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व्याकरण (वेदांग)

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वेदाङ्ग (= वेद का अंग) छः हैं, जिस में से व्याकरण एक है। संस्कृत भाषा को शुद्ध रूप में जानने के लिए व्याकरण शास्त्र का अधययन किया जाता है। अपनी इस विशेषता के कारण ही यह वेद का सर्वप्रमुख अंग माना जाता है। इस के मूलतः पाँच प्रयोजन हैं - रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असंदेह।

व्याकरण की जड़ें वैदिकयुगीन भारत तक जाती हैं। व्याकरण की परिपाटी अत्यन्त समृद्ध है जिस में पाणिनि का अष्टाध्यायी नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ भी शामिल है। 'व्याकरण' से मात्र 'ग्रामर' का अभिप्राय नहीं होता बल्कि यह भाषाविज्ञान के अधिक निकट है। साथ ही इस का दार्शनिक पक्ष भी है।

संस्कृत व्याकरण वैदिक काल में ही स्वतंत्र विषय बन चुका था। नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात - ये चार आधारभूत तथ्य यास्क (ई. पू. लगभग ७००) के पूर्व ही व्याकरण में स्थान पा चुके थे। पाणिनि (ई. पू. लगभग ५५०) के पहले कई व्याकरण लिखे जा चुके थे जिन में केवल आपिशलि और काशकृत्स्न के कुछ सूत्र आज उपलब्ध हैं। किंतु संस्कृत व्याकरण का क्रमबद्ध इतिहास पाणिनि से आरंभ होता है।

संस्कृत व्याकरण का इतिहास पिछले ढाई हजार वर्ष से टीका - टिप्पणी के माध्यम से अविच्छिन्न रूप में अग्रसर होता रहा है। इसे सजीव रखने में उन ज्ञात अज्ञात सहस्रों विद्वानों का सहयोग रहा है जिन्होंने कोई ग्रंथ तो नहीं लिखा, किंतु अपना जीवन व्याकरण के अध्यापन में बिताया।

संस्कृत व्याकरण का इतिहास

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पाणिनीय व्याकरण

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पाणिनि ने वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत दोनों के लिए "अष्टाध्यायी" की रचना की। अपने लगभग ४००० सूत्रों में उन्होंने सदा के लिए संस्कृत भाषा को परिनिष्ठित कर दिया। उन के प्रत्याहार, अनुबन्ध आदि गणित के नियमों की तरह सूक्ष्म और वैज्ञानिक हैं। उन के सूत्रों में व्याकरण और भाषाशास्त्र सम्बन्धी अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश है।

कात्यायन (ई. पू. लगभग ३००) ने पाणिनि के सूत्रों पर लगभग ४२९५ वार्तिक लिखे। पाणिनि की तरह उन का भी ज्ञान व्यापक था। उन्होंने लोकजीवन के अनेक शब्दों का संस्कृत में समावेश किया और न्यायों तथा परिभाषाओं द्वारा व्याकरण का विचारक्षेत्र विस्तृत किया। कात्यायन के वार्तिकों पर पतंजलि (ई. पू. १५०) ने महाभाष्य की रचना की। महाभाष्य आकर - ग्रंथ है। इस में प्राय: सभी दार्शनिक वादों के बीज हैं। इस की शैली अनुपम है। इस पर अनेक टीकाएँ मिलती हैं जिन में भर्तृहरि की "त्रिपादी", कैयट का "प्रदीप" और शेषनारायण का "सूक्तिरत्नाकर" प्रसिद्ध हैं। सूत्रों के अर्थ, उदाहरण आदि समझाने के लिए कई वृत्तिग्रंथ लिखे गए थे जिन में काशिकावृत्ति (छठी शताब्दी) महत्वपूर्ण है। जयादित्य और वामन नाम के आचार्यों की यह रमणीय कृति है। इस पर जिनेन्द्रबुद्धि (लगभग ६५० ई.) की काशिकाविवरणपंजिका (न्यास) और हरदत्त (ई. 1200) की पदमंजरी उत्तम टीकाएँ हैं। काशिका की पद्धति पर लिखे गए ग्रंथों में भागवृत्ति (अनुपलब्ध), पुरुषोत्तमदेव (११वीं शताब्दी) की भाषावृत्ति और भट्टोजि दीक्षित (ई. १६००) का शब्दकौस्तुभ मुख्य हैं।

