथा उच्च पदों की प्राप्ति हेतु योग्यता को आधार बनाया. . MBT के समय के कुछ गैर मुस्लिम अधिकारियों, जैसे- पैरूमल जैन को टकसाल अधिकारी, रतन बार्बर को सिबिस्तान का गवर्नर, शाही राज को केंद्रीय मंत्री, मीरन राय को गुलबर्गा का गवर्नर नियुक्त किया. . अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती व बहराइच के सालार मसूद गाजी की दरगाह पर जाने वाला वह प्रथम सुल्तान था. . नगरकोट अभियान के समय वहाँ स्थित ज्वालामुखी मन्दिर को सुल्तान ने नष्ट नहीं किया. . इसने सती प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया. . MBT दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने उलेमा वर्ग को उनके अपराधों के लिए साधारण व्यक्ति की तरह दण्डित किया. . उसने अलाउद्दीन की भाँति उलेमा वर्ग को शासन में हस्तक्षेप नहीं करने दिया, अपितु उनकी पूर्णतः उपेक्षा की. . हालांकि कुछ समय पश्चात उसने उलेमा वर्ग से समझौता किया और अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित कराया. . 1340 में उसने खलीफा के वंशज गयासुद्दीन महमूद को दिल्ली बुलाकर उनका सम्मान किया और उससे अपने सुल्तान पद की स्वीकृति प्राप्त की.

MBT की योजनाएं - . MBT की प्रमुख योजनाओं के बारे में प्रमुख जानकारी बरनी की "तारीक-ए-फ़ीरोजशाही", इब्नबतूता की "रेहला" व इसामी की फुतुह-उस-सलातीन" से मिलती है. . बरनी ने अपने ग्रंथ में MBT की 6 योजनाओं का क्रमशः वर्णन किया है. जैसे -

1. राजधानी परिवर्तन (1327)- . MBT दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरी) राजधानी परिवर्तन करना चाहता था. . हालाँकि राजधानी परिवर्तन के कारणों में इतिहासकारों में मतभेद है. परन्तु फिर भी निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि देवगिरी का दिल्ली सल्तनत के केंद्र में स्थित होना - बरनी, मंगोल आक्रमणकारियों से सुरक्षा - गार्डन ब्राउन, दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का प्रसार करना व दक्षिण की सम्पन्नता की ओर MBT का खिंचाव या आकर्षण आदि प्रमुख कारण थे. . इस योजना से दिल्ली की समस्त जनता को दौलताबाद स्थानांतरण करने के आदेश दिए गए किन्तु जनता के असंतोष को देखकर तीन वर्ष बाद ही राजधानी को पुनः दिल्ली स्थानांतरण के आदेश दिए गए. इस प्रकार यह योजना असफल रही. Note. - मुबारक शाह खिलजी ने देवगिरी को जीतकर उसका नाम खुतुबाबाद रखा तथा MBT ने अपने समय में देवगिरी को दौलताबाद / कुव्वत-उल-इस्लाम नाम दिया.

2. सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन {1327}- सआँकेतिक मुद्रा का अर्थ होता है कि मुद्रा का मूल्य राज्य तय करेगा, ना कि धातु, अर्थात उसका मूल्य प्रयुक्त की गयी धातु के आधार पर तय नहीं होगा. MBT से पूर्व भी चीन में कूबलई खाँ व फारस में केखत्तू (गजन खाँ) ने भी सांकेतिक मुद्रा चलाई. . MBT द्वारा सांकेतिक मुद्रा के प्रचलन का कारण संभवत राजकोष की रिक्तता था. नेल्सन राइट्स के अनुसार सांकेतिक मुद्रा के प्रचलन का कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चाँदी की कमी होना था. . MBT द्वारा सांकेतिक मुद्रा के रूप में चाँदी के स्थान पर तांबे व कांसे के टांके जारी किए गए और इनका मूल्य चाँदी के टांके के बराबर निर्धारित किया गया. . बरनी ने MBT द्वारा चलाई गयी सांकेतिक मुद्रा को मोहर-ए-मश्श कहा. . MBT की ये योजना असफल रही. क्योंकि बरनी का कथन है कि, 'प्रत्येक हिन्दू का घर टकसाल बन गया, अर्थात लोगों ने घर पर ही तांबे के टांके ढालना प्रारंभ कर दिया. " . साथ ही लोग सामान्य लेनदेन में भी तांबे के टनकों का इस्तेमाल करने लगे और चाँदी के टनकों को जमा करना प्रारम्भ कर दिया. इससे वैदेशिक व्यापार का ह्रास हुआ तथा अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गयी. . अंततः सुल्तान को यह योजना वापस लेनी पड़ी तथा लोगों को तांबे के टांके के स्थान पर चाँदी के टांके लौटाने पड़े. जिससे राजकोष रिक्त हो गया. इसी संदर्भ मे बर्नी का कथन है कि tuglakabad के बाहर तांबे के सिक्कों का पहाड़ लग गया. इस योजना को लागू करते समय सुल्तान ने जनता को विश्वास में नहीं लिया,तथा लोगों को जाली सिक्के ढालने से रोकने के लिए किसी मानक व्यवस्था का निर्धारण भी नहीं किया, फलतः यह योजना असफल हुई.


