संस्कृत व्याकरण का इतिहास
संस्कृत का व्याकरण वेदाङ्ग है। यह वैदिक काल में ही स्वतंत्र विषय बन चुका था। नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात - ये चार आधारभूत तथ्य यास्क (ई. पू. लगभग ७००) के पूर्व ही व्याकरण में स्थान पा चुके थे। पाणिनि (ई. पू. लगभग ५५०) के पहले कई व्याकरण बनाये जा चुके थे जिन में से आपिशलि और काशकृत्स्न के व्याकरण सूत्र आज उपलब्ध हैं। किंतु संस्कृत व्याकरण का क्रमबद्ध इतिहास पाणिनि से आरंभ होता है।
व्याकरण शास्त्र के ९ कर्ता थे जिन के नाम कुछ इस प्रकार थे -
- ऐन्द्रं चान्द्रं काशकृत्स्नं कौमारं शाकटायनम्।
- सारस्वतं चापिशलि शाकलं पाणिनीयकम् ।।
व्याकरण शास्त्र का बृहद् और विस्तृत इतिहास है किंतु आचार्य पाणिनि और उन के द्वारा प्रणीत अष्टाध्यायी ग्रंथ ही इस का केन्द्र बिन्दु हैं। आचार्य पाणिनि ने अष्टाध्यायी में ३९९५ सूत्रें की रचना कर भाषा के नियमों को व्यवस्थित किया जिस में वाक्यों में पदों का संकलन, पदों का प्रकृति, प्रत्यय विभाग एवं पदों की रचना आदि प्रमुख तत्त्व हैं। इन नियम पूर्त्ति के लिये धातु पाठ, गण पाठ तथा उणादि सूत्र भी पाणिनि ने बनाये। सूत्रों में उक्त, अनुक्त एवं दुरुक्त विषयों का विचार कर कात्यायन ने वार्त्तिक की रचना की। बाद में आचार्य पतंजलि ने महाभाष्य की रचना कर संस्कृत व्याकरण को पूर्णता प्रदान की। इन्हीं तीन आचार्यों को 'त्रिमुनि' के नाम से जाना जाता है। प्राचीन व्याकरण में इन का अनिवार्यतः अध्ययन किया जाता है।
नव्य व्याकरण के अन्तर्गत प्रक्रिया क्रम के अनुसार शास्त्रों का अध्ययन किया जाता है जिस में भट्टोजीदीक्षित, नागेश भट्ट आदि आचार्यों के ग्रन्थों का अध्ययन मुख्य है। प्राचीन व्याकरण एवं नव्य व्याकरण दो स्वतंत्र विषय हैं।
पाणिनीय व्याकरण
[संपादित करें]आचार्य पाणिनि ने वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के लिए अष्टाध्यायी की रचना करी। अपने लगभग ४००० सूत्रों में उन्होंने सदा के लिए संस्कृत भाषा को परिनिष्ठित कर दिया। उन के प्रत्याहार, अनुबंध आदि गणित के नियमों की तरह सूक्ष्म और वैज्ञानिक हैं। उन के सूत्रों में व्याकरण और भाषाशास्त्र संबंधी अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश है।
कात्यायन (ई. पू. लगभग ३००) ने पाणिनि के सूत्रों पर लगभग ४२९५ वार्तिक लिखे। पाणिनि की तरह उन का भी ज्ञान व्यापक था। उन्होंने लोकजीवन के अनेक शब्दों का संस्कृत में समावेश किया और न्यायों तथा परिभाषाओं द्वारा व्याकरण का विचारक्षेत्र विस्तृत किया।
