हेमचन्द्राचार्य

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आचार्य हेमचन्द्र महान गुरु, समाज-सुधारक, धर्माचार्य, गणितज्ञ एवं अद्भुत प्रतिभाशाली मनीषी थे। भारतीय चिंतन, साहित्य और साधना के क्षेत्रमें उनका नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। साहित्य, दर्शन, योग, व्याकरण, काव्यशास्त्र, वाड्मयके सभी अंड्गो पर नवीन साहित्यकी सृष्टि तथा नये पंथको आलोकित किया। संस्कृत एवं प्राकृत पर उनका समान अधिकार था।

संस्कृत के मध्यकालीन कोशकारों में हेमचंद्र का नाम विशेष महत्व रखता है । वे महापंडित थे और 'कालिकालसर्वज्ञ' कहे जाते थे । वे कवि थे, काव्यशास्त्र के आचार्य थे, योगशास्त्रमर्मज्ञ थे, जैनधर्म और दर्शन के प्रकांड विद्वान् थे, टीकाकार थे और महान् कोशकार भी थे । वे जहाँ एक ओर नानाशास्त्रपारंगत आचार्य थे वहीं दूसरी ओर नाना भाषाओं के मर्मज्ञ, उनके व्याकरणकार एवं अनेकभाषाकोशकार भी थे ।

समस्त गुर्जरभूमिको अहिंसामय बना दिया। आचार्य हेमचंद्र को पाकर गुजरात अज्ञान, धार्मिक रुढियों एवं अंधविश्र्वासों से मुक्त हो कीर्ति का कैलास एवं धर्मका महान केन्द्र बन गया। अनुकूल परिस्थिति में कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्र सर्वजनहिताय एवं सर्वापदेशाय पृथ्वी पर अवतरित हुए। १२वीं शताब्दी में पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, वलभी, उज्जयिनी, काशी इत्यादि समृद्धिशाली नगरों की उदात्त स्वर्णिम परम्परामें गुजरात के अणहिलपुर ने भी गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

जीवनवृत तथा रचनाएं[संपादित करें]

संस्कृत कवियोंका जीवनचरित्र लिखना कठिन समस्या है। सौभाग्यकी बात है कि आचार्य हेमचंद्रके विषयमें यत्र-तत्र पर्याप्त तथ्य उपलब्ध है। प्रसिद्ध राजा सिद्धराज जयसिंह एवं कुमारपाल राजा के धर्मोपदेशक होने के कारण ऐतिहासिक लेखकों ने आचार्य हेमचंद्र के जीवन चरित्र पर अपना अभिमत प्रकट किया है।

आचार्य हेमचंद्रका जन्म गुजरातमें अहमदाबाद से १०० किलोमिटर दूर दक्षिण-पश्र्विम स्थित धंधुका नगरमें विक्रम सवंत ११४५के कार्तिकी पुर्णिमा की रात्रि में हुआ था। मातापिता शिवपार्वती उपासक मोढ वंशीय वैश्य थे। पिताका नाम चाचिंग अथवा चाच और माताका नाम पाहिणी देवी था। बालकका नाम चांगदेव रखा। माता पाहिणी ओर मामा नेमिनाथ दोनों ही जैन थे। आचार्य हेमचंद्र बहुत बडे आचार्य थे अतः उनकी माताको उच्चासन मिलता था। सम्भव है, माताने बाद में जैन धर्मकी दीक्षा ले ली हो। बालक चांगदेव जब गर्भ में था तब माताने आर्श्र्वजनक स्वप्न देखे थे। ईसपर आचार्य देवचंद्र गुरुने स्वप्नका विश्लेषण करते कहा सुलक्षण सम्पन्न पुत्र होगा जो दीक्षा लेगा। जैन सिद्धांतका सर्वत्र प्रचार प्रसार करेगा।

बाल्यकालसे चांगदेव दीक्षाके लिये दढ था। खम्भांत में जैन संघकी अनुमतिसे उदयन मंत्रीके सहयोगसे नव वर्षकी आयुमें दीक्षा संस्कार विक्रम सवंत ११५४में माघ शुक्ल चतुर्दशी शनिवारको हुआ। और उनका नाम सोमचंद्र रखा गया। शरीर सुवर्ण समान तेजस्वी एवं चंद्रमा समान सुंदर था। ईसलिये वे हेमचंद्र कहलाये।