प्रक्रिया ग्रंथ

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पाणिनि के सूत्रों के क्रम बदलकर कुछ प्रक्रियाग्रंथ भी लिखे गए जिनमें धर्मकीर्ति (ग्यारहवीं शताब्दी) का रूपावतार, रामचन्द्र (ई। १४००) की प्रक्रियाकौमुदी, भट्टोजि दीक्षित की सिद्धान्तकौमुदी और नारायण भट्ट (सोलहवीं शताब्दी) का प्रक्रियासर्वस्व उल्लेखनीय हैं। प्रक्रियाकौमुदी पर विट्ठलकृत "प्रसाद" और शेषकृष्णरचित "प्रक्रिया प्रकाश" पठनीय हैं। सिद्धान्तकौमुदी की टीकाओं में प्रौढमनोरमा, तत्वबोधिनी और शब्देन्दुशेखर उल्लेखनीय हैं। प्रौढमनोरमा पर हरि दीक्षित का शब्दरत्न भी प्रसिद्ध है। नागेश भट्ट (ई. १७००) के बाद व्याकरण का इतिहास धूमिल हो जाता है। टीकाग्रंथों पर टीकाएँ मिलती हैं। किसी किसी में न्यायशैली देख पड़ती है। पाणिनिसम्प्रदाय के पिछले दो सौ वर्ष के प्रसिद्ध टीकाकारों में वैद्यनाथ पायुगुंड, विश्वेश्वर, ओरम्भट्ट, भैरव मिश्र, राघवेन्द्राचार्य, गजेन्द्र गडकर, कृष्णमित्र, नित्यानन्द पर्वतीय एवं जयदेव मिश्र के नाम उल्लेखनीय हैं।

अन्य व्याकरण

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पाणिनीय व्याकरण के अतिरिक्त संस्कृत के जो अन्य व्याकरण इस समय उपलब्ध हैं वे सभी पाणिनि की शैली से प्रभावित हैं। अवश्य ऐंद्र व्याकरण को कुछ लोग पाणिनि के पूर्व का मानते हैं। किंतु यह मत असंदिग्ध नहीं है। बर्नल के अनुसार ऐंद्र व्याकरण का संबंध कातंत्र से और तमिल के प्राचीनतम व्याकरण तोल्काप्पियम से है। ऐन्द्र व्याकरण के आधार पर सातवाहन युग में शर्व वर्मा ने कातन्त्र व्याकरण की रचना की। इस के दूसरे नाम कालापक और कौमार भी हैं। इस पर दुर्गसिंह की टीका प्रसिद्ध है। चान्द्र व्याकरण चंद्रगोमी (ई. ५००) की रचना है। इस पर उन की वृत्ति भी है। इस की शैली से काशिकाकार प्रभावित हैं।