3. खुरासान विजय 1332-34 Ibnbatuta व बरनी ने लिखा है कि, कुछ खुरासानी अमीरों की सलाह पर सुल्तान ने खुरासानी bijay की yojana बनाई. Kyu ki is समय वहाँ के शासक अबू सईद के विरुद्ध बड़ी संख्या में antrik विद्रोह हो रहे थे. बर्नी के अनुसार सुल्तान ने 3,70,000 घुड़सवार ओ की एक विशाल सेना संघठित की और उन्हें 1 वर्षीय का अग्रिम वेतन भी दिया गया. . MBT ने वर्ष के अंत में खुरासान पर आक्रमण करने की योजना बनाई, परन्तु तब तक अबू सईद अपनी स्थिति सुदृढ़ कर चुका था. अतः स्वयं सुल्तान ने आक्रमण का कोई लाभ na hone की शंका से अभियान को रद्द कर दिया. . इस योजना से राजकोष पर अनावश्यक आर्थिक भार बढ़ा, सेना से निकले बेरोजगार सैनिकों में असंतोष व्याप्त हुआ. और जनता में सुल्तान की छवि खराब हुई.

4. कराचिल अभियान -1332-34 (एक मात्र सफल अभियान, पर सफल होने पर भी असफल हुआ.) .कराचिल हिमालय की तलहटी में स्थित एक हिन्दू राज्य था और इतिहासकार वर्तमान में कराचिल को कुमायूँ गढ़वाल से समीकृत करते हैं. Ibbnabatuta ने कराचिल पर आक्रमण का कारण उत्तर की तरफ से राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करना बताया. क्योंकि उस समय चीन के सम्राट तोगन तिमूर ने पहाड़ी राज्यों me रुचि लेना प्रारंभ कर दिया था. . सुल्तान ने कराचिल के विरुद्ध खुसरो मलिक के नेतृत्व में एक लाख घुड़सवार ओ की सेना भेजी और Ibbnabatuta लिखता है कि "सुल्तान की यह योजना सफल रही kyuki कराचिल के शासक ने अधीनता स्वीकार की और वार्षिक कर देना मंजूर किया. परंतु सुल्तान की चेतावनी के बावजूद भी खुसरो मलिक ने तिब्बत के पहाड़ी प्रदेशों को जीतने का प्रयास किया. Marg में बर्फ बारी होने के कारण पूरी सेना बारफ में सबसे कर समाप्त हो गई और Ibnbatuta के अनुसार तीन ही सैनिक बच कर दिल्ली पहुंच पाए. अतः सुल्तान की यह योजना सफल होते हुए भी असफल रही.

5. दोआब में कर वृद्धि करना-1325-36 बारनी के अनुसार MBT ने रिक्त कोष को भरने के लिए भूराज्‍सव में वृद्धि की. और is हेतु उसने सरवप्रथम दोआब के क्षेत्र का चयन किया. क्योंकि दोआब की भूमि अत्यधिक उपजाऊ थी और किसान अधिक कर दे सकते थे. Barni के अनुसार MBT द्वारा 10 से 20 गुना कर वृद्धि की गयी परन्तु R. K. त्रिपाठी के अनुसार यह वृद्धि 5 से 10% ही थी. . उसी वर्ष अकाल पड़ जाने के कारण यह योजना भी असफल रही. . जब सुल्तान को अकाल की स्थिति का पता चला to उसने किसानों को बीज बैल आदि खरीदने हेतु तथा कुए व नहरों को खुदवाने हेतु 2 करोड़ tanka तकाबी के रूप में (कृषि ऋण) दिया. परंतु जनता ने इसका उपयोग क्षुधा पूर्ति हेतु किया. Mt स्वयं अकाल पीड़ितों की सहायता हेतु गंगा किनारे स्वर्ण गिरी नमक शिविर me ढाई वर्ष तक रहा और अकाल संहिता की रचना करवाई. परंतु इन सब कार्यों का प्रजा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और MBT जनता में अप्रिय हो गया. 6. दीवान- ए – कोही की स्थापना – यह विभाग MBT द्वारा स्थापित किया गया कृषि विभाग था. जिसका प्रमुख अमीर-ए-कॊही कहलाता था. इस विभाग की स्थापना का उद्देश्य कृषि भूमि का विस्तार करना तथा उत्पादन में वृद्धि करना था. इस योजना के तहत सुल्तान ने दिल्ली के आस पास का 60 वर्ग मील का प्रदेश चुना और यह सारी भूमि किसानों को जोट्ने के लिए दी गयी. किसानो को खाद बीज खरीदने के लिए 70 लाख tanke का ऋण दिया gay तथा कुछ अधिकारियों की नियुक्ति vaha kia गयी. Bnjar भूमि का चयन करने, अधिकारियों व किसानों द्वारा सहयोग na karne के कारण यह योजना भी असफल रही.