अल्पआयुमे शास्त्रोमें तथा व्यावहारिक ज्ञानमें निपुण हो गये। २१ वर्षकी अवस्थामें समस्त शास्त्रोकां मंथन कर ज्ञान वृद्धि की। नागपुर (नागौर, मारवाड)के धनद व्यापारीने विक्रम सवंत ११६६में सूरिपद प्रदान महोत्सव सम्पन्न किया। आचार्यने साहित्य और समाज सेवा करना आरम्भ किया। प्रभावकचरित अनुसार माता पाहिणी देवीने जैन धर्मकी दीक्षा ग्रहण की। अभयदेवसूरिके शिष्य प्रकांड गुरुश्री देवचंद्रसूरि हेमचंद्रके दीक्षागुरु, शिक्षागुरु या विद्यागुरु थे।

वृद्वावस्थामें हेमचंद्रसूरीको को लूता रोग लग गया। अष्टांगयोगाभ्यास द्वारा उन्होंने रोग नष्ट किया। ८४ वर्षकी अवस्थामें अनशनपूर्वक अन्त्याराधन क्रिया आरम्भ की। विक्रम सवंत १२२९मे महापंडितोकी प्रथम पक्ड्तिके पंडितने देहिक लीला समाप्त की। समाधिस्थल शत्रुज्जंय महातीर्थ पहाड स्थित है। प्रभावकचरितके अनुसार राजा कुमारपालको आचार्यका वियोग असह्य रहा और छः मास पश्चात स्वर्ग सिधार गया।

हेमचंद्र अद्वितीय विद्वान थे। साहित्यके सम्पूर्ण इतिहासमें किसी दुसरे ग्रंथकारकी इतनी अधिक और विविध विषयोंकी रचनाएं उपलब्ध नहीं है। व्याकरण शास्त्रके ईतिहासमें हेमचंद्रका नाम सुवर्णाक्षरोंसे लिखा जाता है। संस्कृत शब्दानुशासनके अन्तिम रचयिता है। इनके साथ उत्तरभारतमें संस्कृतके उत्कृष्ट मौलिक ग्रंथोका रचनाकाल समाप्त हो जाता है।

गुजराती कविता है, 'हेम प्रदीप प्रगटावी सरस्वतीनो सार्थक्य कीधुं निज नामनुं सिद्धराजे'। अर्थात सिद्धराजने सरस्वतीका हेम प्रदीप जलाकर (सुवर्ण दीपक अथवा हेमचंद्र) अपना 'सिद्ध'नाम सार्थक कर दिया। हेमचंद्रका कहना था स्वतंत्र आत्माके आश्रित ज्ञान ही प्रत्यक्ष है

हेमचंद्रके काव्य-ग्रंथ[संपादित करें]

आचार्य हेमचंद्रने अनेक विषयोंपर विविध प्रकारके काव्य रचे है। अश्वघोषके समान हेमचंद्र सोद्देष्य काव्य रचनामें विश्वास रखते थे। इनका काव्य 'काव्यमानन्दाय' न होकर 'काव्यम् धर्मप्रचारय' है। अश्वघोष और कालिदासके सहज एवम् सरल शैली जैसी शैली नहीं थी किन्तु उनकी कविताओमें ह्रदय और मस्तिष्कका अपूर्व मिश्रण था। आचार्य हेमचंद्रके काव्यमें संस्कृत बृहत्त्रयीके पाण्डित्यपूर्ण चमत्कृत शैली है, भट्ठिके अनुसार व्याकरणका विवेचन, अश्वघोषके अनुसार धर्मप्रचार एवम् कलहणके अनुसार इतिहास है। आचार्य हेमचंद्रका पण्डित कवियोंमें मूर्धन्य स्थान है। 'त्रिषष्ढिशलाकापुरुश चरित' एक पुराण काव्य है। संस्कृतस्तोत्र साहित्यमें 'वीतरागस्तोत्र' का महत्वपूर्ण स्थान है। व्याकरण, इतिहास और काव्यका तीनोंका वाहक द्ववाश्रय काव्य अपूर्व है। इस धर्माचार्यको साहित्य-सम्राट कहनेमें अत्युक्ति नहीं है।

व्याकरण ग्रंथ[संपादित करें]