कात्यायन के वार्तिकों पर पतंजलि (ई. पू. १५०) ने महाभाष्य ग्रन्थ की रचना की। महाभाष्य आकर ग्रंथ है। इस में प्राय: सभी दार्शनिक वादों के बीज हैं। इस की शैली अनुपम है। इस पर अनेक टीकाएँ मिलती हैं जिन में भर्तृहरि की त्रिपदी, कैयट का प्रदीप और शेषनारायण का "सूक्तिरत्नाकर" प्रसिद्ध हैं। सूत्रों के अर्थ, उदाहरण आदि समझाने के लिए कई वृत्तिग्रंथ लिखे गए थे जिन में काशिका वृत्ति (छठी शताब्दी) महत्वपूर्ण है। आचार्यद्वय जयादित्य और वामन की यह एक रमणीय कृति है। इस पर वैयाकरण जिनेंद्रबुद्धि (लगभग ६५० ई.) की काशिकाविवरणपंजिका (न्यास) और वैयाकरण हरदत्त (ई. १२००) की पदमंजरी नाम से उत्तम टीकाएँ हैं। काशिका की पद्धति पर लिखे गए ग्रंथों में भागवृत्ति (अनुपलब्ध), पुरुषोत्तमदेव (ग्यारहवीं शताब्दी) की भाषावृत्ति और भट्टोजि दीक्षित (ई. १६००) का शब्दकौस्तुभ मुख्य हैं।
पाणिनि के सूत्रों के क्रम बदलकर कुछ प्रक्रियाग्रंथ भी लिखे गए जिन में धर्मकीर्ति (११वीं शताब्दी) का रूपावतार, रामचंद्र (ई. १४००) की प्रक्रियाकौमुदी, वैयाकरण भट्टोजि दीक्षित का सिद्धान्तकौमुदी और वैयाकरण नारायण भट्ट (१६वीं शताब्दी) का प्रक्रियासर्वस्व ग्रंथ उल्लेखनीय हैं। प्रक्रियाकौमुदी पर वैयाकरण विट्ठल कृत "प्रसाद" और वैयाकरण शेषकृष्ण रचित "प्रक्रिया प्रकाश" पठनीय हैं। सिद्धान्तकौमुदी पर प्रौढ़मनोरमा, तत्वबोधिनी और शब्देन्दुशेखर नामक टीकायें उल्लेखनीय हैं। प्रौढ़मनोरमा पर वैयाकरण हरि दीक्षित कृत शब्दरत्न टीका भी प्रसिद्ध है।
नागेश भट्ट (ई. १७००) के बाद व्याकरण का इतिहास धूमिल हो जाता है। टीकाग्रंथों पर टीकाएँ मिलती हैं। किसी किसी में न्यायशैली देख पड़ती है। पाणिनि संप्रदाय के पिछले १०० वर्ष के प्रसिद्ध टीकाकारों में वैद्यनाथ पायुगुण्ड, विश्वेश्वर, ओरम्भट्ट, भैरव मिश्र, राघवेन्द्राचार्य गजेंद्र गडकर, कृष्णमित्र, नित्यानंद पर्वतीय एवं जयदेव मिश्र के नाम उल्लेखनीय हैं।
संस्कृत व्याकरण का संक्षिप्त इतिहास
[संपादित करें]वेद-पुरूष के मुख के रूप में प्रसिद्ध व्याकरण ही वो वेदाङ्ग हैं जो वेदमन्त्रों का अर्थ स्पष्ट करता है और मंत्रों को प्रयोग योग्य बनाता है। व्याकरण का ज्ञान इस के प्रथम प्रवक्ता ब्रह्मा से आरम्भ होकर बृहस्पति, इन्द्र, भारद्वाज, ऋषियों तक पहुँचा । इस के पश्चात् अलग अलग ऋषियों ने अलग अलग प्रमुख ८ व्याकरण सम्प्रदायों को जन्म दिया जिन का आज नाममात्र ही शेष है। पाणिनीय व्याकरण के विकसित होने पर इस की सारगर्भित, संक्षिप्त व वैज्ञानिक पद्धति के कारण ये सभी सम्प्रदाय भुला दिये गये।
