लीलावती
लीलावती, भारतीय गणितज्ञ भास्कर द्वितीय द्वारा सन ११५० ईस्वी में संस्कृत में रचित, गणित और खगोल शास्त्र का एक प्राचीन ग्रन्थ है, साथ ही यह सिद्धान्त शिरोमणि का एक अंग भी है। लीलावती में अंकगणित का विवेचन किया गया है।
'लीलावती' , भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। इस ग्रन्थ में पाटीगणित (अंकगणित), बीजगणित और ज्यामिति के प्रश्न एवं उनके उत्तर हैं। प्रश्न प्रायः लीलावती को सम्बोधित करके पूछे गये हैं।
वर्ण्यविषय [संपादित करें]
लीलावती में १३ अध्याय हैं जिनमें निम्नलिखित विषयों का समावेश है-
१. परिभाषा
२. परिकर्म-अष्टक ( संकलन (जोड़) , व्यवकलन (घटाना) , गुणन (गुणा करना) , भाग (भाग करना) , वर्ग (वर्ग करना) , वर्ग मूल (वर्ग मूल निकालना) , घन (घन करना) , घन मूल (घन मूल निकालना))
३. भिन्न-परिकर्म-अष्टक
४. शून्य-परिकर्म-अष्टक
५. प्रकीर्णक
६. मिश्रक-व्यवहार - इसमें ब्याज, स्वर्ण की मिलावत आदि से सम्बन्धित प्रश्न आते हैं।
७. श्रेढी-व्यवहार
८. क्षेत्र-व्यवहार
९. खात-व्यवहार
१०. चिति-व्यवहार
११. क्रकच-व्यवहार
१२. राशि-व्यवहार
१३. छाया-व्यवहार
१४. कुट्टक
१५. अङ्क-पाश
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]
- लीलावती (संस्कृत विकिस्रोत पर)
- Lilavati of Bhaskaracharya-Original Book in English Translation
- Leelaawatii of Bhaskaracharya (कृष्णजी शंकर पटवर्धन)
- Bhaskaracharya's Lilavathi - Book Review
- Bhaskara