पाणिनीने संस्कृत व्याकरणमें शाकटायन, शौनक, स्फोटायन, आपिशलि का उल्लेख किया। पाणिनी के 'अष्टाध्यायी' में शोधन कात्यायन और भाष्यकर पतञ्जलि किया। पुनरुद्वार भोजदेवके 'सरस्वती कंठाभरण' में हुआ।

हेमचंद्रकी व्याकरण रचनाएं[संपादित करें]

आचार्य हेमचंद्रने समस्त व्याकरण वांड्मयका अनुशीलन कर 'शब्दानुशासन' एवं अन्य व्याकरण ग्रंथोकी रचना की। पूर्ववतो आचार्योंके ग्रंथोका सम्यक अध्ययन कर सर्वांड्ग परिपूर्ण उपयोगी एवं सरल व्याकरणकी ‍रचना कर संस्कृत और प्राकृत दोनों ही भाषाओंको पूर्णतया अनुशासित किया है।

हेमचंद्रने 'सिद्वहेम' नामक नूतन पंचांग व्याकरण तैयार किया। इस व्याकरण ग्रंथका श्वेतछत्र सुषोभीत दो चामरके साथ चल समारोह हाथी पर निकाला गया। ३०० लेखकोंने ३०० प्रतियाँ 'शब्दानुशासन'की लिखकर भिन्न-भिन्न धर्माध्यक्षोंको भेट देने के अतिरिक्त देश-विदेश, ईरान, सीलोन, नेपाल भेजी गयी। २० प्रतियाँ काश्मीरके सरस्वती भाण्डारमें पहुंची। ज्ञानपंचमी (कार्तिक सुदि पंचमी)के दिन परीक्षा ली जाती थी।

आचार्य हेमचंद्र संस्कृत के अन्तिम महावैयाकरण थे। अपभ्रंश साहित्यकी प्राचीन समृद्वि के सम्बधमें विद्वान उन पधोंके स्तोत्रकी खोजमें लग गये। १८००० श्लोक प्रमाण बृहदवृत्ति पर भाष्य कतिचिद दुर्गापदख्या व्याख्या लिखी गयी। इस भाष्यकी हस्त लिखित प्रति बर्लिन में है।

अलंकार ग्रंथ[संपादित करें]

हेमचंद्रके अलंकार ग्रंथ[संपादित करें]

काव्यानुशासन ने उन्हें उच्चकोटि के काव्यशास्त्रकारों की श्रेणी में प्रतिष्ठित किया। पूर्वाचार्यो से बहुत कछ लेकर परवर्ती विचारकों को चिंतन के लिए विपुल सामग्री प्रदान की। काव्यानुशासन का - सूत्र, व्याख्या और सोदाहरण वृत्ति ऐसे तीन प्रमुख भाग है। सूत्रो की व्याख्या करने वाली व्याख्या 'अलंकारचूडामणि' नाम प्रचलित है। और स्पष्ट करने के लिए 'विवेक' नामक वृति लिखी गयी।

'काव्यानुशासन' ८ अध्यायों में विभाजित २०८ सूत्रो में काव्यशास्त्र के सारे विषयों का प्रतिपादन किया गया है। 'अलंकारचूडामणि' में ८०७ उदाहरण प्रस्तुत है तथा 'विवेक'में ८२५ उदाहरण प्रस्तुत है। ५० कवियों के तथा ८१ ग्रंथो के नामोका उल्लेख है।

'काव्यानुशासन' का विवेचन : सम्पूर्ण एवमं सर्वोत्कृष्ठ पाठ्यपुस्तक[संपादित करें]

काव्यानुशासन प्रायः संग्रह ग्रंथ है। राजशेखरके 'काव्यमीमांसा', मम्मटके 'काव्यप्रकाश', आनंदवर्धन के 'ध्वन्यालोक', अभिनव गुप्तके 'लोचन' से पर्याप्त मात्रामें सामग्री ग्रहण की है।

मौलिकता के विषयमें हेमचंद्रका अपना स्वतंत्र मत है। हेमचंद्र मतसे कोई भी ग्रंथकार नयी चीज नहीं लिखता। यद्यपि मम्मटका 'काव्यप्रकाश' के साथ हेमचंद्रका 'काव्यानुशासन' का बहुत साम्य है। पर्याप्त स्थानों पर हेमचंद्राचार्यने मम्मटका विरोध किया है। हेमचंद्राचार्यके अनुसार आनंद, यश एव कान्तातुल्य उपदेश ही काव्यके प्रयोजन हो सकते है तथा अर्थलाभ, व्यवहार ज्ञान एवं अनिष्ट निवृत्ति हेमचंद्रके मतानुसार काव्यके प्रयोजन नहीं है।