पाणिनीय व्याकरण की विकास परम्परा को ८ अवधियों में बांट सकते हैं - सूत्रकाल, वार्तिककाल, भाष्यकाल, दर्शनकाल, वृत्तिकाल, प्रक्रियाकाल, सिद्धान्तकाल और वर्तमानकाल। ७०० ईसापूर्व के लगभग यास्क ने निरुक्त ग्रन्थ की रचना की जो भाषावैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में प्रथम ग्रन्थ माना जा सकता है। ५०० ईसापूर्व में आचार्य पाणिनि ने संस्कृतभाषा का पूर्ण, संक्षिप्त व वैज्ञानिक रीति से अष्टाध्यायी ग्रन्थ लिखा। पाणिनि से पूर्व भी ८ व्याकरण सम्प्रदाय प्रचलित थे परन्तु सारगर्भित व वैज्ञानिक होने के कारण पाणिनीय संप्रदाय पिछले २१०० वर्षों से अस्तित्व में है और अष्टाध्यायी का अनुशीलन होता आया है। हमारे मत में यह अवधि 'सूत्रकाल' थी। इस के पश्चात् 'वार्तिककाल' में पाणिनीय अष्टाध्यायी को परिष्कृत व इस की व्याख्या करने के लिए ३५० ईसापूर्व में कात्यायन ने वार्तिक लिखे व कुछ सूत्रों को परिष्कृत किया। आगे चल कर इन वार्तिकों को शामिल करते हुए महर्षि पतञ्जलि ने चूर्णकशैली (dialogue) में १०० ईसापूर्व के लगभग महाभाष्य ग्रन्थ की रचना कर पाणिनीय सूत्रों की समीक्षा, टिप्पणी, विवेचना व आलोचना की है । भाषावैज्ञानिक दृष्टि से महाभाष्य में शिक्षा (phonology), व्याकरण (grammar and morphology) और निरुक्त (etymology) तीनों की चर्चा हुई है।
आचार्य पाणिनि से लेकर महाभाष्य तक के काल को 'त्रिमुनि काल' के नाम से जाना जाता है। इस के पश्चात् ५वीं शताब्दी से लेकर १५वीं शताब्दी तक इन त्रिमुनियों की व्याख्याएं हुई । ५वीं शताब्दी में वैयाकरणों ने व्याकरणशास्त्र के सिद्धान्तों को दार्शनिक दृष्टि से प्रस्तुत कर व्याकरण की दार्शनिक विचारधारा को जन्म दिया जिस का वैयाकरण भट्टोजि दीक्षित, कौण्डभट्ट, नागेश भट्ट आदि व्याकरण के भारी विद्वानों ने अनुशीलन कर अतिसूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया। ईसा की ७वीं शताब्दी के आते आते व्याकरण ग्रन्थों की व्याख्या कर इन्हें उदाहरण आदि से समझाने के लिए वृत्ति ग्रन्थ लिखे गये । इस वृत्तिकाल में जयादित्य व वामन द्वारा काशिका वृत्ति लिखी गयी जो बहुत प्रसिद्ध हुई जिस का आज भी अनुशीलन हो रहा है। वृत्तिकाल के पश्चात् नैयायिक समालोचना के समय में ११वीं सदी में विषय विभाग के आधार पर अष्टाध्यायी सूत्रों की व्याख्या करने हेतु प्रकरण ग्रन्थों की रचना प्रारम्भ हुई। इस प्रथा में रूपावतार, रूपमाला, प्रक्रियाकौमुदी, प्रक्रियासर्वस्व, सारसिद्धान्तकौमुदी, लघुसिद्धान्तकौमुदी, मध्यसिद्धान्तकौमदी, वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी इत्यादि ग्रन्थों की रचना हुई। वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में अष्टाध्यायी के सभी सूत्रों को प्रक्रियाक्रम से विवेचित कर उन की वृत्ति देते हुए शब्दरूपों की सिद्धि में उन का विनियोग प्रदर्शित किया गया जिस के कारण यह इतनी लोकप्रिय हुई कि अष्टाध्यायी क्रम की शास्त्र परम्परा ही लुप्त हो गयी। सिद्धान्तकौमुदी के प्रचलन ने बोपदेव के मुग्धबोध, कातन्त्र, चान्द्र व्याकरण आदि को भी बाहर कर दिया । अब पाणिनीय व्याकरण ही प्रचलित है।
