बावजी चतुर सिंहजी

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सन्त कवि महाराज चतुर सिंहजी जो अब बावजी चतुर सिंहजी के नाम से भी जाने जाते हैं, भारत के एक लोकप्रिय संत-कवि थे।[1] उनका जन्म करजली परिवार में हुआ था जो मेवाड़ के 61वें महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (उदयपुर, शासनकाल 1710-1734 ई.) के तीसरे पुत्र महाराज बाग सिंह के वंशज हैं। इनके पिता का नाम महाराज सूरत सिंह था जबकि माता का नाम रानी कृष्ण कँवर था। चतुर सिंहजी चार भाइयों में सबसे छोटे थे, उनका विवाह चापपोली के ठाकुर इंदर सिंह के छोटे भाई ठाकुर मगन सिंह की पुत्री लाड कुंवर से हुआ था, परिवार में इकलौती संतान होने के कारण उनका नाम लाड (प्रिय / प्रिय / प्रिय बच्चा) कुंवर रखा गया था!  बावजी की शादी 19 साल की उम्र में हुई और उनकी दो बेटियां हुईं, एक की बचपन में ही मृत्यु हो गई, जबकि दूसरे सयार कुंवर की शादी गुजरात के विजयनगर के महाराज हमीर सिंहजी से हुई।[2]

रचनाएं[संपादित करें]

बावजी चतुर सिंह जी ने मेवाड़ी भाषा में रचनाएं की।[3] दैनिक सहायता और संगति के लिए, बावजी ने रूपा, कन्ना, देवला, उद्धा, शंकर और अपने समाज सुधारवादी विचारों के प्रसार के लिए उन्हें संबोधित कई कविताएँ लिखीं।

महाराज चतुर सिंहजी एक महान कवि (शब्द-स्मिथ!) होने के साथ-साथ एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व थे।  उनकी रचनाएँ आध्यात्मिक ज्ञान और लोक व्यवहार का संतुलित मिश्रण हैं।  हमारे दिन-प्रतिदिन की घटनाओं के माध्यम से सरल भाषा में सुनाई गई, उन्होंने सबसे कठिन ज्ञान को ऐसे तरीके से समझाया है जो आसानी से समझ में आता है और मामला हमारे दिल और दिमाग को छूता है।[4]


सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Kanhaiyalal Rajpurohit, Bavji Chtur Singhji - Rajasthani Writer, 1996, page 96, ISBN 81-260-0163-1
  2. "राजसी मन में जलाई वैराग्य की ज्योत, मेवाड़ में फैलाया 'चतुर' प्रकाश". Dainik Bhaskar. अभिगमन तिथि 2021-06-07.
  3. Chauhan, Vinod. "Jobs: नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के लिए शानदार मौका, इन विभाग में निकली बंपर भर्ती, जल्दी करें आवेदन". Patrika News. अभिगमन तिथि 2021-06-07.
  4. "बावजी चतुरसिंह जी की जयंती कल". Dainik Bhaskar. अभिगमन तिथि 2021-06-07.