जैनेन्द्र व्याकरण, जैन आचार्य देवनन्दी (लगभग छठी शताब्दी) की रचना है। इस पर अभयनन्दी की वृत्ति प्रसिद्ध है। उदाहरण में जैन संप्रदाय के शब्द मिलते हैं। जैनेन्द्र व्याकरण के आधार पर किसी जैन आचार्य ने ९वीं शताब्दी में शाकटायन व्याकरण लिखा और उस पर अमोघवृत्ति की रचना की। इस पर प्रभाचन्द्राचार्य का न्यास और यक्ष वर्मा की वृत्ति प्रसिद्ध हैं। भोज (११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध) का सरस्वतीकण्ठाभरण व्याकरण में वार्तिकों और गणपाठों को सूत्रों में मिला दिया गया है। पाणिनि के अप्रसिद्ध शब्दों के स्थान पर सुबोध शब्द रखे गए हैं। इस पर दंडनाथ नारायण की हृदयहारिणी टीका है। सिद्ध हेम अथवा हेम व्याकरण आचार्य हेमचन्द्र (११वीं शताब्दी) रचित है। इसमें संस्कृत के साथ साथ प्राकृत और अपभ्रंश व्याकरण का भी समावेश है। इस पर ग्रंथकार का न्यास और देवेन्द्र सूरि का लघुन्यास उल्लेखनीय हैं। सारस्वत व्याकरण के कर्ता अनुभूतिस्वरूपाचार्य (१३वीं शताब्दी) हैं। इस पर सारस्वत प्रक्रिया और रघुनाथ का लघुभाष्य ध्यान देने योग्य हैं। इस का प्रचार बिहार में पिछली पीढ़ी तक था। बोपदेव (तेरहवीं शताब्दी) का मुग्धबोध व्याकरण नितान्त सरल है। इस का प्रचार अभी हाल तक बंगाल में रहा है। पद्मनाभदत्त ने (१५वीं शताब्दी) सुपद्य व्याकरण लिखा है। शेष श्रीकृष्ण (१६वीं शताब्दी) की पदचन्द्रिका एक स्वतंत्र व्याकरण है। इस पर उन की पदचन्द्रिकावृत्ति उल्लेखनीय है। क्रमदोश्वर का संक्षिप्तसार (जौमार) और रूपगोस्वामी का हरिनामामृत भी स्वतंत्र व्याकरण हैं। कवीन्द्राचार्य के संग्रह में ब्रह्मव्याकरण, यमव्याकरण, वरुणव्याकरण, सौम्यव्याकरण और शब्दतर्कव्याकरण के हस्तलेख थे जिन के बारे में आज विशेष ज्ञान नहीं है। प्रसिद्ध किन्तु अनुपलब्ध व्याकरणों में वामनकृत विश्रान्तविद्याधर उल्लेखनीय है।

पञ्चाङ्ग व्याकरण

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व्याकरणशास्त्र में पाँच अंगों की परम्परा दिखती है, इसीलिये 'पंचांग व्याकरण' भी प्रसिद्ध है। पाँच अंग ये हैं- सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिपाठ तथा लिंगानुशासन। संस्कृतवांङ्मय में पाणिनि का 'शब्दानुशासन' पाँच अवयवों से युक्त है। प्रमुख संस्कृत व्याकरणों के अपने-अपने गणपाठ और धातुपाठ हैं।

धातुपाठ

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संस्कृत व्याकरण में क्रियाओं के मूल रूप को धातु' कहते हैं। पञ्चाङों में से धातुपाठ अतिमहत्वपूर्ण है। धातु ही संस्कृत शब्दों के निर्माण के लिए मूल तत्त्व (कच्चा माल) है। इन की संख्या लगभग २०१२ है। धातुओं के साथ उपसर्ग, प्रत्यय मिलकर तथा सामासिक क्रियाओं के द्वारा सभी शब्द (संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आदि) बनते हैं। दूसरे शब्द में कहें तो संस्कृत का लगभग हर शब्द अन्ततः धातुओं के रूप में तोड़ा जा सकता है। कृ, भू, स्था, अन्, ज्ञा, युज्, गम्, मन्, जन्, दृश् आदि कुछ प्रमुख धातुएँ हैं। 'धातु' शब्द स्वयं 'धा' में 'तिन्' प्रत्यय जोड़ने से बना है।

प्रायः सभी शब्दों की व्युत्पत्ति धातुओं से की जाती है। कहा गया है - सर्वं च नाम धातुजमाह।

अनेकों वैयाकरणों ने धातुपाठों का प्रवचन किया है। युधिष्ठिर मीमांसक ने व्याकरशास्त्र के इतिहास में २६ वैयाकरणों का उल्लेख किया है। उन के व्याकरण आजकल प्राप्त नहीं हैं। अतः कहना कठिन है कि किन किन ने धातुओं का प्रवचन किया।