योजनाओं के असफलता का परिणाम. – 1. सुल्तान अपनी प्रजा में अलोकप्रिय हुआ. 2. योजनाओं की असफलता का लाभ उठा कर साम्राज्य के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में विद्रोह हुए. जिनमें से कुछ का दमन तो सुल्तान ने किया परन्तु अंततः उत्तर में बंगाल, दक्षिण में विजयनगर (1336- हरिहर बुक्का), बहमनी (1347 हसन गंगू) जैसे स्वतंत्र राज्य स्थापित हो गए. 3. सल्तनत काल का सर्वाधिक साम्राज्य विस्तार MBT के समय हुआ परन्तु सर्वाधिक विघटन भी MBT के समय ही प्रारंभ हुआ. 4.राजकोष पूर्णतया खाली हो गया. 5. राज्य की आर्थिक v राजनीतिक स्थिति दुर्बल हुई, और आगे चलकर तुगलक वंश के पतन का कारण बना.


MBT का साम्राज्य विस्तार - . MBT के समय दिल्ली सल्तनत का सर्वाधिक विस्तार हुआ. इसामी के अनुसार मंगोलों के वापस जाने के बाद MBT ने पेशावर और कलानूर को जीतकर अपना आधिपत्य स्थापित किया.

. उसने 1337 में एक हिन्दू राज्य नगरकोट को जीता, परन्तु वहाँ के शासक द्वारा अधीनता स्वीकार कर लेने पर उसे ही पुनः शासक नियुक्त किया.

. MBT ने अपनी उत्तरी सीमा को सुरक्षित करने के लिए खुसरो मलिक के नेतृत्व में कराचिल सेना भेजी. जिसमें इसकी विजय हुई. परन्तु जितना लाभ हुआ, उससे कहीं ज्यादा हानि हो गयी.

. गयासुद्दीन के समय ही MBT तेलंगाना और पांड्य राज्य के अधिकांश भाग पर अधिकार कर चुका था. MBT ने अपने विद्रोही बहाउद्दीन गुर्शस्प को शरण देने के कारण काम्पिली राज्य पर आक्रमण किया. काम्पिली शासक ने गुर्शस्प को वीर बल्लाल के पास भेजा व स्वयं युद्ध करते हुए मारा गया. काम्पिली को दिल्ली राज्य में मिला लिया गया.

. होयसल राज्य के वीर बल्लाल ने गुर्शस्प की रक्षा करने का प्रयत्न किया. परन्तु असफल होने पर गुर्शस्प को दिल्ली सुल्तान को सौंप दिया और स्वयं उसकी अधीनता स्वीकार की. अतः MBT ने द्वार समुद्र के अधिकांश भाग को अपने राज्य में मिला लिया.

. MBT ने देवगिरी के निकट स्थित कोंढ़न (सिंहगढ़) राज्य को नागनायक से छीना और यह MBT की नवीन विजय थी.

. राजस्थान में MBT को सफलता नहीं मिली. मेवाड़ शासक हममीर के विरुद्ध उसके द्वारा सेना भेजी गई परन्तु यह आक्रमण विफल रहा. तत्पश्चात उसने राजस्थान में हस्तक्षेप नहीं किया.

  R. C. मजूमदार के अनुसार कश्मीर, उड़ीसा राजस्थान व मालाबार तट को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में सुल्तान की सत्ता स्वीकार की जाती थी, परंतु यह सफलता स्थाई नहीं थी. 10 वर्षों के पश्चात ही इतने विस्तृत साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया.


MBT के समय विद्रोह और साम्राज्य का विघटन - . MBT के समय में सबसे अधिक लगभग 34 विद्रोह सल्तनत काल में हुए जिनमें से 27 विद्रोह दक्षिण भारत में हुए. 1. 1326-27 में सागर के जागीरदार बहाउद्दीन गुर्शास्प ने विद्रोह किया जिसे कम्पिली के हिंदू शासक ने शरण दी. कम्पिली शासक ने गुर्शास्प को वीर बल्लाल को सौंपा तथा खुद मारा गया . वीर बल्लाल ने गुर्शास्प को MBT को सौंप कर स्वयं सुल्तान की अधीनता स्वीकार की. बहाउद्दीन गुर्शास्प के समय MBT ने क्रूरता का परिचय दिया और उसकी खाल में भूसा भरवा कर उसका प्रदर्शन किया और उसके माँस को चावल में पका कर उसकी पत्नि व बच्चों को खाने को मजबूर किया.