परवर्ती काल में सिद्धान्तकौमुदी पर अनेक व्याख्याएं हुई जिन में प्रौढ़मनोरमा, बालमनोरमा, लघुसिद्धान्तकौमुदी, शब्देन्दुशेखर आदि प्रमुख हैं। १६वीं - १७वीं शताब्दियों में नव्यन्याय की प्रतिपादन शैली में गम्भीर और सूक्ष्म विवेचन प्रारम्भ हुआ जिसे सिद्धान्तकाल कह सकते हैं। इस में कौण्डभट्ट, नागेश भट्ट जैसे अद्भुत विद्वान् प्रसिद्ध रहे हैं। इस के बाद १८वीं से २०वीं शताब्दियों के मध्य व्याकरण ग्रन्थों की टीकाएं अधिकांश रूप में हिन्दी भाषा में होने लगी। अतः इस काल को अनुवादकाल कह सकते हैं। २१वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही संस्कृत व्याकरण ग्रन्थों की टीकाएं आंग्ल भाषा में तेजी से लिखी जाने लगी। २१वीं शताब्दी के द्वितीय दशक से व्याकरण के सिद्धान्तों के आधार पर तकनीकी निर्माण कार्य हो रहा है।
अपाणिनीय व्याकरण
[संपादित करें]पाणिनीय व्याकरण के अतिरिक्त संस्कृत के जो अन्य व्याकरण इस समय उपलब्ध हैं वे सभी पाणिनि की शैली से प्रभावित हैं। अवश्य ऐन्द्र व्याकरण को कुछ लोग पाणिनि के पूर्व का मानते हैं। किंतु यह मत असंदिग्ध नहीं है। विदेशी बर्नल के मत में ऐन्द्र व्याकरण का संबंध कातन्त्र से और तमिल के प्राचीनतम व्याकरण तोल्काप्पियम से है। ऐन्द्र व्याकरण के आधार पर सातवाहन युग में शर्व वर्मा ने कातन्त्र व्याकरण की रचना की। इस के दूसरे नाम कालापक और कौमार भी हैं। इस पर दुर्ग सिंह की टीका प्रसिद्ध है। चान्द्र व्याकरण चन्द्रगोमी (ई. ५००) की रचना है। इस पर उन की वृत्ति भी है। इस की शैली से काशिकाकार प्रभावित हैं। जैनेन्द्र व्याकरण जैन आचार्य देवनन्दी (लगभग छठी शताब्दी) की रचना है। इस पर अभयनन्दी की वृत्ति प्रसिद्ध है। उदाहरण में जैन संप्रदाय के शब्द मिलते हैं। जैनेन्द्र व्याकरण के आधार पर किसी जैन आचार्य ने ९वीं शताब्दी में शाकटायन व्याकरण लिखा और उस पर अमोघवृत्ति की रचना की। इस पर प्रभावचन्द्राचार्य का न्यास और यक्ष वर्मा की वृत्ति प्रसिद्ध हैं।
धारेश्वर महाराज भोज (११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध) का सरस्वतीकण्ठाभरण व्याकरण में वार्तिकों और गणपाठों को सूत्रों में मिला दिया गया है। पाणिनि के अप्रसिद्ध शब्दों के स्थान पर सुबोध शब्द रखे गए हैं। इस पर दंडनाथ नारायण की हृदयहारिणी टीका है। सिद्धहेम अथवा हेम व्याकरण आचार्य हेमचंद्र (ग्यारहवीं शताब्दी) रचित है। इस में संस्कृत के साथ साथ प्राकृत और अपभ्रंश व्याकरण का भी समावेश है। इस पर ग्रंथकार का न्यास और देवेंद्र सूरि का लघुन्यास उल्लेखनीय हैं। सारस्वत व्याकरण के कर्ता अनुभूतिस्वरूपाचार्य (१३वीं