नारायण पण्डित (गणितज्ञ)

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

नारायण पण्डित (१३४०–१४००) केरल विद्यालय के एक मुख्य गणितज्ञ थे। उन्होंने १३५६ में गणितीय संक्रियाओं के बारे में गणित कौमुदी नामक पुस्तक लिखी। इसके फलस्वरुप en:combinatorics में कई विकास हुये।

नारायण पण्डित ने दो मुख्य लेखन किये, एक तो गणित कौमुदी नामक अंकगणितीय प्रबन्ध तथा दूसरा बीजगणित वातांश नामक बीजगणितीय प्रबन्ध। नारायण को भाष्कर द्वितीय के लीलावती तथा कर्मप्रदीपिया (अथवा कर्मपद्धति) की विस्तृत टीका के लेखक के रुप में भी जाना जाता है।[1] यद्यपि कर्मप्रदीपिका में मूल कार्य थोड़ा ही है, इसमें संख्याओं का वर्ग करने हेतु सात विभिन्न विधियाँ हैं। एक ऐसा योगदान जो कि पूर्णरुपेण लेखक का मौलिक है साथ ही बीजगणित में योगदान तथा मायावी वर्ग[1]

नारायण के अन्य मुख्य कार्यों में कई गणितीय विकास शामिल है जैसे वर्गमूल का लगभग मान निकालने हेतु एक नियम, दूसरी ऑर्डर की इण्टरमीटिएट समीकरण में छानबीन, nq2 + 1 = p2 (पैल की समीकरण), इण्टरमी़डिएट उच्च ऑर्डर समीकरणों का हल, शून्य सहित गणितीय संक्रियायें, कई ज्यामितीय नियम तथा मायावी वर्ग उसके जैसी अन्य आकृतियों की चर्चा।[1] इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि नारायण ने भाष्कर द्वितीय के कार्य डिफरेन्शियल कैलकुलस के विचार में भी थोड़ा योगदान दिया। नारायण ने चक्रीय चतुर्भुज के विषय में भी योगदान दिया।[2] नारायण को किसी क्रम के सभी परमुटेशनों की सिस्टैमैटिक रुप से उत्पत्ति हेतु एक विधि विकसित करने का भी श्रेय दिया जाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

साँचा:भारत-वैज्ञानिक-आधार

साँचा:एशिया-गणितज्ञ-आधार