2. 1327 में उच्छ व मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा( किचलू खाँ) ने विद्रोह किया. यह विद्रोह सुल्तान के दौलताबाद राजधानी परिवर्तन के विरोध में हुआ. सुल्तान स्वयं इस विद्रोह को दबाने के लिए गया तथा किचलू खाँ का कत्ल कर दिया गया.

3. 1327-28 में MBT द्वारा कैद से छोड़े गए गयासुद्दीन बहादुर ने जिसे तुगलक ने सोनार गाँव की जागीर दी थी विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह का दमन बहराम खाँ ने किया. बहराम खाँ की मृत्यु के बाद विभिन्न सरदारों में बंगाल को लेकर विवाद हुआ. उन्हीं में से एक सरदार अली मुबारक ने लखनौती पर अधिकार कर सुल्तान अलाउद्दीन के नाम से स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित किया. मलिक हाजी इलियास नामक एक अन्य सरदार ने सुल्तान अलाउद्दीन का कत्ल करके शमसुद्दीन के नाम से स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित किया और इस समय बंगाल दिल्ली के हाथ से हमेशा के लिए निकल गया.

4. सुमन समाना और अवध में हुए विद्रोहों का भी दमन कर दिया गया 5. 1334- 35 में मालाबार के सूबेदार अहसन शाह ने विद्रोह किया गया और अंततः मदुरै स्वतंत्र राज्य बन गया. 6. 1336 में विजयनगर व 1347 में बहमनी में स्वतंत्र राज्य की नींव रखी गई.

इस तरह जिस सल्तनत का MBT के समय सर्वाधिक विस्तार हुआ उसका तीव्र गति से विघटन भी हो गया.


MBT की मृत्यु - . गुजरात में विदेशी मुसलमानों के विद्रोह का दमन करने पर उसे सिंध में विद्रोह की सूचना मिलती है, जिसे दबाने के लिए वह सिंध जाता है, परन्तु मार्ग में थट्टा के पास ही MBT की मृत्यु हो जाती है. और बदायूंनी कहता है कि, "इस तरह प्रजा को राजा से और राजा को प्रजा से मुक्ति मिल जाती है." . MBT अपने शासन के अंत में हताश होकर कहता है कि, "मेरा साम्राज्य रुग्ण हो गया है और अब यह किसी भी उपचार से ठीक नहीं हो सकता." . बलबन की भाँति MBT का राजत्व सिद्धांत दैवीय सिद्धांत पर आधारित था, और उसी भाँति MBT ने भी स्वयं को "जिल्ले इलाही" (ईश्वर की छाया या प्रतिछाया) कहा तथा अपने सिक्कों पर "अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह" ( जिसका ईश्वर समर्थक हो) अंकित कराया. . एलफिन्स्टन का मानना है कि, "MBT में पागलपन का अंश विद्यमान था." हेवेल व स्मिथ ने भी इस कथन का समर्थन किया है. . A. L. श्रीवास्तव के अनुसार, "MBT विरोधी तत्वों का मिश्रण था." . MBT को अभागा आदर्शवादी भी कहा जाता है. एडवर्ड थॉमस ने MBT को धनवानों का राजकुमार कहा. . MBT ने दास प्रथा को प्रश्रय नहीं दिया . MBT ने "सोने का सिक्का-दीनार" व "चाँदी का सिक्का- अदली" भी चलाया. . MBT ने दक्षिण में 100 गांवों पर एक अमीर ए सादा की नियुक्ति की. . MBT ने उश्र व जकात को छोड़कर सभी कर लेना बंद कर दिया. . अवध के सूबेदार "आइन-उल-मुल्क-मुल्तानी" का विद्रोह MBT के समय सबसे भयंकर विद्रोह माना जाता है जिसका दमन कर दिया गया. मुल्तानी ने "इंशा-ए-महरु" नाम से पुस्तक भी लिखी जिसमे फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल की जानकारी मिलती है.

फिरोजशाह तुगलक (1351-88)- . MBT का चचेरा भाई FST, गयासुद्दीन तुगलक के भाई रज्जब का पुत्र था. . FST MBT की मृत्यु के समय थट्टा में उसके साथ था. अतः थट्टा में ही उलेमा वर्ग ने FST को शासन सौंप दिया. . इतिहासकार कहते हैं कि FST स्वयं सिंहासन पर बैठने के लिए उत्सुक नहीं था, वरन् सरदारों के कहने पर उसने सिंहासन स्वीकार किया. . अन्य इतिहासकारों का मत है कि प्रभावशाली उलेमा वर्ग जो कि MBT से असंतुष्ट थे, FST उनका समर्थक था. और चतुराई से उनका समर्थन प्राप्त करता रहा ताकि सत्ता उसे प्राप्त हो सके. . बदायूंनी के अनुसार MBT का एक पुत्र था जिसका FST ने अमीरों की सहायता से कत्ल करवाकर स्वयं सिंहासन पर अधिकार किया. . FST के सिंहासन पर बैठने के बाद खुदाबन्दजादा ने अपने पुत्र दाबर मलिक को सिंहासन पर बिठाने की मांग की जिसे अमीर वर्ग ने अस्वीकृत कर दिया. . दिल्ली में MBT के वजीर ख्वाजा जहां ने एक बच्चे को MBT का पुत्र घोषित किया परंतु अमीर वर्ग ने उसे MBT का पुत्र मानने से इंकार कर दिया.