काशकृत्स्न का धातुपाठ कन्नड भाषा में प्रकाशित है। भीमसेन का धातुपाठ तिब्बती (भोट) में प्रकाशित है। पूर्णचन्द्र का धातुपारायण, मैत्रेयरक्षित (१०वीं शताब्दी) का धातुप्रदीप, क्षीरस्वामी (दसवीं शताब्दी) की क्षीरतरंगिणी, सायण की माधवीय धातुवृत्ति, श्रीहर्षकीर्ति की धातुतरंगिणी, बोपदेव का कविकल्पद्रुम, भट्टमल्ल की आख्यातचन्द्रिका विशेष उल्लेखनीय हैं।

गणपाठ सम्बन्धी स्वतंत्र ग्रन्थों में वर्धमान (१२वीं शताब्दी) का गणरत्नमहोदधि और भट्ट यज्ञेश्वर रचित गणरत्नावली (१८७४ ई.) प्रसिद्ध हैं।

उणादिपाठ

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उणादि के विवरणकारों में उज्जवलदत्त प्रमुख हैं।

लिंगानुशासन

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लिंगबोधक ग्रंथों में पाणिनि, वररुचि, वामन, हेमचन्द्र, शाकटायन, शांतनवाचार्य, हर्षवर्धन आदि के लिंगानुशासन प्रचलित हैं। इस विषय की प्राचीन पुस्तक "लिंगकारिका" अनुपलब्ध है।

संस्कृत व्याकरण का दार्शनिक पक्ष

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व्याकरण–दर्शन दर्शनशास्त्र की एक विधा है।

संस्कृत व्याकरण के दार्शनिक पक्ष का विवेचन व्याडि (लगभग 400 ईसापूर्व) के "संग्रह" से आरम्भ होता है जिसके कुछ वाक्य ही आज अवशेष हैं।

भर्तृहरि (लगभग ई. ५००) का वाक्यपदीय व्याकरणदर्शन का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ है। स्वोपज्ञवृत्ति के अतिरिक्त इसपर वृषभदेव (छठी शताब्दी), पुण्यराज (नवीं शताब्दी) और हेलाराज (दसवीं शताब्दी) की टीकाएँ विश्रुत हैं। भर्तृहरि द्वारा प्रणीत ‘वाक्यपदीयम्’ व्याकरण–दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है। यही कारण है कि वाक्यपदीय नामक ग्रन्थ व्याकरण–दर्शन से सम्बन्धित होने के कारण केवल व्याकरण के अध्येताओं के लिए ही नहीं; अपितु दर्शन के अध्येताओं के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। वाक्यपदीय के तीनों काण्ड–ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड और पदकाण्ड, वाक्यपदीय में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं किन्तु वाक्यपदीय वह ग्रन्थ है जो विशेष रूप से पद और वाक्यों से सम्बन्धित ग्रन्थ है। प्रथमकाण्ड में शब्दब्रह्म के स्वरूप का विमर्श होने के कारण, वह काण्ड समग्र वाक्यपदीय ग्रन्थ की प्रस्तावनाभूत मूलतत्त्व का विशद वर्णन करता है। वैयाकरणों के अनुसार वाक्य ही लौकिक व्यवहार का साधन होता है, इसलिए वर्ण, पद की अपेक्षा वाक्य ही प्रधान होता है। वाक्यपदीय के नाम से ही स्पष्ट है कि यह ग्रन्थ केवल वाक्य से ही नहीं अपितु वाक्य जिन पदों से बनता है उससे भी सम्बन्धित है। अतः वाक्यपदीय के तीनों काण्डों में ब्रह्म–वाक्य–पद तीनों का विशद रूप से प्रतिपादन किया गया है।