शताब्दी) हैं। इस पर सारस्वत प्रक्रिया और रघुनाथ का लघुभाष्य ध्यान देने योग्य हैं। इस का प्रचार बिहार में पिछली पीढ़ी तक था। पण्डित बोपदेव (१३वीं शताब्दी) का मुग्धबोध व्याकरण नितांत सरल है। इस का प्रचार अभी हाल तक बंगाल में रहा है। पद्मनाभ दत्त ने (१५वीं शताब्दी) सुपद्म व्याकरण लिखा है। शेष श्रीकृष्ण (१६वीं शताब्दी) की पदचंद्रिका एक स्वतंत्र व्याकरण है। इस पर उन की पदचंद्रिकावृत्ति उल्लेखनीय है। वैयाकरण क्रमदीश्वर का संक्षिप्तसार (जौमार) और रूपगोस्वामी का हरिनामामृत भी स्वतंत्र व्याकरण हैं। कवीन्द्राचार्य के संग्रह में ब्रह्मव्याकरण, यमव्याकरण, वरुणव्याकरण, सौम्यव्याकरण और शब्दतर्कव्याकरण के हस्तलेख थे जिन के बारे में आज विशेष ज्ञान नहीं है। प्रसिद्ध किंतु अनुपलब्ध व्याकरणों में वामनकृत विश्रांतविद्याधर उल्लेखनीय है।
गणपाठ एवं धातुपाठ
[संपादित करें]प्रमुख संस्कृत व्याकरणों के अपने अपने गणपाठ और धातुपाठ हैं। गणपाठ संबंधी स्वतंत्र ग्रंथों में वर्धमान (१२वीं शताब्दी) का गणरत्नमहोदधि और भट्ट यज्ञेश्वर रचित गणरत्नावली (ई. १८७४) प्रसिद्ध हैं। उणादि के विवरणकारों में उज्जवलदत्त प्रमुख हैं। आचार्य काशकृत्स्न का धातुपाठ कन्नड भाषा में प्रकाशित है। भीमसेन का धातुपाठ भोट में प्रकाशित है। पूर्णचन्द्र का धातुपारायण, मैत्रेयरक्षित (१०वीं शताब्दी) का धातुप्रदीप, क्षीरस्वामी (११वीं शताब्दी) की क्षीरतरंगिणी, सायण की माधवीय धातुवृत्ति, श्रीहर्षकीर्ति की धातुतरंगिणी, बोपदेव का कविकल्पद्रुम, भट्टमल्ल की आख्यातचंद्रिका विशेष उल्लेखनीय हैं। लिंग बोधक ग्रंथों में पाणिनि, वररुचि, वामन, हेमचंद्र, शाकटायन, शांतनवाचार्य, हर्षवर्धन आदि के लिंगानुशासन प्रचलित हैं। इस विषय की प्राचीन पुस्तक "लिंगकारिका" अनुपलब्ध है।
संस्कृत व्याकरण का दार्शनिक विवेचन
[संपादित करें]संस्कृत व्याकरण के दार्शनिक पक्ष का विवेचन व्याडि (लगभग ई. पू. ४००) के "संग्रह" से आरंभ होता है जिस के कुछ वाक्य ही आज अवशेष हैं। भर्तृहरि (लगभग ई. ५००) का वाक्यपदीय व्याकरणदर्शन का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ है। स्वोपज्ञवृत्ति के अतिरिक्त इस पर वृषभदेव (छठी शताब्दी), पुण्यराज (नवीं शताब्दी) और हेलाराज (१०वीं शताब्दी) की टीकाएँ विश्रुत हैं। कौंडभट्ट (ई. १६००) का वैयाकरणभूषण और नागेश भट्ट का वैयाकरणसिद्धान्तमंजूषा उल्लेखनीय हैं। नागेश भट्ट का स्फोटवाद, कृष्णभट्टमौनि का स्फोटचंद्रिका और भरतमिश्र की स्फोटसिद्धि भी इस विषय के लघुकाय ग्रंथ हैं। सीरदेव की परिभाषावृत्ति, पुरुषोत्तमदेव की परिभाषावृत्ति, विष्णुशेष का परिभाषाप्रकाश और नागेश भट्ट का परिभाषेंदुशेखर पठनीय हैं। पिछले डेढ़ सौ वर्षों में परिभाषेंदुशेखर पर लगभग २५ टीकाएँ लिखी गई हैं जिन में गदा, भैरवी, भावार्थदीपिका के अतिरिक्त तात्या शास्त्री पटवर्धन, गणपति शास्त्री मोकाटे, भास्कर शास्त्री, वासुदेव अभ्यंकर, मन्युदेव, चिद्रूपाश्रय आदि विद्वानों की टीकाएँ हैं।