FST के उद्देश्य - . FST ने साम्राज्य विस्तार की नीति ना अपनाकर साम्राज्य को संगठित करने की नीति अपनाई. अतः जो सूबे MBT के समय दिल्ली की अधीनता से मुक्त हो गए थे उन्हें दिल्ली के अधीन लाने का उसने कोई प्रयास नहीं किया. . FST का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक वर्ग को संतुष्ट करना था, तथा MBT से नाराज प्रत्येक वर्ग की सहानुभूति प्राप्त करना था. . FST दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जो व्यक्तिगत रूप से धर्मांध होने के साथ साथ प्रशासनिक नीतियों में भी पूरी तरह से शरा या मुस्लिम कानूनों का अनुसरण करने का प्रयास करता था. अतः उसके समय राजनीति में उलेमा वर्ग का वर्चस्व रहा. . FST ने स्वयं को "खलीफा का नाईब" पुकारा तथा दो बार खलीफा से खिल्लत प्राप्त की. . उसने अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित करवाया, अतः खलीफा ने उसे "सैयद-उस-सलातीन" की उपाधि दी. . FST ने खुतबे (शुक्रवार की नमाज से पहले अपने से पूर्व के सभी शासकों का नाम पढ़वाना) में मुबारक शाह खिलजी को छोड़कर शेष सभी सल्तनत कालीन सुल्तानों का नाम अंकित कराया.


FST के आर्थिक सुधार

. FST ने सर्व प्रथम यह पता लगाने का प्रयास किया कि सरकार को विभिन्न करों से कितनी आय होती है और इस कार्य हेतु उसने ख्वाजा हिसामुद्दीन जुनैदी को नियुक्त किया. उसने 6 वर्षों तक प्रांतों का दौरा करके और स्थानीय राजस्व अभिलेखों की जांच कर उनके आधार पर सरकार की वार्षिक आय 6 करोड़ 85 लाख टंका निर्धारित की. FST के सम्पूर्ण काल में राज्य को लगभग इतनी ही आय प्राप्त होती रही.

कर प्रणाली का पुनर्गठन - फिरोज ने अपने शासनकाल में वही कर लगाए जिन्हें एक मुस्लिम सुल्तान द्वारा अपनी जनता से वसूलने का अधिकार इस्लाम में दिया गया है. इसके अतिरिक्त अन्य करों को FST ने माफ़ कर दिया. फतुहात-ए-फिरोजशाही में ख़ुद FST ने लिखा है कि उसने 24 करों को माफ़ कर दिया. FST ने MBT द्वारा दिए गए तकाबी ऋणों को भी माफ़ कर दिया.

FST द्वारा लगाए गए कर. 1. खराज - खराज- गैर मुस्लिमों से लिया जाने वाला भूमिकर जो 1/3 से 1/2 तक तथा कहीं कहीं 1/5 भी होता था. 2. उश्र- मुस्लिमों द्वारा लिया जाने वाला भूमिकर 3. खुम्स - लूटा हुआ धन या गड़ा हुआ खजाने से प्राप्त धन मिलने पर -1/5 सुल्तान (राज्य) को, तथा 4/5 सैनिकों या खजाना ढूँढने वालों को, ( इसको MBT व अलाउद्दीन खिलजी ने उल्टा कर दिया - 4/5 भाग ख़ुद लिया व 1/5 सैनिकों को ). जबकि FST ने इस्लामी परम्परा के अनुसार 1/5 स्वयं लिया. सिकंदर लोदी ने गड़े हुए खजाने में अपना कोई हिस्सा नहीं लिया. 4. जजिया - गैर मुस्लिमों (जिमी) से लिया जाने वाला धार्मिक कर जो मुस्लिम इलाके में रहने पर लिया जाता था, जिसके बदले उनके जीवन व संपत्ति की सुरक्षा होती थी और वे सैनिक सेवा से मुक्त कर दिए जाते थे. . MBK जजिया लगाने वाला प्रथम सुल्तान था. . यह वृद्ध, महिला, ब्राह्मण वर्ग , विकलांग, विक्षिप्त, बच्चों से नहीं लिया जाता, परन्तु FST ऐसा प्रथम शासक था जिसने ब्राह्मणों से भी जजिया लिया. . लोगों की आर्थिक स्थिति के अनुसार जजिया की 3 वार्षिक दरें निर्धारित की गई थी. A.> उच्च वर्ग - 48 दिरहम वार्षिक B. > मध्यम वर्ग - 24 दिरहम वार्षिक C. > निम्न वर्ग - 12 दिरहम वार्षिक

5. जकात - सल्तनत काल में प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का 40वां भाग या 2.1/2 % जकात के रूप में सुल्तान को देना होता था. . जकात से प्राप्त आय को मुस्लिम जनता के हित में खर्च किया जाता था. Note. - संपत्ति की वह न्यूनतम मात्रा जिससे अधिक संपत्ति होने पर जकात देना पड़ता था निसाब कहलाती थी.

