प्रसाद
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प्रसाद, पूजा के बाद वितरित करने वाले पदार्थ को कहते हैं। सामान्यतः यह कोई खाद्य पदार्थ होता है किंतु कभी-कभी कपड़े इत्यादि को भी प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।हिन्दुओं का ऐसा मानना हैं कि पूजा के समय जब कोई खाद्य सामग्री देवी-देवताओं के समक्ष भोग स्वरूप प्रस्तुत की जाती हैं तो देवी-देवता उसे ग्रहण करते हैं,अगर खाने की वस्तु नहीं है जैसे कपड़े स्वर्ण, द्रव्य इत्यादि तो वे उसे स्वीकार करते हैं। अपने इष्टदेव को लगाए गए भोग को खाना या इस्तेमाल करना हिन्दू अपना परम सौभाग्य समझते हैं, अतः भगवान या देवी-देवताओं को अर्पित भोग को प्रसाद कहा जाता है।
कबीरवाणी के अनुसार परमात्मा को भोग लगाने के पश्चात बचे हुए भोजन को प्रसाद कहा जाता है। कई आध्यात्मिक संस्थान बड़े-बड़े भंडारों के माध्यम से प्रसाद वितरण करते हैं। कबीरपंथी संत रामपाल के आश्रम में होने वाले भंडारे दुनिया के सबसे बड़े भंडारे माने जाते हैं। वे अपने भंडारों को कबीर के दिव्य धर्मयज्ञ से प्रेरित बताते हैं जिसमें कबीर के केशव बंजारा नामक शिष्य ने 18 लाख लोगों और साधूसंतों को तीन दिन तक रुचिकर भोजन व हरबार भोजन के साथ एक सोने की मोहर व कीमत दोहर(कम्बल) भी दी थी। हालांकि यह भी मान्यता है कि कबीर ही केशव बंजारा रूप धारण कर आए थे।[1][2]
- ↑ "संत रामपाल महाराज कथाः सतलोक आश्रम सोजत में तीन का दिव्य धर्म यज्ञ भंडारा | Marwar Patrika (MPatrika.com)" (अमेरिकी अंग्रेज़ी भाषा में). 2022-11-03. मूल से से 1 नवंबर 2023 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 2023-10-12.
- ↑ "Shamli News: सतलोक आश्रम वेदखेड़ी में तीन दिवसीय समागम का शुभारंभ". Amar Ujala. अभिगमन तिथि: 2023-11-29.