'काव्यानुशासन से काव्यशास्र के पाठकों कों समजने में सुलभता, सुगमता होती है। मम्मटका 'काव्यप्रकाश' विस्तृत है, सुव्यवस्थित है, सुगम नहीं है। अगणित टीकाएं होने पर भी मम्मटका 'काव्यप्रकाश' दुर्गम रह जाता है। 'काव्यानुशासन' में इस दुर्गमता को 'अलंकारचुडामणि' एवं 'विवेक' के द्वारा सुगमता में परिणत किया गया है।

'काव्यानुशासन' में स्पष्ट लिखते है कि वे अपना मत निर्धारण अभिनवगुप्त एवं भरत के आधार पर कर रहे हैं। सचमुच अन्य ग्रंथो-ग्रंथकारो के उद्वरण प्रस्तुत करते हेमचंद्र अपना स्वयं का स्वतंत्र मत, शैली, दष्टिकोणसे मौलिक है। ग्रंथ एवं ग्रंथकारों के नाम से संस्कृत-साहित्य, इतिहास पर प्रकाश पडता है। सभी स्तर के पाठक के लिए सर्वोत्कृष्ठ पाठ्यपुस्तक है। विशेष ज्ञानवृद्वि का अवसर दिया है। अतः आचार्य हेमचंद्र के 'काव्यानुशासन' का अध्ययन करने के पश्चात फिर दुसरा ग्रंथ पढने की जरुरत नहीं रहती।[तथ्य वांछित] सम्पूर्ण काव्य-शास्त्र पर सुव्यवस्थित तथा सुरचित प्रबंध है।

कोशग्रंथ[संपादित करें]

संस्कृत में अनेक कोशों की रचना के साथ साथ प्राकृत—अपभ्रंश—कोश भी (देशीनाममाला) उन्होंने संपादित किया । अभिधानचिंतामणि (या 'अभिधानचिंतामणिनाममाला' इनका प्रसिद्ध पर्यायवाची कोश है । छह कांडों के इस कोश का प्रथम कांड केवल जैन देवों और जैनमतीय या धार्मिक शब्दों से संबंद्ध है । देव, मर्त्य, भूमि या तिर्यक, नारक और सामान्य—शेष पाँच कांड हैं । 'लिंगानुशासन' पृथक् ग्रंथ ही है । 'अभिधानचिंतामणि' पर उनकी स्वविरचित 'यशोविजय' टीका है—जिसके अतिरिक्त, व्युत्पत्तिरत्नाकर' (देवसागकरणि) और 'सारोद्धार' (वल्लभगणि) प्रसिद्ध टीकाएँ है । इसमें नाना छंदों में १५४२ श्लोक है । दूसरा कोश 'अनेकार्थसंग्रह' (श्लो० सं० १८२९) है जो छह कांडों में है । एकाक्षर, द्वयक्षर, त्र्यक्षर आदि के क्रम से कांडयोजन है । अंत में परिशिष्टत कांड अव्ययों से संबंद्ध है । प्रत्येक कांड में दो प्रकार की शब्दक्रमयोजनाएँ हैं—(१) प्रथमाक्षरानुसारी और (२) 'अंतिमंक्षरानुसारी'। 'देशीनाममाला' प्राकृत का (और अंशतः अपभ्रंश का भी) शब्दकोश है जिसका आधार 'पाइयलच्छी' नाममाला है'।

दार्शनिक एवं धार्मिक ग्रंथ[संपादित करें]

प्रमाणमीमांसा[संपादित करें]