ऊपर्युक्त करों के अतिरिक्त FST ने उलेमा वर्ग से स्वीकृति लेकर एक सिंचाई कर भी लगाया जिसे हक्क-ए-शर्ब भी कहा जाता था. इसकी दर उपज का 1/10 होती थी. ये उन किसानों से लिया जाता था जो सिंचाई के लिए शाही नहरों का पानी प्रयोग में लेते थे.

. तरकात - यदि किसी व्यक्ति की बिना उत्तराधिकारी छोड़े मृत्यु हो जाती थी तो उसकी संपत्ति को मृत्यु के बाद राजकोष में मिला लिया जाता था जिसे तरकात कहते थे.

FST के राजस्व संबंधी सुधार लाभदायक हुए. इससे राजा व प्रजा दोनों को लाभ हुआ परन्तु उसकी राजस्व वसूलने की नीति ठेकेदारी या जागीरदारी प्रथा के समान थी जिससे किसानों की स्थिति कष्‍टदायक बनी रही.

नगर निर्माण व सार्वजनिक हित के कार्य -

  • फिरोज ने अपने समय में 300 नगरों का निर्माण कराया जिसमें फतेहाबाद, फिरोजाबाद फिरोजपुर, जौनपुर व हिसार प्रमुख हैं.

. फिरोज ने नवीन इमारतों के निर्माण के साथ साथ पुरानी ऐतिहासिक इमारतों की मरम्मत करवाई. उसने फुतुहात-ए-फिरोजशाही में दिल्ली की जामा मस्जिद, कुतुबमीनार, शम्सी तलाब, मदरसा आदि के मरम्मत करने की बात लिखी है.

  • FST ने दारुल-सफ़ा नामक एक सार्वजनिक अस्पताल का निर्माण करवाया जहाँ हिन्दू व मुसलमानों का निशुल्क इलाज किया जाता था.

. FST ने दीवान ए खैरात नाम से एक दान विभाग स्थापित किया जो मुस्लिम अनाथ स्त्रियों एवं विधवाओं को आर्थिक सहायता देता था तथा निर्धन मुस्लिम लड़कियों के निकाह की व्यवस्था करता था. . दीवान ए इजारत - यह एक प्रकार का सार्वजनिक निर्माण विभाग था. Note. - इसके अतिरिक्त FST ने रोजगार दफ्तर तथा खुश्क ए शिकार नामक विभाग भी स्थापित किया.

दास प्रथा - फिरोज को दास रखने में बड़ी रूचि थी अतः उसके दासों की संख्या एक लाख 80 हजार तक पहुंच गई. प्रत्येक दास को 10 से 100 टंके के बीच वेतन दिया जाता था. वह उन्हें व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करता था तथा उनके साथ पुत्रवत व्यवहार करता था. उसने दासों के व्यापार व निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था. दासों की देखभाल के लिए फिरोजशाह तुगलक ने एक पृथक विभाग दीवान-ए-बंदगान की स्‍थापना की. FST के ये दास राजकोष पर ना केवल अनावश्यक भार बन गए वरन् FST के बाद उसके दुर्बल उत्तराधिकारियों का लाभ उठा कर उन्होंने राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ किया जो तुगलक वंश के पतन का कारण बना.

सिंचाई व्यवस्था - . सर्वप्रथम नहर निर्माण का श्रेय गयासुद्दीन तुगलक को दिया जाता है जिसका विकास बाद में FST ने किया . FST ने सिंचाई हेतु अपने समय में 5 बड़ी नहरों का निर्माण करवाया. 1. यमुना से हिसार तक (यह सबसे लम्बी नहर है, लगभग 150 मील) trik यहि 2. सतलज से घग्घर ( trik 7 कली का घागरा 3. घग्घर से फिरोजाबाद (trik फिरोजा ने पहना 4. यमुना से फिरोजाबाद (trik यमुना में धोया 5. सिरमौर से हांसी (सिंहावलोकन

इसके अतिरिक्त राजवाही और उलूगख़ानी अन्य प्रमुख नहरें थी. . FST द्वारा निर्मित नहरों का विस्तृत उल्लेख याहिया बिन अहमद सरहिन्दी ने अपनी किताब तारीक-ए-मुबारकशाही में किया है. . FST ने एक अलग से नहर विभाग स्थापित करवाया जिसका अध्यक्ष "वाबदाजा" कहलाता था.