पश्चिम के विद्वानों का योगदान
[संपादित करें]संस्कृत व्याकरण के इतिहास में यूरोप के विद्वानों का भी योग है। पी. सासेती ने, जो १५८३ से १५८८ तक भारत में था, संस्कृत और इटली की भाषा का साम्य दिखलाया था। किन्तु संस्कृत का नियमबद्ध व्याकरण जर्मन यहूदी जे. ई. हाक्सेलेडेन ने लिखा। उस की अप्रकाशित कृति के आधार पर जर्मन पादरी पौलिनस ने १७९० में संस्कृत का व्याकरण प्रकाशित किया जिस का नाम "सिद्ध रुबम्स्यू ग्रामाटिका संस्कृडामिका" था। फोर्ट विलियम कालेज के अध्यापक डॉ॰ विलियम कैरे ने १८०२ में संस्कृत का व्याकरण आंग्ल भाषा में प्रकाशित किया। विलियम कोलब्रुक ने १८०५ में, विलकिन्स ने १८०८ में, फोरेस्टर ने १८१० में, संस्कृत के व्याकरण लिखे। १८२३ में ओथमार फ्रांक ने लैटिन भाषा में संस्कृत व्याकरण लिखा। १८३४ में बोप्प ने जर्मन भाषा में संस्कृत व्याकरण लिखा जिस का नाम "क्रिटिशे ग्रामाटिक डे संस्कृत स्प्राख" है। बेनफी ने १८६३ में, कीलहार्नं ने १८७० में, मॉनिअर विलियम्स ने १८७७ में और अमरीका के ह्विटनी ने १८७९ में अपने संस्कृत व्याकरण प्रकाशित किए। एल. रेनो ने फ्रेंच भाषा में संस्कृत व्याकरण (१९२०) और वैदिक व्याकरण (१९५२) प्रकाशित किए। गणपाठ और धातुपाठ के संबंध में वेस्टरगार्द का रेडिसेज लिंग्वा संस्कृता (1841), बोटलिंक का पाणिनि ग्रामाटिक (1887), लीबिश का धातुपाठ (1920) ओर राबर्टं बिरवे का "डर गणपाठ" (1961) उल्लेखनीय हैं। यूरोप के विद्वानों की कृतियों में मैकडोनेल का "वैदिक ग्रामर" (1910) और वाकरनागेल का "आल्ट्इंडिश ग्रामटिक" (3 भाग, 1896-1954) उत्कृष्ट ग्रंथ हैं। अंग्रेजी में लिखित श्री काले का "हायर संस्कृत ग्रामर" भी प्रसिद्ध है।
संस्कृत व्याकरण का इतिहास पिछले ढाई हजार वर्ष से टीका टिप्पणी के माध्यम से अविच्छिन्न रूप में अग्रसर होता रहा है। इसे सजीव रखने में उन ज्ञात अज्ञात सहस्रों विद्वानों का सहयोग रहा है जिन्होंने कोई ग्रंथ तो नहीं लिखा, किंतु अपना जीवन व्याकरण के अध्यापन में बिताया।
संस्कृत के व्याकरण ग्रन्थ और उनके रचयिता
[संपादित करें]इन्हें भी देखें
[संपादित करें]बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]- यास्क एवं पाणिनि : काल तथा विषयवस्तु का अन्तराल
- A History of Sanskrit Literature
- संस्कृत व्याकरण-शास्त्र का इतिहास (युधिष्ठिर मीमांसक)
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- जैन संस्कृत व्याकरण परम्परा[मृत कड़ियाँ]