सामान्यतः जैन और हिन्दु धर्म में कोई विशेष अंतर नहीं है। जैन धर्म वैदिक कर्म - काण्ड के प्रतीबंध एवं उस के हिंसा संबंधी विधानोकों स्वीकार नहीं करता। आचार्य हेमचंद्र के दर्शन ग्रंथ 'प्रमाणमीमांसा' का विशिष्ट स्थान है। हेमचंद्र के अंतिम अपूर्ण ग्रंथ प्रमाणमीमांसा का प्रज्ञाचक्षु पंडित सुखलालजी द्वारा संपादान हुआ। सूत्र शैली का ग्रंथ कणाद या अक्षपाद के समान है। दुर्भाग्य से इस समय तक १०० सूत्र ही उपलब्ध है। संभवतः वृद्वावस्था में इस ग्रंथ को पूर्ण नहीं कर सके अथवा शेष भाग काल कवलित होने का कलंक शिष्यों को लगा। हेमचंद्र के अनुसार प्रमाण दो ही है। प्रत्यक्ष ओर परोक्ष। जो एक दुसरे से बिलकुल अलग है। स्वतंत्र आत्मा के आश्रित ज्ञान ही प्रत्यक्ष है। आचार्य के ये विचार तत्वचिंतन में मौलिक है। हेमचंद्र ने तर्क शास्त्रमें कथा का एक वादात्मक रुप ही स्थिर किया। जिस में छ्ल आदि किसी भी कपट-व्यवहार का प्रयोग वर्ज्य है। हेमचंद्र के अनुसार इंद्रियजन्म, मतिज्ञान और परमार्थिक केवलज्ञान में सत्य की मात्रा में अंतर है, योग्यता अथवा गुण में नहीं। प्रमाणमीमांसा से संपूर्ण भारतीय दर्शन शास्त्र के गौरव में वृद्वि हुई।

योगशास्त्र[संपादित करें]

ईसकी शैली पतञ्जलि के योगसूत्र के अनुसार ही है। किंतु विषय और वर्णन क्रम में मौलिकता एवं भिन्नता है। योगशास्त्र नीति विषयक उपदेशात्मक काव्य की कोटि में आता है। योगशास्त्र जैन संप्रदाय का धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथ है। वह अध्यात्मोपनिषद् है। इसके अंतर्गत मदिरा दोष, मांस दोष, नवनीत भक्षण दोष, मधु दोष, उदुम्बर दोष, रात्रि भोजन दोष का वर्णन है। अंतिम १२ वें प्रकाश के प्रारम्भ में श्रुत समुद्र और गुरु के मुखसे जो कुछ मैं ने जाना है उसका वर्णन कर चुका हुं, अब निर्मल अनुभव सिद्व तत्वको प्रकाशित करता हुं ऐसा निदेश कर के विक्षिप्त, यातायात, इन चित-भेंदो के स्वरुपका कथन करते बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा का स्वरुप कहा गया है।

  • सदाचार ही ईश्र्वर प्रणिधान नियम है।
  • निर्मल चित ही मनुष्य का धर्म है।
  • संवेदन ही मोक्ष है जिसके सामने सुख कुछ नहीं है ऐसा प्रतीत होता है।

संवेदन के लिये पातच्जल योगसूत्र तथा हेमचंद्र योगशास्त्र में पर्याप्त साम्य है। योग से शरीर और मन शुद्व होता है। योग का अर्थ चित्रवृतिका निरोध। मन को सबल बनाने के लिये शरीर सबल बनाना अत्यावश्यक है। योगसूत्र और योगशास्त्र में अत्यंत सात्विक आहार की उपादेयता बतलाकर अभक्ष्य भक्षणका निषेध किया गया है। आचार्य हेमचंद्र सब से प्रथम 'नमो अरि हन्ताणं' से राग -द्वेषादि आन्तरिक शत्रुओं का नाश करने वाले को नमस्कार कहा है। योगसूत्र तथा योगशास्त्र पास-पास है। संसार के सभी वाद, संप्रदाय, मत, द्दष्टिराग के परिणाम है। द्दष्टिराग के कारण अशांति और दु:ख है। अतः विश्वशांति के लिये, द्दष्टिराग उच्छेदन के लिये हेमचंद्रका योगशास्त्र आज भी अत्यंत उपादेय ग्रंथ है।

भारतीय साहित्यको हेमचंद्रकी देन[संपादित करें]

संस्कृत सहित्यका आरंभ सुदूर वैदिक काल से होता है। जैन साहित्य अधिकांशत: प्राकृत में था। 'चतुर्धपूर्व' और 'एकादश अंग' ग्रंथ संस्कृत में थे। ये पूर्व ग्रंथ लुप्त हो गये। जैन धर्म श्रमण प्रधान है। आचरण प्रमुख है।