सैन्य सुधार (बिगाड़) . FST का सैनिक संगठन दुर्बल raha. उसके द्वारा सैन्य व्यवस्था me किए गए परिवर्तनों ने सैनिकों को अधिक दुर्बल बना दिया. जैसे - 1. उसने सैनिकों को नकद वेतन की बजाय जगीरें देना प्रारंभ किया फलस्वरुप जाहिर प्रथा का प्रसार हुआ. सैनिकों को वेतन के बदले जो जागिर di गयी उसे वजह कहते थे तथा जिन सैनिकों को जागिरें दी गयी वे वजहदार कहलाए. इसकी यह हानि हुई कि अब सैनिकों ने सैनिक कार्य की बजाय अपनी जागीरों के प्रबंधन में रुचि लेना प्रारंभ कर दिया. 2. FST ने सैनिक सेवा वंशानुगत कर दी. शम्स ए सिराज अफीक के अनुसार FST ने आदेश दिया कि, "कोई वृद्ध एवं अक्षम सैनिक अपने स्थान पर अपने एजेंट के रूप में अपने पुत्र, दामाद या गुलाम को सेवा में भेज सकता है."FST के इस आदेश से सेना में योग्य सैनिकों का अभाव हो गया. 3. उसने सैनिकों को पेंशन देना भी प्रारंभ किया अतः उसके सामय में सैनिक लगान लेने वाला व्यक्ति बन गया और उसके बच्चे सैनिक na रह कर पेंशन प्राप्त करने वाले कर्मचारी मात्र रह गए. . फिरोज अपनी आत्म कथा फूतुहाte firojshahi me लिखता है कि, "सर्व शक्तिमान अल्लाह जब अपने sewakon की अजीविका को वृद्धावस्था के कारण वापस नहीं लेता to मै खुदा का बंदा होने के नाते वृद्ध सैनिकों को पदchyut kese कर सकता हूं".

Uprukt कारणों से Fst का सैनिक संगठन durbal raha और वह केन्द्र में एक बड़ी स्थाई सेना नहीं takh सका . उसकी सेना में कठोर नियंत्रण व अनुशासन का अभाव था, इस बार का पता इससे चलता है कि," एक अवसर पर स्वयं सुल्तान ने एक सैनिक को एक टंका दिया और कहा कि इसे वह सैन्य विभाग के अधिकारी को देकर अपने घोड़े की स्वीकृति करा ले".

शिक्षा व संस्कृति - . FST ने जियाउद्दीन बारनी तथा शम्स ए सिराज अफीक को अपने दरबार में संरक्षण दिया. . बारनी ने उसके काल में फतवा ए जहाँदारी तथा तारीक ए फिरोजशाही की रचना की. FST ने स्वयं फुतुहाते फिरोजशाही की रचना की जो उसकी अपनी आत्म कथा थी. . Fst को इतिहास और चिकित्सा शास्त्र में रुचि थी. इसके अतिरिक्त उसने इस्लामी कानूनों और धर्मशास्त्रों की शिक्षा में भी रुचि दिखाई. उसने प्राय 13 madrase स्थापित किये जिनमे से 3 श्रेष्ठ स्तर के विद्यालय the. . उसने ज्वालामुखी मंदिर के पुस्तकालय से 1300 ग्रंथ मंगवाए तथा उनका फारसी में अनुवाद करवाया. उनमें से एक ग्रंथ जो दर्शन और नक्षत्र विज्ञान से संबंधित था उसे दलायले फिरोजशाही कहा गया. . फिरोज ने अशोक कालीन दो स्तंभ टोपरा व मेरठ से मंगवा कर दिल्ली में स्थापित करवाए. . इस प्रकार फिरोज ने शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की परंतु उसके समय का साहित्य इस्लाम धर्म से प्रभावित होने के कारण संकुचित धारणाओं से परिपूर्ण रहा.

धार्मिक नीति - FST दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने इस्लाम के कानूनों और उलेमा वर्ग को राज्य के शासन में प्रधानता दी. उलेमाओं की शक्ति MBT से लगातार बढ़ती जा रही थी परंतु fst के काल में उलेमाओं की शक्ति अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई. . फिरोज की धार्मिक नीति dharmandhta व असहिष्णुta की रही. उसने शिया व सूफी संतों आदि के प्रति असहिष्णुता की नीति अपनाई kyoki वे सुन्नी मत के समर्थक नहीं थे. . वह अपनी बहुसंख्यक हिंदू प्रजा के प्रति अत्यधिक कठोर था. उसने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर और उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त किया, ताकि उसे महमूद gajnavi की भाँति मूर्ति भंजक कहलाने का यश प्राप्त हो सके. R.C. मजूमदार ने लिखा है कि, "फिरोज इस युग का सर्वाधिक धर्मांध और इस क्षेत्र में सिकंदर लोदी तथा औरंगजेब का अग्रगामी था. . फिरोज की धर्मांधता की नीति राज्य के लिए हानिकारक और सैद्धान्तिक आधार पर प्रतिक्रियावादी थी. . बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा उससे असंतुष्ट थी और अलाउद्दीन तथा MBT के समय में अरंभ की गयी धर्म और राज्य को पृथक करने की नीति भी इसके समय विफल हो गयी.