कौंडभट्ट (ई. १६००) का वैयाकरणभूषण और नागेश की वैयाकरण सिद्धांतमंजूषा उल्लेखनीय हैं। नागेश का स्फोटवाद, कृष्णभट्टमौनि की स्फोटचंद्रिका और भरतमिश्र की स्फोटसिद्धि भी इस विषय के लघुकाय ग्रंथ हैं। सीरदेव की परिभाषावृत्ति, पुरुषोत्तमदेव की परिभाषावृत्ति, विष्णुशेष का परिभाषाप्रकाश और नागेश का परिभाषेंदुशेखर पठनीय हैं। पिछले डेढ़ सौ वर्षों में परिभाषेंदुशेखर पर लगभग २५ टीकाएँ लिखी गई हैं जिनमें गदा, भैरवी, भावार्थदीपिका के अतिरिक्त तात्या शास्त्री पटवर्धन, गणपति शास्त्री मोकाटे, भास्कर शास्त्री, वासुदेव अभ्यंकर, मन्युदेव, चिद्रूपाश्रय आदि की टीकाएँ हैं।

कुछ लोग बीजगणित के मूल में व्याकरण को देखते हैं क्योंकि व्याकरण में किसी मूल शब्द को विभिन्न शब्दों में बदलने की व्यवस्था थी जो बीजगणित में 'किसी प्रतीक या चर (variable) द्वारा विभिन्न मान ग्रहण करने' से काफी मिलती है।

संस्कृत व्याकरण के इतिहास में विदेशी विद्वानों का योगदान

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संस्कृत व्याकरण के इतिहास में पश्चिम के विद्वानों का भी योगदान है। है। पी. सासेती ने, जो १५८३ से १५८८ तक भारत में था, संस्कृत और इटली की भाषा का साम्य दिखलाया था। किंतु संस्कृत का नियमबद्ध व्याकरण जर्मन-यहूदी जे. ई. हाक्सेलेडेन ने लिखा। उसकी अप्रकाशित कृति के आधार पर जर्मन पादरी पौलिनस ने 1790 में संस्कृत का व्याकरण प्रकाशित किया जिसका नाम "सिद्ध रुबम्" स्यू ग्रामाटिका संस्कृडामिका" था। फोर्ट विलियम कालेज के अध्यापक डॉ॰ विलियम कैरे ने 1802 में संस्कृत का व्याकरण अँगरेजी में प्रकाशित किया। कोलब्रुक ने 1805 में, विलकिन्स ने 1808 में, फोरेस्टर ने 1810 में, संस्कृत के व्याकरण लिखे। 1823 में ओथमार फ्रांक ने लैटिन भाषा में संस्कृत व्याकरण लिखा। 1834 में बोप्प ने जर्मन भाषा में संस्कृत व्याकरण लिखा जिस का नाम "क्रिटिशे ग्रामाटिक डे संस्कृत स्प्राख" है। बेनफी ने 1863 में, कीलहार्नं ने 1870 में, मॉनिअर विलियम्स ने 1877 में और अमरीका के ह्विटनी ने 1879 में अपने संस्कृत व्याकरण प्रकाशित किए। एल. रेनो ने फ्रेंच भाषा में संस्कृत व्याकरण (1920) और वैदिक व्याकरण (1952) प्रकाशित किए। गणपाठ और धातुपाठ के संबंध में वेस्टरगार्द का रेडिसेज लिंग्वा संस्कृता (1841), बोटलिंक का पाणिनि ग्रामाटिक (1887), लीबिश का धातुपाठ (1920) ओर राबर्टं बिरवे का "डर गणपाठ" (1961) उल्लेखनीय हैं। यूरोप के विद्वानों की कृतियों में मैकडोनेल का "वैदिक ग्रामर" (1910) और वाकरनागेल का "आल्ट्इंडिश ग्रामटिक" (३ भाग, १८९६ - १९५४) उत्कृष्ट ग्रंथ हैं। अंग्रेजी में लिखित मोरेश्वर रामचन्द्र काले का "हायर संस्कृत ग्रामर" भी प्रसिद्ध है।

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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