अन्य साहित्य[संपादित करें]

संस्कृत में उमास्वाति का 'तत्वार्थाधिगमसूत्र', सिद्धसेन दिवाकर का 'न्यायावतार', नेमिचंद्र का 'द्रव्यसंग्रह', मल्लिसेन की 'स्याद्धादमंजरी', प्रभाचंद्र का 'प्रमेय कमलमातंड', आदि प्रसिद्ध दार्शनिक ग्रंथ है।

उमास्वाति से जैन देह में दर्शानात्मा ने प्रवेश किया। कुछ ज्ञान की चेतना प्रस्फुटित हुई जो आगे कुंदकुंद, सिद्धसेन, अकलंक, विद्यानंद, हरिभद्र, यशोविजय, आदि रुप में विकशीत होती गयी।

साहित्य में आचार्य हेमचंद्र के योगशास्त्र का स्थान[संपादित करें]

हेमचंद्र ने अपने योगशास्त्र से सभी को गृहस्थ जीवन में आत्मसाधना की प्रेरणा दी। पुरुषार्थ से दूर रहने वाले को पुरुषार्थ की प्रेरणा दी। इनका मूल मंत्र स्वावलंबन है। वीर और द्दृढ चित पुरुषोंके लिये उनका धर्म है।

हेमचंद्राचार्य के ग्रंथो ने संस्कृत एवं धार्मिक साहित्य में भक्ति के साथ श्रवण धर्म तथा साधना युक्त आचार धर्म का प्रचार किया। समाज में से निद्रालस्य को भगाकर जाग्रति उत्पन्न की। सात्विक जीवन से दीर्घायु पाने के उपाय बताये। सदाचार से आदर्श नागरिक निर्माणकर समाज को सुव्यवस्थित करनेमें आचर्य हेमचंद्र ने अपूर्व योगदान किया।

आचार्य हेमचंद्रने तर्कशुद्ध, तर्कसिद्ध एवम भक्तियुक्त सरस वाणी के द्वारा ज्ञान चेतना का विकास किया और परमोच्च चोटी पर पहुंचा दिया। पुरानी जडता को जडमूल से उखाड फेंक दिया। आत्मविश्वास का संचार किया। आचार्य के ग्रंथो के कारण जैन धर्म गुजरात में द्दृढमूल हुआ। भारत में सर्वत्र, विशेषतः मध्य प्रदेश में जैन धर्म के प्रचार एवं प्रसार में उन के ग्रंथोने अभूतपूर्व योगदान किया। इस द्दृष्टि से जैन धर्म के साहित्य में आचार्य हेमचंद्र के ग्रंथो का स्थान अमूल्य है।

हेम प्रशस्ति[संपादित करें]

सदा ह्रदि वहेम श्री हेमसूरे: सरस्वतीम ।

सुवत्या शब्दारत्नानि ताम्रपर्णा जितायया ॥

  • ज्ञान के अगाध सागर कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्र को पार पाना अत्यंत दुष्कर है। जिज्ञासु को कार्य करने में थोडी सी प्रेरणा मिलने पर सब अपने आपको कृतार्थ समजेगें। (सोमेश्वर भट्ट की 'कीर्ति कौमिदी' में)
  • हेमचंद्र अत्यंत कुशाग्र बुद्धि थे। राजाकुमारपालके सामने किसी मत्सरीने कहा 'जैन प्रत्यक्ष देव सूर्यको नहीं मानते', ईस पर हेमचंद्रने उत्तर दिया। जैन साधु ही सूर्यनारायणको अपने ह्र्दयमें रखते है। सुर्यास्त होते ही जैन साधु अन्नजल त्याग देते है। और ऐसा कौन करता है?

गणितज्ञ के रूप में हेमचन्द्र सूरी[संपादित करें]

आचार्य हेमचन्द्र के नाम से प्रसिद्ध हेमचन्द्र सूरी (१०८९-११७२) भारतीय गणितज्ञ तथा जैन विद्वान थे। इन्होने हेमचन्द्र श्रेणी का लिखित उल्लेख किया था जिसे बाद में फिबोनाची श्रेणी के नाम से जाना गया ।

हेमचन्द्र की रचनायें[संपादित करें]

यह भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]