फिरोज व साम्राज्य विस्तार - . फिरोज ने साम्राज्य विस्तार की नीति na अपनाकर राज्य के संघठन की नीति को अपनाया. . फिरोज ने बंगाल पर दो बार आक्रमण किया. . प्रथम आक्रमण 1353 में हाजी इलियास के समय किया गया. इलियास ने इकदला के किले में शरण ली. कुछ समय बाद फिरोज ने स्वयं ही युद्ध बंद कर संधि कर ली. . 1359 में फिरोज ने बंगाल पर पुनः आक्रमण किया. इस समय बंगाल का शासक इलियास का पुत्र सिकंदर था. यह आक्रमण भी विफल रहा. . 1360 में fst ने जाजनगर उड़ीसा पर आक्रमण कर जगन्नाथ पुरी के मंदिर को ध्वस्त किया. उड़ीसा का शासक भानुदेव तृतीय भाग गया. . 1361 में फिरोज ने नगरकोट पर आक्रमण किया. इस आक्रमण का उद्देश्य ज्वालामुखी मंदिर को ध्वस्त करना था. . 1362 में फिरोज ने सिंध अभियान छेड़ा. सिंध के शासक जाम बाबनिया ने उसका मुकाबला किया. अंततः बाबनिया ने fst के आधिपत्य को स्वीकार कर उसे वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया.

मृत्यु - . फिरोज ने अपने पुत्र मोहम्मद खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जिसने 1387 में सुल्तान के रहते हुए नासीरुद्दीन मोहम्मद शाह की उपाधि धारण कि और शासन संभाला. नासिरुद्दीन की विलास प्रियता व शासन के प्रति उदासीनता से अमीर वर्ग असंतुष्ट रहा. अतः फिरोज ने अपने पौत्र तुगलकशाह(smo फतेह खां) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया. . कुछ समय पश्चात 1288 में dat की मृत्यु हो गई.

अन्य बिन्दु

.इतलाक़ - fst राजकीय सिपाहियों को राज्य के राजस्व अधिकारियों से अपना वेतन प्राप्त करने के लिए एक हुण्डी (हवाला) देता था जिसे इतलाक़ कहते थे. . Fst सल्तनत काल का द्वितीय शासक था जिसने बहराइच के संत सालार मसूद गाजी के मक़बरे की यात्रा की (1st MBT). . इलियट व एल finstan ने fst को सल्तनत युग का अकबर कहा. . फिरोज को मध्यकालीन भारत का कल्याणकारी निरंकुश शासक कहा जाता था. सिक्के - 1. शंसगनी =6 जीतल 2. चीहल /हस्तगानी = 8 जीतल . शंसगनी के आधे मूल्य का सिक्का दोगानी कहलाता था जिसका मूल्य 3 जीतल था. . अफीक के अनुसार फिरोज ने अद्धा व बिख नामक सिक्के चलाए, ये जीतल के क्रमशः आधे व चौथाई होते थे. . फिरोज का वजीर मलिक मकबूल था जिसे उसने खान ए जहाँ (खां ए जहां तेलंगानी) की उपाधि दी थी. यह तेलंगाना का ब्राह्मण था जिसने इस्लाम कबूल कर लिया था. फिरोज ने हौजखास में खान ए जहां तेलंगानी का माकबारा बनवाया . इस मकबरे को यह विशेषता थी कि यह दिल्ली में निर्मित प्रथम अष्टभुजाकार मकबरा था.

शासकों के नाम[संपादित करें]

  1. गयासुद्दीन तुग़लक़
  2. मुहम्मद बिन तुग़लक़
  3. फ़िरोज़ शाह तुग़लक़

इन तीनों योग्य शासकों के बाद कोई और शासक सही शासन न कर सके। इसके बाद तुग़लक़ वंश का पतन शुरू हो गया। इनके अलावा कुछ शासक और हुए जिनका नाम इस प्रकार है:-

तुग़लक़ वंश का पतन[संपादित करें]

तैमूर के आक्रमण से तथा उत्तराधिकारी के अभाव में यह वंश 1414 में समाप्त हो गया जिसके बाद सय्यद वंश का शासन आया।


दिल्ली सल्तनत के शासक वंश
ग़ुलाम वंश | ख़िलजी वंश | तुग़लक़ वंश | सैयद वंश | लोधी वंश | सूरी वंश